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दरअसल ख़ुदा और बन्दों में बाप और बेटे का रिश्ता यहूदियों के ज़हन की उपज है। यहूदी अपने पैग़ंबर हज़रत उज़ैर अलैहिस्सलाम को ख़ुदा का बेटा कहते थे। (हज़रत उज़ैर अलैहिस्सलाम की उम्मत को भी यहूदी कहा जाता है)। ऐसा वो दूसरे पैग़ंबरों पर अपने पैग़ंबर की बरतरी ज़ाहिर करने के लिए करते थे। फिर उन्होंने अक़्वामे आलम पर अपनी बरतरी और फ़ज़ीलत ज़ाहिर करने के लिए ख़ुद को ख़ुदा का बेटा कहना शुरू किया यानी सारे यहूदी ख़ुदा के बेटे हैं और इसीलिए ख़ुदा के महबूब हैं।
तुर्की में हर जगह गोलेन के स्कूल हैं और सबसे बेहतर समझे जाते हैं। जहां लाखों डालर की हाईटेक सहूलियात हैं और जहां लड़कियां लड़कों के बराबर हैं और अंग्रेज़ी पहली जमात में ही पढ़ाना शुरू किया जाता है। गोलेन ने सिर्फ तालीमी शोबा को ही मुतास्सिर नहीं किया है। एक नौजवान इमाम के तौर पर 60 की दहाई में शुरूआत करते हुए उन्होंने मुतवस्सित तब्क़े के तुर्कों के ऊपर ज़ोर दिया कि वो मग़रिब से सीखें और उसके इक़दार को गले लगाऐं। जिनमें से एक ग़ैर मोतवक़्क़े तौर पर पैसा कमाना भी शामिल था।
बिला आख़िर जब चौथे ख़लीफ़ा हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हा मदीना से बाहर मुंतक़िल हुए तो उन्होंने ख़ुद को कूफ़ा, इराक़ में मुस्तहकम किया ना कि मक्का मुकर्रमा में, क्यों? तब से किसी ने भी मक्का को अपनी मुस्लिम सल्तनत की दारुल हकूमत नहीं बनाया, यहां तक कि सल्तनते उस्मानिया ने भी जिन्होंने यहां और मुस्लिम दुनिया के बड़े हिस्से पर हुकूमत की और मुस्लिम दुनिया उन्हें खुल़्फ़ा पुकारती थी, क्यों?
क़नाअतः मोमिन की पहचान
सुहेल अरशद, न्यु एज इस्लाम
क़नाअत इंसान को सब्र और शुक्र के साथ रहना सिखाती है। तंगदस्ती और दुनिया की वक़्ती महरूमियों पर सब्र और हिर्स व तमा से दूरी इंसान को परहेज़गार बनाती है और ख़ुदा की नेमतों के एतराफ़ से दिल को रुहानी सुकून मिलता है ख़ुदा का शुक्र अदा करने वाला इंसान ना तंगदस्ती पर ख़ुदा से मायूस होता है और ना ख़ुशहाली में शेखी बघारने और इतराने लगता है।
…जहां तक बाज़ इमामों की गिरफ़्तारी और उन्हें मुल्क बदर करने का ताल्लुक़ है उनके ताल्लुक़ से हक़ीक़त ये है कि नफ़रत, तशद्दुद और इस्लाम के बरअक्स नज़रियात का प्रचार करने वाले ऐसे इमामों को मुस्लिम मुल्कों में भी यक़ीनन गिरफ़्तार कर लिया जाएगा कि ये मज़हबी और नस्ली बुनियादों पर नफ़रत और तशद्दुद की मुसलसल हौसला अफ़्ज़ाई करते रहे थे। ये लोग अपने मफ़ादात के लिए मज़हब को तो मानते हैं लेकिन मज़हब की बात को नहीं मानते।
जो कुछ भी एक मुसलमान मज़हबी आलिम या एक सहाफ़ी उर्दू प्रेस में लिखते हैं, इसमें इस्लाम फ़ौक़ियत और दीगर मज़हब के लिए नफ़रत की बू आना ज़रूरी है और जो अपने व साथ ही साथ दीगर मज़ाहिब की इल्म और इफ़्हाम व तफ़्हीम की कमी की बुनियादों के सबब है। हमारे नाम निहाद उल्मा काफ़िर बनाने वाली फ़ैक्ट्रियों से आते हैं जहां इस्लाम के अंदर मुख्तलिफ मक्तबे फिक्र, अहले किताब औक गैर मुसलमानों के ख़यालात व नज़रियात का एहतेराम नहीं सिखाया जाता है। उन्हें अपने महदूद नज़रिया के मुक़ाबले में दूसरे ख़यालात के किसी निज़ाम की तर्बियत नहीं दी जाती है। ऐसे में दूसरों के एहतेराम का सवाल ही नहीं पैदा होता है। इल्म सबसे पहले आता है। - एडीटर, न्यु एज इस्लाम
मुसलमानों को मज़हबी जुनून से बचना चाहिए। अव़्वल, तो वो लोग माली, इक़्तेसादी और तालीमी ऐतबार से पसमांदा हैं (मैं सिर्फ ख़लीज के ममालिक के बारे में बात नहीं कर रहा हूँ, जहां कुछ हुक्मरान अशराफ़िया तब्क़े के पास पैसा है, मेरी तवज्जो आम मुसलमानों पर है जो सिर्फ जानवरों के एक झुंड के तौर पर पैरवी करते हैं)। अपनी अलैहदगी और मजमूई तौर पर पसमांदगी के लिए ख़ुद को क़ुसूरवार बताने के बजाय वो दीगर तब्क़ात को ज़िम्मेदार ठहराते हैं। वो 7वीं सदी की ज़िंदगी भी जीना चाहते हैं और साथ ही हर मैदान में पेशक़दमी भी करना चाहते हैं। ये मुम्किन नहीं है।
शादी और एलाहदगी में जब्र
शमीम तारिक़ (तर्जुमा- न्यु एज इस्लाम)
हुकूमत और सियासी पार्टियां पंचायत के चौधरियों को अपनी ताक़त का मंबा समझती हैं इसलिए रिवायत और परंपरा के अलावा इन चौधरियों की अना और मफ़ाद का भी लिहाज़ रखती हैं इसलिए ना सिर्फ शादी ब्याह के मुआमले में बल्कि कई दूसरे उमूर में भी चौधरियों की चौधराहट ही को रिवायत और परम्परा का नाम दे दिया जाता है। नतीजतन ना सिर्फ आशिकों के ख़ुशनुमा ख़्वाबों का बल्कि इंसानी आज़ादी और बुनियादी इंसानी हुक़ूक़ का भी ख़ून होता है।
हज़रत इमाम ज़हबी रहमतुल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं कि हज़रत इमामे आज़म रहमतुल्लाह अलैह ने चालीस साल तक इशा के वुज़ू से फ़ज्र की नमाज़ पढ़ी। रात भर आप क़ुरान शरीफ़ पढ़ा करते थे और ख़ौफ़े ख़ुदा से इस क़दर रोते थे कि आप के हमसायों को आप पर रहम आता था। हज़रत इमाम के शागिर्द हज़रत क़ाज़ी इमाम अबु यूसुफ़ फ़रमाते हैं कि हज़रत इमामे आज़म हर रात और दिन में एक ख़त्म क़ुरान पढ़ा करते थे और रमज़ान शरीफ़ में (दिन और रात मिला कर) बासठ क़ुरान ख़त्म फ़रमाया करते थे।
शरीयत पर जर्मनी के सबसे मारूफ़ तालीमी माहिर प्रोफ़ेसर मीथियास रूहे जिन्होंने जामिआ में इस्लामी दीनियात के प्रोग्राम शुरू करने में मदद फ़राहम की, कहते हैं, "मैं यक़ीन से नहीं कह सकता कि हमें इस काम पर आफ़ाक़ी दाद व तहसीन मिलेगी लेकिन ये यक़ीनन एक बहस को शुरू करने का बाइस बनेगा"। इस्लामी सोच और दीनियात की तरक़्क़ी के लिए पेशावराना तदरीसी माहौल की फ़राहमी जर्मन मुसलमानों को इस्लाम के माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल पर आलमी मुबाहिसे में हिस्सा लेने का नया रास्ता फ़राहम करेगी।
फतवा और औरत
सोनिका रहमान, न्यु एज इस्लाम
हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम (स.ल.अ.) ने पहली बार इंसानियत को औरतों की अज़मत से वाकिफ कराया। दुनिया को सबक़ दिया कि लड़के और लड़कियों की परवरिश मे भेदभाव न करें। लड़कियों को तालीम देने का हुक्म दिया। माँ के कदमो के नीचे जन्नत करार दिया। इस्लाम औरत को कद्र और इज़्ज़त की निगाह से देखने के लिए कहता है। फिर क्यों बार बार एक नया फतवा जारी करके हम उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाते हैं और उनकी तरक्की में रुकावट बनते हैं?
उरूजे आदमे ख़ाकी से अंजुम सहमे जाते हैं
मौलाना नदीमुल वाजिदी (तर्जुमा- न्यु एज इस्लाम)
मुशरिकीन मक्का से मायूस होकर आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने ताइफ का रुख किया, ये शहर मक्का मुकर्रमा से साठ मील की मुसाफ़त पर वाक़े है, आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इस सफ़र के दौरान हर क़बीले को दावते इस्लाम दी, लेकिन किसी ने भी आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की ये दावत क़ुबूल ना की, इसके बजाय उन लोगों ने आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को शहर से बाहर निकालने के लिए आवारा लड़कों को पीछे लगा दिया, ये बदनसीब लड़के आप पर आवाज़े कसते और पत्थर बरसाते पीछे पीछे चल रहे थे, यहां तक कि आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के दोनों जूते जिस्म के ख़ून से रंगीन हो गए थे।
अर्ज़े फ़लस्तीन, अल-क़ुद्स और हम
प्रोफ़ेसर अख़्तरुल वासे (तर्जुमा- न्यु एज इस्लाम)
ज़िंदगी के मुख़्तलिफ़ नेज़ाम आए और चले गए। मुआशरे क़ायम हुए, ममलकतें और हुकूमतें क़ायम हुईं और सफ़ए हस्ती से मिट गईं। हालात व वाकेआत के इस ना मुख़्ततम सिलसिले के पेशे नज़र दुनिया को एक स्टेज भी कहा गया है जहां अफ़राद, मुआशरे और कौमें आती हैं, अपना मुक़र्ररा किरदार अदा करते हैं और चली जाती हैं और उनकी जगह दूसरे लोग आ जाते हैं।
यहूदो नसारा से दुश्मनी
असद मुफ़्ती (तर्जुमा- न्यु एज इस्लाम)
ये एक तल्ख़ हक़ीक़त है कि बाज़ उल्मा ने इरादतन या ग़ैरइरादी तौर पर इस्लाम को बड़ा नुक़्सान पहुंचाया है ये लोग इस्लाम को ग़ैर मुस्लिमों, मग़रिब और अमेरीका में इश्तेआल अंगेज़ और अदम रवादारी व अदम तहम्मुल का हामिल बना कर पेश कर रहे हैं। इस किस्म का तास्सुर पैदा करने वाले इक़दामात में बुनियादी तब्दीली लाकर उन्हीं दुरुस्त सिम्त देना ज़रूरी है।
मौजूदा ज़माने की मुसलमान लड़कियां आला तालीम हासिल करने में दिलचस्पी रखती हैं। इन दिनों मुसलमानों के दरमियान बच्चों की शादियां आम नहीं हैं। चीज़ें तेज़ी के साथ तब्दील हो रही हैं। मुस्लिम लड़कीयों की शादी की उम्र के बारे में मुस्लिम पर्सनल ला में तब्दीली करने की कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि इससे कोई मक़सद हल नहीं होगा बल्कि सिर्फ़ मसाइल पैदा होंगे।