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The Truth behind Taliban's Fatwa Justifying Killings of Innocent Civilians Part-5 नवाये अफगान जिहाद का फतवा और उसकी वास्तविकता- (किस्त 5) मुल्ला यूसुफ अलउबैरी का ये कहना कि दुश्मन के अत्याचार या ज़्यादती का बदला उसकी बीवी, बच्चों और उसकी क़ौम के दूसरे लोगों से लेना जाइज़ है। ये प्रत्यक्ष रूप से जिहालत है और गैर इस्लामी व गैर शरई है। इस फ़तवे का औचित्य न क़ुरान में है न हदीस में और न ही फिकह इस्लामी में है।

 

The Truth behind Taliban's Fatwa Justifying Killings of Innocent Civilians Part-4 नवाये अफगान जिहाद का फतवा और उसकी वास्तविकता: (किस्त 4): तालिबानी आलिम का गैर मुसलमानों के क़त्ल का गैर इस्लामी फ़तवा

इसलिए कुरान की जिन आयतों और जिन हदीसों को मौलाना अलउबैरी ने अपने दृष्टिकोण के समर्थन में पेश किया है वो उनका खंडन करती हैं और कुरान, हदीस और फ़िक़ह के मुताबिक़ कुफ़्फ़ार के बेकसूर लोगों, औरतों, बच्चों, बुज़ुर्गों और मज़हबी लीडरों के क़त्ल से न सिर्फ मना किया है बल्कि ये शरीअत के खिलाफ और सबसे बड़ा गुनाह है।

 
Women's Access to Holy Places पवित्र स्थानों पर औरतों का प्रवेश
असग़र अली इंजीनियर (अनु.- न्यु एज इस्लाम)

Women's Access to Holy Places पवित्र स्थानों पर औरतों का प्रवेश

कुरान और हदीस दोनों ने इल्म (ज्ञान) हासिल करने पर बहुत ज़ोर दिया है इसके वाबजूद हमारे उलमा ने ऐसे फतवे जारी किये हैं कि आवश्यक मज़हबी रस्मों जैसे नमाज़ वगैरह को अदा करने के लिए ज़रूरी इल्म से ज़्यादा औरतों को न दिया जाए। ये हमारे लिए बहुत ही शर्म की बात है और हम जितनी जल्दी इन चीज़ों में सुधार करेंगे हमारे लिए उतना ही बेहतर होगा। औरतों की तालीम और उनका उच्च स्तर, हमारी प्रगति के लिए अनिवार्य शर्त है।

 

The Truth Behind Taliban's Fatwa Justifying Killings Of Innocent Civilians नवाये अफगान जिहाद का फतवा और उसकी वास्तविकता: (किस्त 3)- खुदकुशी, नशीली दवाओं और खारिजियत पर आधारित तालिबानी फिक्र और अमल

....हदीस और फिकह की किताब में गैर मुस्लिमों के अधिकारों के बारे में उलमा और फुकहा के बेशुमार फतवें हैं जो गैर मुसलमानों की जान और माल और जायदाद को मुसलमानों के बराबर करार देते हैं। लेकिन तालिबान जैसे गैर इस्लामी गुट मुसलमानों के साथ गैर मुस्लिमों के आम नागरिकों और अमन पसंद लोगों का क़त्ले आम करके अपने को असल मुसलमान और हक़ पर होने का दावा करते हैं.....

 

Israel and the US Key to Peace अमन की कुंजी इसराइल और अमेरिका के हाथ में

एक तरफ तो ये सच्चाई है कि इसराइल के पास परमाणु हथियारों का बहुत बड़ा भंडार है और वो किसी भी पड़ोसी देश को तबाह करने यहां तक ​​कि ईरान पर भी हमला करने की क्षमता रखता है। ज़ाहिर है कि ये बात अरब कौमों को अपने परमाणु बम बनाने पर उकसाएगी।

The Truth Behind Taliban's Fatwa Justifying Killings Of Innocent Civilians  नवाये अफगान जिहाद का फतवा और उसकी वास्तविकता (किस्त- 1)

पिछले कुछ बरसों में तालिबान के ज़रिए मज़ारों, जुलूसों और मस्जिदों और शहरों के रिहायशी इलाक़ों में अनगिनत आत्मघाती धमाके हुए हैं जिनमें मासूम बच्चे, बूढ़े और औरतों सहित हजारों लोग शहीद हुए। क्या वो सब अमेरिकी थे और किस हदीस के मुताबिक़ उनका क़त्ल जायज़ ठहरता है? तालिबान ने जो आत्मघाती हमलों को हथियार या रणनीति के रूप में अपनाया है, वो न तो कुरान के मुताबिक़ जायज़ है और न ही हदीस के मुताबिक़। खुदकुशी इस्लाम में हराम है चाहे वो नेक मकसद के लिए ही क्यों न हो।

 

The Truth Behind Taliban's Fatwa Justifying Killings Of Innocent Civilians  नवाये अफगान जिहाद का फतवा और उसकी वास्तविकता. (क़िस्त- 2)

.... तालिबान भी ऐसा ही संगठन है जो बावजूद ये कि शरई तौर पर गलत और बागी जमात हैं अपने आप को हक़ पर समझते हैं और अपनी हुकूमत को ही इस्लामी हुकूमत करार देते हैं और इस आधार पर इंसाफ करने वालों से जंग और मासूम औरतों और बच्चों के क़त्ल को उचित और शरीअत के मुताबिक़ क़रार देते हैं।

 

The Shia-Sunni divide: How real and how deep? Can we move towards genuine unity? शिया सुन्नी मतभेद: कितने वास्तविक और कितने गहरे। क्या हम वास्तविक एकता कायम कर सकते हैं?

शिया- सुन्नी मतभेद की शुरुआत 632 में हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की वफात (मृत्यु) के बाद बल्कि उनके अंतिम संस्कार से पहले उनके उत्तराधिकारियों के मसले से हुई जो वर्तमान इराक के कर्बला में आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के अहले बैत और नवासों के क़त्ल की वजह बनी। शिया- सुन्नी मतभेद का कोई औचित्य तब बनता जब किसी सुन्नी ने कर्बला के क़त्ले आम का समर्थन किया होता।

 
To Shave or Not To Shave दाढ़ी मुँडना चाहिए या नहीं
ऐमन रियाज़, न्यु एज इस्लाम

To Shave or Not To Shave दाढ़ी मुँडना चाहिए या नहीं

जो भी हो, दाढ़ी मुंडवाई जाए या नहीं,  बहुत बड़ी तादाद में मुसलमानों के मन में एक दुविधा बनी हुई है। और हजारों तरह के भेदभाव सिर्फ इसलिए है कि मुट्ठी भर लोग बहक गए हैं। जो भी हो इसका समाधान ये है कि हम दुनिया को बताएँ कि इस्लाम अमन और शांति का धर्म है, बंदूक और बमों का धर्म नहीं हैं। लेकिन इससे पहले कि इस तरह की कण्डीशनिंग  गैर मुस्लिमों के बीच पैदा हो, ये सबक हम मुसलमानों को खुद ही समझना चाहिए।

 

Jamiat Ulema's dialogue with former RSS chief KS Sudarshan  आरएसएस के पूर्व सरसंघचालक के.एस. सुदर्शन से जमीअत उलेमा की बातचीत

...... कम शब्दों में बात ये है कि मुसलमानों ने राजाओं और सत्ताधारियों के फैसले और अमल को कभी धर्म और आदर्श स्वीकार नहीं किया है, केवल खिलाफ़ते राशेदा और बाद में उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रहिमतुल्लाह अलैहि के शासनकाल को नमूना समझा है, इसका कुछ विवरण पेश किया। मुसलमानों का सबसे अहम मसला अक़ीदए तौहीद और रिसालत है। उन्होंने कभी खासकर भारतीय नस्ल के मुसलमानों ने राम, कृष्ण को खारिज नहीं किया है, फिर पूर्वज मानने का सवाल क्यों उठाया जाता है।

 

आतंकवाद के समर्थन में तालिबानियों के द्वारा जारी किया गया फ़तवा खारिज किया जाना चाहिएः ऐसे हालात जिनमें काफिरों के आम लोगों का क़त्ल भी जायज़ है- भाग 6

कुछ मुसलमान इंकार करने की स्थिति में ही जीना पसंद करते हैं। वो अखबार पढ़ते हैं, टीवी देखते हैं, तालिबान और दूसरे जेहादियों को इस्लाम के नाम पर बयान न किये जा सकने वाले आतंक को फैलाते हुए देखते हैं,  और उनके औचित्य के लिए हमेशा क़ुरान की आयतों का हवाला देते हैं। लेकिन ध्यान दिलाने पर भी ये मुसलमान इस्लाम की असहिष्णु व्याख्या और नृशंस आचरण के बीच पाए जाने वाले किसी भी सम्बंध से इंकार करते हैं। इस्लाम की ये असहिष्णु व्याख्या हमारे साथ किसी न किसी रूप में या किसी न किसी नाम के तहत इतिहास की 14 सदियों से है। ऐसे लोगों को पहले ख्वारिज या खारिजी (इस्लाम से निकल जाने वाले) कहा जाता था,  और आज उन्हें वहाबी कहा जाता है,  हालांकि वो अपने आपको सल्फ़ी (इस्लाम के बुनियादी सिद्धांत में विश्वास रखने वाले जिस पर मुसलमानों की पहली पीढ़ी ने अमल किया था) और मोहिद (खुदा के एक होने में दृढ़ विश्वास रखने वाले) कहलाने को प्राथमिकता देते हैं। मीडिया में उनकी हामी भरने वाले चाहते हैं कि उन्हें सिर्फ एक आम मुसलमान समझा जाए,  ताकि उनकी इन निंदनीय और नाजायज़ सरगर्मियों के वर्ग में सभी मुसलमानों को शामिल किया जा सके।

बहरहाल मुसलमान जो इस पूरे खेल को जानते हैं और उनके विचारों और गतिविधियों से खुद को अलग करना चाहते हैं। खुदा का शुक्र है कि वहाबी समुदाय अभी भी मुस्लिम समाज का एक छोटा सा समूह है, हालांकि पिछले चार दशकों में उन्होंने पेट्रोडालर की भारी मदद से अपने विचारों के प्रसार द्वारा अपने प्रभाव और पहुंच को बढ़ाया है। ये अहम है कि हम मुख्य धारा के मुसलमान होने के नाते उनके विचारों की कलई खोलते रहें और उनको रद्द करते रहें ताकि वहाबियत, सल्फ़ियत  और इससे संबंधित विचारधाराओं जैसे अहले हदीसियत, क़ुत्बियत, मौदूदियत, देवबंदियत आदि के समर्थकों और प्रचारकों को इस्लाम के मुख्य धारा में शामिल होने का दावा करने से रोका जा सके।

इसी अहम ज़रूरत के मद्देनज़र न्यु एज इस्लाम तालिबान के मुखपत्र नवाये अफगान जिहाद (जुलाई 2012) में प्रकाशित लेख को पेश कर रहा है। ये मासिक पत्रिका में प्रकाशित हो रहे लेख का पहला हिस्सा है जिसमें इस बात को स्पष्ट किया गया है कि क्यों वहाबियों का ये ईमान है कि काफिरों यानि सभी गैर- वहाबी मुस्लिम,  पूर्व मुस्लिम और अहले किताब समेत गैर-मुस्लिमों के बेगुनाह मर्दों, औरतों और बच्चों को मारना उनके इस्लाम में जायज़ है। मुख्य धारा में शामिल मुसलमानों के लिए ज़रूरी है कि वो तालिबानियों के वास्तविक खूनी प्रकृति को समझें और वैश्विक शांति और इस्लाम की नेक नामी की हिफाज़त के लिए कुरान और सुन्नत के आधार पर एक आवाज़ होकर इस दृष्टिकोण की निंदा करें। और वहाबियों के उस वर्ग को जो हिंसक विचारधारा का समर्थन नहीं करता जिनके संस्थापक इब्ने अब्दुल वहाब और वैचारिक संरक्षक इब्ने तैमिया हैं।  उन्हें इस समूह से पूरी तरह से अलग हो जाना चाहिए। अगर आप वहाबी सिर्फ इसलिए कहलाते हैं क्योंकि आप सूफियों के मज़ारात पर हाज़िरी देने और सूफी बुजुर्गों का एहतेराम करने से नफ़रत करते हैं,  न कि इसलिए क्योंकि आप असहिष्णुता और इस दृष्टिकोण के उग्रवाद के कायल और क़द्रदान हैं,  तो आपको समझना चाहिए कि मज़ारात पर हाज़िरी से परहेज़ करने के लिए आपको वहाबी होने की ज़रूरत नहीं। ऐसे बहुत से दूसरे समुदाय के मुसलमान हैं जो मज़ारात की ज़ियारत नहीं करते,  फिर भी वो वहाबी नहीं हैं। आपको मोहिद होने के लिए वहाबी या सल्फ़ी होने की ज़रूरत नहीं........... सुल्तान शाहीन, एडिटर, न्यु एज इस्लाम

 

आतंकवाद के समर्थन में तालिबानियों के द्वारा जारी किया गया फ़तवा खारिज किया जाना चाहिएः ऐसे हालात जिनमें काफिरों के आम लोगों का क़त्ल भी जायज़ है- भाग 5

कुछ मुसलमान इंकार करने की स्थिति में ही जीना पसंद करते हैं। वो अखबार पढ़ते हैं, टीवी देखते हैं, तालिबान और दूसरे जेहादियों को इस्लाम के नाम पर बयान न किये जा सकने वाले आतंक को फैलाते हुए देखते हैं,  और उनके औचित्य के लिए हमेशा क़ुरान की आयतों का हवाला देते हैं। लेकिन ध्यान दिलाने पर भी ये मुसलमान इस्लाम की असहिष्णु व्याख्या और नृशंस आचरण के बीच पाए जाने वाले किसी भी सम्बंध से इंकार करते हैं। इस्लाम की ये असहिष्णु व्याख्या हमारे साथ किसी न किसी रूप में या किसी न किसी नाम के तहत इतिहास की 14 सदियों से है। ऐसे लोगों को पहले ख्वारिज या खारिजी (इस्लाम से निकल जाने वाले) कहा जाता था,  और आज उन्हें वहाबी कहा जाता है,  हालांकि वो अपने आपको सल्फ़ी (इस्लाम के बुनियादी सिद्धांत में विश्वास रखने वाले जिस पर मुसलमानों की पहली पीढ़ी ने अमल किया था) और मोहिद (खुदा के एक होने में दृढ़ विश्वास रखने वाले) कहलाने को प्राथमिकता देते हैं। मीडिया में उनकी हामी भरने वाले चाहते हैं कि उन्हें सिर्फ एक आम मुसलमान समझा जाए,  ताकि उनकी इन निंदनीय और नाजायज़ सरगर्मियों के वर्ग में सभी मुसलमानों को शामिल किया जा सके।

बहरहाल मुसलमान जो इस पूरे खेल को जानते हैं और उनके विचारों और गतिविधियों से खुद को अलग करना चाहते हैं। खुदा का शुक्र है कि वहाबी समुदाय अभी भी मुस्लिम समाज का एक छोटा सा समूह है, हालांकि पिछले चार दशकों में उन्होंने पेट्रोडालर की भारी मदद से अपने विचारों के प्रसार द्वारा अपने प्रभाव और पहुंच को बढ़ाया है। ये अहम है कि हम मुख्य धारा के मुसलमान होने के नाते उनके विचारों की कलई खोलते रहें और उनको रद्द करते रहें ताकि वहाबियत, सल्फ़ियत  और इससे संबंधित विचारधाराओं जैसे अहले हदीसियत, क़ुत्बियत, मौदूदियत, देवबंदियत आदि के समर्थकों और प्रचारकों को इस्लाम के मुख्य धारा में शामिल होने का दावा करने से रोका जा सके।

इसी अहम ज़रूरत के मद्देनज़र न्यु एज इस्लाम तालिबान के मुखपत्र नवाये अफगान जिहाद (जुलाई 2012) में प्रकाशित लेख को पेश कर रहा है। ये मासिक पत्रिका में प्रकाशित हो रहे लेख का पहला हिस्सा है जिसमें इस बात को स्पष्ट किया गया है कि क्यों वहाबियों का ये ईमान है कि काफिरों यानि सभी गैर- वहाबी मुस्लिम,  पूर्व मुस्लिम और अहले किताब समेत गैर-मुस्लिमों के बेगुनाह मर्दों, औरतों और बच्चों को मारना उनके इस्लाम में जायज़ है। मुख्य धारा में शामिल मुसलमानों के लिए ज़रूरी है कि वो तालिबानियों के वास्तविक खूनी प्रकृति को समझें और वैश्विक शांति और इस्लाम की नेक नामी की हिफाज़त के लिए कुरान और सुन्नत के आधार पर एक आवाज़ होकर इस दृष्टिकोण की निंदा करें। और वहाबियों के उस वर्ग को जो हिंसक विचारधारा का समर्थन नहीं करता जिनके संस्थापक इब्ने अब्दुल वहाब और वैचारिक संरक्षक इब्ने तैमिया हैं।  उन्हें इस समूह से पूरी तरह से अलग हो जाना चाहिए। अगर आप वहाबी सिर्फ इसलिए कहलाते हैं क्योंकि आप सूफियों के मज़ारात पर हाज़िरी देने और सूफी बुजुर्गों का एहतेराम करने से नफ़रत करते हैं,  न कि इसलिए क्योंकि आप असहिष्णुता और इस दृष्टिकोण के उग्रवाद के कायल और क़द्रदान हैं,  तो आपको समझना चाहिए कि मज़ारात पर हाज़िरी से परहेज़ करने के लिए आपको वहाबी होने की ज़रूरत नहीं। ऐसे बहुत से दूसरे समुदाय के मुसलमान हैं जो मज़ारात की ज़ियारत नहीं करते,  फिर भी वो वहाबी नहीं हैं। आपको मोहिद होने के लिए वहाबी या सल्फ़ी होने की ज़रूरत नहीं........... सुल्तान शाहीन, एडिटर, न्यु एज इस्लाम

 

आतंकवाद के समर्थन में तालिबानियों के द्वारा जारी किया गया फ़तवा खारिज किया जाना चाहिएः ऐसे हालात जिनमें काफिरों के आम लोगों का क़त्ल भी जायज़ है- भाग 4

कुछ मुसलमान इंकार करने की स्थिति में ही जीना पसंद करते हैं। वो अखबार पढ़ते हैं, टीवी देखते हैं, तालिबान और दूसरे जेहादियों को इस्लाम के नाम पर बयान न किये जा सकने वाले आतंक को फैलाते हुए देखते हैं,  और उनके औचित्य के लिए हमेशा क़ुरान की आयतों का हवाला देते हैं। लेकिन ध्यान दिलाने पर भी ये मुसलमान इस्लाम की असहिष्णु व्याख्या और नृशंस आचरण के बीच पाए जाने वाले किसी भी सम्बंध से इंकार करते हैं। इस्लाम की ये असहिष्णु व्याख्या हमारे साथ किसी न किसी रूप में या किसी न किसी नाम के तहत इतिहास की 14 सदियों से है। ऐसे लोगों को पहले ख्वारिज या खारिजी (इस्लाम से निकल जाने वाले) कहा जाता था,  और आज उन्हें वहाबी कहा जाता है,  हालांकि वो अपने आपको सल्फ़ी (इस्लाम के बुनियादी सिद्धांत में विश्वास रखने वाले जिस पर मुसलमानों की पहली पीढ़ी ने अमल किया था) और मोहिद (खुदा के एक होने में दृढ़ विश्वास रखने वाले) कहलाने को प्राथमिकता देते हैं। मीडिया में उनकी हामी भरने वाले चाहते हैं कि उन्हें सिर्फ एक आम मुसलमान समझा जाए,  ताकि उनकी इन निंदनीय और नाजायज़ सरगर्मियों के वर्ग में सभी मुसलमानों को शामिल किया जा सके।

बहरहाल मुसलमान जो इस पूरे खेल को जानते हैं और उनके विचारों और गतिविधियों से खुद को अलग करना चाहते हैं। खुदा का शुक्र है कि वहाबी समुदाय अभी भी मुस्लिम समाज का एक छोटा सा समूह है, हालांकि पिछले चार दशकों में उन्होंने पेट्रोडालर की भारी मदद से अपने विचारों के प्रसार द्वारा अपने प्रभाव और पहुंच को बढ़ाया है। ये अहम है कि हम मुख्य धारा के मुसलमान होने के नाते उनके विचारों की कलई खोलते रहें और उनको रद्द करते रहें ताकि वहाबियत, सल्फ़ियत  और इससे संबंधित विचारधाराओं जैसे अहले हदीसियत, क़ुत्बियत, मौदूदियत, देवबंदियत आदि के समर्थकों और प्रचारकों को इस्लाम के मुख्य धारा में शामिल होने का दावा करने से रोका जा सके।

इसी अहम ज़रूरत के मद्देनज़र न्यु एज इस्लाम तालिबान के मुखपत्र नवाये अफगान जिहाद (जुलाई 2012) में प्रकाशित लेख को पेश कर रहा है। ये मासिक पत्रिका में प्रकाशित हो रहे लेख का पहला हिस्सा है जिसमें इस बात को स्पष्ट किया गया है कि क्यों वहाबियों का ये ईमान है कि काफिरों यानि सभी गैर- वहाबी मुस्लिम,  पूर्व मुस्लिम और अहले किताब समेत गैर-मुस्लिमों के बेगुनाह मर्दों, औरतों और बच्चों को मारना उनके इस्लाम में जायज़ है। मुख्य धारा में शामिल मुसलमानों के लिए ज़रूरी है कि वो तालिबानियों के वास्तविक खूनी प्रकृति को समझें और वैश्विक शांति और इस्लाम की नेक नामी की हिफाज़त के लिए कुरान और सुन्नत के आधार पर एक आवाज़ होकर इस दृष्टिकोण की निंदा करें। और वहाबियों के उस वर्ग को जो हिंसक विचारधारा का समर्थन नहीं करता जिनके संस्थापक इब्ने अब्दुल वहाब और वैचारिक संरक्षक इब्ने तैमिया हैं।  उन्हें इस समूह से पूरी तरह से अलग हो जाना चाहिए। अगर आप वहाबी सिर्फ इसलिए कहलाते हैं क्योंकि आप सूफियों के मज़ारात पर हाज़िरी देने और सूफी बुजुर्गों का एहतेराम करने से नफ़रत करते हैं,  न कि इसलिए क्योंकि आप असहिष्णुता और इस दृष्टिकोण के उग्रवाद के कायल और क़द्रदान हैं,  तो आपको समझना चाहिए कि मज़ारात पर हाज़िरी से परहेज़ करने के लिए आपको वहाबी होने की ज़रूरत नहीं। ऐसे बहुत से दूसरे समुदाय के मुसलमान हैं जो मज़ारात की ज़ियारत नहीं करते,  फिर भी वो वहाबी नहीं हैं। आपको मोहिद होने के लिए वहाबी या सल्फ़ी होने की ज़रूरत नहीं........... सुल्तान शाहीन, एडिटर, न्यु एज इस्लाम

 
The Paradox of Protest विरोध का विरोधाभास
सैफ़ शाहीन, न्यु एज इस्लाम

The Paradox of Protest विरोध का विरोधाभास

मुसलमान बार बार ये दावा करते हैं कि इस्लामी आतंकवाद और कट्टरपंथ की ज़िम्मेदारी मुस्लिम समाज के हाशिए के कुछ लोगों पर बनती हैं, लेकिन अगर वो खुद इस्लाम का भय फैलाने वाले पश्चिमी समाज के लोगों के काम के लिए अमेरिकी दूतावास के कर्मचारियों जैसे बेगुनाहों को सज़ा देंगे तो वो ऐसे बहुत कम लोगों को पायेंगे जो इस दावे पर यक़ीन करें।

 
They Take Everybody As A Kafir Except Themselves वो अपने अलावा सबको काफ़िर समझते हैं
तनवीर ज़मान खान (अनुवाद- न्यु एज इस्लाम)

जिस शरीअत फॉर पाकिस्तान कांफ्रेंस की हम चर्चा कर रहे हैं उसके सभी वैचारिक रक्षक पूरी दुनिया में नेज़ामे खिलाफ़त क़ायम करना चाहते हैं क्योंकि वो खुद के अलावा सारी दुनिया को काफ़िर समझते हैं। और इन काफिरों के खिलाफ सशस्त्र जिहाद दीन का फर्ज़ है। शरीयत फॉर पाकिस्तान के सर्वोच्च सिद्धांत के अनुसार दरअसल पाकिस्तान का संविधान कुफ्र है। इसलिए इस कुफ्र के संविधान के तहत चलने वाला राज्य भी काफ़िर राज्य है।

 
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