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Hindi Section (09 Jul 2018 NewAgeIslam.Com)


Understanding Pranab Mukherjee’s Speech as an Answer to Mohan Bhagwat is Wrong प्रणब मुखर्जी के भाषण को मोहन भागवत का जवाब समझना गलत है

 

 

 

अरशद आलम, न्यू एज इस्लाम

09 जून 2018

कांग्रेस पार्टी को अब बहुत अधिक राहत मिली होगीl आर एस एस की विदाई समारोह में प्रणब मुखर्जी जैसे एक बड़े कांग्रेसी के भाषण से कांग्रेस पार्टी काफी अविश्वास का शिकार हुई होगी, और मामला भी ऐसा ही हैl तथापि, भाषण के मवाद ने आर एस एस के साथ प्रणब मुखर्जी के नए रिश्ते पर बहुत से लोगों की चिंता और भय को समाप्त कर दिया हैl हालांकि उनका भाषण सार संघ संचालक मोहन भागवत जैसी शानदार तो नहीं थी लेकिन उन्होंने सहिष्णुता और विविधतावाद की आवश्यकता पर अपने भाषण में काफी जोर दियाl उन्होंने कहा कि यही दो बातें भारतीय राष्ट्रवाद की इम्तियाज़ी पहचान हैंl उन्होंने बिलकुल स्पष्ट तौर पर हमें यह बताया कि विभिन्न दृष्टिकोण और विविध पहचान आज भारतीय राष्ट्रवाद के हवाले से आर एस एस के विचारों के मुकाबले में काफी भिन्न हैंl अपने पुरे भाषण प्रणब मुखर्जी ने रंगा रंगी और बहुलतावाद के महत्व पर जोर दिया और उन्हें भारतीय राष्ट्रवाद की अनूठी विशेषता करार दियाl

क्या आर एस एस को इस बात का खतरा होना चाहिए कि जिस व्यक्ति को उन्होंने आमंत्रित किया उसी ने उनका वैचारिक खंडन कर दिया और जिस उद्देश्य के लिए उन्हें बुलाया गया था वह उद्देश्य ख़त्म हो गया? बहुत से टिप्पणी कारों ने भी यही समझा, जबकि हकीकत यह है कि अगर अंतर खोजा जाए तो जो आर एस एस के मुखिया ने कहा और जो प्रणब मुखर्जी ने कहा उन दोनों के बीच बहुत छोटा सा अंतर हैl बेशक उन दोनों का संबंध अलग अलग राजनीतिक विचारों से है लेकिन जब राष्ट्रवाद की बात आती है तो उन सभी के बयान से एक बड़े पैमाने पर सहमति का इज़हार होता हैl अब हम उस दृष्टिकोण का विस्तृत अध्ययन करते हैंl

ऐसा प्रतीत हुआ की दोनों ने भारत की सफलता पर ही प्रकाश डालाl यह बिलकुल स्पष्ट है कि प्राचीन भारत हिन्दू भारत के बराबर है और इसी कारण यह भारतीय सभ्यता व संस्कृति का नमूना समझा जाता हैl प्रणब मुखर्जी ने विभीन्न साम्राज्यों और तक्षशिला जैसी विभिन्न विश्वविद्यालयों के जरिये प्राचीन संस्कृति की कामयाबियों के बारे में बात कीl जब मध्य युग की बात आई जो कि मुस्लिम साम्राज्य का दुसरा नाम है, तो वह इसे केवल ‘मुस्लिम आक्रमणकारी’ का दौर कह कर आगे निकल गएl आर एस एस को यह सुन कर बड़ी ख़ुशी हुई होगीl आखिर एक सीनियर कांग्रेसी लीडर भारत के इतिहास के बारे में उन का दृष्टिकोण पेश कर रहा थाl मुसलामानों के बारे में कोई बात ना करके इन दोनों के भाषण से मुसलामानों को गायब कर दिया गया थाl

न्याय की बात यह है कि भागवत ने भारतीय सभ्यता के सांस्कृतिक निरंतरता पर जोर दिया लेकिन उन्होंने तुरंत इस बात का भी इशारा कर दिया की यह निरंतरता केवल हिन्दू मत के प्रचार के माध्यम से ही संभव हैl मुखर्जी ने भी यही सब कुछ कहा लेकिन इसके बाद उन्होंने यह भी कहा की सदियों तक मेल जोल की वजह से भारतीय संस्कृति व्यापक और वैश्विक बन चुकी हैl तथापि, भागवत की ही तरह उन्होंने यह भी कहा की इस देश की विविधता में एक विशेष प्रकार की एकता भी थी और यह एकता हिन्दू मत से पैदा हुई थीl इस तरह प्रणब मुखर्जी ने हालांकि शब्द व्यापक और वैश्विक का प्रयोग किया, लेकिन उन्होंने इसके पीछे के इतिहास को पूर्ण रूप से नज़र अंदाज़ कर दियाl उन्होंने मौलाना मदनी और मौलाना आज़ाद का कोई ज़िक्र नहीं किया जो कि यहाँ की व्यापक और वैश्विक राष्ट्रवाद के कल्पना के पीछे असल उत्तेजक थेl इन दोनों लोगों के भाषण में हिन्दू संस्कृति ही एक बुनियाद की हैसियत से कायम रहा जिसके इर्द गिर्द भारतीय सभ्यता परवान चढ़ी और अब भी जारी हैl हिन्दू मत की एक गैर ऐतिहासिक समझ और प्राचीन भारत की उपलब्धियों की प्रशंसा काफी मामूली बात है जो कि इस दौर में गलत हैl दलितों के दृष्टिकोण से प्राचीन भारतीय संस्कृति में कोई खूबी और उल्लेखनीय बात नहीं है और इसकी वजह साफ़ है कि उनके साथ उस दौर में जानवर से भी बदतर व्यवहार किया जाता थाl ब्राह्मणों के हाटों हत्या का सामना करने वाले बुद्ध मत के अनुयायियों के लिए भारतीय इतिहास के उस दौर में कौन सा अध्याय शानदार है? बुद्ध मत को उसकी जन्म स्थान तक ही सीमित कर दिया गया था और खतरनाक और ज़हरीले ब्राह्मणवाद की बदौलत लगभग बर्बाद किया जा चुका थाl

इन सारी बातों का उद्देश्य यह है कि इस देश में इस मुद्दे पर एक अनावश्यक बहस का दौर चल रहा है कि कांग्रेस और आर एस एस की राष्ट्रवाद के बीच बुनियादी अंतर हैl भागवत और मुखर्जी के भाषणों में ऐसी बहुत सारी बातें हैं जिनसे यह ज़ाहिर होता है कि इन दो राजनीतिक पार्टियों के बीच राष्ट्रवाद के बारे में सहमती हैl अंतर केवल प्रकृति का नहीं केवल रूप का हैl इसलिए टीवी के बहस और अखबारों के कालम में इन दोनों के बीच जो बुनियादी अंतर साबित करने का प्रयास किया जा रहा है वह अवश्य ही अनर्थ और उनके दृष्टिकोण को समझने में तग़ाफ़ुल का नतीजा हैl ख़ास तौर पर इनका यह तग़ाफ़ुल स्वयं लिबरल हिन्दू इतिहास के मान्यताओं का परिणाम भी हैl क्या यह केवल इत्तेफाक की बात है की आर एस एस इतनी आसानी के साथ इन्द्रा गांधी से मोदी पर आ जाए? आखिर कार इन्द्रागांधी को आर एस एस ने दुर्गा का स्थान दिया था और उस समय कांग्रेस को भी इस पर कोई आपत्ति नहीं थीl इस बात का उद्देश्य यह है कि हम में से कुछ लोग कांग्रेस और आर एस एस के विभिन्न दृष्टिकोणों के बारे में हमेशा गलत कल्पना कायम कर लेते हैंl आर एस एस की कोई आलोचना ना करके प्रणब मुखर्जी ने यह साबित कर दिया है कि वह एक सच्चे कांग्रेसी हैंl जो लोग उनसे मायूस हैं उन्हें कांग्रेस पार्टी की इतिहास का कोई समझ नहीं हैl

अगर प्रणब मुखर्जी कोई अंतर पैदा करना चाहते तो वह ख़ास तौर पर मुसलामानों और दलितों के कत्ल ए आम के बारे में जरुर कोई बात करतेl आज जो गलत है उसे स्पष्ट ना करके और इस बात का खुलासा ना करके कि किस तरह उनका संबंध अतिवादी हिन्दू विचार से हैl उन्होंने आर एस एस को एक विशेष अंदाज़ में औचित्य प्रदान किया हैl जो दौर हम देख रहे हैं इस जैसे परेशान करने वाले दौर में बुराई का नाम ना लेना उसे अनदेखा करने के बराबर हैl आखिर में उनके भाषण को इसके मवाद के लिए नहीं जाना जाएगा क्योंकि इसमें कोई असली या नई बात नहीं थीl बल्कि वह उस दृष्टिकोण के लिए जाना जाएगा जो उस भाषण ने प्रदान किया हैl भगवा झंडा लहराना और एक ऐसे वरिष्ठ कांग्रेसी लीडर की मौजूदगी में उसे सलामी पेश करना जो कि राजनीतिज्ञ होने का दावा कर सकता हैl इस पुरे तमाशे ने केवल उन दृश्यों को एक ख्याल ए खाम बनाते हुए एक मामूली घटना बना कर पेश करने में ही मदद की हैl और जिन लोगों का ख्याल इसके विपरीत है वह केवल खुद को बेवकूफ बना रहे हैंl

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