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Hindi Section (07 Apr 2017 NewAgeIslam.Com)


Are ISIS, Taliban and Al-Qaeda Kahrijite Organisations? (Part-6) क्या आइएसआइएस, तालिबान और अलक़ायदा ख़वारिज संगठन हैं? (भाग-6)



गुलाम गौस सिद्दीकी, न्यु एज इस्लाम

14- हदीसे पाक में ख़वारिज की एक निशानी यह है “कि “वह (ख़वारिज) खैरुल बरिय्यह की हदीस बयान करेंगे।'' यहाँ थोड़ा विवरण उद्देश्य है इसलिए पूरी हदीस को ध्यान में रखना जरूरी है। ''हज़रत अली रदि अल्लाहु अन्हु ने बयान किया, कि मैं ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को फरमाते सुना है कि अंत समय में ऐसे लोग आएंगे जो कम उम्र होंगे, कम बुद्धि वाले होंगे, वह खैरुल बरियह की हदीस का वर्णन करेंगे, वह इस्लाम से इस तरह निकल जाएंगे जिस तरह तीर शिकार से निकल जाता है, उनका ईमान उनके हलकों से आगे नहीं बढ़ेगा, तुम उन्हें जहां पाओ उन्हें कत्ल कर दो क्योंकि उनकी हत्या करना कयामत के दिन उनके लिए सवाब और इनाम का कारण होगा जो उन्हें मार देंगे ''( सहीह बुखारी: किताब फजाईलुल कुरआन, हदीस नo: 82, सहीह बुखारी: 3611, सहीह मुस्लिम: किताबुज्जकात हदीस नo: 199, जमेअ तिरमिज़ी: किताबुल फितन, हदीस नo: 31)

हाफ़िज़ इब्ने हजर असकलानी रहमतुल्लाह अलैह ने फरमाया कि वह (ख्वारिज) लोग कुरआन की बहुत अधिक तिलावत करेंगे और खैरुल बरियह के कौल का मतलब पैगंबर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की तिलावत की हुई आयतें हैं।(फ़तहुल बारी, नेअमतुल बारी फी शरह सहीह अल बुखारी: जिल्द 9 पृष्ठ 314)

अल्लामा इब्ने मुलक्किन (मृतक 804 हिजरी) इस हदीस (सहीह अल बुखारी: 3611) की शरह में लिखते हैं: ''इस हदीस में वर्णित है: वे लोग “कौलुल बरियह” का वर्णन करेंगे: यानी उनकी बातें बहुत अच्छी होंगी और उनके कार्य बहुत खराब होंगे। इस हदीस में वर्णित है कि उन्हें मारना इनाम का कारण होगा क्योंकि वे धरती पर फसाद करेंगे और मुसलमानों की एकता को तोड़ने की कोशिश करेंगे। इस हदीस में वर्णित है: उनका ईमान उनके हलकों से अधिक नहीं होगा क्योंकि वे मोमिन नहीं होंगे। ''( अत्तौजीह लिश्श्र्हुल जमेअ अल सहीह: जिल्द 20 पृष्ठ 194, वज़ारातुल औक़ाफ़, क़तर, 1429 हिजरी, नेअतुल बारी फी शरह अल बुखारी लिल अल्लामा गुलाम रसूल साईदी: जिल्द 9 पृष्ठ 311)

लेकिन इस हदीस में इशकाल बड़ा है और वह यह है कि हमें यह आदेश दिया गया है कि हम ज़ाहिर का पालन करें और हम इसके मुकल्लफ़ नहीं कि हम भीतर की खोज करें, तो जो लोग “खैरुल बरीयह की बात” को पढ़ते होंगे हमें इनके हाल पर कैसे अभिविन्यास होगी कि हम उन्हें प्राणदण्ड के योग्य घोषित कर दें।

शेख उसैमीन जो एक बहुत बड़े वहाबी मुफ़्ती है इसके जवाब में लिखते हैं: ''उन लोगों के लक्षण हैं और सबसे महत्वपूर्ण संकेत यह है कि यह मोमेनीन को काफिर करार देंगे क्योंकि उनका एक निश्चित तरीका है और जो उनके तरीके का विरोधी हो वह उसे काफ़िर कहते हैं, सो उन लोगों की हत्या करना वाजिब (आवश्यक) है। अगर यह सवाल किया जाए कि क्या आम लोगों के लिए उन्हें क़त्ल करना जायज़ है तो इसका उत्तर यह है कि इसमें कोई शक नहीं कि सीमाओं को स्थापित करना और मुरतदीन को मारना देश के प्रमुख की ओर मुफुज़ है क्योंकि अगर यह दरवाजा खोल दिया जाए तो हर व्यक्ति मुबाहुद्दम की हत्या कर देगा। और अगर मान लिया जाए कि देश का प्रमुख इस आदेश का पालन न करे तो आम मुसलमान के लिए भी उन्हें क़त्ल करना जायज़ है बशर्ते कि उसे इससे हानि न हो।

वहाबी शेख अब्दुल्लाह बिन बाज़ ने इस हदीस के सम्बन्ध में लिखा है कि ये लोग ख़वारिज हैं और मुसलमानों की हत्या करते हैं और मूर्ति पूजनें वालों को छोड़ते हैं।'' (शरह सहीह बुखारी: जिल्द 4 पृष्ठ 406, मकतबा अल तिबरी, 1429 हिजरी)

यहाँ सूफी सुन्नी अल्लामा गुलाम रसूल सईदी अलैहिर्रहमा शेख उसैमीन की उपरोक्त शरह पर टिप्पणी करते हुए मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब नजदी के कुफ्र पर अरब और गैर अरब के उलेम के संयोग का हवाला देते हुए लिखते हैं:

''मैं कहता हूं कि जिन लोगों को शेख उसैमीन ने ह्त्या के योग्य करार दिया है उनके सर्वोच्च मिसदाक़ शेख मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब नजदी के अनुयायी हैं और उनमें शेख अब्दुल्लाह बिन बाज़ और शेख उसैमीन भी शामिल हैं, देखिये:

वहाबियों के इमाम शेख मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब नजदी (मृतक 1206 हिजरी) लिखते हैं: अनुवाद '' तुम जान चुके हो कि उन का एक खुदा को स्वीकार करना उनको इस्लाम में प्रवेश नहीं करता, और यह जो मलाइका (फरिश्तों) और नबियों का क़स्द करते हैं और उनकी हिमायत का इरादा करते हैं और इससे अल्लाह के करीब होनें का इरादा करते हैं इस चीज़ ने उनकी हत्या करने और उनके माल लुटने को मुबाह (वैध) कर दिया है।'' (कशफ़ुल शुबहात: पृष्ठ 9, मकतबा सल्फिया मदीना मुनव्वरा,1389 हिजरी)

इस वाक्यांश में शेख अब्दुल वहाब नजदी ने वर्णन कर दिया है कि जो उनके वहाबी अकीदे का विरोधी है उसे कत्ल करना जायज़ है।

शेख मोहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब के भाई सुन्नी सही अक़ीदे के मुसलमान थे, वह शैखे नजदी की तकफीर का रद्द करते हुए लिखते हैं: ''मुसलमानों की तकफीर के बारे में तुम्हारा रुख इसलिए भी सही नहीं है कि अल्लाह के गैर को पुकारना नज्र व नियाज़ बिल्कुल कुफ्र नहीं और ना ही इस अमल को करने वाले मुस्लिम को इस्लाम से बाहर किया जा सकता है, क्योंकि सहीह में है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: ''संदेह (शुबहात) के आधार पर हुदूद को सकित कर दो।'' (तारीख बगदाद जिल्द 9 पृष्ठ 303)। और हाकिम ने अपनी सहीह में और अबू अवाना ने अलबज़ार में सहीह सनद के साथ रिवायत की है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: ''जब किसी व्यक्ति की सवारी एक बे आबो गयाह( जहां जल पेड़ पौदे कुछ न हों) रेगिस्तान में गुम हो जाए तो वह तीन बार कहे: ऐ अल्लाह के बंदे! मुझे अपनी सुरक्षा में ले लो तो अल्लाह तआला के कुछ बन्दे हैं जो उसे अपनी सुरक्षा में ले लेते हैं। '' (मुसनद अलबज़ार: 3128, अमलुल यौमा वाल्लैलती लिन्निसाई: 558) और  तबरानी की रिवायत है कि ''यदि व्यक्ति सहायता चाहता हो तो यूँ कहे कि ऐ अल्लाह के बन्दों! मेरी मदद करो। ( अल मुअजमुल कबीर: 10518)। इस हदीस को फ़ुक़्हा ए इस्लाम ने क़ुतुब ए जलीलह में उल्लेख किया है और इसका प्रकाशन किया है और फ़ुक़्हा ए किराम में से किसी ने इसका इनकार नहीं किया है। इसलिए इमाम नौव्वी शाफ़ई मृतक 676 हिजरी ने 'किताबुल अज्कार 807' 'में इसका उल्लेख किया है, और इब्नुल कय्यिम ने अपनी किताब' ' अल कल्मुल तय्यिब' 'में इसका उल्लेख किया है और इब्ने मुफलेह ने' किताबुल अदब '' में इस हदीस का उल्लेख करने के बाद लिखा है: ''हज़रत इमाम बिन हंबल के पुत्र बताते हैं कि मैं अपने पिता (यानी इमाम अहमद बिन हंबल (मृतक 241 हिजरी) से सुना, वह कहते थे, '' मैंनें पांच बार हज किए हैं, एक बार में पैदल जा रहा था और रास्ता भूल गया, मैंने कहा: ऐ अल्लाह के बंदों! मुझे रास्ता दिखाओ, मैं यूं ही कहता रहा यहां तक कि मैं सही रास्ते पर आ गया''। अब मैं यह कहता हूँ कि जो व्यक्ति किसी अनुपस्थित या मृतक बुजुर्ग को पुकारता है और तुम इसे काफ़िर कहते हो बल्कि तुम सिर्फ अपने गलत अनुमान से यह कहते हो कि इस व्यक्ति का शिर्क उन मुशरिकीन के शिर्क से भी बढ़कर है जो समुन्द्र और भूमि में पूजा हेतु गैर अल्लाह को पुकारते थे, और उसके रसूल को खुले तौर पर झुठलाते थे, क्या तुम इस हदीस या इसके मकसद पर उलेमा और इमामों के कर्म को उस व्यक्ति के लिए अस्ल नहीं करार देते जो बुजुर्गों को पुकारता है और केवल अपने गंदे अनुमान से उसे शिर्क करार देते हो। जबकि संदेह से सीमा खत्म हो जाती हैं तो इस मजबूत मूल के आधार पर ऐसे व्यक्ति से तकफीर क्यों न माफ होगी। तथा मुख्तसरुल रौज़ा में कहा है: जो तौहीद और रिसालत की गवाही देता हो उसे किसी बिदअत के आधार पर काफ़िर नहीं कहा जाएगा। '' (अस्सवाईकुल इलाहिय्यह पृष्ठ 34, 35, मकतबा एशीक, इस्तांबुल)

शैख़ हुसैन अहमद मदनी दारुल उलूम देवबंद (मृतक 1377 हिजरी) मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब (मृतक 1206 हिजरी) के संबंध में लिखते हैं: “दोस्तों! मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब नजदी तेरहवीं सदी में अरब के नज्द से ज़ाहिर हुआ  और चूंकि यह गलत विचार और गंदा अकीदा रखता था इसलिए उसने अहले सुन्नत वलजमाअत से क़त्ल व केताल किया, उनको जबरदस्ती अपने विचारों की तक़ज़ीब देता रहा, उनके माल को गनीमत माल और हलाल (वैध) माना गया, उनकी हत्या को इनाम और रहमत का कारण गिनता रहा, अहले हरमैन को विशेष रूप से और अहले हिजाज़ को आमतौर पर अधिक से अधिक कष्ट पहुँचाए, सलफ सालेहीन और अनुसरण की शान में बहुत बेअदबी और गुस्ताख़ी के शब्द इस्तेमाल किए, कई लोगों को उसकी तकलीफे शदीद के कारण मदीना और मक्का छोड़ना पड़ा और हजारों आदमी उसके और उसके सेना के हाथों शहीद हो गए। कहने का तात्पर्य यह कि वह एक तानाशाह और विद्रोही, जालिम, अनैतिक व्यक्ति था, इसी कारण अहले अरब को विशेष रूप से उससे और उसका अनुसरण करनें वालों से हार्दिक द्वेष था, और इतना ज्यादह है कि इतना यहूदी न ईसाई न मजूसी और न हिन्दुओं से है ''। (अस्सहबुस्साकिब: पृष्ठ 42, मीर मोहम्मद पुस्तकालय, कराची)

अल्लामा मोहम्मद अमीन बिन उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ अल दमुश्की (मृतक 1252) हिजरी लिखते हैं: '' जिस तरह हमारे ज़माने में मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब के अनुसरण करनें वाले हैं, जो नजद से निकले हरमैन पर हावी हो गए और वह खुद को मजहबे हनाबलह से जोड़ते हैं लेकिन उनका मानना है कि वह मुसलमान हैं और जो उनके अकीदे में जो विरोधी है वह मुशरिक है और इसलिए उन्होंने सुन्नी अकीदे के मानने वालों की हत्या को और उलेमा की हत्या को जायज करार दिया।'' (रद्दुल मुहतार लिश्शामी: जिल्द 6 पृष्ठ 317, दारुल अहया अत्तुरासुल अरबी, बेरूत, 1419 हिजरी)

इसके बाद अल्लामा गुलाम रसूल सईदी अलैहिर्रहमा लिखते हैं: ''सऊदी सरकार ने अपने राज्य में अल्लामा शामी की'' किताब रद्दुल मोह्तार की इस इबारत की वजह से सऊदी हुकूमत में प्रवेश निषिद्ध कर दिया है। मैं कहता हूँ: उन्होंने '' रद्दुल मोह्तार 'का प्रवेश तो अपनी सरकार में बंद कर दिया है लेकिन वह इस हदीस का क्या करेंगे: 'हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रदि अल्लाहु अन्हुमा बयान करते हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने प्रार्थना की: ऐ अल्लाह हमारे शाम में और हमारे यमन में बरकत अता फरमा, सहाबा ने अर्ज़ किया: और हमारे नजद में? आपनें प्रार्थना की: ऐ अल्लाह हमारे शाम में और हमारे यमन में बरकत अता फरमा, सहाबा ने अर्ज़ किया: और हमारे नजद में? आपने फरमाया: वहाँ भूकंप और फ़ित्ने होंगे और वहीं से शैतान का सींग निकलेगा। (सहीह अल बुखारी: 1073, 7094, सहीह इब्ने हिब्बान: 6648, शरह अल सुन्नह: 4004, मुस्नद अहमद: जिल्द 2 पृष्ठ 5, जामेउल मसनीद इब्नुल जूजी: 3519)। नजद की दक्षिण घाटी हनीफा के एक स्थान अय्यना में मुसैल्मा कज़ाब पैदा हुआ था, और इसी जगह मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब नजदी पैदा हुआ, और उसकी फैलाई हुई बद अकीदगियों से मुसलमानों के अकीदे में ज़लज़ला और जबरदस्त फितना पैदा हुआ ''

फिर अल्लामा गुलाम रसूल सईदी अलैहिर्रहमा क्या ही उम्दा नसीहत देते हुए लिखते हैं: ''मैं कहता हूँ शेख अब्दुल्लाह बिन बाज़ (मृतक 1420 हिजरी) और शेख उसैमीन (मृतक 1421 हिजरी) तो दुनिया से विदा हो गए और उनका हिसाब और किताब अल्लाह पाक के इख्तियार में है लेकिन उनके अनुसरण करनें वाले और उनके समर्थकों को चाहिए कि वे इस बहस को ध्यानपूर्वक पढ़ें, हो सकता है कि वह शेख मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब की पैरवी छोड़ दें और मसलक अहले सुन्नत वल जमाअत को ले लें। अल्लाह हमें हिदायत पर कायम रखे और उन्हें हिदायत नसीब फरमाए। (आमीन) '' (नेअमतुल बारी फी शरह सहीह अल बुखारी: जिल्द 9 पृष्ठ 316, 317)

(शेष अगले)

गुलाम गौस सिद्दीकी देहलवी इस्लामी पत्रकार, अंग्रेजी, अरबी, उर्दू भाषाओं के अनुवादक और न्यु एज इस्लाम के नियमित स्तंभकार हैं। ईमेल: ghlmghaus@gmail.com

URL to read its short version in English: http://www.newageislam.com/islamic-ideology/ghulam-ghaus,-new-age-islam/isis,-taliban,-al-qaeda-and-other-islamist-terrorists-are-kharijites?-an-analysis-of-40-major-characteristics-of-kharijites/d/106173

 

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/ghulam-ghaus-siddiqi,-new-age-islam/are-isis,-taliban-and-al-qaeda-kahrijite-organisations?-(part-6)-کیا-داعش-،طالبان-اور-ا-لقاعدہ-خوارج-صفت-تنظیمیں-ہیں؟-قسط--۶/d/109977

 

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/ghulam-ghaus-siddiqi,-new-age-islam/are-isis,-taliban-and-al-qaeda-kahrijite-organisations?-(part-6)--क्या-आइएसआइएस,-तालिबान-और-अलक़ायदा-ख़वारिज-संगठन-हैं?-(भाग-6)/d/110672

 

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