Hindi Section(23 Jan 2019 NewAgeIslam.Com)
Early History of Muslims Needs Fresh Appraisal — XII इस्लाम का उद्देश्य मतभेदों और विवादों को मिटाना और एक उम्मत ए वाहिदा स्थापित करना है



एम आमिर सरफ़राज़

२४ दिसंबर, २०१८

रॉबर्ट बरफलाट (१९४८-१८७६) की “Making of Humanity” को मानवीय सभ्यता की इलमी बुनियाद का एक भाग माना जाता हैl रॉबर्ट बरफलाट लिखते हैं, “जिन सिद्धांतों ने फ्रांसीसी आंदोलन और अधिकार घोषणापत्र का आधार रखा जिसकी रौशनी में अमेरिकी संविधान का फ्रेमवर्क तैयार हुआ और जिसने लैटिन अमेरिकी देशों [और दुसरी जगहों] पर आज़ादी के लिए संघर्ष की चिंगारी भड़काई, वह पश्चिम के अविष्कार किये हुए नहीं थेl बल्कि उनकी तहरीक और जोश जज़्बे का परम स्रोत कुरआन ए पाक थाl”

कुरआन यह कहता है कि मानवता का प्रारम्भ एक मानवीय भाईचारे व बंधुत्व के रूप में हुआ यहाँ तक कि वह आपस में ही लड़ पड़े (१०:१९)l वहाँ से वह बटे और जात पात, कबीलों और विभिन्न धर्मों में बटते गएl समय समय पर खुदा ने अपने पैगम्बरों को एक जीवन प्रणाली देकर उनके बीच भेजा ताकि उनके मतभेद दूर हों और उन्हें बंधुत्व के एक मजबूत रिश्ते में बांधा जाएl (२:२१३) प्रारम्भिक मुस्लिम इतिहास के वर्तमान स्थिति के साथ मेरी समस्या यह है कि यह मुसलमानों को सीधे कुरआन के खिलाफ ला कर खड़ा कर देता हैl मैं इसके सबूत में एक उदाहरण पेश करता हूँl’

कुरआन पाक का एक महत्वपूर्ण संदेश वहदत (मानवीय भाईचारा) हैl इसलिए, कुरआन एलान करता है

“और तुम सब मिल कर अल्लाह की रस्सी को मजबूती से थाम लो और फूट मत डालो” (३:१०३)l

कुरआन हर ज़माने में सारे इंसानों के लिए एक सफल और पूर्ण जीवन व्यतीत करने के लिए एक जीवन प्रणाली है; और यह स्थायी जीवन है (२:२५६), विस्तृत है (६:४१४) संगठित व स्थिर है (१०:६४) और पूर्ण (६:११५; १०:५७) हैl इस आयत के बयान का विवरण यह है कि एक खुदा के धर्म के साथ व्यक्तिगत संबंध स्थापित करने का नाम नहीं है बल्कि यह एक समुदाय (वहदत) का भाग बनने का नाम हैl और “तफरका मत डालो”, यह एक इलाही आदेश है जिससे कोई चारा कार नहीं हैl कुरआन पाक में दोसरी जगह (४२:१३), यह भी कहा गया है कि इस आयत में पेश किया गया संदेश नया नहीं है; यह इब्राहीम, मूसा और ईसा अलैहिमुस्सलाम सहित दोसरे नबियों को भी दिया गया हैl

कुरआन को एक खुदा ने नाज़िल किया है और यह एक दीन (जीवन प्रणाली) की शिक्षा देता हैl लेकिन दीन के अनुयायी अपनी हसद और अहंकार और घमंड के आधार पर बाद में एक दोसरे से मुकाबला करते हैं और फिरके (अदियान) स्थापित कर लेते हैं (४२:१४)l यह कार्य भावनाओं और सत्ता की हवस पर आधारित हैl और संबंधित गिरोह के समर्थन या विरोध के लिए बाद में प्रमाण गढ़ लिए जाते हैंl जब कुरआन नाज़िल हुआ तो उस समय बहुत सारे धर्म प्रचलित थे, इसने स्पष्ट तौर पर यह एलान किया कि इस्लाम का उद्देश्य मतभेदों और विवादों को मिटाना और एक उम्मत ए वाहिदा स्थापित करना हैl और यह कि यह काम नज़र और अंतर्दृष्टि के साथ अपनी मर्ज़ी से अंजाम दिया जाए, वरना अल्लाह सारे इंसानों को उन जानवरों की तरह पैदा करता जो हैवानी मानसिकता के साथ रेवड़ में रहते हैंl

किसी समुदाय में फूट डालना इंसानियत के खिलाफ एक अपराध हैl जब मूसा अलैहिस्सलाम अपनी कौम हारून अलैहिस्सलाम के हवाले करके कुछ समय के लिए अपनी कौम से बाहर चले गए तो वापस आने पर उन्होंने इसराइलियों को एक बछड़े की पूजा करता हुआ पायाl मूसा अलैहिस्सलाम ऐसा करने के लिए अपनी कौम को छोड़ देने पर हारून अलैहिस्सलाम पर क्रोधित हुए लेकिन उन्होंने मूसा अलैहिस्सलाम को बताया कि अगर मैं अपनी कौम को ऐसा ना करने देता तो मेरी कौम गिरोहों में बट जाती (इस कारण मैंने उन्हें ऐसा करने दिया)l बाद में खुदा ने भी उन्हें माफ़ करने का फैसला किया, लेकिन एक बार जब वह फिरकों और गिरोहों में बट गए (७:१६८) तो वह अपमानित व बर्बाद कर दिए गए (३:१११)

कुरआन बार बार उन लोगों पर अल्लाह के अज़ाब उतरने की बात करता है जो उम्मत में तफरका डालते हैं और इसे बढ़ावा देते हैंl इसके उलट जो लोग इस जीवन प्रणाली की पैरवी करते हैं (३:१०७) कुरआन उनके लिए शाश्वत आनंद का वादा करता हैl कुरआन मुसलमानों को बुतों की पूजा करने से भी रोकता है जबकि किसी के मन में यह प्रश्न पैदा हो सकता है कि कोई मोमिन ऐसा क्यों करेगाl इसलिए कुरआन यह स्पष्ट करता है कि आपस में फूट डालना बुत परस्ती के बराबर हैl कुरआन ने इस्लाम के पैगम्बर मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मशवरा दिया कि आप उन लोगों से दूर रहें जो फूट पैदा करते हैं (६:१५९)l निसंदेह, नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उस मस्जिदे ज़रार को ढा दिया जिसे स्थानीय सुविधा के नाम पर कुछ मुसलमानों (खुफिया मुनाफ़िकों) ने निर्माण किया थाl कुरआन ने उस मस्जिद के निर्माण को अल्लाह पाक और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के खिलाफ एक साज़िश करार दिया और मुजरिमों के लिए दोज़ख की वईद भी सुनाईl

“मेरी उम्मत का मतभेद रहमत है”l कोई यह कह सकता है कि इतनी अतार्किक और कुरआन के खिलाफ बात नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से नहीं जोड़ी जा सकतीl लेकिन ऐसा करने पर आपकी जान खतरे में पड़ जाएगी और विभिन्न धार्मिक गिरोहों के रहनुमा आपको मुर्तद करार देंगेl

क्योंकि मुसलमानों को दो टुक अंदाज़ में कुरआन की पैरवी करने और एकजुट रहने का आदेश दिया गया है (इस्लाम में ना तो किसी फिरके की गुंजाइश है और ना अलग मस्जिदें बनाने की अनुमति है), इसलिए, आप के मन में यह प्रश्न पैदा हो सकता है कि क्यों पूरी दुनिया में इस्लामी फिरके और गिरोह पाए जाते हैं? तो इसका जवाब बहुत आसान है कि यह हमारी हदीसों और प्रारम्भिक मुस्लिम इतिहास का परिणाम हैl

इसकी शुरुआत इस हदीस से हुई कि, “मेरी उम्मत का मतभेद रहमत है”l कोई यह कह सकता है कि इतनी अतार्किक और कुरआन के खिलाफ बात नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मंसूब नहीं की जा सकतीl लेकिन ऐसा करने पर आपकी जान खतरे में पड़ जाएगी और विभिन्न मज़हबी गिरोहों के रहनुमा आपको मुर्तद करार देंगेl इसके अलावा वह किसी मामले में अपने गंभीर तास्सुब और बौद्धिक टकराव का एहसास किये बिना अपने स्टैंड का डट कर “बचाव” भी करेंगेl तथापि, वह इस बात का जवाब नहीं दे सकते कि क्यों वह अहमदियों से इतनी नफरत करते है जिन्होंने केवल एक और फिरका कायम किया है? अपने अकीदों के एतेबार से उन्हें तो उम्मते मुस्लिमा के लिए इतना लाभप्रद साबित होने के लिए अहमदियों को मुबारक बाद पेश करना चाहिएl

उपर्युक्त हदीस इस्लाम में तफरका/फिरका बाज़ी के हक़ में एक एतेहासिक बचाव है लेकिन इसमें एक कमी भी है क्योंकि इसने हर फिरके को खुद को ही असल/सच्चा और हक़ पर कहने का हक़ दे दिया हैl इसलिए, इसी प्रकार एक हदीस और इजाद की गई कि, “मेरी उम्मत तिहत्तर फिरकों में बट जाएगी, लेकिन उनमें से केवल एक ही हक़ पर होगाl” इस हदीस ने समस्या को हल कर दिया क्योंकि एक हज़ार वर्ष से अधिक समय से इसकी बुनियाद पर हर वर्ग के पास खुद को असली और दोसरों को नकली कहने का लाइसेंस प्राप्त हैl उन्हें इस बात का अंदाज़ा ही नहीं है कि इस ‘हल’ ने मुसलमानों के बीच स्थायी तफरका और फसाद पैदा कर दिया हैl जिसका परिणाम अंतहीन बेचैनी, हंगामा आराई, खून खराबा, जान व माल का नुक्सान और तरक्की में रुकावट के रूप में हमारे सामने हैl

स्रोत:

dailytimes.com.pk/336613/early-history-of-muslims-needs-fresh-appraisal-xii/

URL for English article: http://www.newageislam.com/islamic-history/m-aamer-sarfraz/islam-is-here-to-remove-confusion-and-schisms,-and-to-mould-individuals-into-a-community--early-history-of-muslims-needs-fresh-appraisal-—-xii/d/117373

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/m-aamer-sarfraz,-tr-new-age-islam/early-history-of-muslims-needs-fresh-appraisal-—-xii--اسلام-کا-مقصد-اختلافات-اور-تنازعات-کو-مٹانا-اور-ایک-امت-واحدہ-قائم-کرنا-ہے/d/117478

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/m-aamer-sarfraz,-tr-new-age-islam/early-history-of-muslims-needs-fresh-appraisal-—-xii--इस्लाम-का-उद्देश्य-मतभेदों-और-विवादों-को-मिटाना-और-एक-उम्मत-ए-वाहिदा-स्थापित-करना-है/d/117531

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