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पाकिस्तान में भी कुछ साहसी लोग इस्लाम के मूल तत्वों और खुद मोहम्मद साहब (स.अ.व.) ने जिस सहिष्णुता का प्रदर्शन किया था उससे लोगों को परिचित कराने का प्रयास कर रहे हैं। मोहम्मद साहब(स.अ.व.) ने अपने जीवनकाल में उनका अपमान करने वालों और उन्हें भड़काने वालों के साथ भी सहिष्णुता दिखाई थी।
नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के व्यक्तित्व के निर्माण में अक्सर एक समस्या ये आती है कि आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के जन्म से लेकर कुरान के आप पर नाज़िल होने से पहले के जीवन के बारे में कुरान लगभग खामोश है। ये आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के माँ बाप, पत्नियों, बच्चों, मित्रों या जानने वालों के नाम नहीं देता है और न ही उनके बारे में जानकारी उपलब्ध कराता है, हालांकि ये आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के प्रारंभिक जीवन के बारे में निम्नलिखित संक्षिप्त टिप्पणी पेश करता है:"क्या उसने तुम्हें यतीम पाकर (अबू तालिब की) पनाह न दी (ज़रूर दी) (93:6) और तुमको एहकाम से नावाकिफ़ देखा तो मंज़िले मक़सूद तक पहुँचा दिया (7) और तुमको तंगदस्त देखकर ग़नी कर दिया"(93 : 8)
उम्मे ज़ैनब ये भी कहती हैं कि नक़ाब पहनने से "आज़ादी का अनुभव" होता है क्योंकि इसको पहनने के बाद लोग आपको न तो आपके शरीर और न ही आपकी सुंदरता बल्कि आपको वैसे ही लेने लगते हैं जैसे कि आप हैं।" लेकिन इस पर कोई भी हैरान हुए बिना नहीं रह सकता है कि किस तरह वो विचार जो महिलाओं को पूरी तरह उनकी गुमनामी, उनकी आवाज और सार्वजनिक जीवन में निर्णय के सभी काम में उनकी उपस्थिति को पूरी तरह खत्म करने और हटाने की वकालत करता हो वो कैसे आज़ादी के तौर पर देखा जा सकता है।
कुरान और सुन्नत के बारे में बातचीत की प्रकृति और संभावना और उनके आपसी व्याख्यात्मक संबंधों पर आधारित नई पद्धति पर लेखक इस बात को बरकरार रखता है कि हदीस की सत्यता और विश्वसनीयता से संबंधित प्रश्न, इसके काम और महत्व के मामले में दूसरे दर्जे का महत्व रखते हैं और ये कि कुरान और सुन्नत के व्यापक इल्मियाती निर्माण में (यानी जिसमें हदीस शामिल है) और उसके व्याख्यात्मक और पद्धति से सम्बंधित मान्यताएं अधिक महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
तालीम की दीनी और दुनियावी तक़्सीम
प्रोफेसर अख्तरुल वासे (अनुवाद- न्यु एज इस्लाम)
मदरसों के पूरे इतिहास में ये भेदभाव कभी नहीं किया गया। मुसलमानों के द्वारा इस भेदभाव की आधिकारिक शुरुआत शायद 1866 ई. में दारुल उलूम देवबंद की स्थापना से हुई, लेकिन देवबंद के संस्थापक की नज़र में इतिहास के एक खास चरण और विशेष वातावरण की आवश्यकताओं के संदर्भ में ये एक अस्थायी जरूरत थी न कि स्थायी।
सिविल सोसाइटी की ओर से की जाने वाली तमाम कोशिशों के बावजूद, पश्चिम में इस्लामोफ़ोबिया बढ़ रहा है, इसे आंशिक रूप से लगातार हो रहे आतंकवादी हमलों, इक्स्कलूसिविस्ट (exclusivist) रवैय्यों और मुसलमानों के बीच जेनोफ़ोबिया (xenophobia) और मुस्लिम दुनिया में ईशनिंदा जैसे फर्जी आधार पर धार्मिक और सांप्रदायिक अल्पसंख्यकों के साथ बदसुलूकी के कारण बढ़ावा मिल रहा है।
रहस्मय बेबसी और अजनबी लड़का
तनवीर कैसर शाहिद (अनुवाद- न्यु एज इस्लाम)
ये टार्गेट किलिंग थी जिसका निशाना हज़ारा मुसलमान समुदाय के नौजवान बने। पलक झपकते ही आधा दर्जन से अधिक नौजवानों के बेजान शरीर कटे हुए तनों की तरह जमीन पर बिखर पड़े थे। ये खूंखार और खूनी घटना अपनी तरह की पहली घटना नहीं जिसमें हज़ारा मुसलमान, जो एक विशेष पंथ के पैरोकार हैं, नरसंहार का शिकार हुए हैं। कोई नहीं जानता और हमारी राज्य के हुक्मरान शायद जानना भी नहीं चाहते कि इस खूनी घटना से पहले इस पंथ के मानने वाले कितने ही लोगों को गोलियों से उड़ा दिया गया।
वयस्क समलैंगिकों को अपने मुताबिक जीवन जीने के लिए छोड़ने में इस्लामी पैग़ाम का कोई उल्लंघन नहीं होगा और इसलिए उनके साथ हिंसा या भेदभावपूर्ण व्यवहार किए जाने की जरूरत नहीं है। वो लोग जो समलैंगिकता से नफरत करते हैं, समलैंगिकों के साथ दोस्ती न करें या उनकी मिसाल की पैरवी न करें, लेकिन उन्हें दुश्मन न मानें या समलैंगिक होने के नाते उनके साथ भेदभाव न करें
विद्वानों और सामाजिक वैज्ञानिकों के साथ लेखकों और पत्रकारों की एक बड़ी संख्या ने अब सैद्धांतिक और वैचारिक आधार पर सल्फ़ी विचारधारा को चुनौती देना शुरू कर दिया है, उसकी राजनीति और साम्राज्यवादी जड़ों और उसके विकास में पेट्रो डालर की भूमिका को भी बेनक़ाब कर रहे हैं। बहुत से लोग अक्सर बहस करते हैं कि सल्फ़ी तरीका कभी भी मुस्लिम समाज में आम मुसलमानों की चयनित पद्धति नहीं थी।
मदीना में पैगंबर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के शुरुआती दो वर्षों के दौरान यहूदी ही आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पैगम्बरी के दावे और आपके अनुयायियों के धार्मिक उत्साह के सख्त विरोधी थे, जिन पर काफी निर्भरता थी, वो बहुत कम हो सकता था जब तक कि यहूदी आलोचना को शांत या असफल न कर दिया जाता ..... जब यहूदियों ने अपना रवैय्या बदल दिया और सक्रिय रूप से दुश्मन बने रहने से रुक गये, उन्हें छेड़ा नहीं गया ........
क़ुरानः मानवाधिकार का बेमिसाल वैश्विक घोषणा पत्र
हिफ़्ज़ुर्रहमान कास्मी (अनुवाद- न्यु एज इस्लाम)
कुरान ने खुले शब्दों में मनुष्य को वो सभी अधिकार दिए हैं जो उसे इंसान के रूप में मिलने चाहिए। इसके बावजूद अगर कोई इंसान पश्चिमी दृष्टि से कुरान पढ़े तो उसे वास्तव में कुरान पर आपत्ति होगी, लेकिन इससे कुरान की अहमियत कम नहीं होगी, इसलिए कि चमगादड़ को अगर दिन में कुछ नज़र न आए तो इसमें सूरज की किरणों का कोई गिनाह नहीं है।
उदारवादी इस्लाम के आलोचकों का सामना
Sultan Shahin, Editor, New Age Islam
हम उदार मुसलमान क्यों बार बार ये कहते हैं कि इब्ने हिशाम के एक समकालीन ने उन्हें झूठा कहा है? जाहिर है अगर हम इब्ने हिशाम को बदनाम करना चाहते हैं तो ये तथ्य बहुत ही संगत है और हमारे दृष्टिकोण को बल प्रदान करता है। तो जो कुछ भी नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के समकालीन या निकटतम समकालीन ने आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के बारे में कहा या आपके फरमान के रूप में बताया है, वो मुनासिब है और जिन लोगों को ये उचित लगता है वो उसे अपनी मान्यता प्रदान करेंगे। हम क्यों खुद हदीसों का सम्मान करते हैं? क्योंकि ये कथित रूप से इतिहास, पारंपरिक कहानी और यहाँ तक कि इस्लाम की प्रारंभिक पीढ़ियों की परंपरा वाली कल्पित कहानियों का एक संग्रह है।
चरमपंथ के सबसे ज्यादा शिकार खैबर पख्तूनख्वाह प्रांत के पाठ्यक्रम बोर्ड के अध्यक्ष ने पिछले साल कहा था, “जनरल जिया उल हक ने स्कूली पाठ्यक्रम का इस्तेमाल धार्मिक और जातीयता के आधार पर समाज को बांटने के लिए किया। इसी का नतीजा है कि प्रांत में इतना चरमपंथ, असहिष्णुता, उग्रवाद, सांप्रदायिकता और कट्टरपंथ फैला है।”
एक हिंदू लड़की की विपदा
फ़ाइज़ा मिर्ज़ा (अनुवाद- न्यु एज इस्लाम)
काश मुझ पर ज़बरदस्ती कोई धर्म थोपने के बजाय मुझे अपना धर्म अपनाने का अधिकार हासिल होता। काश मैं सबको ये समझा सकती कि हिंदुओं और मुसलमानों का खुदा असल में एक जैसा ही है। काश मैं सबको एक ऐसी पहचान दे सकती जो हमारा हक़ है। ये सारे चेहरे जो कभी मेरे जाने पहचाने थे, अब उन्हें देख कर बस यही सोचती हूँ कि मैं कौन हूँ?
तरस आता है इन विदेशियों पर जो हमारे छोटे से मामले पर आग बबूला हो जाने की बीमारी के कारण तलाश करने की कोशिश करते हैं और अगर वो लोग युवा ईसाई लड़की के मामले का जायज़ा ले, तो ये सच उनके सामने आ जायेगा कि हमारी बीमारी नाकाबिले इलाज ही नहीं बल्कि समझ में भी नहीं आने वाली है।