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शरह पैदाइश में बड़ी कमी आम तौर पर बढ़ती हुई आमदनी की सतह, बढ़ती हुई तालीम और हमल रोकने वाली दवाइयों तक आसान रेसाई के साथ इसे मुंसलिक किया जाता है। क़दामत पसंद और अक्सर पसमांदा मुस्लिम मुआशरों के लिए इन अवामिल में से कोई भी दुरुस्त नहीं हैं। इसके बजाय मुहक़्क़िक़ीन मुस्लिम मुआशरों में "मतलूबा पैदाइश की सतह" को शरह पैदाइश में कमी से मंसूब करते हैं? जैसा कि औरतों की तरफ़ से इज़हार किया गया। वो तालीम या हमल रोकने वाली दवाईयों तक रेसाई तक के अलावा वो तरीक़ा तलाश लिया है जिससे वो बच्चों को जन्म देने से बच सकती हैं।
महेर की अहमियत
नीलोफ़र अहमद (तर्जुमा न्यु एज इस्लाम)
महेर वाहिद बीवी की मिल्कियत है और इस पर ना तो वाल्दैन और ना ही किसी दूसरे रिश्तेदार का कोई हक़ होता है। कभी कभी मर्द रिश्तेदार महेर को एक नज़र औरत के देखे बगै़र इसे गै़रक़ानूनी तौर पर ले जाते हैं और जो इस पूरे अमल को फ़रोख़्त होने के जैसा एहसास कराता है।
ये फ़ैसला दो बुनियादी सवालात पैदा करता है और जिसे पूछा जाना चाहिए कि अगर हिंदुस्तान अपने तमाम शहरियों को मसावात और उनके साथ मसावी सुलूक करने के हक़ को यक़ीनी बनाना चाहता है तो, क्या मुसलमान लड़कियां इंसान नहीं हैं? या हिंदुस्तान में मुसलमान हिंदुस्तानी नहीं हैं? ये अलमिया है जिस वक़्त हिंदुस्तान बच्चों के जिन्सी इस्तेहसाल को ख़त्म करने और जिन्सी ताल्लुक़ात के लिए रजामंदी की उम्र को 16 से 18 साल बढ़ाने की कोशिश कर रहा है उस वक़्त हाईकोर्ट के फ़ैसले ने ये तय किया है कि मुसलमान लड़कियों को ऐसे किसी भी क़ानूनी तहफ़्फ़ुज़ की ज़रूरत नहीं है।
ये अच्छी तरह मालूम है कि जहां तक इसके क़ानूनी हैसियत का ताल्लुक़ है तो इस्लाम में शादी दो अफ़राद के दरमियान तहरीरी मुआहेदा है और इसके लिए दोनों को बालिग़ होना चाहिए जो इस तरह के मुआहेदों की ज़िम्मेदारियों और पेचीदगियों को समझते हों। ये हुक्म जो बच्चों की शादी के तसव्वुर की बुनियाद पर चोट करती है उसे क़ुरान की आयत 4: 6 से हिमायत हासिल है और जो शादी की उम्र (बलग़ुन्निकाह) और ज़हनी पुख़्तगी की उम्र (रशद) को बराबर बताती है, ये एक मरहला है जो सने बलोग़त के बाद आता है।
सऊदी अरब से आए एक के बाद एक तीन इमामे हरम के दारूल उलूम देवबंद और नदवे के दौरों पर बहस समाप्त होने का नाम नहीं ले रही थी कि अमेरिकी दूतावास के राजनीतिक सलाहकार जेम्स प्लाज़मेन और उनके सहयोगी दिनेश दूबे के हाल में हुए देवबंद के दौरे ने एक नया तूफान खड़ा कर दिया है।
वाक़ेआ मेराज आदम ख़ाकी के उरूज का मुंतहाए कमाल
प्रोफ़ेसर अख़्तरुल वासे (तर्जुमा- न्यु एज इस्लाम)
वाक़ेआ मेराज इंसान को सबक़ देता है कि वो पूरी कायनात में सबसे अफ़ज़ल व अशरफ़ है और कौनों मकाँ की वुसअत इसके फ़िक्रो नज़र की जोला निगाह है, उसकी फ़िक्री परवाज़ उसी आसमान तक महदूद नहीं बल्कि उसके लिए सितारों से आगे और जहां भी हैं, और उसके मक़ासिद सिर्फ उसी दुनिया के रोज़ व शब में उलझ कर ना रह जाएं कि इसके ज़माँ व मकाँ और भी हैं।
क्या इसका मतलब ये है कि तरक़्क़ी याफ़्ता क़ानून साज़ी तमाम दूसरे लोगों के मक़सद से है और मुस्लिम लड़कियों के मामले में क़दीम क़ानून का ही इतलाक़ होगा जो इस ज़माने और वक़्त में मलऊन चीज़ है? इसके बाद क्या होगा? हिंदुस्तानी मुसलमानों के लिए शरई अदालत? ऐसे इम्कान के मुताल्लिक़ सोच कर ही वहशत होती है लेकिन हाईकोर्ट के हालिया फ़ैसले को देख कर लगता है कि इसके इम्कानात हैं।
अब सवाल ये है कि सिविल अदालतें अपने दायरए अख़्तियार में पर्सनल ला का इस्तेमाल कर रही हैं जबकि उनकी ज़िम्मेदारी आईनी क़वानीन की तशरीह करने की है। अगर हम अपने आईनी शिक़ों की बालादस्ती को क़बूल करते हैं तो पर्सनल ला समेत मुल्क के दीगर तमाम क़वानीन, हमारे सिविल क़वानीन के मातहत होने चाहिए। और फ़ैसलों में उसे वाज़ेह तौर पर सामने आना चाहिए। बदक़िस्मती से, जजेज़ हज़रात इन मज़हबी अख़्लाक़ियात का इस्तेमल उनके दलायल को वाज़ेह करने या तक़्वियत पहुंचाने के लिए कर रहे हैं, जो काफ़ी ख़तरनाक लगते हैं।
2003 में आला सतह के सऊदी अरब के एक क़ानूनदां, शेख़ सालेह इमाम अलफ़ौज़ान ने एक फतवा जारी किया जिसमें उन्होंने दावा किया कि "गु़लामी इस्लाम का एक हिस्सा है। गु़लामी जिहाद का हिस्सा है, और जिहाद तब तक बाक़ी रहेगा जब तक कि इस्लाम है।" उन्होंने अलग राय रखने वाले मुस्लिम उल्मा की तन्क़ीद की और अपनी बात पर क़ायम रहे कि," वो जाहिल हैं, उल्मा नहीं हैं... वो महेज़ लिखने वालों में से हैं। लिहाज़ा जो भी इस तरह की बातें कहता है वो काफ़िर है।"
इसी आयत को ज़्यादा तर मुसलमान याद रखते हैं और इसी पर अमल करते हैं। लेकिन अगली ही आयत में उनके लिए वज़ाहत की गई है कि बैतुल मोक़द्दस, यहूदियों और ईसाईयों के लिए क़िब्ला था, जिसे मुसलमान भूल गए हैं। और अपनी नज़र में ख़ुद परहेज़गार हमारे उल्मा को बेशक इन कुरानी आयात को नज़रअंदाज करने की आदत पड़ गई है जो उनके लिए ग़ैर मुनासिब हैं जो उनके क़ज़्ज़ाक़, अपनी रास्त मंदी, मर्दों को अफ़ज़ल बताने और इस्लाम फ़ौक़ियत वाले रवैय्ये की हिमायत नहीं करती हैं।
मस्जिदे अक्साः तारीख़ी हैसियत, शरई अहमियत
मौलाना नदीमुल वाजिदी (तर्जुमा- न्यु एज इस्लाम)
रवायात में है कि जिस वक़्त हज़रत सुलेमान अलैहि अस्सलाम मस्जिदे अक्सा की तामीर से फ़ारिग़ हुए तो उन्होंने अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त से तीन चीज़ों की दुआ की एक तो ये कि उनके फ़ैसले अल्लाह के फ़ैसलों के ऐन मुताबिक़ हों, दूसरे ये कि उनको ऐसी बेमिसाल और वसी हुकूमत अता की जाय, जो उनके बाद किसी को ना मिले, तीसरे ये कि जो शख़्स सिर्फ़ नमाज़ के इरादे से मस्जिद में दाख़िल हो तो गुनाहों से पाक साफ़ होकर इस हाल में मस्जिद से बाहर निकले जैसे उस की माँ ने उसे आज ही जना हो, सरकारे दो आलम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया इनमें से दो चीज़ें तो सुलेमान अलैहिस्सलाम को अता कर दी गई हैं, उम्मीद है तीसरी भी अता की जाएगी।
इस्लामियत गुज़श्ता दो दहाईयों से दुनिया भर में एक रुझान बन गया है, जो जज़ीरा नुमा अरब के अंदरूनी हिस्सा की बंजर ज़मीन और अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान की सरहद पर वाक़े दूर दराज़ के मदारिस से निकल कर शहरों और कस्बों, कॉलिजों और दफ़ातिर और हमारे खेल के मैदानों और हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी और ड्राइंग रूम्स में दाख़िल हो गया है। इसी मुद्दत में इंटरनेट मवासलात आम्मा का एक आलमी ज़रिया बन गया है जिसने असल में हर एक को आपस में जोड़ दिया है।
पाकिस्तान के उर्दू प्रेस का मुंदरजा ज़ेल मज़मून ज़ाहिर करता है कि किस तरह मुसलमानों के दरमियान दीगर मज़हबी तबकों के साथ नफ़रत और उनसे ज़हनी ख़ौफ़ और अपनी मज़लूमियत की कैफ़ीयत को पाकिस्तान में फ़रोग़ दिया जा रहा है। अफ़सोस की बात है कि इसी तरह की सूरते हाल हिंदुस्तान के उर्दू प्रेस में भी ग़ालिब है। उसे दीगर तब्क़ात के फे़ल या फ़ेले बद से क़ता नज़र कोई हिंदुस्तानी मुस्लिम उर्दू मज़्मून निगार भी लिख सकता था, और हमें मालूम होना चाहिए के ज़हनी ख़ौफ़ और अपनी मज़लूमियत की कैफ़ियत ख़ुदबख़ुद मोकम्मल होने वाली पेशन गोई साबित हो सकती है।
नफ़रत की गहराई का इस मज़मून से अंदाज़ा लगता है, मिसाल के तौर पर यहूदियों के तईं मुसलमानों के दरमियान एक बहुत ही आम रुझान है। सैहूनियों की ग़ल्तियों और इसराईली रियासत के अमल के लिए उनको मौरिद इल्ज़ाम ठहराना ऐसा है जैसे इस्लामी इंतेहापसंदों के फ़ेले बद के लिए पूरे मुस्लिम तब्क़े की मलामत करना है। वैसे उनसे नफ़रत करना, या किसी और से, और उनको ख़बीस या ग़लीज़ कहना और उन पर इस नफ़रत के लिए मज़हबी जवाज़ पैदा करना उनके तईं नाइंसाफ़ी है और इस्लाम और इसकी तकसीरियत से हमारी वाबस्तगी के साथ धोखा है।
क़ुरान की उन आयात का हवाला देना जो तारीख़ में एक ख़ास मुद्दत और ख़ास हालात में रहनुमाई के लिए नाज़िल हुई थीं और उस ज़माने में जब इस्लाम अपनी तफ़ूलियत के दौर में था और इसके पैरोकारों की बक़ा को ख़तरा लाहक़ था और उन आयात को आलमगीरी नसीहत वाली तसव्वुर करना इस्लाम और मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को बदनाम करने के बराबर होगा। मुसलमानों को इस्लामी इंतेहापसंदों के तर्ज़े अमल और नुक़्तए नज़र के सबब हज़ारहा मसाइल का सामना करना पड़ रहा है। मैं सोचता हूँ अगर कोई रास्ता हो जिससे मर्कज़ी धारे के मुसलमान हमारे दरमियान नफ़रत फैलाने वाले इस्लामी इंतेहापसंदों से बातचीत कर सकें और उन्हें अपने मज़हब और आलमी मुस्लिम तब्क़े के मफ़ाद में उनके शिद्दत पसंदाना तरीक़ों को ठीक करने के लिए क़ाएल कर सकें---- एडिटर, न्यु एज इस्लाम
क़ुरान ने भी लफ़्ज़ बाअल के इस्तेमाल से गुरेज़ किया है जिस का अरबी ज़बान में मानी एक देवता से है। क़ुरआन ने लफ़्ज़ बाअल को सिर्फ तीन बार और वो भी माज़ी की कहानियां ब्यान करने के लिए इस्तेमाल किया है, दूसरी सूरत में, ये शौहर के लिए लफ़्ज़ ज़ौज का इस्तेमाल करता है। लफ़्ज़ बाअल के इस्तेमाल से गुरेज़ किया गया वर्ना इसकी ग़लत तशरीह हो सकती थी। इस्लाम में शौहर जोड़े के निस्फ़ से ज़्यादा कुछ भी नहीं है जो शौहर और बीवी दोनों की बराबरी को ज़ाहिर करता है। इस पर भी हमारे उल्मा बीवी पर शौहर को इस्तेहक़ाक़ देते हैं।
हज़रत अली अलैहिस्सलाम का अहदे हुकूमत
मुज्तबा आब्दी (तर्जुमा- न्यु एज इस्लाम)
अली अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं परहेज़गार और नेकोकार इंसानों को चाहिए कि गुनहगारों पर रहम करें और हक़ ताला का शुक्र अदा करते हुए उनसे चश्मपोशी करें। अपने भाई की ग़ीबत ना करें और वो जिस जिस बला में गिरफ़्तार हुआ है उस पर उसको सरज़निश ना करें। ये सोच लेना चाहिए कि ख़ुद वो भी एक बड़े गुनाह का मुर्तक़िब होते हैं। ऐ बंदए ख़ुदा! बंदों के गुनाह पर मलामत करने में जल्दी ना कर। शायद ख़ुदा ने इनको बख़्श दिया हो।