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Hindi Section (07 Aug 2018 NewAgeIslam.Com)


Allama Anwar Shah Kashmiri’s Views on the Prediction of Islam Dominance Before the Qayamat, (The Last Day) क़यामत के क़रीब इस्लाम के प्रभुत्व की भविष्यवाणी अल्लामा अनवर शाह कश्मीरी का दृष्टिकोण

 

अम्मार खान नासिर

हदीस की पुस्तकों में सैयदना मसीह अलैहिस्सलाम के दुबारा नाज़िल होने से संबंधित कुछ रिवायतों में यह बात बयान हुई है कि जब वह तशरीफ लाएंगे तो सलीब (क्रूस) को तोड़ देंगे, खिंजीर को मार देंगे और जज़िया को बन्द कर देंगेl (बुखारी, किताब अहादीसुल अंबिया, बाब नुज़ूल ए ईसा बिन मरियम अलैहिमुस्सलाम,रकम 3290) वह लोगों को इस्लाम की ओर दावत (बुलाएंगे) देंगे और उनके ज़माने में अल्लाह पाक इस्लाम के अलावा सारी मिल्लातों का अंत कर देंगेl (सुनन अबी दाउद, किताबुल मलाहिम, बाब खुरुज अल दज्जाल, रकम 3866)

हदीस के शारेहीन ने सामान्यतः इस भविष्यवाणी की व्याख्या यह की है कि ईसा अलैहिस्सलाम के नाज़िल होने के मौके पर कुफ्र का अंत और इस्लाम का बोलबाला हो जाएगाl तथापि निकटतम अतीत के प्रसिद्ध मुहद्दिस अल्लामा अनवर शाह कश्मीरी रहमतुल्लाह अलैह ने इस राय से मतभेद व्यक्त किया हैl उनका कहना है कि रिवायत में उस मौके पर इस्लाम के ग़ालिब आने का जो ज़िक्र हुआ है, उससे मुराद पूरी धरती नहीं, बल्कि सीरिया और उसके आस पास का विशिष्ट क्षेत्र है जहां सैयदना मसीह का नुज़ूल होगा और जो उस समय इस्लाम वालों और कुफ्र वालों के बीच दुविधा और युद्ध का केंद्र होगाl

शाह साहब की यह राय क़यामत के करीब होने से संबंधित कुरआन व हदीस में वारिद भविष्यवाणियों के समग्र समझ पर आधारित है और उन्होंने मसीह के नुज़ूल के बाद इस्लाम के प्रभुत्व की भविष्यवाणी को सभी संबंधित भविष्यवाणियों के समग्र संदर्भ में देखते हुए उनकी उल्लेखित व्याख्या पेश की हैl इन भविष्यवाणियों के हवाले से उनके दृष्टिकोण की स्पष्टता उनकी पुस्तकों, विशेषतः फैजुल बारी में कई जगह पर मौजूद हैl इन पंक्तियों में शाह साहब की लेखनी की रौशनी में इसके बुनियादी पहलुओं को संक्षेप में स्पष्ट करने का प्रयास किया जाएगाl

1 -अल्लामा अनवर शाह रहमतुल्लाह अलैह के दृष्टिकोण में एक मूल बिंदु अल्लाह पाक की उस तकवीनी सुन्नत की समझ और इदराक है कि वह संसार में किसी भी कौम को हमेशा के लिए प्रभुत्व व आधिपत्य प्रदान नहीं करताl उसकी ओर से कौमों के उदय व पतन के नियम निश्चित हैं जिनके तहत कौमों को एक विशिष्ट समय तक सत्ता और शक्ति दे कर आज़माया जाता है और समय पूरा होने पर अल्लाह के कानून के अनुसार सत्ता उनसे लेकर किसी दूसरी कौम को दे दी जाती हैl शाह साहब मुस्लिम उम्मत के प्रभुत्व और सत्ता को भी इसी तकवीनी सुन्नत के तहत देखते हैं, इसलिए लिखते हैं:

“ इस उम्मत के प्रभुत्व का समय, जैसा कि शैख़ अकबर, मुजद्दिद अल्फ सानी, शाह अब्दुल अज़ीज़ और तफसीर ए मजहरी के लेखक सनाउल्लाह ने कहा है, एक हज़ार वर्ष थाl इसका समर्थन इब्ने माजा की इस हदीस से होती है कि “मेरी उम्मत को आधा दिन मिलेगाl अगर इसके बाद वह मुस्तकीम रहे तो दिन का बाकी हिस्सा भी मुस्तकीम रहेंगे, वरना हलाक होने वालों की तरह हलाक हो जाएंगेl”

शारेहीन इस पर एक मत हैं कि यहाँ दिन से मुराद आख़िरत (न्याय का दिन) का दिन है जिसका उल्लेख इस आयत में हुआ है कि “बेशक तेरे रब के यहाँ एक दिन तुम्हारे गिनती के अनुसार एक हज़ार साल के बराबर होता हैl” इतिहास भी इसकी गवाही देता है कि फितना ए तातार के रूप में बड़ी मुसीबत हम पर पांच सौ साल के बाद नाज़िल हुई जिससे दीन की इमारत मुतज़लज़ल (अस्थिर) हो कर रह गई, लेकिन अल्लाह पाक ने अपने रसूल की जुबान पर हमसे जो वादा किया था, उसे पूरा किया और एक हज़ार वर्ष की अवधि पुरी हो गईl इस अवधि में इस्लाम पूर्व और पश्चिम में दुनिया के सारे दीनों पर ग़ालिब था और यही ज़माना उम्मत ए मुहम्मदिया के प्रभुत्व का ज़माना थाl इसके बाद अल्लाह ने हम पर यूरोप वालों को मुसल्लत कर दिया और अब इस्लाम के मीनारों और मिम्बरों का हाल वहाँ पहुँच चुका है जो तुम देख रहे होl” (फैजुलबारी जिल्द 2, पृष्ठ 163)

2 –शाह साहब के दृष्टिकोण की दूसरी महत्वपूर्ण बुनियाद याजूज व माजूज के खुरुज से सम्बंधित भविष्यवाणियों का उनका विशिष्ट समझ है जिसके अनुसार इन भविष्यवाणियों में किसी एक निर्धारित घटना का नहीं, बल्कि एक लम्बे समय को कवर किए हुए घटनाओं के सिलसिले का उल्लेख किया गया है और यह इतिहास में याजूज और माजूज के निकलने का प्रारम्भ कई सदियों पहले हो चुका है और हम इस समय उसी दौर में जी रहे हैंl

कुरआन पाक में याजूज और माजूज के निकलने का उल्लेख दो जगहों पर किया गया है: एक सुरह अल कहफ़ में जुलकरनैन के घटना के संदर्भ में, जहां कहा गया है कि याजूज और माजूज को एक बंद के पीछे कैद कर देने के बाद जुलकरनैन ने कहा कि जब मेरे रब के वादे का समय आएगा तो वह इस बंद को रेज़ा रेज़ा कर देगाl (सुरह अल कहफ़, आयत 98) दूसरी जगह सुरह अम्बिया की आयत 96 है जहां याजूज और माजूज के निकलने को क़यामत के करीब होने की निशानी के तौर पर बयान किया गया हैl

अल्लामा अनवर शाह कहते हैं कि इन दोनों आयातों में याजूज और माजूज के निकलने के प्रारम्भिक और अंतिम चरण का उल्लेख हैl पहला चरण जुलकरनैन बंद के टूटने का है जिसके बाद याजूज और माजूज के, अपने इलाके से बाहर निकलने का कार्य प्रारम्भ हो जाएगाl सुरह अल कहफ़ में इसी का उल्लेख हैl फिर जब याजूज और माजूज के निकलने का यह सिलसिला विभिन्न चरणों से गुज़रता हुआ दुनिया की तबाही और फसाद के आखरी चरण में दाखिल होगा तो वह बिलकुल क़यामत का करीबी ज़माना होगा जिसका उल्लेख सुरह अम्बिया में किया गया हैl (फैजुल बारी, जिल्द 4, पृष्ठ 358) गोया याजूज और माजूज के, दुनिया की कौमों पर ताखत और ताराज की घटना केवल एक बार नहीं, बल्कि बार बार घटित होना है और यह घटना के एक पुरे सिलसिले का बयान है जिसका आरम्भ हो चुका है और जो क़यामत के बिलकुल करीबी ज़माने में अपने अंतिम रूप में पूर्ण होगाl उन्हीं में से एक खुरुज ए सैयदना मसीह के नुज़ूल के बाद भी होगा और याजूज और माजूज के इस गिरोह को हदीसों के अनुसार सैयदना मसीह की बददुआ की वजह से हलाक कर दिया जाएगाl (फैजुल बारी जिल्द 4, पृष्ठ 197)

शाह साहब का कहना है कि तुर्की नसल, रूस वाले और बर्तानिया वाले याजूज माजूज की औलाद हैं और दुनिया में फसाद और तबाही फैलाने के लिए उनके निकलने का प्रारम्भ मंगोलों के हमलों के रूप में हो चुका हैl शाह साहब तैमूर लंग, चंगेज़ खान और हलाकू की तबाह कारियों को (और इसी प्रकार पश्चिमी कौमों की औपनिवेशिक कौशल को) इसी भविष्यवाणी का एक मिसदाक़ करार देते हैंl (फैजुल बारी जिल्द 4, पृष्ट 197)

जहां तक कुरआन पाक में उल्लेखित उस “बंद” का संबंध है जो याजूज और माजूज को रोकने के लिए जुलकरनैन ने बनाया था तो इसके बारे में सैयदना अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहु अन्हु की रिवायत में बयान हुआ है कि याजूज और माजूज उस “बंद” के पीछे कैद हैं और प्रतिदिन उसे तोड़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन असफल रहते हैं, यहाँ तक कि क़यामत के करीब वह आखिरकार उसे तोड़ने में सफल हो जाएँगे और वही उनके निकलने का ज़माना होगाl (इब्ने माजा, किताबुल फितन, बाब फितना अल दज्जाल व खुरुज ईसा बिन मरियम व खुरुज याजूज व माजूज, रकम 4112) शाह साहब ने इस रिवायत को बुखारी की सहीह रिवायत के खिलाफ करार दिया है जिसमें ज़िक्र हुआ है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने ज़माने में बंद के, अंगूठे और उंगली के हलके के बराबर टूट जाने की सुचना दीl (बुखारी, किताबुल फितन, बाब याजूज व माजूज, रकम 6753) अधिक यह कि इस रिवायत को अल्लामा इब्ने कसीर ने मुअल्लल करार दिया है और यह रुझान किया है कि यह असल में इस्राइलियात में से है जिसे अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहु अन्हु ने काब अह्बार से नक़ल किया और रावियों ने गलती से नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तरफ मंसूब कर दियाl (फैजुल बारी, जिल्द 4 पृष्ठ संख्या 355)

3 –शाह साहब की ज़ेरे बहस राय की तीसरी महत्वपूर्ण बुनियाद नुज़ूले मसीह से संबंधित हदीसों का संदर्भ और माहौल हैl इन हदीसों में उल्लेखित विवरण पुरे धरती का घेराव नहीं करतीं, बल्कि एक विशिष्ट भूमि क्षेत्र को चिन्हित करती हैं जिनमें यह घटनाएं घटित होंगीl शाह साहब इससे यह लेते हैं कि इन रिवायतों में इस्लाम के गलबे और दुसरे दीनों के खात्मे की जो बात ज़िक्र की गई है, इसका संबंध भी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र से है और इसे पुरे धरती से संबंधित करार नहीं दिया जा सकताl फरमाते हैं:

“यह जो ज़ुबानों पर मशहूर है कि ईसा अलैहिस्सलाम के ज़माने में दीन पुरे धरती पर फ़ैल जाएगा, यह बात हदीसों में बयान नहीं हुईl हदीसों में केवल यह कहा गया है कि वह शरई मसले के तौर पर यहूदियत और नसरानियत को (अर्थात उनके मानने वालों को अपने धर्म पर कायम रहने की) इजाज़त नहीं देंगेl इसलिए जो इस्लाम कुबूल करेगा, वह अपनी जान को बचा लेगा और जो इनकार करेगा, उसे क़त्ल कर दिया जाएगा, और यह कानून उन क्षेत्रों में लागू होगा जहां अल्लाह के नबी ईसा अलैहिस्सलाम जेहाद करेंगेl हदीसों का हासिल यह है कि आज तो तीन दीन जारी हैं, लेकिन जब ईसा अलैहिस्सलाम नाज़िल होंगे तो केवल इस्लाम कुबूल किया जाएगा और उस समय सारा दीन अल्लाह ही का हो जाएगाl इसलिए शरई हुक्म का बयान है ना कि बाहर में घटित होने वाले किसी घटना का (अर्थात यह भविष्यवाणी नहीं है कि अमलन यहूदियत और ईसाइयत का अंत हो जाएगा), इसलिए यह संभव है कि (इसके बाद भी) कुफ्र और अहले कुफ्र बाकी रहें, अलबत्ता अगर ईसा अलैहिस्सलाम उन तक पहुँच गए तो वह उनसे केवल दीन ए इस्लाम कुबूल करेंगे, ना कि जज़िया, जैसा कि आज किया जाता हैl हदीसों से यह भी मुस्तफाद होता है कि यह प्रभुत्व जिसका वादा किया गया है, सीरिया और उसके आस पास के क्षेत्र में होगा जहां ईसा अलैहिस्सलाम नाज़िल होंगेl याजूज व माजूज का फसाद भी इसी क्षेत्र में बरपा होगा और जज़ीरा तबरिया भी सीरिया ही की ओर स्थित हैl हासिल यह है कि हमें किसी हदीस में यह नहीं मिला कि ईसा अलैहिस्सलाम दज्जाल की तरह पूरी ज़मीन में घूमेंगे, इसलिए उनके लिए जिस गलबे का वादा किया गया है, वह केवल इसी क्षेत्र में होंगेl बाकी सारी दुनिया के हाल का उनमें कोई ज़िक्र नहीं और अल्लाह ही बेहतर जानता है कि उनकी क्या स्थित होगीl” (फैजुल बारी जिल्द 3, पृष्ठ 400)

एक हदीस में बयान हुआ है कि “क़यामत कायम नहीं होगी जब तक कि तुम्हारी यहूद के साथ जंग ना हो, यहाँ तक कि वह पत्थर जिसके पीछे यहूदी होगा, पुकारेगा कि ऐ मुसलमान, यह यहूदी मेरे पीछे छिपा हुआ है, इसको क़त्ल कर दोl” (बुखारी, किताबुल जिहाद वल सैर, बाब कितालुल यहूद, रकम 2797)

अल्लामा अनवर शाह कश्मीरी इसकी व्याख्या में फरमाते हैं कि यहाँ उन्ही यहूदियों का ज़िक्र है जिनके साथ जंग के लिए सैयदना मसीह अलैहिस्सलाम नाज़िल होंगे, वरना सारी दुनिया के यहूदी, और यह वह यहूदी होंगे जो दज्जाल के अनुयायी होंगेl (फैजुल बारी, जिल्द 4, पृष्ठ 197)

ज़ेरे बहस भविष्यवाणी की व्याख्या में शैखुल हदीस मौलाना सरफ़राज़ खान सफ़दर रहमतुल्लाह अलैह के यहाँ भी यही रुझान दिखाई देता है, इसलिए उन्होंने लिखा है:

“इमाम मेहदी की पैदाइश और आमद से पहले दुनिया में जो अत्याचार होगा, अल्लाह के फज़ल व करम से सत्ता में आने के बाद प्रभाव के तहत क्षेत्रों में वह न्याय स्थापित करेंगे और अन्याय को समाप्त कर देंगेl” (इरशाद अल शीया, पृष्ठ 195)

“दज्जाल के क़त्ल के बाद जिस क्षेत्र में हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की सत्ता होगी, वहाँ केवल इस्लाम के और कोई धर्म बाकी नहीं रहेगाl” (पृष्ठ 201)

4 –उल्लेखित साक्ष्य और सबूतों के आलावा कुछ दुसरे स्रोत से भी शाह साहब की ज़ेरे बहस राय की ताईद होती हैl जैसे कि सहीह मुस्लिम में मरवी है कि एक मौके पर सैयदना अम्र बिन आस रज़ीअल्लाहु अन्हु की मजलिस में मस्तुर्द कुर्शी रज़ीअल्लाहु अन्हु ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद नक़ल किया कि “कयामत से पहले रूमी लोगों की संख्या सबसे अधिक होगीl” (अहदे नबवी के उर्फ़ में रम से मुराद सफ़ेद फाम पश्चिमी अकवाम होती थीं)l अम्र बिन आस ने सूना तो चौंके और पुछा कि “देखो! क्या कह रहे हो? मस्तुर्द कुर्शी ने कहा कि मैं वही कह रहा हूँ जो मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सूना हैl अम्र बिन आस ने फरमाया कि अगर ऐसी बात है तो फिर उन रुमियों में चार सिफ़तें मौजूद होंगे (जिनकी वजह से वह दुनिया की बाकी कौमों पर ग़ालिब होंगे):

पहली यह कि वह फितने और आज़माइश के समय दुसरे लोगों से अधिक धैर्य और बुर्दबारी का प्रदर्शन करेंगेl

दूसरी यह कि वह मुसीबत गुजरने के बाद संभलने में दुसरे लोगों से अधिक तेज़ होंगेl

तीसरे यह कि वह हार के बाद दुबारा जल्दी हमलावर होने वाले होंगेl

चौथे यह कि वह अपने यतीमों और कमज़ोरों की देखभाल में बेहतरीन लोग होंगेl

और उनमें एक पांचवीं खूबी भी होगी जो अच्छी और खूबी होगी कि वह लोगों को शासकों के अत्याचार से रोकने में सबसे बढ़ कर होंगेl (मुस्लिम, किताबुल फितन व अश्रातुस साअह बाब तक्वीमुस साअह व अक्सरुन्नास, रकम 5289)

उपर्युक्त सभी क़राइन व सबूत बहुत विचारणीय हैं और इनसे कयामत के करीब के ज़माने के स्थिति पर धार्मिक संदर्भ में विचार के लिए कई महत्वपूर्ण एंगल्स सामने आते हैंl

अहले किताब के लिटरेचर में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का ज़िक्र

कुरआन पाक ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की रिसालत की अभिपुष्टि में एक स्पष्ट दलील यह ज़िक्र की है कि आपकी बेअसत (भेजे जाने) का उल्लेख तौरात व इंजील में मौजूद है और अहले किताब के उलेमा आपके तशरीफ लाने से ना केवल परिचित हैं, बल्कि इसकी प्रतीक्षा भी कर रहे थे और वह आपको उसी तरह पहचानते हैं जैसे अपनी संतान को पहचानते हैंl

कुरआन पाक के इन बयानों के संदर्भ में तौरात व इंजील और अम्बिया के सहीफों में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से संबंधित भविष्यवाणियों की निशान दही और क़राइन व तर्क के प्रकाश में आप पर उन भविष्यवाणियों का इन्तेबाक प्रारम्भ से ही मुसलमान वक्ताओं की दिलचस्पी का विषय रहा हैl इस संदर्भ में अल्लामा बीच के दौर में बिन हज़म और इमाम इब्नुल कैय्यिम की तहकीकात, जबकि उपमहाद्वीप में ब्रिटीश शासन के दौर में मौलाना रहमतुल्लाह कैरानवी (इजहारूल हक़), मौलाना अबू मंसूर देहलवी (नवेद जावेद), मौलाना सिबली नोमानी(सीरतुन्नबी), मौलाना हमीदुद्दीन फराही (मन हुवल ज़बीह) और मौलाना हिफ्ज़ुर्रह्मान स्यौहारवी (मीसाकुन्नबीईन) आदि के प्रयास विशेषकर उल्लेखनीय हैंl करीब के गुज़रे हुए ज़माने में मौलाना बशीर अल हुसैनी और जनाब अब्दुल सत्तार गौरी ने बाइबिल की कुछ भविष्यवाणियों पर विस्तृत और तहक़ीक़ी किताबें लिखी हैं जबकि मौलाना अब्दुल माजिद दरियाबादी, मौलाना अमीन अहसन इस्लाही और मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी की तफसीरों में भी संबंधित स्थानों पर कीमती मवाद मिलता हैl’

लेखक को बाइबिल और यहूदियत व मसीहियत के अध्ययन से किशोरावस्था से ही लगाव रहा हैl इस कारण नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से संबंधित भविष्यवाणियों पर लिखे जाने वाले लिटरेचर से भी दिलचस्पी रही और अब भी हैl मेरा एहसास यह है कि कुरआन मजीद में तौरात व इंजील की जिन भविष्यवाणियों के हवाले से यहूद व नसारा पर इतमामे हुज्जत किया गया, उसमें असल प्रभावी चीज अहले किताब के यहाँ चली आने वाली सदरी (सीना बसीना) रिवायत और वह इंतेज़ार था जो उस ज़माने में बहुत आम थाl जहां तक सहीफों के मतन का संबंध है तो किताबे इस्तिसना की भविष्यवाणी के अलावा, जिसमें बहुत स्पष्ट क़राइन हैं, बाकी भविष्यवाणियाँ ऐसी सराहत के साथ मौजूद नहीं या नहीं रहने दी गईं कि किसी रद्दो कद के बिना उन्हें नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर मुन्तबक किया जा सकेl इस संदर्भ में संबंधित बयानों के एतेहासिक व भाषाई विश्लेषण के हवाले से हमारे मरहूम बुज़ुर्ग अब्दुल सत्तार गौरी साहब की कोशिशें शायद इस संदर्भ की latest research की हैसियत रखती है, लेकिन उनके अध्ययन के बाद भी मेरा यह तास्सुर कायम रहाl इस प्रकार मौजूदा परिप्रेक्ष्य में यह एक अकादमिक या मुनाजराना प्रकार की बहस हो सकती है, लेकिन दावत या इतमामे हुज्जत के पहलु से साधारणतः इसका कोई ख़ास लाभ मुझे नहीं देतीl

अलबत्ता इस्लामी जखीरे में इस विषय से संबंधित कुछ और पहलुओं का उल्लेख मिलता है जिसपर मेरे विचार में दादे तहकीक देने का इमकान और जरूरत मौजूद हैl इनमें से एक पहलु तो वही है जिसका उपर ज़िक्र हुआ, अर्थात यह कि उलेमा ए अहले किताब सीना ब सीना चली आने वाली रिवायात की रौशनी में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बेसत के मुन्तजिर थेl दूसरा पहलु यह है कि इस्लामी इतिहास के प्रारम्भिक और मध्य काल के अहले इल्म के यहाँ इस बात का एक सामान्य उल्लेख मिलता है कि अहले किताब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अल्लाह का सच्चा नबी मानते हैं, लेकिन आपकी बेसत को अहले अरब के लिए ख़ास करार दे कर खुद को आप पर ईमान लाने का मुकल्लफ़ नहीं समझतेl इन दोनों हवालों से अहले किताब, ख़ास तौर पर यहूद के मज़हबी लिटरेचर में ऐसे सबूत व बयान की निशान दही नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की रिसालत के अस्बात की एक बिलकुल मूल एतेहासिक दलील को और दृढ़ और मजबूत बना सकती हैl

हाल ही में लेखक को एक वेब साईट पर इस प्रकार की कुछ तहकीकात देखने का मौक़ा मिला जिनसे उल्लेखित एहसास को और अधिक मजबूती प्राप्त होती हैl http://old-criticism.blogspot.com के नाम से कायम वेब साईट में “अन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फित तौरात अल यहूदी” के शीर्षक के तहत चार किस्तों में एक लेख प्रकाशित की गई है जिसमें यहूद के मज़हबी जखीरे से इस लेख के कुछ अहम सबूतों का ज़िक्र किया गया हैl जैसे कि रबी शमउन बिन युहाई का शुमार दूसरी शताब्दी ईसवी के बड़े यहूदी उलेमा में से होता हैl उनका जन्म 80 ईसवी में जब कि मृत्यु 160 में हुआl उन्होंने अपनी एक लेख में दुनिया के खात्मे के करीब घटित होने वाले कुछ घटनाओं का ज़िक्र किया है और इस संदर्भ में लिखा है कि अल्लाह की मर्जी यह है कि वह बनी इस्माइल में एक नबी भेजे और उस धरती पर उन्हें प्रभुत्व और सत्ता प्रदान करेl रबी शमउन ने इस हवाले से यशायाह नबी और जकारिया नबी के सहीफों से भी इस्तेशाद किया हैl

इस प्रकार ग्यारहवीं और बारहवीं शताब्दी इसवी में यमन के एक बड़े यहूदी आलिम मिन्तनाइल अलफ्युमी ने अपने एक रिसाले में लिखा है कि अल्लाह पाक जैसे तौरात के नाज़िल करने से पहले विभिन्न कौमों में नबियों को भेजता रहा है, उसी प्रकार तौरात के नाज़िल होने के बाद भी ऐसे लोगों में नबी भेज सकता है जिनके पास दीन ना होl इसी लिए अल्लाह पाक ने अरब वालों में, जिनकी तरफ से इससे पहले कोई नबी नहीं भेजा गया था, उनकी जरूरत के पेशे नज़र मुहम्मद को भेजा ताकि वह उनकी सहीह रास्ते की ओर राहनुमाई करेl

धर्मों के अध्ययन से दिलचस्पी रखने वाले मुहक्केकीन (शोधकर्ता) इस हवाले से यहूदी तुरास तक सीधे पहुँच और लाभ उठाने की सलाहियत पैदा कर सकती है तो हमें आशा है कि इस प्रकार के बहुत सारे सबूत और बयान जमा किए जा सकते हैंl

स्रोत: http://www.alsharia.org/mujalla/2018/aug/khatirat-ammar-nasir

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/omar-khan-nasir/allama-anwar-shah-kashmiri’s-views-on-the-prediction-of-islam-dominance-before-the-qayamat,-(the-last-day)--قرب-قیامت-میں-غلبہ-اسلام-کی-پیشین-گوئی-علامہ-انور-شاہ-کشمیری-کا-نقطہ-نظر/d/116018

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/omar-khan-nasir,-tr-new-age-islam/allama-anwar-shah-kashmiri’s-views-on-the-prediction-of-islam-dominance-before-the-qayamat,-(the-last-day)--क़यामत-के-क़रीब-इस्लाम-के-प्रभुत्व-की-भविष्यवाणी-अल्लामा-अनवर-शाह-कश्मीरी-का-दृष्टिकोण/d/116054

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