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इस लेख के लेखक प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन सिपाहे सहाबा के पूर्व प्रमुख और पंजाबी तालिबान के अमीर अस्मतुल्लाह मुआविया हैं। इस लेख में उन्होंने लोकतंत्र पर तालिबान के दृष्टिकोण को दुहराया है और मौलाना मौदूदी के इस नज़रिए का समर्थन किया है कि लोकतंत्र एक गैरइस्लामी और कुफ़्र पर आधारित शासन की व्यवस्था है। इस वक्त वो पाकिस्तान के साथ 'सार्थक' बातचीत चाहते हैं जो कि समझ में न आने वाली बात है क्योंकि तालिबान पाकिस्तान की सरकार को काफिरों की सरकार करार दे चुके हैं जबकि इसमें शामिल मंत्रियों का बहुमत मुसलमान है और देश के कानून का आधार इस्लामी शरीयत है।

इस लेख में मौलाना ने ये समझाने की जी तोड़ कोशिश की है कि पाकिस्तान के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समस्याएं इसी 65 साल के लोकतंत्र का परिणाम हैं, जो कुफ़्र पर आधारित है और ये कि सिर्फ तालिबान ही इस देश को भ्रष्टाचार के दलदल से निकाल सकते हैं।

ये बात ध्यान देने लायक़ है कि तालिबानी उलमा पाकिस्तान की जनता की आम समस्याओं के बारे में बातें तो करते हैं और गरीबी, नेताओं के भ्रष्टाचार, सरकार पर कब्जा किये हुए जागीरदारों और नवाबों के द्वारा देश की दौलत की लूट पर जनता की सहानुभूति में घड़ियाली आँसू भी बहाते हैं लेकिन वो शिया लोगों के क़त्ल, सूफियों के मज़ारों की तबाही और रिहायशी और कारोबारी इलाकों में नागरिकों पर आत्मघाती हमलों की कभी चर्चा नहीं करते। इसलिए, इस लेख में मौलाना ने जनता के दुखों पर घड़ियाली आँसू बहाकर उन्हें तालिबान का इंसानी चेहरा (जो सिरे से है ही नहीं) दिखाने की कोशिश की है। उर्दू के ज़्यादातर शायरों की तरह उन्होंने भावनात्मक नारों और लच्छेदार ज़बान के साथ शेरों का इस्तेमाल करके तालिबान की गैरइंसानी गतिविधियों और विरोधियों के क़त्ल की नीति पर पर्दा डालने और तालिबान के समर्थन में जनता की सहानुभूति बटोरने की कोशिश की है। लेकिन ये बात भुलाई नहीं जा सकती कि उनकी नीति का शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने वाली एक 13 साल की लड़की के ऊपर जानलेवा हमला करने में भी उन्हें शर्म नहीं आई। इस लेख में भी उनकी दोग़ली नीति पूरी तरह स्पष्ट हो गई है। न्यु एज इस्लाम उनकी इसी दोग़ली नीति को बेनकाब करता रहेगा .... न्यु एज इस्लाम एडिट डेस्क

 

 

अलअबीरी के लेख में गोइबल्स के इस नज़रिये को लागू किया गया है कि यदि एक झूठ को सौ बार दुहराया जाए तो वो सच बन जाता है या लोग उसको सच समझ कर कुबूल कर लेते हैं। इस लेख में भी बार बार क़ुरान, हदीस और उलमा के कथनों को नक़ल करके और उन्हें गलत संदर्भ में पेश करके ये संदेश देने की कोशिश की गई है कि नऊज़ोबिल्लाह इस्लाम दुश्मन के बच्चों, बूढ़ों और औरतों को क़त्ल करना जायज़ समझता है जबकि हक़ीक़त ये है कि ऐसा करना इस्लामी सिद्धांत और हुक़ूकुल इबाद (बंदों के अधिकार) की विचारधारा के बिल्कुल खिलाफ है।

 

हद ये है कि पाकिस्तान का अधिकांश मीडिया हज़ारा शिया समुदाय के इस सामूहिक नरसंहार पर कुछ कहने से घबरा रहा है। इसकी वजह सरल और स्पष्ट है, मीडिया संस्थानों के मालिक समझते हैं कि अगर वो ऐसे विषयों में उलझ गए तो न सिर्फ उन्हें निशाना बनाया जाएगा बल्कि उनके व्यवसायिक हितों को भी नुकसान पहुंचेगा। पहले ही कट्टरपंथी तालिबान और अलकायदा पाकिस्तानी मीडिया से नाराज़ हैं और अगर सांप्रदायिक हत्याओं के मामले पर उसे आलोचना का निशाना बनाया गया तो स्थिति बिगड़ सकती है। बलूचिस्तान की राज्य सरकार से इस संबंध में किसी प्रगति की उम्मीद रखना निरर्थक है क्योंकि बहुत से ज़रूरी मामलों में राज्य सरकार के प्रमुख ओहदेदारों की अक्षमता काफी स्पष्ट रही है।

 

अगर अपने हालात और आवश्यकता के मद्देनजर एक से अधिक (4 तक) शादी की ज़रूरत महसूस करता है, तो वो ऐसा कर सकता है। इसकी इस्लामी शरीयत ने इजाज़त दी है। आज की तारीख में यहां ये सवाल ध्यान देने लायक हो गया है कि क्या दूसरी शादी के लिए आदमी को पहली बीवी की इजाज़त और रज़ामंदी (सहमति) हासिल करना ज़रूरी होगा और ये शर्त पूरी किए बिना दूसरी शादी नहीं कर सकता है।

 

कुछ मुसलमान इंकार करने की स्थिति में ही जीना पसंद करते हैं। वो अखबार पढ़ते हैं, टीवी देखते हैं, तालिबान और दूसरे जेहादियों को इस्लाम के नाम पर बयान न किये जा सकने वाले आतंक को फैलाते हुए देखते हैं,  और उनके औचित्य के लिए हमेशा क़ुरान की आयतों का हवाला देते हैं। लेकिन ध्यान दिलाने पर भी ये मुसलमान इस्लाम की असहिष्णु व्याख्या और नृशंस आचरण के बीच पाए जाने वाले किसी भी सम्बंध से इंकार करते हैं। इस्लाम की ये असहिष्णु व्याख्या हमारे साथ किसी न किसी रूप में या किसी न किसी नाम के तहत इतिहास की 14 सदियों से है। ऐसे लोगों को पहले ख्वारिज या खारिजी (इस्लाम से निकल जाने वाले) कहा जाता था,  और आज उन्हें वहाबी कहा जाता है,  हालांकि वो अपने आपको सल्फ़ी (इस्लाम के बुनियादी सिद्धांत में विश्वास रखने वाले जिस पर मुसलमानों की पहली पीढ़ी ने अमल किया था) और मोहिद (खुदा के एक होने में दृढ़ विश्वास रखने वाले) कहलाने को प्राथमिकता देते हैं। मीडिया में उनकी हामी भरने वाले चाहते हैं कि उन्हें सिर्फ एक आम मुसलमान समझा जाए,  ताकि उनकी इन निंदनीय और नाजायज़ सरगर्मियों के वर्ग में सभी मुसलमानों को शामिल किया जा सके।

बहरहाल मुसलमान जो इस पूरे खेल को जानते हैं और उनके विचारों और गतिविधियों से खुद को अलग करना चाहते हैं। खुदा का शुक्र है कि वहाबी समुदाय अभी भी मुस्लिम समाज का एक छोटा सा समूह है, हालांकि पिछले चार दशकों में उन्होंने पेट्रोडालर की भारी मदद से अपने विचारों के प्रसार द्वारा अपने प्रभाव और पहुंच को बढ़ाया है। ये अहम है कि हम मुख्य धारा के मुसलमान होने के नाते उनके विचारों की कलई खोलते रहें और उनको रद्द करते रहें ताकि वहाबियत, सल्फ़ियत  और इससे संबंधित विचारधाराओं जैसे अहले हदीसियत, क़ुत्बियत, मौदूदियत, देवबंदियत आदि के समर्थकों और प्रचारकों को इस्लाम के मुख्य धारा में शामिल होने का दावा करने से रोका जा सके।

इसी अहम ज़रूरत के मद्देनज़र न्यु एज इस्लाम तालिबान के मुखपत्र नवाये अफगान जिहाद (जुलाई 2012) में प्रकाशित लेख को पेश कर रहा है। ये मासिक पत्रिका में प्रकाशित हो रहे लेख का पहला हिस्सा है जिसमें इस बात को स्पष्ट किया गया है कि क्यों वहाबियों का ये ईमान है कि काफिरों यानि सभी गैर- वहाबी मुस्लिम,  पूर्व मुस्लिम और अहले किताब समेत गैर-मुस्लिमों के बेगुनाह मर्दों, औरतों और बच्चों को मारना उनके इस्लाम में जायज़ है। मुख्य धारा में शामिल मुसलमानों के लिए ज़रूरी है कि वो तालिबानियों के वास्तविक खूनी प्रकृति को समझें और वैश्विक शांति और इस्लाम की नेक नामी की हिफाज़त के लिए कुरान और सुन्नत के आधार पर एक आवाज़ होकर इस दृष्टिकोण की निंदा करें। और वहाबियों के उस वर्ग को जो हिंसक विचारधारा का समर्थन नहीं करता जिनके संस्थापक इब्ने अब्दुल वहाब और वैचारिक संरक्षक इब्ने तैमिया हैं।  उन्हें इस समूह से पूरी तरह से अलग हो जाना चाहिए। अगर आप वहाबी सिर्फ इसलिए कहलाते हैं क्योंकि आप सूफियों के मज़ारात पर हाज़िरी देने और सूफी बुजुर्गों का एहतेराम करने से नफ़रत करते हैं,  न कि इसलिए क्योंकि आप असहिष्णुता और इस दृष्टिकोण के उग्रवाद के कायल और क़द्रदान हैं,  तो आपको समझना चाहिए कि मज़ारात पर हाज़िरी से परहेज़ करने के लिए आपको वहाबी होने की ज़रूरत नहीं। ऐसे बहुत से दूसरे समुदाय के मुसलमान हैं जो मज़ारात की ज़ियारत नहीं करते,  फिर भी वो वहाबी नहीं हैं। आपको मोहिद होने के लिए वहाबी या सल्फ़ी होने की ज़रूरत नहीं........... सुल्तान शाहीन, एडिटर, न्यु एज इस्लाम

 
Pakistan Helpless Before Taliban तालिबान के आगे पाकिस्तान बेबस
कुलदीप तलवार (अनुवाद- न्यु एज इस्लाम)

सत्ताधारी दल मोटे तौर पर धार्मिक चरमपंथ का विरोधी और दक्षिण एशिया में शांति का पक्षधर है लेकिन प्रशासनिक स्तर पर गैर प्रभावी साबित हुआ है। पाकिस्तान की न्यायिक प्रणाली भी आतंकवादियों को सजा देने की क्षमता खो चुकी है। पिछले 15 वर्षों में सिर्फ दो लोगों को आतंकवाद से जुड़े मामलों में सज़ा हुई है। गृहमंत्री रहमान मलिक ने कहा है कि पाकिस्तान में जज लोग आतंकवादियों से खौफ खाते हैं और यही वजह है कि वो उन्हें सज़ा के बगैर छोड़ देते हैं।

 

राज्य के सभी शिक्षण संस्थानों की इत्तेला के लिए अर्ज़ है कि जितनी जल्दी मुमकिन हो सके अपने यहां जारी शिक्षा को अहले जिहाद से मंज़ूर करवा लें अन्यथा अहले जिहाद अब आपके शिक्षण संस्थाओं को बम लगाकर ढहाने तक ही सीमित नहीं रहेंगे बल्कि आपको धर्म विरोधी शिक्षा देने के अपराध में लिप्त बताकर वास्तव में सजा दी जाएगी।

 

हिन्दुओं के अहले किताब न होने में कोई बुराई नहीं है। और हिन्दुओं के 'मुशरिकीन' होने में भी कोई बुराई नहीं है। हिंदू क्या हैं, और क्या नहीं, इस पर सिर्फ उनको ही विचार करना है। हम जैसे मुसलमानों को इसमें कुछ नहीं कहना चाहिए, और न ही ये हमारा काम होना चाहिए।

इससे भी अधिक गंभीर समस्या औरतों के खरीदने और बेचने का है। खरीदी हुई औरत के साथ जो बर्ताव किया जाता है उसकी कल्पना करके ही कंपकंपी आ जाती है। हालांकि खरीदी हुई औरतों से अक्सर शादी कर ली जाती है लेकिन शादी से इन औरतों की मुसीबतें कम नहीं होतीं क्योंकि दुल्हन बना लेने के बाद भी उन्हें खरीदी हुई चीज़ ही समझा जाता है।

 
Religious Fanaticism मज़हबी जुनूनियत
हुसैन अमीर फ़रहाद (अनु.- न्यु एज इस्लाम)

इस तरह की घटनाएं क़ौम के अलावा देश के लिए भी शर्मिंदगी और बदनामी का कारण बनती हैं। अल्लाह का हुक्म है कि,  या अय्योह्लज़ीना आमनू इन जा अकुमफासेकुम बेनबाइम फतबैय्यनू अनतोसीबू क़ौमम बेजहालतिन फतुस्बेहू अला मा फअलतुम नादेमीन (49- 6) ऐ ईमान वालो! अगर कोई फ़ासिक तुम्हारे पास खबर लेकर आये तो तहक़ीक़ (जाँच) कर लिया करो और कहीं ऐसा न हो कि जिहालत में तुम किसी का नुकसान कर बैठो और फिर तुम्हें अपने किए पर नादिम (शर्मिंदा) होना पड़े।

जब तक हम दूसरों से नफ़रत करते और डरते रहेंगे, तब तक साजिशी थ्योरी के कारण झगड़े होते रहेंगे। हमें इनसे ज़रूर होशियार रहना चाहिए, इसलिए कि वो सिर्फ अपने द्वारा पैदा किए गए डर को बल प्रदान करेंगे। जबकि कुछ लोग जानबूझकर दुश्मनी की बुनियाद पर इस थ्योरी को बढ़ावा देते हैं, और बहुत से मुसलमान आसानी से उनका शिकार हो जाते हैं। कुरान का फरमान है,'' जब भी कोई बात तुम तक पहुँचे तो उसे दूसरों को बताने से पहले उसकी अच्छी तरह तफ्तीश (जाँच) कर लो। और यही हमारा पथ प्रदर्शक होना चाहिए।

 

ये तो शादी करने वाले की जिम्मेदारी है कि देखभाल कर शादी जैसा जिम्मेदाराना कदम उठाए। ये मुफ्ती, आलिम का काम नहीं है कि वो सर्वे और इंक्वाएरी करता फिरे कि कौन यहूदी, ईसाई असल अहले किताब हैं और कौन सिर्फ नाम के। बच्चों की तर्बियत के एतबार से भी अहले किताब से शादी सवाल पैदा करेगा, लेकिन इसके औचित्य को सीधे तौर पर खारिज नहीं किया जा सकता है।

 

दरअसल इस लेख का सारा ताना बाना वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकवादी हमले के नतीजे में मारे गए नागरिकों के क़त्ल को जायज़ ठहराने के लिए बनाया गया है और इसका आधार एक हदीस पर रखा गया है जिसके बारे खुद इमाम अलहजर असक़लानी कहते हैं कि मुमकिन है कि वो हदीस बाद में रद्द कर दी गयी हो और इसके साथ ये भी फरमाया कि अगर औरतों और बच्चे दुश्मन के साथ हों तब भी उन्हें क़त्ल नहीं किया जाना चाहिए।

 

अलमूर्दी ने अल-एहकाम अल-सुल्तानिया के पेज  संख्या 41 में लिखा है, 'जंग में औरतों और बच्चों का क़त्ल प्रतिबंधित है क्योंकि हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इससे मना फरमाया है। इब्ने मालिक और अलक़ज़ी का भी ये मज़हब है कि किसी भी हालत में यहाँ तक कि अगर कुफ़्फ़ार औरतों और बच्चों को ढाल के तौर पर इस्तेमाल करें तो भी उनका क़त्ल जायज़ नहीं है।

 

क्रिसमस की मुबारकबाद के खिलाफ तालिबान का फतवा गैर इस्लामी है

न्यु एज इस्लाम अपने ईसाई भाईयों को क्रिसमस की मुबारकबाद पेश करता है

हमारे पाठक लोग गैर मुस्लिमों के क़त्ल के समर्थन में तालिबानी फ़तवे को पढ़ चुके हैं। हमने उसका खंडन भी प्रकाशित किया है तालिबान की ओर से एक और फतवा जारी किया गया है जिसमें मुसलमानों को ईसाइयों (अहले किताब) को क्रिसमस की मुबारकबाद देने से मना किया गया है और इसे हराम और गैर शरई अमल करार दिया है। ये उनकी ओर से बहुलवादी समाज में मुसलमानों और ईसाइयों के बीच मतभेद को बढ़ावा देने की एक कोशिश है। इस तरह के फतवे नफरत को बढ़ावा देते हैं और मुसलमानों को एक ऐसे क़ौम के रूप में पेश करते हैं जो सांप्रदायिक सद्भाव, अंतर्धार्मिक सांस्कृतिक बातचीत में यक़ीन नहीं रखती, जिस पर क़ुरान में जोर दिया गया है। पैगम्बर मोहम्मद (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्ल्म) गैर मुस्लिमों के उपहार और निमंत्रण स्वीकार करते थे। मुस्लिम समाज में इस तालिबानी दृष्टिकोण और मानसिकता की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इंडोनेशिया में धार्मिक लोगों की ओर से इस साल मुसलमानों को ईसाईयों को क्रिसमस की बधाई देने से मना किया गया है, उनकी दावत स्वीकार करना और उनकी खुशी में शामिल होना तो दूर की बात है। यहां तक ​​कि उन्होंने वहां के राष्ट्रपति से राष्ट्रीय क्रिसमस समारोह में शामिल न होने की दरख्वास्त की है, जबकि एक बहुलवादी देश के राष्ट्रपति के रूप में उन्हें ऐसे समारोह में शामिल होना चाहिए। इसलिए, ये स्पष्ट है कि ये तालाबानी फतवे दूरगामी प्रभाव वाले हैं और इस मानसिकता की घोर निंदा की जानी चाहिए और सामूहिक रूप से इसका मुकाबला करना चाहिए।

अंत में हम अपने सभी अहले किताब भाईयों को क्रिसमस की मुबारकबाद देते हैं और नए साल में उनकी सलामती और खुशहाली के लिए दुआ करते हैं। हम यहाँ नवाये अफगान जिहाद में प्रकाशित लेख की नकल पेश कर रहे हैं और अपने पाठकों से अनुरोध करते है कि इस पर अपनी राय व्यक्त करें।--- न्यु एज इस्लाम एडिट डेस्क

 

Taliban fatwa against 'Merry Christmas' has far reaching consequences

New Age Islam wishes Christians a Merry Christmas!

Dec 24, 2012

Our readers have gone through the Taliban's fatwa justifying the killings of non-Muslims published in their mouth-piece Nawa-e-Afghan Jihad. We have published the refutations of it. In yet another fatwa on the issue of extending greetings to Christians (ahl-e-Kitab) on Christmas, they have declared saying "Merry Christmas 'to Christians haram and un-Islamic. This is another attempt at creating rifts between Muslims and Christians in a multicultural society. Fatwas like this only promote hatred and present Muslims as a community that does not believe in communal harmony and interfaith cultural exchanges and dialogue which the Quran encourages and emphasises. The holy Prophet (PBUH) accepted invitations and gifts from non-Muslims and stood by them in their joy and sorrow.

This Talibani ideology and mindset has taken deep roots in all Muslim societies. This is evident from the fatwa issued by ulema from a section of religious community in Indonesia and other Muslim countries urging Muslims not to say Merry Christmas to the Christians, not to speak of accepting their invitations to their festivities. In Indonesia they have even asked the President not to attend the national Christmas celebrations which he should do as the President of a multi-religious country. The Taliban fatwa, therefore, seems to have far-reaching consequences and this mindset has to be condemned in the harshest possible terms and fought collectively. At the end, we wish all our ahl-e-kitab Christian brethren a very happy Christmas and pray for their well being and prosperity in the New Year. We are producing the article published in the Nawa-e-Afghan Jihad so that Muslims may be aware of what is going on their society. Now when they hear these same arguments from a seemingly well-educated, even westernised liberal, they can judge where these arguments are coming from, sometimes even without the express understanding of the speaker. We hope readers will express their views on it. - New Age Islam Edit Desk

 

एक बार तो डोमेन रजिस्ट्रार ने हमारे डोमेन नेम को बिना किसी पूर्व सूचना के ही निलंबित कर दिया। और इंटरनेट पर इस निलंबन का प्रचार प्रसार होने में कुछ दिन लग जाते हैं, हुआ ये कि दुनिया के कुछ हिस्सों में कंप्यूटर पर NewAgeIslam.com साइट खुलती थी, और कुछ हिस्सों में ये लिख कर आता कि ये साइट मौजूद नहीं है। एक दो दिनों तक हमें कुछ पता नहीं चला कि हमारे साथ क्या गलत हो रहा है। हम एक डोमेन रजिस्ट्रार से दूसरे डोमेन रजिस्ट्रार तक और एक वेब होस्ट से दूसरे वेब होस्ट को स्थानांतरित होते रहे।

 

तालिबान ने अफगानिस्तान में जंग के दौरान उत्तरी क्षेत्र में पेड़ों को काट दिया वहाँ की नहरों को तबाह कर दिया और घरों को नष्ट कर दिया और इस तरह वहाँ के नागरिकों को वहां से पलायन करने और अन्य क्षेत्रों में शरण लेने के लिए मजबूर कर दिया। मुल्ला अलउबैरी के द्वारा तालिबान के इसी अमल को सही ठहराने की कोशिश है, जबकि इस्लामी कानून ज़मीन सोख्ता नीति (Scorched earth Policy)  के खिलाफ हैं।

 

पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया कि ऐ नौजवानों! तुममें से जो भी शादी के लायक है उसे शादी कर लेनी चाहिए, जो शादी के लायक नहीं है उसे ये सलाह दी जाती है कि वो रोज़े रखे इसलिए कि रोज़े रखने से जिंसी ताक़त (यौन शक्ति) में कमी आती है (अनुवाद सही बुखारी वाल्यूम- 7, किताब 62: [Wedlock (Nikah)] नम्बर- 3)

 

मुल्ला यूसुफ अलउबैरी का ये कहना कि दुश्मन के अत्याचार या ज़्यादती का बदला उसकी बीवी, बच्चों और उसकी क़ौम के दूसरे लोगों से लेना जाइज़ है। ये प्रत्यक्ष रूप से जिहालत है और गैर इस्लामी व गैर शरई है। इस फ़तवे का औचित्य न क़ुरान में है न हदीस में और न ही फिकह इस्लामी में है।

 

इसलिए कुरान की जिन आयतों और जिन हदीसों को मौलाना अलउबैरी ने अपने दृष्टिकोण के समर्थन में पेश किया है वो उनका खंडन करती हैं और कुरान, हदीस और फ़िक़ह के मुताबिक़ कुफ़्फ़ार के बेकसूर लोगों, औरतों, बच्चों, बुज़ुर्गों और मज़हबी लीडरों के क़त्ल से न सिर्फ मना किया है बल्कि ये शरीअत के खिलाफ और सबसे बड़ा गुनाह है।

 
Women's Access to Holy Places पवित्र स्थानों पर औरतों का प्रवेश
असग़र अली इंजीनियर (अनु.- न्यु एज इस्लाम)

कुरान और हदीस दोनों ने इल्म (ज्ञान) हासिल करने पर बहुत ज़ोर दिया है इसके वाबजूद हमारे उलमा ने ऐसे फतवे जारी किये हैं कि आवश्यक मज़हबी रस्मों जैसे नमाज़ वगैरह को अदा करने के लिए ज़रूरी इल्म से ज़्यादा औरतों को न दिया जाए। ये हमारे लिए बहुत ही शर्म की बात है और हम जितनी जल्दी इन चीज़ों में सुधार करेंगे हमारे लिए उतना ही बेहतर होगा। औरतों की तालीम और उनका उच्च स्तर, हमारी प्रगति के लिए अनिवार्य शर्त है।

 

....हदीस और फिकह की किताब में गैर मुस्लिमों के अधिकारों के बारे में उलमा और फुकहा के बेशुमार फतवें हैं जो गैर मुसलमानों की जान और माल और जायदाद को मुसलमानों के बराबर करार देते हैं। लेकिन तालिबान जैसे गैर इस्लामी गुट मुसलमानों के साथ गैर मुस्लिमों के आम नागरिकों और अमन पसंद लोगों का क़त्ले आम करके अपने को असल मुसलमान और हक़ पर होने का दावा करते हैं.....

 

एक तरफ तो ये सच्चाई है कि इसराइल के पास परमाणु हथियारों का बहुत बड़ा भंडार है और वो किसी भी पड़ोसी देश को तबाह करने यहां तक ​​कि ईरान पर भी हमला करने की क्षमता रखता है। ज़ाहिर है कि ये बात अरब कौमों को अपने परमाणु बम बनाने पर उकसाएगी।

पिछले कुछ बरसों में तालिबान के ज़रिए मज़ारों, जुलूसों और मस्जिदों और शहरों के रिहायशी इलाक़ों में अनगिनत आत्मघाती धमाके हुए हैं जिनमें मासूम बच्चे, बूढ़े और औरतों सहित हजारों लोग शहीद हुए। क्या वो सब अमेरिकी थे और किस हदीस के मुताबिक़ उनका क़त्ल जायज़ ठहरता है? तालिबान ने जो आत्मघाती हमलों को हथियार या रणनीति के रूप में अपनाया है, वो न तो कुरान के मुताबिक़ जायज़ है और न ही हदीस के मुताबिक़। खुदकुशी इस्लाम में हराम है चाहे वो नेक मकसद के लिए ही क्यों न हो।

 

.... तालिबान भी ऐसा ही संगठन है जो बावजूद ये कि शरई तौर पर गलत और बागी जमात हैं अपने आप को हक़ पर समझते हैं और अपनी हुकूमत को ही इस्लामी हुकूमत करार देते हैं और इस आधार पर इंसाफ करने वालों से जंग और मासूम औरतों और बच्चों के क़त्ल को उचित और शरीअत के मुताबिक़ क़रार देते हैं।

 
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