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Hindi Section (18 Jun 2018 NewAgeIslam.Com)


A Profound Ideological Crisis In The Indian Muslim Community सांप्रदायिकता: भारतीय मुस्लिम समाज का एक जबरदस्त सैद्धांतिक संकट

 

 

 

गुलाम रसूल देहलवी, न्यू एज इस्लाम

25 जनवरी 2017

न्यू एज इस्लाम के फाउन्डिंग एडीटर जनाब सुलतान शाहीन ने अपने एक हालिया लेख में बजा तौर पर यह सवाल उठाया है की : “साम्प्रदायिक सौहार्द यकीनन एक कदर के काबिल उद्देश्य हैl तथापि, इसका उद्देश्य भी अति महत्वपूर्ण हैl एक दुसरे को काफिर कहने वाले वहाबी देवबंदी और सूफी- बरेलवी फिरके अब कुछ महीनों से एकजुट होने की कोशिश कर रहे हैंl लेकिन इसका उद्देश्य क्या है?”

१० मई २०१६ को इण्डियन एक्सप्रेस ने देश में दो बहुसंख्यक मुस्लिम गिरोह अर्थात देवबंदी और बरेलवी के बीच एकता की शुरुआत की खबर प्रकाशित की है जो कि शुरू से ही एक दुसरे के कट्टर विरोधी रहे हैंl एक सर करदा बरेलवी आलिम मौलाना तौकीर राजा खान ने आश्चर्यजनक रूप से भारत में देवबंदी विचारधारा के प्रसिद्ध संस्थान दारुल उलूम देवबंद का दौरा कियाl उन्होंने दारुल उलूम देवबंद के मौजूदा नाज़िम ए आला अबुल क़ासिम नोमानी सहित प्रभावी देवबंदी उलेमा से मुलाक़ात भी की और “अपने साझा दुश्मन” से मुकाबले के लिए भारतीय मुसलमानों के बीच आपसी एकता पर जोर दियाl

मीडिया स्रोतों के अनुसार प्रसिद्ध देवबंदी और बरेलवी उलेमा ने कई सम्मेलनों और जलसों का आयोजन कियाl सबसे पहले देवबंद में और उसके बाद अजमेर में- जिसमें उन्होंने भारत में एकता के लिए एक तजवीज पेश की हैl भारतीय मुस्लिम समाज के अन्दर देवबंदी और बरेलवी दोनों फिरकों की अक्सरियत एक ज़माने से एक दुसरे को इस्लाम से बाहर करार देने में लगे हैंl इसलिए, इन दोनों फिरकों के बीच एकता की कोशिश की खबरों ने बहुत से लोगों को हैरत में दाल दिया हैl लेकिन यह दोनों फिरके ‘उम्मते मुस्लिमा के एकता’ की जो वजह बयान कर रहे हैं वह पूर्ण रूप से हैरत अंगेज़ हैl उनका मानना है की देश की हुमरान जमात ‘जान बुझ कर’ ‘भारतीय मुसलामानों के बीच फूट पैदा करने के लिए ‘ साम्प्रदायिक बटवारे के अपने परियोजना में आगे बढ़ने की कोशिश कर रही हैl इसलिए, स्पष्ट तौर पर इसके पीछे सक्रिय मुस्लिम समाज के राजनीतिक नेताओं के उपर लटकती हुई राजनीतिक खौफ की तलवार हैl

इस आश्चर्यजनक प्रगति के बारे में टिप्पणी करते हुए भारतीय मुसलामानों के मामलों के बहुत सारे टीकाकारों ने यह दावा किया की इन दो प्रतिद्वंद्वी मुस्लिम फिरकों के बीच एकता ‘मुस्लिम विरोधी’ सरकार की “फूट डालो नीति” के जवाब में कायम किया जा रहा हैl सबूत के तौर पर उन्होंने हाल ही में देहली के अनादर आयोजित होने वाले एक महान सूफी कान्फ्रेंस, वर्ल्ड सूफी फोरम का हवाला दिया है जिसमें प्रधानमंत्री मोदी विशेष मेहमान की हैसियत से शरीक थेl उदाहरण के तौर पर आन लाइन मुस्लिम मीडिया मुस्लिम मिरर (Muslim Mirror) के एडीटर सैयद जुबैर अहमद ने कहा की: “मुस्लिम समाज के अन्दर यह खौफ और रुझान बढ़ रहा है की उसे निशाना बनाया जा रहा है और उनसे बांटने की कोशिश की जा रही हैl हालिया आयोजित होने वाली सूफी कान्फ्रेंस को मुस्लिम समाज में दरार पैदा करने की कोशिश माना गया थाl उन्होंने इण्डियन एक्सप्रेस को बताया की [बरेलवी-देवबंदी एकता] महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह सन्देश लोगों तक पहुँच रहा है की अब मुस्लिम समाज के अन्दर दरारें पैदा करना मुश्किल हो गा”l

असल में बरेलवी और देवबंदी फिरकों के बीच फिकही मुजादले और मुनाज़रे का एक लंबा इतिहास रहा है जो को अक्सर इन दोनों के बीच सांप्रदायिक तनाव का कारण रहा हैl इसके मद्देनज़र साम्प्रदायिक दूरियों को ख़तम करना यकीनी तुर पर एक खुश आइंद कदम हैl यह इकदाम बहुत पहले ही उठा लिया जाना चाहिए थाl लेकिन अपनी दाखली दुश्वारियों और परेशानियों का आरोप हुकूमत पर लगाना और धार्मिक चरमपंथ का मुकाबला करने में सूफियों की कोशिशों को बदनाम करना अजीब बात हैl क्या मुहासबे के बजाए जो की मुस्लिम समाज के लिए आवश्यक है, गफलत और मज़लूमियत की मानसिकता इख्तियार करना एक आसान काम नहीं है?

बरेलवी – देवबंदी एकता का सार्वजनिक प्रदर्शन करने के बजाए, यह दोनों फिरकों के उलेमा के लिए अतिवादी विचारधारा से भरी हुई मौजूदा साम्प्रदायिक मानसिकता पर गंभीरता के साथ गौर व फ़िक्र करने का समय थाl एक तहक़ीक़ी अध्ययन से पता चलता है कि ना केवल देवबंदी बल्कि मौजूदा दौर के बरेलवी उलेमा के एक वर्ग ने भी देश के सीधे सादे मुसलामानों के अन्दर धार्मिक चरमपंथ की आग को हवा दी हैl

बरेलवी तहरीक अविभाजित भारत के अन्दर १८८० में कैसी सूफी जमात की शकल में उभर कर सामने आईl इसका उद्देश्य वहाबी देवबंदी सिद्धांत निर्माताओं के अतिवादी विचारों व सिद्धांतों का रद करना थाl मुख्य धारा सुन्नी सूफी विचारधारा से अलग हो कर मौलवी इस्माइल देहलवी और सैय्यद अहमद “शहीद” जैसे बड़े उलेमा ने वहाबी विचारधारा में शमूलियत इख्तियार कर लीl जिसका लाज़मी नतीजा यह हुआ की देवबंदी मुसलामानों की आने वाली नस्लों ने इस्लाम की बहुत प्राचीन और अलगाव वादी रिवायत को कुबूल कर लियाl इसलिए, इस्लाम के देवबंदी अनुयायियों को इस्लाम पसंद उग्रवाद के रास्ते पर आसानी के साथ लगा दिया गयाl कई शोधकर्ताओं ने देवबंद और तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान (टी टी पी) की फिकही विचारधारा के बीच समानता का भी खुलासा किया हैl पाकिस्तानी मीडिया के अनुसार उत्तर पूर्व पाकिस्तान में तालिबानी उग्रवादी स्थानीय देवबंदी मदरसों के ग्रेजुएट हैंl लाल मस्जिद जैसे अतिवादी इस्लामी मदरसे का भी वैचारिक संबंध देवबंदी मकतबे फ़िक्र के साथ सामने आया हैl

तथापि, बरेलवी उलेमा के नेतृत्व में मुख्य धारा के सूफी सुन्नी मुसलमान अपेक्षाकृत सहिष्णु और परंपरावादी इस्लाम पर अमलपैरा हैंl वह बड़े पैमाने पर इस्लामी सूफीवाद के सिद्धांत व मोतकेदात और रिवायात व मामुलात पर अमलपैरा रहे हैंl

लेकिन हालिया पेशरफ्त ने मुस्लिम समाज के विश्लेषकों और विकासवादी मुस्लिम विचारकों को तशवीश में दाल दिया हैl भारतीय मुसलमानों की बरेलवी जमात जिसे अपनी सहिष्णु सूफी सुनी रिवायत पर गर्व था, वह भी अब बदनामे ज़माना वहाबी चरमपंथियों की ही तरह मज़हबी हिंसा और उग्रवाद के रास्ते पर चलने लगे हैंl

‘इस्लाह ए तसव्वुफ़’ के नाम पर आज बहुत सारे अतिवादी बरेलवी उलेमा लिबरल और सहिष्णु दृष्टिकोण के खिलाफ घृणा पैदा करने में लगे हुए हैं जो की भारतीय सूफी बुजुर्गों की रिवायत रही हैl वह लिबरल मज़हबी दृष्टिकोण के हामिल गैर मुकल्लिद सूफी मुसलामानों की लानत व मलामत करते हैं और उन्हें ज़िन्दीक, बाद मज़हब और गुमराह करार देते हैंl

मिसाल के तौर पर – पाकिस्तानी नज़ाद कैनेडा के सूफी आलिम और प्रसिद्ध बौद्धिक डाक्टर ताहिरुल कादरी को बरेलवी मुफ्तियों के एक बड़े वर्ग ने गुमराह करार दिया हैl एक बड़ी संख्या में बरेलवी उलेमा ने गैर मुस्लिमों की घटनाक्रम में शिरकत करने, सूफी रक्स और संगीत और मस्जिद में दुसरे धार्मिक रहनुमाओं का स्वागत करने जैसे अंतरधार्मिक सरगर्मियों के आधार पर डाक्टर कादरी के खिलाफ फतवे सादिर किए हैंl बरेलवी उलेमा के हलके में इस किस्म के कदामत परस्त और शिद्दत पसंद फतवों में इजाफा हुआ हैl ज़ाहिर है की वह देश में ऐसे खौफनाक फतवों की फैक्ट्रियां चलाने में देवबंदी उलेमा से अलग नहीं हैंl

अतिवादी बरेलवी फतवों के प्रभाव मुंबई की रज़ा एकेडमी के विरोध प्रदर्शन में देखे जा सकते हैं जो की एक धार्मिक व राजनीतिक बरेलवी जमात हैl मार्च २०१२ ई० में एक बरेलवी फतवा जारी किए जाने के बाद कि जिसमें ताहिरुल कादरी की तकरीर को शिर्क फिल रिसालाह के बराबर करार दिया गया था, रज़ा एकेडमी ने अंतर्धार्मिक सद्भाव पर ताहिरुल कादरी की तकरीरों पर पाबंदी लगाने का मुतालबा किया थाl लेकिन मुंबई हाईकोर्ट ने शहर में अवामी इज्तेमाई कर्णरे के लिए डाक्टर कादरी को मशरूत इजाज़त देदी और इसी तरह रज़ा एकेडमी उनके खिलाफ अपनी पेटीशन में नाकाम हुईl

बहरहाल, रज़ा एकेडमी वह पहली मुस्लिम तंजीम है जिसने फिल्म साज़ माजिद माजिदी की फिल Muhammad:The Messenger of God के खिलाफ मुहिम चलाई थीl पैगम्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की प्रारम्भिक ज़िंदगी पर आधारित इस फिल्म के इजरा से पहले उसके मवाद का जाएज़ा लिए बिना ही उसके खिलाफ बरेलवी उलेमा ने धमकी भरे फतवे जारी कर दिए थेl और उन फतवों में सीनेमा के जरिये नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़िंदगी को पेश करने की उनकी (गुनाहगार) कोशिश के लिए माजिद माजदी की ज़बरदस्त आलोचना की गई थी, क्योंकि ऐसा करना प्रमाणित बरेलवी उलेमा के अनुसार इस्लामी शरीअत में ‘हराम’ हैl इसलिए, उन्होंने इस इस्लामी फिल्म में संगीत देने वाले एक भारतीय मुस्लिम संगीतकार ए आर रहमान समेत पुरे फिल्म साज़ अमले पर तौहीन और इर्तेदाद जैसे सख्त आरोप लगाएl इसके बाद रज़ा एकेडमी ने माजिद माजिदी की फिल्म से जुड़े हर फर्द से दुबारा कलिमा पढने और इस्लाम के दायरे में दाखिल होने का मुतालबा कियाl यह फतवा एक प्रसिद्ध बरेलवी आलिम मुफ्ती महमूद अख्तर ने जारी किया था जो कि हाजी अली दरगाह की मस्जिद में इमाम हैं और शहर में अपना एक दारुल इफ्ता भी चलाते हैंl हाजी अली दरगाह पर औरतों की हाजरी के खिलाफ अत्यंत विवादित फतवे के पीछे भी उन्हीं का हाथ थाl

तथापि, उल्लेखनीय बात यह है कि अजमेर शरीफ हज़रत निजामुद्दीन औलिया दरगाह जैसे बड़े सूफी दरगाहों ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हयात पर आधारित फिल्म और संगीत पर अपना स्टैंड बरेलवी फतवा के खिलाफ अख्तियार कियाl इसके बजाए उन्होंने ए आर रहमान की शानदार कारकर्दगी के लिए उनकी तारीफ़ की और उन्हें ‘एक हकीकी मोमिन’ करार दियाl मीडिया के अनुसार ए आर रहमान ने एक लिखित ब्यान जारी किया था जिसमें उन्होंने लिखा था कि: “मैं कोई इस्लाम का आलिम नहीं हूँl मैं बीच का रास्ता अपनाता हूँ और मैं आंशिक तौर पर रिवायत पसंद और आंशिक तौर पर बुद्धिवादी हूँ “........” फिल्म पर काम करने के मेरे रूहानी तजुर्बात भुत व्यक्तिगत हैं और मैं उन्हें शेयर करना पसंद नहीं करूंगा...... इस फिल्म के लिए संगीत तैयार करने का मेरा फैसला नेक नीयति पर आधारित था, और इसमें किसी को तकलीफ पहुंचाने का कोई इरादा शामिल नहीं थाl”

तकलीफ की बात यह है की ना केवल फिल्म के संगीतकार एक आर रहमान ने बल्कि फिल्म साज़ माजिद माजिदी ने भी इस फिल्म के पीछे नेक इरादे का इज़हार कियाl एक इरानी मैगज़ीन हिजबुल्लाह लाइन को दिए गए अपने एक इंटरव्यू में माजिद माजिदी ने कहा है कि: “मैंने पश्चिम में इस्लामोफोबिया की नई लहर से लड़ने के लिए इस फिल्म को बनाने की फैसला किया था-------“ उन्होंने मज़ीद कहा की इस्लाम की पश्चिमी ताबीर हिंसा और आतंकवाद से भरी हुई हैl”

लेकिन इस इस्लामी फिल्म के पीछे नेक महत्वाकांक्षा के इज़हार और शिया भूल देश इरान में इसके खैरमकदम किए जाने के बावजूद बरेलवी उलेमा ने माजिद माजिदी और ए आर रहमान के खिलाफ एक फतवा जारी किया और हुकूमत से देश में इस फिल्म पर बैन लगाने का मुतालबा कर डालाl

इस्लामी फिल्मों के अलावा अतिवादी बरेलवी उलेमा ने सूफी संगीत और मजारों पर महिलाओं की हाज़िरी समेत ऐसे बहुत सारे सांस्कृतिक मामुलात पर पाबंदी आयद की हैं जिनसे समाजी संबंध और धार्मिक सद्भाव को शक्ति मिलती हैl

इस तरह, बरेलवी और देवबंदी दोनों वर्गों के उलेमा की जानिब से ऐसे रुढ़िवादी फतवों का खतरा भारत में बढ़ रहा हैं जिससे मुस्लिम समाज का बड़ा वर्ग भयभीत हैl इस अम्र के पेशे नज़र कि मुस्लिम उलेमा मुस्लिम समाज के इस ज़बरदस्त सैद्धांतिक बोहरान पर गहरी नज़र नहीं रखते बरेलवी-देवबंदी एकता अनर्थ हैl इस आत्मनिरीक्षण के बिना मुस्लिम समाज की एकता, इसकी अखंडता और सद्भाव केवल एक सराब हैl

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