Hindi Section(17 Apr 2016 NewAgeIslam.Com)
Curriculum of the Indian Madrasas and Islamic Seminaries, Dars-e-Nizami भारतीय मदरसों का पाठ्यक्रम, दर्स-ए-निज़ामी: विवाद सामग्री से भरपूर और सुन्दर आध्यात्मिक इस्लामी शिक्षाओं से खाली

 

 

By Ghulam Rasool Dehlvi, New Age Islam

18 April, 2016

इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि मदरसे हमेशा इस्लामी शिक्षाओं के केंद्र रहे हैं और आज भी ऐसे कई मदरसे हैं जो इस दिशा में शानदार कारनामे अंजाम दे रहे हैं। लेकिन दुखद स्थिति यह है कि आज अक्सर मदरसे अपने छात्रों को आधुनिक दौर में पेश आने वाले शैक्षिक और वैज्ञानिक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम बनाने में सफल नहीं हैं। दीनी मदारिस के मौजूदा हालात पर केवल एक सरसरी नजर डालने से ही इस बात का बखूबी अंदाजा हो जाता है कि यह अपने उस  वास्तविक  लक्ष्य से बहुत पीछे हैं जो हमारे पूर्वज उलेमा और इस्लामी विद्वानों ने शुरुआत में तय किया था। आज मदरसों के अयोग्य, लालचिन और स्वार्थी प्रबंधकों नें,  जो धार्मिक संस्थाओं के उद्देश्य से बिल्कुल ही अनभिज्ञ होते हैं, अक्सर भारतीय मदरसों  पर अपना  एकाधिकार स्थापित कर चुके हैं। इसलिए, छात्रों को मौजूदा दौर में मुसलमानों की धार्मिक  और सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए तैयार करने की तो बात ही छोड़ दें, जो कि इस्लामी शिक्षण संस्थानों का मुख्य उद्देश्य है, कई मदरसों में मुस्लिम बच्चे बुनियादी इस्लामी शिक्षाओं से भी नाआशना हैं ।

भारत में मदरसों के प्रकार

भारत में मुख्य रूप से दो प्रकार के मदरसे हैं: एक जो सिर्फ मुस्लिम जनता के वित्तीय सहयोग से चलते हैं और दूसरे वे जो विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, झारखंड और असम में राज्य सरकारों से जुड़े हुए हैं और उनकी सहायता प्राप्त कर रहे हैं। इस प्रकार भारतीय मदरसे अपनी राज्य सरकारों के अनुदान और जनता के आर्थिक सहयोग पर निर्भर करते हैं। प्रथम श्रेणी के मदरसों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है: (1) मकतब (2) मदरसा (3) दारुल उलूम। हालांकि उनके बीच काफी अंतर है लेकिन भारत में आम मुसलमान उनके बीच कोई अंतर नहीं समझते हैं और हर इस्लामी शिक्षण संस्था को 'मदरसा' या 'दारूल उलूम' ही कहते हैं। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि देश  में फैले हुए बेशुमार मदरसे  और यहां तक कि छोटे क्षेत्रीय मकतब भी आज अपने आप को 'जामिया' यानी विश्वविद्यालय से नामित किए हुए हैं।

लेकिन  इन मदरसों का पाठयक्रम  और शिक्षा  प्रणाली  उनके अपने विशेष मत या पंथ-संबंधी धार्मिक अक़ीदों और विचारधाराओं के अनुसार थोड़ा बहुत  बदला हुआ नज़र आता  है। इसलिए, मदरसों के पाठ्यक्रम में विभिन्न इस्लामी विचारधाराएँ  पढाई जाती रही हैं।   उदाहरण के तौर पर सुनी सूफी मदरसों में वहदतुल वजूद (अस्तित्व की एकता) जैसे सार्वभौमिक आध्यात्मिक सिद्धांतों की शिक्षा दी जाती है और उन पर अमल करने पर जोर दिया जाता है, जबकि चरमपंथ वहाबी मदरसों में यह और इस तरह की सभी  सूफ़ियाना विचारधाराएँ सख्त वर्जित हैं।

इस्लामी पाठ्यक्रम का एक व्यापक दृष्टि

अठारवीं सदी में भारत के दीनी मदारिस में एक व्यापक और विस्तृत पाठ्यक्रम प्रचलित था जिसमें धार्मिक और दार्शनिक ज्ञान के अलावा आधुनिक और समाजी विज्ञान की कई किताबें थीं। इन इस्लामी मदरसों ने आधुनिक एवं समाजी विज्ञान से सम्बंधित मुख्य विषय जैसे गणित, खगोल विज्ञान, चिकित्सा, दर्शन,  भूगोल, साहित्य, रासायनिक इत्यादि के साथ साथ कुरान की व्याख्या (तफ़्सीर), हदीस, इस्लामी फ़िक़्ह  और सूफीमत (तसव्वुफ़)  के साहित्य को शामिल करके एक व्यापक इस्लामी पाठ्यक्रम प्रदान किया।

दरअसल, मदरसों का यह पाठ्यक्रम राजा अकबर के काल में मीर फत्हुल्लाह सीराजी ने तैयार किया था। बाद के युग में भारतीय विद्वानों ने परंपरागत इस्लामी पाठ्यक्रम में कुछ महत्वपूर्ण सुधार और संशोधन किए। मीर फत्हुल्लाह सीराजी के बाद अविभाजित भारत में इस्लामी शिक्षण पाठ्यक्रम पर काम करने वाले उल्लेखनीय इस्लामी विद्वानों में से कुछ यह हैं: मुफ्ती अब्दुस्सलाम लाहौरी, मौलाना दानियाल चैरासी, मुल्ला कुतबुद्दीन  सहालवी, हाफिज अमानउल्ला बनारसी, मौलाना कुतबुद्दीन शमसाबादी  और मुल्ला निजामुद्दीन सहालवी।

इन सभी विद्वानों का संबंध विभिन्न ज़मानों से रहा और उन्होंने इस्लामी पाठ्यक्रम में विभिन्न आयामों को परिचित किया। शाह वलीयुल्लाह मुहद्दिस देहलवी (रहमतुल्लाह अलैह) के समकालीन मुल्ला निजामुद्दीन सहालवी ने भारतीय मदरसों के शैक्षिक पाठ्यक्रम को नए सिरे से तैयार किया और उसे संपादित किया। इस लिए मदरसों के पाठ्यक्रम का नाम उन्हीं के नाम पर "दरस-ए-निज़ामी" रखा गया।

चूंकि मुल्ला निजामुद्दीन सहालवी फिरंगी महल के रहने वाले थे और उनका संबंध उन इस्लामी विद्वानों और शिक्षकों के परिवार से था जो उस जमाने में भारत में इस्लामी विज्ञान  का केंद्र 'फिरंगी महल' की ऊँची दरसगाहों में अध्यापक और प्रबंधक थे, इसलिए उनके बनाए हुए पाठ्यक्रम पर न कोई जबरदस्त आलोचना की गया और न ही कोई विरोध। फलस्वरूप, "दरस-ए-निज़ामी" का इस्लामी पाठ्यक्रम दिल्ली, फिरंगी महल, लखनऊ और खैराबाद के  केंद्रीय मदरसों में बखूबी प्रचलित हो गया। खासकर लखनऊ और दिल्ली के प्रमुख इस्लामी विद्वानों ने इस पाठ्यक्रम का समर्थन किया और उसे अपने यहां लागू किया, क्योंकि वह फिरंगी महली उलेमा और फ़ुक़्हा को महत्व देते थे।

"दरस-ए-निज़ामी" के पाठ्यक्रम को मदरसों में लागू करने के पीछे  बहुत सारी वजहें थीं। मुफ्ती तक़ी उस्मानी ने उनमें से एक का उल्लेख इस प्रकार किया है:

"जब मुगलों ने भारत पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया तो दरस-ए-निज़ामी की शिक्षा प्रणाली दक्षिण एशिया में व्यापक रूप से  फैल गई। इस्लामी विज्ञान के केन्द्रों और इस्लामी शैक्षणिक संस्थाओं के लिए भारत  दुनिया भर में प्रसिद्ध हो गया। इसी शिक्षा  प्रणाली के कारण एशियाई समाज महान उपलब्धियों से परिचित हुआ। हमारे लिए दरस-ए-निज़ामी की शिक्षण प्रणाली को अपनाना जरूरी था, इसलिए कि इस ने ज्ञान, शिक्षा और कला के क्षेत्रों में हजारों विशेषज्ञ पैदा किये "

"दरस-ए-निज़ामी" के पाठ्यक्रम में मुख्य रूप से शास्त्रीय इस्लामी विज्ञान जैसे तफ़्सीर-ए-कुरान, हदीस, फिक़्ह (न्यायशास्त्र), बलाग़त (वाग्मिता), अरबी व्याकरण, मंतिक़  (तर्क) कलाम आदि की दर्सी किताबें (text books) शामिल हैं। लेकिन इस पाठ्यक्रम में इस्लामी इतिहास और यहां तक कि विदेशी और अंतरराष्ट्रीय इस्लामी आंदोलनों के अध्ययन को भी महत्व नहीं दिया गया था। इस पहलू को बेहतर तौर से समझने के लिए हम मध्यकालीन युग में गठित इस शिक्षण प्रणाली (दरस-ए-निज़ामी) के महत्वपूर्ण विषयों और पाठ्यपुस्तकों पर एक नज़र डालते हैं, जो आज भी अक्सर भारतीय मदरसों में शामिल हैं:

अरबी व्याकरण (नह्व व सर्फ़) के विषय पर मीज़ान, मुन्शइब, पंज गंज, इल्मुल सीगह, फ़ुसूल-ए-अकबरी, नहवमीर, काफ़िया, शरह जामी, हिदायतुं-नहव आदि पुस्तकें पढाई जाती थीं। 

मंतिक़ (तर्क) के विषय पर यह पुस्तकें: शरह शम्स, सुल्लम, रिसाला मीर ज़ाहिद, मुल्ला जलाल, सुग़रा, कुबरा, शरह तहज़ीब और मीर क़ुत्बी आदि

फलसफा (दर्शन) के विषय पर यह पुस्तकें: मेबज़ी, शम्स बाज़गह और सदरा आदि

गणित के विषय पर यह पुस्तकें: क़ोशजह, शरह चग़मिनी  आदि

इल्म-ए-कलाम के विषय पर यह पुस्तकें: शरह मवाक़िफ़, शरह अक़ाइद नस्फी आदि

फिक़्ह (इस्लामी न्यायशास्त्र) के विषय पर यह पुस्तकें : नुरुल इज़ाह, क़ुदुरी, शरह विक़ाया और हिदायह आदि

उसूल फिक़्ह  (न्यायशास्त्र सिद्धांत) के विषय पर यह पुस्तकें: उसूल अल-शशि, नुरुल अनवार, तौज़ीह तलवीह आदि। 

तफ़्सीर-ए-कुरान के विषय पर यह पुस्तकें: जललयन, बैज़ावी शरीफ आदि। 

हदीस के विषय पर यह पुस्तकें: मिशक़ात, बुखारी, मुस्लिम, तिर्मिज़ी, इब्ने माजा, श्माइल तिर्मिज़ी, मुअत्ता इमाम मुहम्मद  आदि। 

सल्फ़ी, अहले हदीस और जमाते इस्लामी से जुड़े मदरसों के अलावा लगभग सभी  मदरसों में आम तौर पर दर्स-ए-निज़ामी का यही पाठयक्रम प्रचलित है। लेकिन बाहरी विषयों के अध्ययन के लिए उनकी अपनी अपनी किताबें होती हैं, इसलिए कि धार्मिक अक़ीदों, विश्वासों, सिद्धांत और अन्ये दूसरे धार्मिक मामलों में  उनके दृष्टि में खासा अंतर है। इस प्रकार दर्स-ए-निज़ामी का पाठ्यक्रम विभिन्न इस्लामी विचारधाराओं और सिद्धांतों की व्याख्या करता है।    

लेकिन दर्स-ए-निज़ामी के सदियों पुराने पाठ्यक्रम को बिना किसी बड़े परिवर्तन, बुनियादी सुधार या इस में कोई पर्याप्त संशोधन के  वैश्विक इस्लामी पाठ्यक्रम के रूप में आज भी भारतीय मदरसों में पढ़ाया जा रहा है। बल्कि छात्रों को उनकी रूचि या क्षमता के अनुसार किसी विषय या किताबों का चयन करने से भी वंचित कर दिया जाता है। आज भारतीय मदरसों का पाठ्यक्रम दार्शनिक मतभेद और विवाद सामग्री से भरा हुआ है और इस्लाम की आध्यात्मिक शिक्षाओं  से खाली है। अतीत में जिन सुंदर इस्लामी शिक्षाओं को भारत के सूफ़ी संतों ने अपने उपदेशों और मकातीब द्वारा संकलित किया था, वह उस समय मदरसों के शैक्षिक पाठ्यक्रम में भी शामिल थीं। लेकिन अब समकालीन दीनी मदारिस के पाठ्यक्रम में सुंदर शैक्षिक, नैतिक और आध्यात्मिक सामग्री (Spiritual Study Material) खाल खाल ही कहीं शामिल है। यहां तक कि आज सुन्नी सूफी मदरसों में भी कशफ़ुल महजूब, फवाईद अल-फूॉद और अवारिफुल मआरिफ़  जैसी पुस्तकें भी अध्यापन में शामिल नहीं। जबकि तथ्य यह है कि इस्लामी सूफीवाद के यह ऐतिहासिक दस्तावेज हैं जिनमें सार्वभौमिक इस्लामी मूल्यों, खुदा सेवा, अस्तित्व, सामाजिक सद्भाव और सारी मानवता के लिए प्रेम की शिक्षा दी गई है। अब वह दिन भी चले गए जब शेख सादी की गुलसतां और बोस्तान जैसी ज्ञान और नैतिक शिक्षा देने वाली किताबें भारतीय मदरसों के पाठ्यक्रम का हिस्सा थीं। इस्लामी धर्म  की व्यापक इस्लामी अवधारणा प्रस्तुत करने के बजाय मदरसों के वर्तमान पाठ्यक्रम अब छात्रों को केवल अपने ही फ़िक़्ही मज़हब और विशेष मत या पंथ-संबंधी अक़ीदों की जानकारी तक सीमित रखते हैं। 

आधुनिक विज्ञान की तो बात ही छोड़ दें, आज मदरसों में धार्मिक बहस को भी इस ढंग से नहीं पढ़ाया जाता जिससे आधुनिक दौर में पैदा होने वाली समस्याओं का समाधान किया जा सके। मदरसों के पारंपरिक उलेमा और दकियानूसी मोहतमिम हज़रात इस बात का तो खूब दावा करते हैं कि दर्स-ए-निज़ामी एक वैश्विक पाठ्यक्रम है, और इसलिए इसमें किसी परिवर्तन की आवश्यकता नहीं। मगर वैश्विक परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों तो छोड़ें, स्वदेशी संदर्भ में भी हमारे मदरसों के पाठयक्रम नाकाम हैं। मदरसों के प्रबंधकों का कहना है कि चूंकि इसी शिक्षण प्रणाली (दर्स-ए-निज़ामी) ने अतीत में महान इस्लामी विद्वानों, फ़ुक़्हा और उलेमा पैदा किए हैं, तो वर्तमान और भविष्य में भी इसका परिणाम ऐसा ही होगा।

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