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बच्चों की शादी और इस्लाम
असग़र अली इंजीनियर (अनुवाद- न्यु एज इस्लाम)

बच्चों की शादी और इस्लाम

चूँकि  इस्लाम में शादी एक क़रार है, धार्मिक या कुरान के कारणों के बजाय सामाजिक कारणों से बच्चों की शादी की इजाज़त देते समय इमाम अबु हनीफा ने ये व्यवस्था दी थी कि कोई  लड़की प्रौढ़ता  या समझ बूझ की उचित आयु प्राप्त करने के बाद शादी को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है और उसके वली (आमतौर पर पिता) भी शादी के लिए अगर वो तैयार नहीं है तो उसे स्वीकार करने पर मजबूर नहीं कर सकते हैं। इमाम अबु हनीफा ने ये व्यवस्था इसलिए दी थी कि  उन्हें जानकारी थी  कि बच्चों की शादी के मामले में पिता को पूर्ण अधिकार नहीं होता है।

 

हदीस और उनके संकलनकर्त्ताओं का बचाव:  आदरणीय इमाम जिनकी हतक की गयी

सबसे ज़्याद दुर्भाग्यपूर्ण हिस्सा इस तरह की हदीसों के विषयों में नहीं है- चाहे वो नैतिक रूप से सबसे ज़्यादा विरोधी, सबसे ज़्यादा आक्रामक या महिलाओं के लिए अपमानजनक, वैज्ञानिक रूप से जिनका समर्थन न किया जा सके और जो हमारे पैगंबर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की सबसे अपमान करने वाली हों, हमारे विश्वास को बुरे रूप में पेश करने वाली हों और जो कुरान के संदेश के परस्पर विरोधी हों बल्कि वास्तविकता ये है कि रूढ़िवादी लोगों ने इस्लामी कैलेंडर के पांचवीं शताब्दी के आसपास हदीस को खुदा की तरफ से आने वाली ‘वही’ के रूप में फतवा देने के बाद से, इनकी समीक्षा एक हजार साल तक नहीं की। इस्लामी कानून के माध्यमिक ज़रिए के रूप में हदीस, सम्मान के अधिकारी  थे, वास्तविकता ये है कि उनके संकलनकर्त्ताओं ने स्पष्ट रूप से, आने वाली पीढ़ियों को गैर प्रामाणिक और आपत्तिजनक हदीसों की मौजूदगी के बारे में चेतावनी दी थी।

 

ये समय है कि हम इस पर गंभीरता से विचार करें कि वास्तव में दुनिया में क्या हो रहा है। क्यों मुसलमानों हर जगह, सिर्फ कश्मीर या अफ्रीका में ही नहीं,  बड़ी संख्या में इस्लाम छोड़ रहे हैं अगर इस्लाम को दुनिया में बरकरार रहना है तो ये महत्वपूर्ण सवाल है जिस पर हमें  विचार करना चाहिए। एक और सवाल जिस पर ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है: क्या दुनिया पर या अल्लाह पर इससे कोई फर्क पड़ता है कि दुनिया में मुसलमानों की संख्या कम हो रही है। एक  मानव के रूप में क्या हमें इसको लेकर परेशान होने का कोई कारण है? सभी जानकारी के स्रोतों के अनुसार  मुसलमान अन्य धार्मिक वर्गों के जैसे ही बुरे या अच्छे हैं। अगर इंसानी व्यवहार के कई सामाजिक पहलुओं या तक़वा के ज़रिए जिसे खुदा ने हमारे लिए बनाया है, को ध्यान में रख कर इंसाफ करें तो हम इससे भी बदतर साबित हो सकते हैं।

 
पाकिस्तान के असहाय हज़ारा मुसलमान
समूएल बेद (अनुवाद- न्यु एज इस्लाम)

हजारा शियों के नरसंहार के सिलसिले में ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ पाकिस्तान भी संदेह व्यक्त कर रहा है कि इसमें खुफिया एजेंसियों का हाथ हो सकता है। यह संदेह तब प्रकट किया गया जब शियों पर सबसे ताज़ा हमला क्वेटा में 28 जून को हुआ उस दिन हजारा शियों को ईरान से क्वेटा लाने वाली बस पर राकेटों से हमला किया गया। 11 शिया मारे गए थे पिछले मार्च से इस साल के अप्रैल महीने तक यानी एक साल में 29 हजार शियों को घात लगा कर मारा गया। हजारा डेमोक्रेटिक पार्टी का कहना है कि औसतन हर दिन टार्गेट किलिंग पर 4 हजार शियों को मारा जाता है। इस पार्टी ने ये भी कहा कि 21 हजार हजारा शिया पाकिस्तान से निकल जाने की कोशिश में हैं...

 

आतंकवादः उग्रवादी इस्लाम से कैसे निपटें

हमारे लिए ये स्वीकार करना ज़रूरी है कि सियासी इस्लाम, उग्रवाद को हराना बहुत ज़रूरी है। मुस्लिम दुनिया से कट्टरपंथ किसी न किसी तरह खत्म हो जाएगा, की आशा नहीं रखनी चाहिए। राजनीतिक इस्लाम के साथ जिसका असर दुनिया के कुछ हिस्सों में अहम है, , बातचीत ज़रूरी है, जबकि उग्रवाद को समर्थन देने वाले इस्लाम के साथ बातचीत नहीं हो सकती है। आतंकवाद पर काबू पाने का सबसे अच्छा तरीका ये है कि इसका सामना किया जाये। अगला कदम उसे बार बार पैदा होने से रोकने का होना चाहिए। इस तरह मुसलमानों के लिए ऐसा भविष्य सुनिश्चित करना ज़रूरी है जो गरीबी, अशिक्षा और भ्रष्टाचार से मुक्त हो।

 
तक़वा (परहेज़गारी) पर कुरान की व्यापक घारणा
मोहम्मद यूनुस, न्यु एज इस्लाम

तक़वा (परहेज़गारी) पर  कुरान की व्यापक घारणा

तक़वा का व्यापक विचार और सभी मानवता के साथ उसकी गहरी सम्बद्धता धार्मिक लोगों के विशेषाधिकार को को समाप्त करता है। एक मुसलमान व्यक्ति (उसके लिंग को ध्यान में रखे बिना) सबसे ज़्यादा नज़र आने वाले धार्मिक प्रतीकों के साथ या धार्मिक संस्कार के मामले में समर्पित व्यक्ति तक़वा में पीछे या नाकाम भी हो सकता है और खुदा की खुशनूदी (आर्शीवाद) प्राप्त करने के अयोग्य हो सकता है जबकि एक गैर मुसलमान, यहां तक ​​कि वो मुल्हिद हो, जिसमें खुदी की अता की हुई शक्ति उसके चेतना में किसी तरह कम न हो, वह तक़वा में आगे जा सकता है और धार्मिक प्रतीकों की अनुपस्थिति और दिखने वाली इबादत में कम हो लेकिन वो खुदा की खुशनूदी (आर्शीवाद) हासिल कर सकता है, हालांकि ख़ुदा बेहतर जानता है कि कौन उसकी खुशनूदी हासिल करेगा।

 
आइये हज से फायदे हासिल करें
राशिद समनाके, न्यु एज इस्लाम

आइये हज से फायदे हासिल करें

ऐसा लगता है कि धार्मिक उद्योगों के सीईओ के साथ साथ हरम के खादिम (सेवक) ने सदियों से आपसी और खास "दुनियावी फायदे" के लिए साँठगाँठ की है, लेकिन हाजियों को सिर्फ "आखिरत" में इसके फायदे का वादा कर रहे हैं 2: 202! तीस लाख मुसलमानों को हर साल एक जगह कम से कम एक अंतरराष्ट्रीय समस्या को हल करने में मदद करनी चाहिए, और व्यावसायिक रूप से जो फायदे मुसलमानों को हैं उनके अलावा इस दुनिया में उन्हें हज के भी फायदे पहुंचाना चाहिए 2:201, 18:10। क़ौम को इसकी सख्त जरूरत है, जिसे दुनिया के देशों के बीच अपने अच्छे मकाम को फिर से हासिल करने के लिए, ऐसा करना चाहिए।

 

आतंकवादः क्रांतिकारी विचारधारा या नासमझी भरी हिंसा?

खुद से इन्कार करने की ये विशेषता आतंकवादियों को अन्य प्रकार के राजनीतिक चरमपंथियों और साथ ही साथ इसी तरह अवैध और हिंसक गतिविधियों में लिप्त लोगों से इन्हें अलग करता है। मिसाल के तौर पर, एक कम्युनिस्ट या क्रांतिकारी आसानी से स्वीकार करता है कि वो कम्युनिस्ट या क्रांतिकारी है। इसके विपरीत आतंकवादी कभी स्वीकार नहीं करते हैं कि वो एक आतंकवादी है और किसी नतीजे या संबंध से बचने और उसे छिपाने के लिए वो किसी भी हद तक जा सकते हैं।

 

अल्लाह हाफ़िज़ और मुसलमानों का खुद का नुक्सान

ये दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन सच है कि मुसलमानों की एक बड़ी संख्या अपने सांस्कृतिक आधार से अलग हो रही हैं। इस असम्बद्धता और अरबों की इस्लामी परंपरा के साथ खुद को जोड़ने से मुसलमानों को बहुत नुक्सान उठाना पड़ सकता है और विशेष रूप से उन लोगों को जो भारत जैसे मिले जुले समाज में रह रहे हैं। धीरे धीरे ये उन लोगों को उनके आसपास और पड़ोस से बेगाना करेगा और इन लोगों को दूसरे वर्गों के बारे में नकारात्मक और दकियानूसी विचार पैदा करने की ओर ले जाएगा।

सुल्तान शाहीन: क्या जिस व्यक्ति ने मदरसे में शिक्षा नहीं प्राप्त की है वो मुसलमानों के लिए नहीं बोल सकता?

न्यु एज इस्लाम की शुरुआत से पहले और बाद में भी कई बार सुल्तान शाहीन को उग्र विचारधारा वाले लोगों का सामना करना पड़ा है। उन्होंने बताया कि वेबसाइट पर कमेंट के रूप में उन्हें दो बार मौत की धमकियां मिल चुकी हैं। कई मौक़ों पर उलेमा ने उनसे कहा कि वेबसाइट नरक में ले जाने का शॉर्टकट है। बहुमत में मौजूद विरोधी कई वार्ताओं और सम्मेलनों के दौरान उन्हें खामोश करा चुके हैं। मेरठ, उत्तर प्रदेश में उन्हें अपने व्याख्यान को संक्षेप में करना पड़ा था और उन्हें हर तरफ से आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। "मुझसे कहा गया कि अगर घर वापस जाना चाहते हो तो चुप रहो। मुझे एहसास है कि हिंदुस्तान में उग्रवादी अपना पक्ष स्पष्ट नहीं करते हैं, ऐसे में दलील की कोई गुंजाइश नहीं है।"

 

इसी तरह जाहिलियत के दौर में क़र्ज़ अदा न होने की स्थिति में ब्याज दर ब्याज असल रक़म (मूल धन) में जुड़ता रहता था। जिससे थोड़ी रकम पहाड़ बन जाती और कर्जदार की रातों की नींद और दिन का चैन बर्बाद कर देती थी। वर्तमान समय में बैंकिंग प्रणाली इसी ज़ालिमाना (क्रूर) सिद्धांत पर कायम है। इस क्रूर प्रणाली के विपरीत नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने कहा कि अगर कर्जदार परेशाम हाल है तो ब्याज लेना तो दरकिनार मूल धन लेने में भी उसे मोहलत दो और अगर कर्ज माफ करने की क्षमता है तो ये बहुत ज़्यादा अच्छा है।

मांसाहारी + अरबी नाम = हिंदुस्तानी मुसलमान

बेशक, दुनिया भर में मुसलमान अरबी नाम रखते हैं, लेकिन हिंदुस्तानी मुसलमानों के अलावा किसी दूसरी जगह के मुसलमान इस अमल से इस कदर चिपके हुए नहीं हैं। मिसाल के लिए उत्तरी अमेरिका की इस्लामिक सोसाइटी अपना नेता एंगर्ड मैटसन नाम की महिला को बिना किसी परेशानी के चुन सकती है। इंडोनेशिया में कोई भी मुसलमान पिता अपने बच्चों का नाम मेगावती सुकर्णोपुत्री या सेलो बाम्बांग योधोयोनो रख सकता है और दुनिया के सबसे मुस्लिम आबादी वाले देश में उनके राष्ट्रपति बनने के सम्भावना पर इससे कोई आँच भी नहीं आती है।

 

पाकिस्तान टीवी पर वीना मलिक जैसे इस्लामी प्रचारक रमज़ान में लोगों को बतायेंगे कि इस्लाम क्या है

रमज़ान के महीने के लिए खास तैयार होने वाले विशेष इस्लामी कार्यक्रम सहरी और इफ़्तार के वक्त प्रसारित किये जाते हैं। वैसे तो माहे रमज़ान की विशेष प्रसारण के इस्लामी कार्यक्रमों के लिए विभिन्न इस्लामी विद्वानों की सेवाएं ली जाती थीं लेकिन लगभग सभी टीवी चैनलों ने ये कार्यक्रम अश्लील फिल्मों में नग्न और अर्द्ध नग्न हो कर काम करने वाली अभिनेत्रियों और डान्सरों के हवाले कर दिए हैं। इस बार जब भी कोई पाकिस्तानी सहरी या इफ़्तार के वक्त टीवी लगाएगा उसे नग्न फिल्मों में काम करने वाली इन अभिनेत्रियों का नज़ारा करना होगा। ऐसा क्यों हो रहा है?

आज का मुसलमान: कौन मोमिन और कौन काफ़िर
आसिफ मर्चेण्ट, न्यु एज इस्लाम

आज का मुसलमान: कौन मोमिन और कौन काफ़िर

मुसलमानों को निश्चित तौर पर गुमराह किया गया है। बेशक ये वो नहीं है जो नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने कल्पना की थी। अब मुसलमानों के बीच उन विभिन्न रस्मों और रिवाजों पर अमल करने पर ज़ोर दिया जाता है  जो जन्नत में जगह सुनिश्चित कर सकें। ये पूरी तरह स्वकेंद्रित हैं। तथाकथित इस्लाम के स्तम्भ 'मानवता के सांस्कृतिक विकास में किसी भी तरह से कोई सहयोग नहीं कर रहे हैं जो नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का मिशन था।

ज़ालिम इंसान है, इस्लाम नहीं
नाज़िया जसीम (अनुवाद- न्यू एज इस्लाम)

मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ अपराधों को इस्लाम से जोड़ा नहीं जा सकता है। एक धर्म के रूप में इस्लाम सबसे पहला धर्म रहा है, जिसने महिलाओं को संपत्ति रखने का अधिकार, तलाक और दोबारा शादी (अन्य धर्मों की महिलाओं को ये अधिकार संघर्ष करने के बाद मिला) का अधिकार प्रदान किया था। लड़कियों को बोझ न समझा जाए इसे रोकने के लिए मुस्लिम महिलाएं उनमें से एक हैं जो अपने पति से महेर मांग सकती हैं। इस्लाम महिलाओं पर अत्याचार नहीं करता हैَ मर्द औरतों पर अत्याचार करते हैं......

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