FOLLOW US:

Hindi Section

तालीमयाफ्ता हिंदुस्तानी मुसलमानों का दानिशवाराना दो जज़्बियत: आर.टी.ई. (राइट टू एजुकेशन) बनाम मज़हेका खेज़ (हास्यास्पद) फतवा अगर मुसलमान मुख्य धारा के हिंदू वर्ग की प्रगतिशीलता के तेज कदमों के साथ तालमेल बनाए रखने में नाकाम रहते हैं तो हिंदुस्तानी समाज के अछूत और अभागे के तौर पर खत्म हो जायेंगे। और उन लोगों के क़हेर का शिकार होंगे जो हिंदुस्तान को चमकाना चाहते हैं और शिक्षित मुसलमान इस खुद आयेद तबाही के लिए अकेले जिम्मेदारी होंगे। इसके साथ ही लेखक न्यु एज इस्लाम से दरख्वास्त करता है कि वो RTE के मदरसों में विस्तार का समर्थन करने के लिए एक अभियान की शुरुआत करे।

 

मुस्लिम समाज में तलाक का बढ़ता हुआ रुझान

मुस्लिम समाज में तलाक की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं, ये एक चिंताजनक स्थिति है, निकाह इसलिए नहीं किया जाता कि तलाक के ज़रिए इसको खत्म कर दिया जाये, शरीयत की निगाह में ये एक अहम मामला है, जिसमें दवाम और इस्तमरार मतलूब है, इसलिए निकाह को महज एक अक़्द या मामला ही नहीं रखा गया बल्कि इसको सुन्नते अंबिया करार देकर इबादत का दर्जा भी दिया गया, दूसरी तरफ बाज़ नागुज़ीर हालात में तलाक की इजाज़त तो दी गई लेकिन उसे अबगज़ अलमोबोहात (जायेज़ चीज़ों में सबसे ज़्यादा नापसंदीदा चीज़) करार देकर ये भी वाज़े कर दिया गया कि अल्लाह को तलाक बिल्कुल पसंद नहीं है, लेकिन अगर हालात ऐसे पैदा हो जायें कि तलाक के बिना चारा न रहे तब बिला शक तलाक का हक़ इस्तेमाल किया जाये, बात बेबात तलाक देना गजबे इलाही को दावत देने के मोतरादिफ है, हदीस शरीफ में है कि'' निकाह करो, तलाक न दो, इसलिए कि तलाक देने से अर्शे इलाही लरज़ उठता है।'' (तफ्सीर अलकर्तबी: 149/8)

इस्लाम को कुरान की तरफ वापस लायें
सैफ शाहीन, न्यु एज इस्लाम

इस्लाम को कुरान की तरफ वापस लायें

मिसाल के तौर पर, मुसलमान अक्सर उम्मत (सभी मुसलमानों के भाईचारे) के बारे में बात करते हैं, लेकिन मोहम्मद यूनुस और अशफाक अल्लाह सैयद का कहना है कि कुरान भाईचारे में पूरी इंसानियत को शामिल करने का तसव्वुर रखता है। "कुरान इंसानी नस्ल, ज़बान और रंग की विविधता को तस्लीम करता है (30:22) और इसका ऐलान करता है कि अगर ख़ुदा चाहता तो वो सबको एक क़ौम बना देता (10:18 11:118) और सबको रहनुमाई अता करता है (6:149)। जिस तरह पूरे कुरआन में दीन अल-इस्लाम और तक़वा का इस्तेमाल किया गया है, लेखक इस तशरीह पर पहुंचते हैं। वो कहते हैं कि "कुरान दीन अल-इस्लाम को वही आफाकी पैग़ाम (सार्वभौम संदेश) वाला बताता है जो पहले के नबियों पर उतरा था, जो सभी सच्चे मुसलमान थे (2:131-133), और इसी असल पैग़ाम को उन्होंने लोगों तक पहुंचाया था। "वो कहते हैं कि ईमान का खुलासा इंसानियत की खिदमत के ज़रिए खुदा की इताअत करना है। इसी तरह तक़वा जो कुरान आयात में किसी न किसी शक्ल में सैकड़ों बार इस्तेमाल हुआ है, वो "किसी शख्स के आलमगीर सामाजी और एख्लाकी ज़िम्मेदारियों के लिहाज़....." को ज़ाहिर करता है।

 

नौकरानियों और कॉल गर्ल्स वगैरह के साथ बग़ैर शादी के यौन संबंध के औचित्य को पेश करने के लिए नकल की जाने वाली कुरान आयात पर नई बसीरत "और अगर तुम्हें अंदेशा हो कि तुम यतीम लड़कियों के बारे में इंसाफ न कर सकोगे तो उन औरतों से शादी करो जो तुम्हारे लिए पसंदीदा और हलाल हों, दो दो और तीन तीन और चार चार (लेकिन ये इजाज़त बशर्ते अद्ल है), फिर अगर तुम्हें अंदेशा हो कि तुम (ज़ायद बीवियों में) अद्ल नहीं कर सको तो सिर्फ एक ही औरत से (शादी करो) या कनीज़ें जो (शरअन) तुम्हारी मिस्कियत में आईं हों, ये बात इस से क़रीबतर है कि तुमसे ज़ुल्म न हो"(4:3)। कुरान मानव समाज में चौतरफा सुधार के लिए आया था, जिसमें अन्य बातों के अलावा, शादी और परिवार से संबंधित अन्य कानूनों के ज़रिए गुलामी और औरतों का सशक्तिकरण शामिल है। इसलिए गुलामों, कैदियों, नौकरानियों, कॉल गर्ल्स वगैरह के साथ जिंसी ताल्लुकात की इस्लाम में कोई भी तज्वीज़ इसके आफाकी पैगाम (सार्वभौम संदेश) के बिल्कुल मुतासादिम होगी।

 
फतवा को बदला जा सकता है
असग़र अली इंजीनियर (अनुवाद- न्यु एज इस्लाम)

फतवा को बदला जा सकता है

ये सब सैकड़ों साल पहले लिखी गई किताबों और जारी किए गए फ़तवे पर आधारित है और हमारे उलेमा लोग इन तहरीरों से इंहेराफ (विचलित) करना नहीं चाहते हैं। जब भी इनसे कोई सवाल पूछा जाता है तो ये इन तहरीरों से रुजू करते हैं और एक फतवा जारी करते और फिर अदालत के फैसले की तरह यह फतवा बाद के फतवों के लिए एक नज़ीर बन जाता है और ये फतवा पूरी दुनिया में लागू होने वाला माना जाने लगता है। आम मुसलमानों को पता नहीं है कि ये फतवा सिर्फ मुफ्ती हज़रात की ज़ाहिर की गई महज़ राय है और इनकी पाबंदी करना ज़रूरी नहीं है।

 

शादी से अलग शारीरिक सम्बंध के लिए औरतों को कोड़े मारना क्रूरता और गैर-इस्लामी अमल है

"और जो लोग पाक दामन औरतों पर (बदकारी की) तोहमत लगायें फिर चार गवाह पेश न कर सकें तो तुम उन्हें (सज़ाए कज़फ के तौर पर) अस्सी कोड़े लगाओ और कभी भी उनकी गवाही क़ुबूल न करो, और यही लोग बद किरदार हैं (24:4) सिवाय उनके जिन्होंने इस (तोहमत लगने) के बाद तौबा कर ली और (अपना) इस्लाह कर ली, तो बेशक अल्लाह बड़ा बख्शने वाला निहायत मेहरबान है (उनका शुमार फ़ासिकों  में नहीं होगा लेकिन इससे हदे कज़फ माफ़ नहीं होगी"(24:5)।

न्यूट गिंगरिच कदीम इस्लामी कानून की सरज़िनश करने वालों में अकेले नहीं हैं वक्त आ गया है कि मुसलमानों के कुलीन वर्ग और लीडर प्राचीन इस्लामी (शरई) कानून को आधुनिक इस्लामी कानून (शरई) से बदलें जिसमें पश्चिम के सेकुलर मूल्य भी शामिल हों और जो कुरान के व्यापक दायरे के अंदर हो। इस अमल में देरी या कोई रिआयत खालिद अबुल फज़ल की चिंता को बल प्रदान करेगी, ’क्या ये मुमकिन है कि वो दिन आयेगा कि जब हमारा ज़िक्र खत्म हो जाने वाली तहज़ीबों में होगा।

 

पाकिस्तानः बढ़ती हुई कशमकश और मज़हबी क़ूवतें

कुछ लोगों का मानना ​​है कि पाकिस्तानी सत्ता देफाए पाकिस्तान कौंसिल को आंतरिक और बाहरी मोर्चों पर इस्तेमाल कर रही थी और जहां देश में राजनीतिक दलों को इसके द्वारा संदेश दिया जाता था वहीं भारत, अमेरिका और यूरोपीय देशों को भी कौंसिल के ज़रिए सख्त किस्म के संदेश दिए जा रहे थे। शक्तिशाली संगठन नहीं चाहते  हैं कि देफाए पाकिस्तान कौंसिल को निष्क्रिय किया जाये जबकि विदेश मंत्रालय की ओर से स्पष्ट रूप से बता दिया गया है कि अगर देफाए पाकिस्तान कौंसिल इसी तरह हिंसक व्यवहार का प्रदर्शन करती रही तो न सिर्फ पाकिस्तान के विदेशी संबंध बुरी तरह प्रभावित होंगे बल्कि पाकिस्तान के आर्थिक हितों को भी गंभीर आघात पहुंचेगा।

 

मोहम्मद यूनुस की तरफ से इस्लामी रसूमात में तरमीम की ज़रूरत पर एम. हुसैन सदर के लेख का जवाब

समस्या मुस्लिम विद्वानों के साथ है। वो कट्टरपंथियों और उलेमा को इस्लाम में रसूम और रिवाज और अलामतों को खत्म करने के लिए कहते हैं और ये जाने बग़ैर कि वो ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि वो उसके निर्माता और अकेले संरक्षक है और धार्मिक मामलों से फायदा उठाने वाले हैं। अगर वो सुधार चाहते हैं तो उन्हें रूढ़िवादियों और उलेमा को उनके ही अंदाज में चुनौती देनी होगी और उन्हें कुरान का गहराई से अध्ययन करना होगा। तब उन्हें एहसास होगा कि रस्मों औऱ अलामतों के लिए सीमित स्थान है और ये कई सामाजिक, नैतिक और वैश्विक उदाहरणों को स्पष्ट करेगा जो उन्हें 21वीं सदी की चुनौतियों से निपटने में मददगार साबित होगा।

 

तलाक शुदा महिलाओं के नान-नुफ्का को इद्दत तक बहाल रखने को महदूद करना गैर इस्लामी अमल है

"ऐ ईमान वालो! जब तुम मोमिन औरतों से निकाह करो फिर तुम उन्हें तलाक दे दो कब्ल इसके कि तुम तुम उन्हें मस् करो (यानि खिलवते सहीहा करो) तो तुम्हारे लिए इन पर कोई इद्दत (वाजिब) नहीं है कि तुम उसे शुमार करने लगो, पस उन्हें कुछ माल और मता दो और उन्हें अच्छी तरह हुस्ने सुलूक के साथ रुख्सत करो "(33:49)।

 

सामाजिक न्याय, लैंगिक न्याय, कम न किये जा सकने वाले धार्मिक बहुलवाद पर प्रगतिशील मुसलमानों की सोच की प्रमुख विशेषताएं प्रगतिशील मुसलमान की विचारधारा के समर्थक मुस्लिम और गैर मुस्लिम दुनिया भर में फैल जाएं। कई प्रसिद्ध प्रगतिशील मुस्लिम बुद्धिजीवी पश्चिम में रहते हैं और पश्चिमी विश्वविद्यालयों में शिक्षा देते हैं। उनमें से कुछ ने इन संस्थाओं से स्नातक और स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल है, और कुछ मामलों में इस्लामी अध्ययन में पारंपरिक प्रशिक्षण प्राप्त किया है।

 
लड़कियां रहमत हैं उन्हें ज़हमत न समझें
मौलाना मोहम्मद मुजाहिद हुसैन हबीबी

हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा बयान करती हैं कि मेरे पास एक औरत आई उसके साथ उसकी दो बेटियाँ थीं। उसने कुछ मांगा और मेरे पास खजूर के सिवा कुछ नहीं था। मैंने उसे वही दे दिया। उसने उस खजूर को अपनी दोनों बेटियों के बीच बांट दिया और खुद कुछ न खाया। फिर उठकर खड़ी हुई और चली गई। जब रसूल अल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम हमारे पास आए मैंने आपको ये बताया तो आपने कहा जो कोई इन लड़कियों के बारे में किसी आज़माइश में मुब्तेला हो जाये, फिर वो उनसे अच्छा व्यवहार करे तो ये लड़कियाँ उसके लिए जहन्नम की आग से पर्दा बन जाएंगी। (बुखारी व मुस्लिम)

 
पाकिस्तान में बेयक़ीनी की फिज़ा
मुजाहिद हुसैन (अनुवाद- न्यु एज इस्लाम)

पाकिस्तान में बेयक़ीनी की फिज़ा पाकिस्तान में हर किस्म की बेचैनी का दौर दौरा है और राज्य लगभग हर हवाले से समस्याओं का शिकार है क्योंकि विधायिका, न्यायपालिका और प्रशासन में से हर कोई बाला दस्ती का ख्वाहिशमंद है। फौज इस स्थिति में सत्ता पर कब्जा करने में हमेशा जल्दबाज़ी का प्रदर्शन करती रही है लेकिन आज वो सिर्फ इसलिए ऐसा करने से परहेज कर रही है कि पाकिस्तान की एकता अतीत की तुलना में बहुत कमज़ोर है। देश के एक बड़े हिस्से में आतंकवादियों का राज है तो साथ ही राजनीतिक विवाद युद्ध की स्थिति अख्तियार कर रहे हैं। क़बायली पट्टी राज्य के हाथों से बहुत दूर जा चुकी है और बलूचिस्तान में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है जो इस्लामाबाद से जान छुड़ाना चाहते हैं। देश का धार्मिक समुदाय सारी दुनिया के साथ युद्ध के लिए तैयार हो रहा है और राज्य को युद्ध के मैदान में व्यस्त देखना चाहता है।

 
सूफीवाद का इस्लामी संस्कृति में महान योगदान है
असग़र अली इंजीनियर (अनुवादः न्यु एज इस्लाम)

सूफीवाद का इस्लामी संस्कृति में महान योगदान है

पिछड़ी जाति के हिंदु जो मुख्य धारा के हिंदू धर्म से बाहर किए गए और जिन्हें हाशिए पर डाल दिया गया था, उनके प्रति भी सूफी हज़रात ने प्रतिष्ठा और सम्मान व्यक्त की है और इसी के कारण पिछड़ी जातियों के हिंदु भी इस्लाम की ओर आकर्षित हुए और उनमें से बहुत से लोगों ने अपने धर्म को बदल दिया था, लेकिन इस बात के कोई दस्तावेज नहीं मिलते हैं कि सूफी हज़रात ने उन लोगों को अपना धर्म बदलने के लिए प्रोत्साहित किया था। धार्मिक परिवर्तन इसलिए अधिक हुए क्योंकि मुख्या धारा से बाहर किए गए और पिछड़े हिंदुओं ने समानता के सिद्धांत को बहुत आकर्षक पाया था। लेकिन, मुख्य धारा के इस्लामी समाज ने उनके खिलाफ भेदभाव का अमल किया और जिससे वो आला मकाम हासिल नहीं कर सके।

 
आप उलेमा के खिलाफ क्यों हैं?
मौलाना नदीमुल वाजिदी (अनुवाद- न्यु एज इस्लाम)

आप उलेमा के खिलाफ क्यों हैं? इस दौर में उलेमा को जिस कदर बुरा भला कहा जा रहा है शायद ही कभी कहा गया हो, एक तरह से इल्म वालों को आलोचना का निशाना बनाना और उन पर कीचड़ उछालना फैशन सा बन गया है लेकिन किसी महफ़िल में कुछ लोग इकट्ठा हुए बात देश की या अंतर्राष्ट्रीय सियायत की चली, बातचीत का रुख मुसलमानों के पिछड़ेपन की तरफ मुड़ा और आलोचना उलेमा की होने लगी, जैसे मुसलमानों के पिछड़ेपन की सारी जिम्मेदारी इन्हीं बेचारे मौलवियों पर है, आमतौर पर ऐसा कहा जाता है कि समाज में जो कुछ त्रुटियाँ फैली हुई हैं और देश में जो कुछ फ़ितना व फसाद बरपा है वह उलेमा वर्ग के कारण है, अगर ये लोग न होते तो पूरी उम्मत आराम से होती और पूरा समाज बुराइयों से पाक नज़र आता......

1 2 ..14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 ... 30 31 32
Get New Age Islam in Your Inbox
E-mail:
Videos

Dr. Muhammad Hanif Khan Shastri Speaks on Unity of God in Islam and HinduismPLAY 

Shaukat Kashmiri speaks to New Age Islam TV on forced conversions to Islam in PakistanPLAY 

Shaukat Kashmiri speaks to New Age Islam TV on impact of Sufi IslamPLAY 

NEW COMMENTS