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Hindi Section (24 Sep 2018 NewAgeIslam.Com)


Defeating Islamism and Jihadism जेनेवा में सुलतान शाहीन का खिताब: इस्लामिज्म और जिहादिज्म की हार के लिए अमन व शांति, सहअस्तित्व और लैंगिक न्याय पर आधारित इस्लामिक थियोलौजी का गठन आवश्यक

 

 

सुलातान शाहीन, फाउन्डिंग एडीटर, न्यू एज इस्लाम

14 सितंबर 2018

तकरीरी बयान, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद, जेनेवा का 39 वां रेगुलर सेशनl (आयोजित 10 से 28 सितंबर 2018)

जनरल डिबेट, आइटम नंबर 3, विकास के अधिकार सहित शहरी, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक जैसे सभी अधिकारों का बढ़ावा और इनकी सुरक्षा

सुलतान शाहीन, फाउन्डिंग एडीटर न्यू एज इस्लाम

प्रेषक एशियन यूरेशियन मानवाधिकार मंच

आदरणीय अध्यक्ष महोदय,

आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए 17 वर्ष हो चुके हैं लेकिन अब तक हम इस्लाम के नाम पर होने वाले आतंकवाद को मात देने में असफल रहे हैंl जिहादी और इस्लामिस्ट संगठन अब भी मुस्लिम युवाओं को अपनी चपेट में ले रही हैंl और इसका कारण यह है कि विश्व स्तर पर इस्लामिज्म के सिद्धांतों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया हैl

बहुसंख्य मुसलमान इस्लाम को अनंत मोक्ष का स्रोत मानते हैंl इस्लाम का उद्देश्य शांति को स्थापित करना है, सद्भाव पैदा करना है, सहअस्तित्व की राहें हमवार कराना है और समाज का सुधार करना हैl विभिन्न एतेहासिक मोहरिकात के आधार पर इस्लामी थियोलौजी जो कि आठवीं और नौवीं शताब्दी में तैयार की गई है, इसमें इस्लाम को तफ़व्वुक़ परस्ती, अजनबियों से बेज़ारी, असहिष्णुता और लैंगिक भेद भाव पर आधारित एक राजनीतिक और बेबाक सिद्धांत के तौर पर पेश किया गयाl मदरसों में हिंसा, अलगाववाद और दुनिया को पराजित करने पर आधारित फिकही शिक्षाएं दी जाती हैं और इसी से इस्लाम परस्ती के रुझान को बल मिलता हैl लेकिन समान रूप से, शांतिपूर्ण मुसलामानों और गैर मुस्लिमों के खिलाफ इस्लामिज्म के हिंसा के बावजूद उम्मत का ध्यान एक जवाबी बयानिया तैयार करने पर केन्द्रित नहीं हुआl

यह बात अब अपरिहार्य हो चुकी है कि जिन मुस्लिम देशों ने यू एन चार्टर पर हस्ताक्षर किए हैं वह त्वरित रूप से इस समस्या की ओर आकर्षित हों और अमन, बहुलतावाद और न्याय पर आधारित नई थियोलौजी तैयार करने की ओर कदम बढ़ाएंl पहले मोरक्को और अब सऊदी अरब जैसे विभिन्न देश इस तरफ कदम आगे बढ़ाते हुए मालुम पड़ते हैं जबकि जिस देश ने इस संबंध में ठोस कार्यवाही किए हैं वह तुर्की हैl एक दशक तक लगातार प्रयास के बाद सौ तुर्की उलेमा ने दस हज़ार में से मुस्तनद हदीसों की संख्या सोलह सौ निर्धारित की है, इनमें से हर एक हदीस का संदर्भ निर्धारित किया है और इनकी उचित व्याख्या भी उन्होंने पेश की हैl और यह किताब तुर्की की सभी मस्जिदों को भेजी गई है, और मुझे उम्मीद है कि यह किताब विश्व स्तर पर मुस्लिम उम्मत को उनकी भाषाओं में जल्द ही प्रदान कर दी जाएगीl

वर्तमान इस्लामी थियोलौजी आज इक्कीसवीं शताब्दी के मिश्रित और बहुलतावादी समाज में जीवन की आवश्यकताओं के साथ संगत नहीं हैl दक्षिण एशियाई उपमहाद्वीप के एक शायर और विचारक अल्लामा इकबाल ने लगभग एक सौ साल पहले ही इस्लाम में धार्मिक विचार और सिद्धांत के नव निर्माण की दावत दी थीl अब हमें उन पत्रों पर काम प्रारम्भ कर देना चाहिएl

लेकिन सबसे पहले हमें यह समझना आवश्यक है कि वर्तमान स्थिति के कारण क्या क्या हैंl ऐसा क्यों है कि हमारे बीच उपस्थित उलेमा यद्यपि सशस्त्र जिहादियों की हिमायत नहीं करते, लेकिन उनकी इन हैबतनाक तबाहियों के बावजूद जिनमें खुद हज़ारों मुसलामानों की जानें गईं हैं, सहिष्णु हो चुके हैं, 9/11 जैसे दुर्घटनाओं और यूरोप और नार्थ अमेरिका के विभिन्न शहरों में हिंसा और आतंकवादी कार्यवाहियों की तो बात ही छोड़ियेl

तथाकथित “इस्लामी रियासत” जो कि अपनी क्रूर और बर्बर कार्यवाहियों को डरावने अंदाज़ में ब्राडकास्ट करने के लिए प्रसिद्ध है, ईराक और सीरिया के क्षेत्रों से इसका वर्चस्व तो समाप्त हो चुका है लेकिन अफ्रिका और साउथ एशिया में इसके विचार प्रबल होते हुए दिखाई पड़ रहे हैंl हालांकि अलकायदा पराजित हो चुका है लेकिन अभी समाप्त नहीं हुआ; यह अब भी मुस्लिम युवकों के विभिन्न वर्गों को सैद्धांतिक रूप से प्रभावित कर रहा हैl तालिबान कि जिसने अफगानिस्तान में अलकायदा को जन्म दिया है, फिर से अपना सिर उभार रहा है और धीरे धीरे विश्व समुदाय अब यह मानने को तैयार हो चुका है कि काबुल के सरकारी प्रबंधन में उनका भी इख़तियार होना चाहिए जहां से उन्हें 9/11 हादसे के बाद 2011 में बेदखल कर दिया गया थाl

पाकिस्तान में लश्कर ए तय्यबा और जैश ए मुहम्मद, अफ्रिका में बोको हराम और अल शबाब और इंडोनेशिया में अल जमाअतुल इस्लामिया जैसी आतंकवादी संगठन विश्व स्तर पर अपनी जड़ें मजबूत कर रही हैंl

अध्यक्ष महोदय,

हो सकता है 9/11 से ही विश्व समुदाय इस्लामी आतंकवाद के मामलों में लिप्त हो, लेकिन यह बुनियादी तौर पर इस्लाम के अन्दर सैद्धांतिक युद्ध है जो शताब्दियों से चल रही हैl अल्लाह और उसके पैगम्बर दोनों की चाह यह है कि मुसलमान उदारवादी, इंसाफ़ परस्त संतुलित उम्मत बन जाएंl कुरआन की आयत 2:143 में अल्लाह ने इस उम्मत को उम्मते वुस्ता कहा हैl कुरआन ए करीम की कई आयतें और विभिन्न हदीसों में मुसलामानों को कभी भी आतंकवाद का रास्ता विकल्प ना करने का आदेश दिया गया, यहाँ तक कि नमाज़ और रोज़ा जैसी मज़हबी फ़राइज़ की अदायगी में भी नहींl बल्कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ख़ास तौर पर उन लोगों के हक़ में अपने गुस्से का इज़हार फरमाया जिन्होंने पुरे दिन और पूरी रात नमाज़ अदा करने, लगातार पुरे हफ्ते रोज़ा रखने, शादी से बचने और अपनी शहवत को कंट्रोल करने और बिस्तर पर सोने से बचने के लिए गोश्त से परहेज़ करने की ख्वाहिश ज़ाहिर कीl

और 632 (ईसवी) में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफात के तुरंत बाद ही अतिवादियों ने उभरना शुरू कर दिया और उन्होंने स्वयं ही यह निर्णय करना भी शुरू कर दिया कि कौन मुसलमान है और कौन मुर्तद और कौन मुशरिक कौन और काफिर कौन? यहाँ तक कि उन्होंने अभिमान करके काफिरों और गुस्ताखों को सज़ा देना और क़त्ल करना भी शुरू कर दियाl ऐसा करने वाला पहला गिरोह ख्वारिज का था उन्होंने चौथे खलीफा हज़रत अली (रज़ीअल्लाहु अन्हु) समेत हज़ारों मुसलामानों को क़त्ल किया, आज इस्लाम के सभी फिरकों से संबंध रखने वाली धार्मिक किताबों में ऐसी हज़ारों बुनियादें बयान की गई हैं जिनकी बिना पर एक मुसलमान को काफिर, मुशरिक या मुर्तद करार दिया जा सकता है और उसे मौत की सज़ा दी जा सकती हैl

यह विचारधारा व्यक्तिगत तौर पर उन मुसलामानों को भी सशक्त बनाती हैं जो उन मुसलामानों के साथ न्याय करना चाहते हैं जिनके बारे में उन्हें लगता है कि उन्होंने कुफ्र या गुस्ताखी का प्रतिबद्ध किया हैl खुदाई न्याय जो कि कयामत के दिन खुदा की तरफ से किया जाना था उसका प्रारम्भ इसी दुनिया में वह लोग कर रहे हैं जिन्हें ‘अम्र बिल मारुफ़ और नही अनिल मुनकर’ जैसे इलाही हुक्म के मजाज़ होने जैसे बुनियाद परस्त विचारधारा के माध्यम से ब्रेनवाश किया गया हैl

कुरआन, हदीस और क्लासिकी फिकह सब इस बात पर एकमत हैं कि इस्लाम में इस्लामी रियासत की कोई कल्पना नहीं है, जबकि केवल रियासत का एक जायज़ हुक्मरान ही किसी भी प्रकार के हिंसा का फैसला ले सकता है चाहे वह किसी दूसरी रियासत से जंग की स्थिति में हो चाहे वह किसी व्यक्ति के खिलाफ हो न्याय करने के लिएl क्लासिकी फिकह में किसी भी व्यक्ति को या किसी भी जमात को अपनी मर्ज़ी से किसी भी प्रकार के हिंसा का कोई विकल्प नहीं हैl लेकिन आज उम्मत इस्लाम के नाम पर विभिन्न शक्लों में हिंसा के हवाले से सहिष्णुता का प्रदर्शन कर रही हैl एक आतंकवादी अपने काम के वैधता में कुरआन या हदीस से कोई उद्धरण हवाले के तौर पर पेश कर देता है, जिसका घटना के संदर्भ से कोई संबंध नहीं होता, और बस इसकी ज़लील हरकत माफ़ कर दी जाती हैl आखिर कार उसामा बिन लादेन पर कभी भी इर्तेदाद और गुस्ताखी का फतवा नहीं लगाया गया, जबकि हिन्दुस्तान के सर सैयद अहमद खान (1817-1898) जैसे प्रसिद्ध मज़हबी इस्लाह पसंदों पर हिन्दुस्तान के देवबंदी उलेमा और यहाँ तक कि मक्का में खाना ए काबा के मुतवल्ली ने भी कुफ्र व इर्तेदाद के सैंकड़ों फतवे जारी किएl इसमें कोई शक नहीं है कि मुस्लिम देशों के विभिन्न क्षेत्रों में मतभेद रखने वालों और सुधारवादियों को कुछ लोग और जमाअतें अब भी क़त्ल कर रही हैंl तथाकथित इस्लामी रियासत के मुखिया अल बगदादी के इस बयान का कि “इस्लाम कभी एक दिन के लिए भी अमन का मज़हब नहीं रहा है”, पुरे दुनिया के मुस्लिम उलेमा ने एक सन्नाटेदार खामोशी के साथ स्वागत कियाl

अध्यक्ष महोदय

इस बढ़ती हुई इस्लामिज्म की अतिवाद के हवाले से सर्द मेहरी इस हद तक बढ़ चुकी है कि कुछ उच्च शिक्षा प्राप्त मुस्लिम अब यह कहते हुए दिखाई दे रहे हैं कि, “क्या हुआ अगर एक साल के अन्दर 86 देशों से तीस हज़ार मुसलामानों ने इस्लामी रियासत में शमूलियत इख्तियार की? 1.7 बिलियन लोगों की बिरादरी में उनकी प्रतिशत कितनी है?! इतनी छोटी और सीमित संख्या को बढ़ती हुई अतिवाद के सबूत के तौर पर कैसे पेश किया जा सकता है?” अकल हैरान है कि ऐसे विचारकों और बुद्धिजीवियों को कैसे जवाब दिया जाएl वास्तविकता यह है कि अगर एक मुसलमान को यह ;लगता है कि एक इंसानी बम की शक्ल में मस्जिद के अन्दर जाने और खुद को और दुसरे मुसलामानों को नमाज़ के दौरान धमाके से उड़ा देने पर खुदाई इनाम हासिल होगा, तो उम्मत के लिए यह अवश्य चिंता का क्षण है कि हमारे मज़हब में ऐसा क्या है जिसकी आड़ में आतंकवादी संगठन इस तरह के घिनावने अपराध का प्रतिबद्ध करने के लिए तैयार हो जाते हैं, क्या ऐसा करके वह जन्नत में दाखिल हो जाएंगेl उम्मत के लिए यह निश्चित रूप से गौर का मुकाम हैl उम्मत को सोचना चाहिए कि हिंसा में नुमाया इज़ाफा होता जा रहा है, यहाँ तक कि आतंकवादी अपराधों के सैंकड़ों घटनाओं के बावजूद भी हम बे हिसी की ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं, प्रतिदिन दुनिया के किसी ना किसी हिस्से से आतंकवाद की घटनाओं की सुचना मिलती है लेकिन हमें इसकी फ़िक्र कहाँ, हमें तो बेहिस ही बने रहना है!!

जिस व्यक्ति ने पाकिस्तानी पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर को तौहीने रिसालत की आरोपी एक ईसाई महिला के लिए हमदर्दी पर क़त्ल किया उसे एक वली का दर्जा दे दियाl उसकी फांसी के बाद पाकिस्तान के सूफी बरेलवियों ने उसके नाम पर एक दरगाह निर्माण किया है जहां हज़ारों लोग प्रतिदिन हाज़री देते हैं और दुनिया और आख़िरत में सफलता प्राप्त करने के लिए अल्लाह की बारगाह में उस क्रूर हत्यारे का वसीला पेश करते हैंl

मज़हब के नाम पर अंजाम दिए जाने वाले इन अपराधों को सम्मान की निगाह से देखने की बुनियाद क्या है? इस्लाम के नाम पर अंजाम दिए जाने वाले अपराधों को बिना सोचे समझे स्वीकार कर लिए जाने और उनके हवाले से उपेक्षा बरतने की असल वजह क्या है? ऐसा मालुम होता है कि मुसलमानों ने पैगम्बरे इस्लाम मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफात के दो सौ साल के बाद तुरंत ही नौवीं सदी ईसवी में मोतज़ेला की हार के बाद से ही सोचने समझने और विचार करने का सिलसिला बंद कर दिया हैl उलेमा ने मुसलमानों को इज्तिहाद का दरवाज़ा बंद करने के लिए कहा जो कि इस्लाम के अन्दर रचनात्मक सोच का एक बुनियादी सिद्धांत है, और उन्होंने ऐसा ही कियाl इज्तिहाद का सिलसिला दुसरे खलीफा हज़रत उमर रज़ीअल्लाहु अन्हु के ज़माने से चला आ रहा है जिन्होंने पैगम्बरे इस्लाम मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफात के दो साल बाद खिलाफत के तख़्त पर जगह लीl

अध्यक्ष महोदय,

इज्तिहाद का दरवाज़ा बंद हो जाने के बाद भी उम्मत के एक बड़े वर्ग की मंजूरी के बिना ही व्यक्तिगत तौर पर इज्तिहाद का सिलसिला जारी रहाl दीन के अन्दर उम्मत के लिए कोई नई बात उसी समय स्वीकार योग्य होती है जब उलेमा उसे स्वीकार कर लेंl उदाहरण के तौर पर हज पर जाने के लिए चित्र का प्रयोग, तिलावत ए कुरआन के लिए लाउडस्पीकर या रेडियो का प्रयोग या दावती और तबलीगी उद्देश्यों के लिए इंटरनेट का प्रयोगl इसलिए ऐसा मालुम होता है कि एक लंबे और कष्टपूर्ण बहस के बाद हमारे उलेमा के अन्दर कुछ बौद्धिक चेतना जागृत हुई हैl मालुम होता है कि हमारे उलेमा के ज़ेहन के दरीचे को खुलने में जितना समय लगता है वह भी थोड़ा होता जा रहा हैl उस्मानिया खिलाफत के उलेमा को यूरोप से प्रिंटिंग प्रेस की आयात की अनुमति देने में लगभग चार सदियाँ लग गईं लेकिन उन्हें पासपोर्ट साइज़ फोटो ग्राफ, लाउडस्पीकर, रेडियो, टीवी और इंटरनेट की अनुमति देने में केवल कुछ दशक ही लगींl

हमें यह समझने में कोई दुश्वारी नहीं होनी चाहिए कि क्यों इस्लामी दुनिया अज्ञानता की घटाटोप अंधियारे में डूबी हुई है जबकि दुनिया पूरी तेज़ी के साथ तरक्की के मरहले तै कर रही हैl एक सीरियाई शायर अली अहमद सईद अदोनिस (1930 ईसवी) ने इसे “विलुप्तता का एक दौर करार दिया है, इस अर्थ में कि दुनिया से रचनात्मक सोच विलुप्त हो चुकी हैl” त्युनिस के विचारक अब्दुल वहाब अल मुवद्दब (1946-2014) ने यह भविष्यवाणी की कि “इस्लामी अकीदों के फ्रेमवर्क में जकड़ी हुई अरब सभ्यता एक बड़े मुर्दा सभ्यता में परिवर्तित हो जाएगीl” अल मुवद्दब इस्लामी अकीदों की किन रुकावटों की बात कर रहे हैं? क्या आप यह गुमान कर सकते हैं कि सदियों तक पुरी इंसानी आबादी के एक तिहाई भाग पर हुकूमत करने वाली खिलाफत ए उस्मानिया (1517-1924) ने कुरआन व हदीस के विज्ञापन और प्रकाशन की ग़रज़ से भी प्रिंटिंग प्रेस की आयात पर पाबंदी लगा दी थी, और इसकी वजह यह थी कि मज़हबी उलेमा को यह लगा कि हर नई इजाद शैतान का काम हैl शायद हमारे मज़हबी उलेमा को यह ख्याल गुजरा हो कि अल्लाह ने मज़हब ए इस्लाम को नाज़िल करने के बाद अपनी रचनात्मक क्षमता को खो दिया है और अब केवल शैतान ही कोई नई चीज आविष्कार कर सकता हैl असल में हमारे उलेमा का तो ख़याल यह है कि कुरआन भी अल्लाह की मखलूक नहीं है बल्कि यह गैर मखलूक और अबदी व अजली (हमेशा रहने वाली) है और लौहे महफूज़ में हमेशा हमेशा के लिए मौजूद हैl अल्लाह ने केवल पहले से मौजूद कुरआन को पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के वसीले से सातवीं शताब्दी ईसवी में इंसानियत के उपर नाज़िल कियाl खल्के कुरआन का मसला एक मार्कतुल आरा मसला है जिसकी वजह से आठवीं और नौवीं शताब्दी के उलेमा के बीच एक जबरदस्त विवाद पैदा हुआ, जिसके परिणाम स्वरूप मोतज़ेली उलेमा को हार हुईl मोतजलियों ने यह कहा कि कुरआन को एक ख़ास समय में अल्लाह ने बनाया है, और यह कुरआन मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बेसत के बाद सातवीं सदी के प्रारम्भिक अरब दौर में बदलते हुए हालात के अन्दर मुसलामानों और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की राहनुमाई के लिए समय समय पर नाज़िल होने वाली आयतों का मजमुआ हैl इसलिए बहुत सारी ऐसी आयतें हैं जो एक ख़ास संदर्भ के साथ विशेष हैं और उनका इन्तेबाक दुसरे संदर्भ में नहीं किया जा सकताl लेकिन रुढ़िवादी और लफ्ज़ परस्त उलेमा ने इसे स्वीकार नहीं कियाl उन्होंने कहा कि कुरआन भी ख़ुदा की तरह अद्वितीय है और उसी की तरह हमेशा रहने वाला है, अल्लाह ने कुरआन को केवल नाज़िल किया है, बदलते हालात के मांग के मद्देनजर इसकी रचना नहीं की, और इसका लाभ यह है कि इसकी सारी आयतें हमेशा हमेशा के लिए लागू किए जाने के काबिल हैंl

यहाँ तक कि इमाम अबुल हसन अल अशअरी जो कि एक मोतज़ली रह चुके थे, उन्होंने चालीस साल की आयु में रुढ़िवादियों का ख़ेमा इख्तियार कर लिया, हालांकि उन्होंने अपने दावे की ताईद (समर्थन) के लिए मोतज़ेला का ही तर्क का तरीका जारी रखाl लेकिन लफ्ज़ परस्त हम्बली मकतबे फ़िक्र में स्वयं अपने ही दावे की ताईद व तौसीक के लिए बुद्धी व तर्क के प्रयोग की अनुमति नहीं थीl इसलिए मोतज़ेला के सख्त विरोधी हम्बलियों और अशअरियों ने अपना अपना एक अलग मसलक तैयार कर लियाl

कुरआन के गैर मखलूक होने का मतलब यह था कि कुरआन में वह सभी घटनाएं व हालात जिनकी वजह से सातवीं सदी के प्रारम्भिक दौर के अरब में पैगम्बरे इस्लाम और उनके सहाबा की दीनी और तबलीगी संघर्ष में राहनुमाई के लिए नाज़िल हुआ, वह पहले से निर्धारित थे और पहले से इन स्थितियों व घटनाओं की योजना इस लिए थी ताकि नुज़ूले कुरआन के मौके पैदा हो सकेंl इस का अर्थ यह भी था कि जिन्होंने पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मदद व नुसरत की उनका काम ही यही था और जिन्होंने जी जान से पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का विरोध किया यहाँ तक कि वह आप के क़त्ल के भी दर पे हुए, वह केवल अल्लाह के हुक्म की मर्जी पूरी कर रहे थेl और किस तरह पहले से ही मौजूद कोई कुरआन नाज़िल किया जा सकता है?

इस्लाम की इस समझ से यह भी लाभ हासिल होता है कि दुनिया में जो कुछ भी भला या बुरा होता है वह पहले से ही भाग्य हैl मोतज़ेली उलेमा का यह एतेराज़ था कि जब ऐसा है तो सवाब व अज़ाब का क्या मतलब? अगर कोई खुदा लोगों को उन्हीं कामों की सज़ा देने लगे जो वह खुद चाहता है कि लोग करें तो फिर खुदा मुंसफ (न्यायाधीश), मेहरबान और रहमान (रहम करने वाला) कैसे हुआ? दीन के मामले में बुद्धी व तर्क का विरोद करने वाले हम्बली, अशअरी, मात्रीदी, ज़ाहेरी, मुजस्सिमी और मुहद्देसीन सभी ने यह कहा कि खुदा सर्वशक्तिमान है, जो चाहता है करता हैl उनका ख़याल है कि न्याय और नैतिकता के सिद्धांत खुदा पर लागू करना उसके इख्तियार को सीमित करने के बराबर होगा और ऐसा नहीं किया जा सकताl खुदा ना तो इंसाफ परवर है और ना ही बुद्धिमान और केवल कुदरत और अपनी मर्जी का मज़हर है, वह जो चाहता है करता हैl खुदा ब्रह्माण्ड का ऐसा पहला और केवल एक सबब पैदा करने वाला है जिसका कोई भी सबब पैदा करने वाला नहींl खुदा जब करना चाहे तो उसके किए ना कोई सबब पैदा करने वाला होता है और ना ही कोई हरकत देने वाला, बस उसकी मर्ज़ी होती है और वह जो करना चाहे कर गुज़रता हैl

8 वीं और 9 वीं शताब्दी (ईसवी) के अन्दर शोला बार फिकही बहस में दोनों पक्षों ने कुरआनी आयतों का हवाला पेश कियाl बुद्धी व तर्क का विरोध करने वाली जमात ने भी हदीसें (जिन्हें नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का कौल माना जाता है, हालांकि उन्हें आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के विसाल की तीन शताब्दियों के बाद जमा किया गया) का हवाला पेश कियाl और इन बहस में कुछ आयतें भी पेश की गई, जिन्हें इस तकरीरी बयान के आखिर में देखा जा सकता हैl)

बुद्धिवादी   जमात मोतज़ेला की हार और उनकी किताबों को जलाए जाने के डेढ़ सदियों के बाद इमाम गज्जाली (1058-1111) ने हम्बली, अशअरी और मात्रीदी मकातिबे फ़िक्र पर आधारित इज्माअ का इस्लामी उसूल इस अंदाज़ में पेश किया, और उन्होंने निम्नलिखित बात अल्लाह से मंसूब की:

“वह जहन्नम में हैं और मुझे कोई परवाह नहीं, और वह जन्नत में हैं, और मुझे कोई परवाह नहींl”

इस विचार का रद्द इब्ने रूश्द (1126-1198) ने अपनी प्रसिद्ध किताब “Incoherence of the Incoherence” में कियाl इसमें इमाम गज्जाली की किताब “थाफतुल फ्लास्फा” की बिंदु वार रद्द थीl लेकिन इब्ने रूश्द की किताबों को मुस्लिम स्पेन में (1195) में आग के हवाले कर दिया गया था और स्वयं उन्हें जिला वतन कर दिया गयाl उनकी कुछ किताबें केवल इस वजह से सुरक्षित रह गईं कि पहले ही उनका अनुवाद यूरोपियन भाषाओं में किया जा चुका था और उनके समर्थक भी पर्याप्त हो चुके थे, हालांकि उनके दृष्टिकोण की तरदीद 1270 और 1277 में कैथोलिक चर्च ने भी कीया थीl चर्च के विरोध के बावजूद ईसाई यूरोप में उनकी लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह “unity of the intellect” पर उनकी फ़िक्र बनी, जिसका मुद्दआ यह था कि सभी इंसानों की बुद्धी एक जैसी हैl जिसके परिणामस्वरूप यूरोप का पुनर्जागरण हुआ और मुस्लिम दुनिया ने स्वयं को अँधेरे में डाल दिया जिससे उभरना अभी बाकी हैl

अध्यक्ष महोदय,

कुरआन व हदीस की बुद्धी व तर्क की रौशनी में तफसीर व ताबीर करने की बजाए उसकी शाब्दिक फिकही सिद्धांत के तहत हिंसा, अजानिब बेज़ारी, असहिष्णुता और लैंगिक अन्याय ख़ास व आम में लोकप्रिय बन गईl बीसवीं शताब्दी में हसनुल बन्ना, सैयद क़ुतुब, सैयद अबुल आला मौदूदी, और बाद में अलकायदा और आइएसआइएस जैसी जमातों के विचारक इस मामले में क्लासिकी फुकहा से भी एक कदम आगे निकल गए जिन्होंने दीन की ऐसी ताबीर पेश की जिसमें इस दुनिया पर इस्लाम को विजेता करने की मुसलामानों की धार्मिक ज़िम्मेदारी के नाम पर भयानक और क्रूर आतंकवाद का औचित्य निकाला जाएl आज गैर मुस्लिमों की बहुसंख्या वाले पश्चिमी देशों की भी मस्जिदों में इमाम गैर मुस्लिमों पर लान तान करते हैं और अपने जुमे के ख़ुतबों में उनकी हार और इस्लाम की जीत के लिए दुआ के करते हैंl 7 वीं शताब्दी ईसवी की युद्ध की स्थिति वाली अरबी मानसिकता अब भी ज़िंदा हैl

कलासिकी फिकह में रियासत के हुक्म पर जिहाद या किताल को फर्ज ए किफाया माना जाता था, अर्थात यह एक मज़हबी जिम्मेदारी थी कि जिसे उम्मत के कुछ लोगों ने अगर अपनी ख़ुशी से अदा कर दीया तो दुसरे सारे लोग भी इस ज़िम्मेदारी से बरी हो गएl और खारजी हमले की स्थिति में देश के बचाव के लिए इसे फर्ज ए ऐन माना गया था, अर्थात यह हर क्षमता रखने वाले मुस्लिम पर व्यक्तिगत रूप से एक मज़हबी फरीज़ा थाl लेकिन इसमें भी सिद्धांत और निर्देश और एक रियासत की जरूरत थीl लेकिन आधुनिक इस्लामी सिद्धांत निर्माताओं ने आक्रामक जिहाद या दुसरे शब्दों में आतंकवाद को सभी मुस्लिमों के लिए फर्ज ए ऐन करार दिया है, यहाँ तक कि उन्होंने इस तरह की जंग के हुक्म के लिए एक जायज मुस्लिम रियासत की जरूरत को भी खत्म कर दियाl

इस्लामी फिकह और अकीदों की किताबों का प्रयोग लगभग हर तरह के मौकों के समर्थन के लिए किया जा सकता है, यहाँ तक कि इनका प्रयोग ऐसे सिद्धांतों की भी ताईद व तौसीक के लिए किया जा सकता है जो परस्पर एक दुसरे से विरोधात्मक हों, जैसा कि हमने उपर मोतज़ेला, हम्बली और अशअरियों के बीच बहस व तम्हीस में देखा हैl और ऐसे अवाम उन बातों को स्वीकार कर लेते हैं जिन्हें सदियों से यही बताया जा रहा हो कि केवल गौर व फ़िक्र करना ही कुफ्र या इर्तेदाद है (अल फिक्रू कुफ्र)l

जैसा कि हमने उपरोक्त में मोतज़ेला की तरफ से पेश किए गए कुरआनी उद्धरण में यह अवलोकन किया कि अल्लाह मुसलामानों को बार बार गौर व फ़िक्र करने, अवलोकन करने और सीखने आदि का आदेश देता हैl कुछ जगहों पर अल्लाह नाराज़गी का इज़हार फरमाते हुए मुसलामानों से यह कहता है कि तुम गौर क्यों नहीं करते? जैसे इस आयत को देखें-

“बेशक सब जानवरों में बदतर अल्लाह के नज़दीक वह हैं जो बहरे गूंगे हैं जिनको बुद्धी नहीं” (8:22)

और यहाँ हम हैं कि उम्मत की हैसियत से एक हज़ार साल से यह मानते चले आ रहे हैं कि केवल गौर व फ़िक्र करना ज़ाते वह्दहू ला शरीक का इनकार करने के बराबर हैl आज हम इस जगह पर इसलिए हैं कि बड़े पैमाने पर हम ने हिंसा और अलगाववाद की ओर ले जाने वाली अल फिक्रू कुफ्र की प्रचलित फिकह को स्वीकार कर लिया हैl अंधी तकलीद नौवीं शताब्दी से ही हमारा सिद्धांत रहा हैl असल में वह सलफी वहाबी जो स्वयं को गैर मुकल्लिद कहते हैं वह भी फिकह हम्बली, इब्ने तैमिया और मुहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब के फिकही सिद्धांतों की अंधी तकलीद करते हैंl

अध्यक्ष महोदय, मुझे उम्मीद है कि संयुक्त राष्ट्र के चार्टर पर हस्ताक्षर करने वाले सभी मुस्लिम देश आतंकवाद के समस्या को गंभीरता से लेंगे, इज्माअ की हमारी मौजूदा तकलीदी फिकह से उसके संबंधों को समझेंगे और अमन, बहुलतावाद और लैंगिक न्याय पर आधारित नई इज्तेहादी थियोलौजी तैयार करने में गंभीरता से कोशिश करेंगे और मदरसों के पाठ्यक्रम की नवीकरण भी करेंगेl नई थियोलौजी और अधिक बुद्धिवादी, एक दुसरे से जुड़ी हुई और आंतरिक रूप में संगत होनी चाहिए जिस पर क्रमशः विश्व मुस्लिम समुदाय का इज्माअ स्थापित हो सकेl

धन्यवाद, अध्यक्ष महोदय l

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परिशिष्ट 1

मोतज़ेला का एक उचित और न्यायपूर्ण खुदा की कल्पना और बुद्धी व तर्क की हौसला अफजाई कुरआन की निम्नलिखित आयतों और इस जैसी दूसरी आयतों से साबित होती है:

“इसमें शक़ नहीं कि ज़मीन पर चलने वाले तमाम हैवानात से बदतर ख़ुदा के नज़दीक वह बहरे गूँगे हैं जो कुछ नहीं समझतेl” (8:22)

कुरआन अपनी आयतों को “उस कौम पर स्पष्ट करता है जो गौर व फ़िक्र करती है, और उस कौम को तंबीह करता है जो अकल व समझ का प्रयोग नहीं करती”l (जैसे कि सुरह बकरा की आयत 2:164, सुरह मायदा की आयत 5:58 सुरह अल राअद की आयत 13:4, सुरह नहल की आयत 16:12, और सुरह मरियम की आयत 19:93-95, का अध्ययन किया जाए)

“और किसी जान की ताकत नहीं कि ईमान ले आए मगर अल्लाह के हुक्म से और अज़ाब उन पर डालना है जिन्हें अकल नहीं”l (10:100)

“(इन सब बातों में) अक्ल वालों के लिए बड़ी बड़ी निशानियाँ हैंl” (2:164)

“(ऐ रसूल) किताब (कुरान) जो हमने तुम्हारे पास नाज़िल की है (बड़ी) बरकत वाली है ताकि लोग इसकी आयतों में ग़ौर करें और ताकि अक्ल वाले नसीहत हासिल करेंl” (38:29)

“और हमने मूसा को अपनी निशानियाँ देकर भेजा (और ये हुक्म दिया) कि अपनी क़ौम को (कुफ्र की) तारिकियों से (ईमान की) रौशनी में निकाल लाओ और उन्हें ख़ुदा के (वह) दिन याद दिलाओ (जिनमें ख़ुदा की बड़ी बड़ी कुदरतें ज़ाहिर हुई) इसमें शक़ नहीं इसमें तमाम सब्र शुक्र करने वालों के वास्ते (कुदरते ख़ुदा की) बहुत सी निशानियाँ हैंl” (14:5)

“हमने यक़ीनन अपने पैग़म्बरों को वाज़े व रौशन मोजिज़े देकर भेजा और उनके साथ किताब और (इन्साफ़ की) तराज़ू नाज़िल किया ताकि लोग इन्साफ़ पर क़ायम रहे और हम ही ने लोहे को नाज़िल किया जिसके ज़रिए से सख्त लड़ाई और लोगों के बहुत से नफे (की बातें) हैं और ताकि ख़ुदा देख ले कि बेदेखे भाले ख़ुदा और उसके रसूलों की कौन मदद करता है बेशक ख़ुदा बहुत ज़बरदस्त ग़ालिब हैl” (57:25)

“और (ऐ रसूल) हमने तो तुमको सारे दुनिया जहाँन के लोगों के हक़ में अज़सरतापा रहमत बनाकर भेजाl” (21:107)

“अलिफ़ लाम रा ऐ रसूल ये (क़ुरान वह) किताब है जिसकों हमने तुम्हारे पास इसलिए नाज़िल किया है कि तुम लोगों को परवरदिगार के हुक्म से तारीकी से रौशनी में निकाल लाओ ग़रज़ उसकी राह पर लाओ जो सब पर ग़ालिब और सज़ावार हम्द हैl” (14:1)

और बीच की राह ठीक अल्लाह तक है और कोई राह टेढ़ी है और चाहता तो तुम सबको राह पर लाता”l (16:9)

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परिशिष्ट 2

हनाब्ला, आशाएरा और मात्रिदिया के अकीदों के अनुसार अल्लाह पाक सर्वशक्तिमान है, स्वायत्त है, हर चीज उसके इरादे से जुहूर पज़ीर होती है, उसकी ज़ात अक्ल व न्याय के दायरे तक सीमित नहींl वह निम्नलिखित कुरआनी आयतों और इस जैसी दूसरी आयतों की रौशनी में उन अकीदों को साबित करते हैं (इसके अलावा वह बहुत सारे हदीसों को भी पेश करते हैं विशेषतः मुतवातिर हदीसें जिन्हें लगभग वही की तरह कतीअत का दर्जा हासिल है) मैं यहाँ हदीस को नक्ल नहीं कर रहा बल्कि बताना उद्देश्य है कि कुरआनी आयतों के अलावा हदीसों की एक लम्बी संख्या है जो अशाएरह, हनाब्ला और मात्रिदिया के पेश किए हुए अकीदों व सिद्धांतों को साबित करते हैं:

“और अगर ख़ुदा चाहता तो तुम सबको एक ही (किस्म के) गिरोह बना देता मगर वह तो जिसको चाहता है गुमराही में छोड़ देता है और जिसकी चाहता है हिदायत करता है और जो कुछ तुम लोग दुनिया में किया करते थे उसकी बाज़ पुर्स (पुछ गछ) तुमसे ज़रुर की जाएगी”l (16:93)

“तो ख़ुदा जिस शख़्श को राह रास्त दिखाना चाहता है उसके सीने को इस्लाम (की दौलत) के वास्ते (साफ़ और) कुशादा (चौड़ा) कर देता है और जिसको गुमराही की हालत में छोड़ना चाहता है उनके सीने को तंग दुश्वार ग़ुबार कर देता है गोया (कुबूल ईमान) उसके लिए आसमान पर चढ़ना है जो लोग ईमान नहीं लाते ख़ुदा उन पर बुराई को उसी तरह मुसल्लत कर देता है”l (6:125)

“ख़ुदा उन लोगों का सरपरस्त है जो ईमान ला चुके कि उन्हें (गुमराही की) तारीक़ियों से निकाल कर (हिदायत की) रौशनी में लाता है और जिन लोगों ने कुफ़्र इख्तेयार किया उनके सरपरस्त शैतान हैं कि उनको (ईमान की) रौशनी से निकाल कर (कुफ़्र की) तारीकियों में डाल देते हैं यही लोग तो जहन्नुमी हैं (और) यही उसमें हमेशा रहेंगे”l (2:257)

“(ऐ रसूल) ये चन्द बस्तियाँ हैं जिन के हालात हम तुमसे बयान करते हैं और इसमें तो शक़ ही नहीं कि उनके पैग़म्बर उनके पास वाजेए व रौशन मौजिज़े लेकर आए मगर ये लोग जिसके पहले झुठला चुके थे उस पर भला काहे को ईमान लाने वाले थे ख़ुदा यूं काफिरों के दिलों पर अलामत मुकर्रर कर देता है (कि ये ईमान न लाएँगें)”l (7:101)

“वह सब ग़ायब हो गयी और बाज़ उनमें के ऐसे भी हैं जो तुम्हारी (बातों की) तरफ कान लगाए रहते हैं और (उनकी हठ धर्मी इस हद को पहुँची है कि गोया हमने ख़ुद उनके दिलों पर परदे डाल दिए हैं और उनके कानों में बहरापन पैदा कर दिया है कि उसे समझ न सकें और अगर वह सारी (ख़ुदाई के) मौजिज़े भी देखे लें तब भी ईमान न लाएंगें यहाँ तक (हठ धर्मी पहुची) कि जब तुम्हारे पास तुम से उलझे हुए आ निकलते हैं तो कुफ्फ़ार (क़ुरान लेकर) कहा बैठे है (कि भला इसमें रखा ही क्या है) ये तो अगलों की कहानियों के सिवा कुछ भी नहीं”l (6:25)

“उनके दिलों पर और उनके कानों पर (नज़र करके) खुदा ने तसदीक़ कर दी है (कि ये ईमान न लाएँगे) और उनकी ऑंखों पर परदा (पड़ा हुआ) है और उन्हीं के लिए (बहुत) बड़ा अज़ाब है”l (2:7)

“उनके दिलों में मर्ज़ था ही अब खुदा ने उनके मर्ज़ को और बढ़ा दिया और चूँकि वह लोग झूठ बोला करते थे इसलिए उन पर तकलीफ देह अज़ाब है”l (2:10)

“ऐ शख्स क्या तू नहीं जानता कि सारे आसमान व ज़मीन (ग़रज़ दुनिया जहान) में ख़ास ख़ुदा की हुकूमत है जिसे चाहे अज़ाब करे और जिसे चाहे माफ़ कर दे और ख़ुदा तो हर चीज़ पर क़ादिर है”l (5:40)

“और नसरानी और यहूदी तो कहते हैं कि हम ही ख़ुदा के बेटे और उसके चहेते हैं (ऐ रसूल) उनसे तुम कह दो (कि अगर ऐसा है) तो फिर तुम्हें तुम्हारे गुनाहों की सज़ा क्यों देता है (तुम्हारा ख्याल लग़ो है) बल्कि तुम भी उसकी मख़लूक़ात से एक बशर हो ख़ुदा जिसे चाहेगा बख़ देगा और जिसको चाहेगा सज़ा देगा आसमान और ज़मीन और जो कुछ उन दोनों के दरमियान में है सब ख़ुदा ही का मुल्क है और सबको उसी की तरफ़ लौट कर जाना है”l (5:18)

“जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है (ग़रज़) सब कुछ खुदा ही का है और जो कुछ तुम्हारे दिलों में हे ख्वाह तुम उसको ज़ाहिर करो या उसे छिपाओ ख़ुदा तुमसे उसका हिसाब लेगा, फिर जिस को चाहे बख्श दे और जिस पर चाहे अज़ाब करे, और ख़ुदा हर चीज़ पर क़ादिर है”l (2:284)

“जो चाहता है करता है”l (85:16)

“जो लोग पक्की बात (कलमा तौहीद) पर (सदक़ दिल से ईमान ला चुके उनको ख़ुदा दुनिया की ज़िन्दगी में भी साबित क़दम रखता है और आख़िरत में भी साबित क़दम रखेगा (और) उन्हें सवाल व जवाब में कोई वक्त न होगा और सरकशों को ख़ुदा गुमराही में छोड़ देता है और ख़ुदा जो चाहता है करता है”l (14:27)

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