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Hindi Section (12 Feb 2019 NewAgeIslam.Com)



Decent Worldview is Indispensable for Harmony, Reconciliation and Unity अच्छा गुमान सद्भाव, सुलह और एकता के लिए अपरिहार्य है


कनीज़ फातमा, न्यू एज इस्लाम


अच्छे गुमान का अर्थ किसी के बारे में अच्छा ख़याल करना और नेक गुमान रखना हैl विडंबना यह है कि हमारे समाज में अच्छे गुमान का अभाव है, हमारे लोगों में एक दोसरे के संबंध में बदगुमानी बहोत चरम पाई जा रही हैl हमारे आम लोगों में अधिकतर मतभेद बदगुमानी का परिणाम हैंl आम लोगों के साथ साथ ख़ास लोग भी इसके प्रभाव से सुरक्षित नहीं हैंl इसमें कोई संदेह नहीं कि अगर हम अच्छे गुमान को अपने व्यवहारिक जीवन का आभूषण बना लें तो हम दीनी और दुनयावी अक्सर मतभेदों और विवादों व पक्षपात से पाक साफ़ हो जाएंl
अच्छा गुमान मुसलमानों का इमानी आभूषण है, बल्कि आपसी सद्भाव, सामंजस्य, एकता और मानवीय समाज के कल्याण के लिए अपरिहार्य भी हैl अच्छा गुमान इस्लामी व अखलाकी शिक्षाओं की एक मजबूत कड़ी है, जो दीनी व मज़हबी, फिकही व शरई, समाजी व मुआशरती और रूहानी कई एतेबार से महत्व का हामिल हैl इसकी महत्व का अंदाजा कुरआन ए पाक, पाक हदीसों, सहाबा व ताबईन और सूफियों की मजलिसों, खतों, वसीयतनामों और लेखों आदि से बखूबी लगाया जा सकता हैl
कुरआन ए पाक की कई आयतों में अच्छे गुमान की शिक्षाएं मिलती हैंl यहाँ हम एक आयत ए करीमा पर संतोष करते हैंl अल्लाह का इरशाद है:
“ऐ ईमान वालों बहोत गुमानों से बचो बेशक कोई गुमान गुनाह हो जाता है और कमी मत तलाश करो एक दोसरे की गीबत मत करो क्या तुम में कोई पसंद रखे गा कि अपने मरे हुए भाई का गोश्त खाए तो यह तुम्हें गवारा नहीं होगा और अल्लाह से डरो बेशक अल्लाह बहोत तौबा कुबूल करने वाला मेहरबान हैl” (४९:१२)
नबी क्रीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भी कई बार हमें अच्छे गुमान की शिक्षा दी हैl
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ीअल्लाहु अन्हु) बयान करते हैं कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया: तुम गुमान करने से बचो क्योंकि गुमान करना सबसे झूटी बात है और जिज्ञासा ना करो और (किसी के हालात जानने के लिए) पूछ ताछ ना करो और किसी से हसद ना करो और ना ही एक दोसरे से पीठ फेरो और ना किसी से बुग्ज़ रखो और अल्लाह के बंदे भाई भाई बन जाओl एक रिवायत में है: और किसी मुसलमान के लिए यह जायज नहीं है कि वह तीन दिन से अधिक अपने भाई को छोड़े रखेl (सहीह अल बुखारी हदीस नंबर:५ सहीह मुस्लिम हदीस नंबर:, सुनन अबू दाउद, सुनन तिरमिज़ी, मुसनद अहमद, आलिमुल क़ुतुब, तिब्यानुल कुरआन सुरह हुजरात आयत १२)
तिब्यानुल कुरआन में है: कुछ उलेमा ने कहा है कि कुरआन ए पाक की इस आयत में और उल्लेखनीय हदीस में गुमान की मनाही से मुराद बदगुमानी से मना करना है और किसी पर तोहमत लगाने से मना करना है, जैसे कोई व्यक्ति बिना किसी मजबूत दलील के और बिना किसी उचित कारण के यह गुमान करे कि वह शराब पिता या जिना करता है या और कोई बेहयाई का काम करता हैl अर्थात ऐसे ही किसी के दिल में ख़याल आ जाए कि फलां व्यक्ति फलां बुरा काम करता है तो यह बदगुमानी हैl
कुछ गुमान सहीह होते हैं और कुछ गुमान फासिद होते हैं, इनमें अंतर यह है कि जिस गुमान का कोई सहीह प्रतीक नी हो और उसका कोई स्पष्ट कारण ना हो वह बदगुमानी है और हराम है और यह उस स्थिति में है कि
जिस व्यक्ति के संबंध में प्रसिद्ध हो कि वह नेक आदमी है या उसका हाल छुपा हुआ है और कोई व्यक्ति केवल शक के कारण उसके संबंध में बदगुमानी करे, जैसे उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा सिद्दीका (रज़ीअल्लाहु अन्हा) के संबंध में मुनाफ़िकों और कुछ मुसलमानों ने केवल शक के कारण बदगुमानी की कि वह काफले से बिछड़ गई थीं और बाद में हज़रत सफवान बिन मोअतल (रज़ीअल्लाहु अन्हु) के साथ आई थीं तो अल्लाह पाक ने उनकी बदगुमानी के रद्द में आयत नाज़िल फरमाई:
.........(ऐसा क्यों नहीं हुआ कि जैसे ही तुमने इस बात (हज़रत आयशा रज़ीअल्लाहु अन्हा पर बेहयाई की तोहमत) को सूना तो मोमिन मर्दों और मोमिन औरतों ने अपनों के संबंध में नेक गुमान किया होता और यह कहा होता कि यह निरा बोहतान हैl
और हाफ़िज़ युसूफ बिन अब्दुल्लाह इब्ने अब्दुल बरमाल लिखते हैं:
बेशक अल्लाह ने मुसलमान के खून और उसके जान को हराम कर दिया है और फरमाया: मुसलमानों के बारे में खबर के सिवा और कोई गुमान ना किया जाए, और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: जब तुम किसी के बारे में (बद) गुमानी करो तो इसकी तहकीक ना करो और हज़रत उमर बिन खत्ताब ने फरमाया: किसी मुसलमान व्यक्ति के लिए यह जायज नहीं है कि वह अपने मुसलमान भाई से कोई बात सुन कर उसके बारे में बदगुमानी करे जबकि इस बात का कोई नेक महमल निकल सकता हो और सुफियान ने कहा: गुमान की दो किस्में हैं: एक वह गुमान है जिसमें गुनाह है और एक वह गुमान है जिसमें गुनाह नहीं है, जिस गुमान में गुनाह है यह वह गुमान है जिसके अनुकूल बात किया जाए और जिसमें गुनाह नहीं है यह वह गुमान है जिसके अनुकूल बात ना किया जाएl (अल तम्हीद, दारुल क़ुतुब अल इल्मिया, बैरुत, मनकूल अज़ तिब्यानुल कुरआन)
इमाम मोहम्मद इब्ने मोहम्मद गज्ज़ाली लिखते हैं:
शैतान आदमी के दिल में बदगुमानी डालता है तो मुसलमान को चाहिए कि वह शैतान की तस्दीक ना करे यहाँ तक कि अगर किसी के मुंह से शराब की बू आ रही हो तो फिर भी उस पर हद लगाना जायज नहीं क्योंकि हो सकता है उसने शराब का एक घूंट पी कर कुल्ली कर दी हो या किसी ने उसको जबरदस्ती शराब पिला दी हो और इसका ऐहतेमाल है, तो वह दिल के खून को, उसके माल को और उसके बारे में बदगुमानी को हराम कर दिया है, इसलिए जब तक वह स्वयं किसी चीज का मुशाहेदा ना करे या उस पर दो नेक गवाह कायम ना हो जाएं उस समय तक मुसलमान के बारे में बदगुमानी जायज नहीं है और जब इस तरह ना हो और शैतान तुम्हारे दिल में किसी मुसलमान के बारे में बदगुमानी का वसवसा डाले तो तुम इस वसवसे को दूर करो और इस पर जमे रहो कि उसका हाल तुमसे छुपा है और उस व्यक्ति के हक़ में नेक पर कायम रहने और गुनाह से बाज़ रहने की दुआ करो और शैतान को नाकाम और नामुराद करके उसे गुस्से में लाओl (अहयाउल उलूम, दारुल कुतुबुल इल्मिया, बैरुत, मनकुल अज़ तिब्यानुल कुरआन)
अल्लामा बदरुद्दीन महमूद बिन अहमद ऐनी हनफ़ी लिखते हैं:
जो गुमान निषेध है वह यह है कि अल्लाह पाक और नेक मुसलमानों के बारे में बुरा गुमान किया जाए और जिस गुमान के करने का हुक्म दिया गया है वह यह है कि जिस आदेश के अधिग्रहण का कतई तर्क उपलब्ध ना हो और किसी मामले में इस पर हुक्म लागू करना उद्देश्य हो तो इस मामले में ग़ालिब गुमान पर अमल करके आदेश लागू करना वाजिब है, जिस प्रकार हम पर वाजिब है कि हम नेक मुसलमानों की शहादत कुबूल करें (और उनका नेक होना ग़ालिब गुमान से पता चलेगा) और जंगल में गौर व फ़िक्र करके ग़ालिब गुमान से किबले की दिशा मालुम करना, इसी प्रकार अगर किसी महरम ने किसी जानवर का शिकार करके उसको हालाक कर दिया और शरीअत में उस जानवर की मात्रा और मूल्य निश्चित नहीं है तो उसका फिरौती अदा करने के लिए ग़ालिब गुमान से उसकी कीमत को निश्चित करनाl इस प्रकार की मिसालों में हमें ग़ालिब गुमान के तकाज़े पर अमल करने का आदेश दिया गया है, और जो गुमान मुबाह है वह यह है कि जब इमाम को रिकातों की संख्या में शक पड़ जाए तो वह गौर व फ़िक्र करे और जितनी संख्या पर ग़ालिब गुमान हो उस पर अम्ल करे, हालांकि दोबारा नमाज़ पढ़ना उचित है और जो गुमान मुस्तहब है वह यह है कि अपने मुसलमान भाई के बारे में नेक गुमान करे, चाहे लोग उसको बिना दलील बुरा कह रहे होंl (उमदतुल कारी, दारुल कुतुबुल इल्मिया, बैरुत, तिब्यानुल कुरआन सुरह हुजरात आयत १२ के हवाले के साथ)
अच्छे गुमान के अनेकों लाभ हैंl इससे अच्छे फ़िक्र की तामीर, साकारात्मक विचारों को बढ़ावा और समाज से जंग व जिदाल का खात्मा हो जाता हैl अच्छे गुमान से बातिनी व कलबी बीमारियों का इलाज होता हैl आपसी विवादों और मतभेदों का अंत होता हैl दिल व दिमाग को सुकून मिलता हैl इस प्रकार अच्छे गुमान के माध्यम से एक नेक और सालेह समाज का गठन किया जा सकता हैl


URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/kaniz-fatma,-new-age-islam/decent-worldview-is-indispensable-for-harmony,-reconciliation-and-unity--حسن-ظن-ہم-آہنگی-،-مصالحت-اور-اتحاد-کے-لیے-ناگزیر/d/117636


URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/kaniz-fatma,-new-age-islam/decent-worldview-is-indispensable-for-harmony,-reconciliation-and-unity--अच्छा-गुमान-सद्भाव,-सुलह-और-एकता-के-लिए-अपरिहार्य-है/d/117716


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TOTAL COMMENTS:-   1


  • The problems is that the beautiful teachings of Islam are in books and not in practice. 
    Our Muslim community wastes their time in unnecessary matters and do not try to practice the beautiful teachings. 
    Some do not know the beautiful teachings and some who know them do not practice them. 
    At least we should try to practice good teachings in which decent worldview is a part. 

    By Ghulam Ghaus Siddiqi غلام غوث الصديقي - 2/12/2019 4:03:33 AM



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