certifired_img

Books and Documents

Hindi Section (16 Jan 2019 NewAgeIslam.Com)


Early History of Islam Needs Fresh Appraisal — X मदनी, आज़ाद, मौदूदी और इनके अखलाफ ही इस्लामी सिद्धांतों के हामिल हैं



एम आमिर सरफ़राज़

११ दिसंबर, २०१८

अल्लामा इकबाल का मानना था कि उलेमा का वजूद इस्लाम के लिए हानिकारक हैl इसलिए, अबुल आला मौदूदी (वर्तमान खलीफा= सिराजुल हक़), हुसैन अहमद मदनी ( वर्तमान खलीफा= मौलाना फाज़िलुर्रह्माना) और शब्बीर अहमद उस्मानी (वर्तमान खलीफा= तकी उस्मानी या खादिम हुसैन रिज़वी) इत्यादि एक ही सिक्के के विभिन्न पहलु हैंl इनके लिए केवल दो प्रकार का इस्लाम ही स्वीकार्य योग्य है: एक वह इस्लाम जिसको आधार बना कर वह शासन करते हैं (थ्योरो क्रेसी) और दोसरा वह इस्लाम जिसे आधार बना कर वह मुस्लिम पर्सनल लॉ को कंट्रोल करते हैंl इकबाल (और जिनाह) एक अलग ही दृष्टिकोण रखते थे जिसके अनुसार सरकार लोगों के चुने हुए प्रतिनिधियों की होगी और वही मज़हबी अल्पसंख्यकों का लिहाज़ करते हुए कुरआनी हिदायतों के अनुसार नियम बनाएंगे, और राज्य का गठन मदीना मॉडल पर होगाl सौभाग्य वश जिनाह और इकबाल मौलवियों के विरुद्ध इस जंग को जीतने में सफल हो गए; लेकिन दुर्भाग्यवश उस समय कुछ मनहूस लोग यहाँ बड़ी बेशर्मी से दर आए और तब से ही उन्होंने पाकिस्तान को बंधक बना रखा हैl

मदनी, आज़ाद, मौदूदी और उनके अखलाफ थोड़े मतभेद के साथ एक ही तरह के इस्लामी सिद्धांतों के हामिल हैंl इसमें आश्चर्य की इस लिए कोई बात नहीं है क्योंकि इन सभी को एक ही प्रकार के पारम्परिक मदरसों की शिक्षा प्राप्त हुई हैl मौदूदी कुछ अधिक रौशन ख़याल साबित हुए क्योंकि उन्होंने आधिकारिक तौर पर किसी मदरसे की शिक्षा प्राप्त नहीं की और एक अवधि तक सर सैयद के साथ जुड़े रहे और उनकी साहित्यिक सेवाओं से भी प्रभावित थे (अपनी पत्नी के साथ)l पहले वह उसी इस्लाम के अनुयायी थे जिसे मैंने अजमी इस्लाम कहा, और इसकी वजह यह थी कि वह सदियों पुराने उसी दर्से निज़ामी के शिक्षित थे जिसकी बुनियाद सोलहवीं शताब्दी में निज़ामुद्दीन सहालवी ने रखी थी, जिसके अग्रणी गज्जाली और तूसी जैसे लोग थेl यह पाठ्यक्रम जहां छात्रों को हदीस के ज्ञान सहित बेकार मंतिक और फ़लसफ़ा की शिक्षा प्रदान करता है वहीँ इस पाठ्यक्रम के तहत कुरआन पाक की केवल कुछ सूरतें ही पढ़ाई जाती हैं वह भी हदीसों की रौशनी मेंl इसीलिए इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है कि प्रिंटिंग प्रेस जैसी वैज्ञानिक आविष्कार को हराम करार देने की इन उलेमा की एक तारीख रही है जिसने मुसलमानों को सदियों तक पिछड़ेपन का गुलाम बनाए रखाl

अल्लामा इकबाल ने इस्लाम के संबंध में अपना दृष्टिकोण सीधे कुरआन से प्राप्त किया हैl और यही हाल सर सैयद का भी है जो कि पाकिस्तान के वास्तविक वास्तुकार हैंl सर सैयद ने १८५७ में आज़ादी की जंग हार जाने के बाद ना केवल यह कि ब्रिटिश सरकार के कहर व गज़ब से मुसलमानों को बचाया बल्कि उन्होंने शाही सुरक्षा के अंतर्गत सक्रीय ओरियन्टलिस्ट (Orientalists) और ईसाई मिशनरियों के खिलाफ इस्लाम का बचाव भी कियाl उन्होंने कुरआन पाक की एक तफ़सीर भी लिखी और यह उजागर किया कि किस प्रकार प्रचलित ताफसीरें व तर्जुमे कट्टरता और संकीर्णता का पुलिंदा हैं, और इनका कुरआन के असल अर्थ से कोई संबंध नहीं हैl अबी दाउद की किताब अल मसाहिफ के बाद शायद सर सैयद ही पहले ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने इस बात को उजागर किया कि किस प्रकार शाह वलीउल्लाह सहित रिवायती मुफ़स्सेरीन ने अपनी तफसीरों में तथ्य और बुद्धि व तर्क को अनदेखा करके कुरआन के संदेशों को विकृत किया हैl कुरआन पाक की समझ और उसकी नये सिरे से ताबीर व तफसीर के हवाले से उनकी बसीरत अंगेज़ प्रयासों के कारण सदैव उनकी तुलना सेंट थामस अकीनास (St. Thomas Aquinas) और ईसाई दुनिया के लिए उनकी सेवाओं से किया जाता हैl

इकबाल और जिनाह को अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से काफी लगाव थाl अल्लामा असलम जय राजपुरी सहित विभिन्न इल्म वालों के साथ इकबाल के करीबी संबंध थे, जो दिल्ली में जामिया मिल्लिया इस्लामिया का नेतृत्व करने के लिए अरबी भाषा और इस्लामी इतिहास के प्रोफेसर की हैसियत से समय से पहले ही सेवानिवृत्ति ले चुके थेl इकबाल की दरख्वास्त पर अल्लामा असलम जय राजपुरी कुरआन की एक ऐसी प्रमाणिक लुगत तैयार करने के लिए राज़ी हो गए जो नुज़ूले कुरआन के ज़माने की शायरी की भाषा और विश्वसनीय अरबी लुगात से प्रमाणित होl इकबाल के शिष्य चौधरी गुलाम अहमद परवेज़ १९३०-३१ में दिल्ली के अन्दर एक सरकारी नौकर के तौर पर काम करना शुरू कर चुके थेl वह कुरआनी सिद्धांतों पर बहस करने और अरबी अदब के कुछ पहलुओं पर रहनुमाई प्राप्त करने के लिए अल्लामा असलम जय राजपुरी से मिलने गएl साझा रूचियों (कुरआन, अदब, इकबाल, सर सैयद और मुसलामानों की दुर्दशा) के कारण वह जल्दी एक दोसरे के जिगरी दोस्त बन गए और जब वह दिल्ली में होते तो एक दोसरे को देखे बिना शायद उनका एक दिन भी नहीं गुजरताl अल्लामा असलम जय राजपुरी कुरआन पाक और अरबी भाषा व साहित्य में उस २७ वर्षीय परवेज़ की गहरी रूचि से काफी प्रभावित थेl उन्होंने जल्द ही कुरआनी विषयों के हवाले से प्रश्नों के लिए अपने शिष्यों और उलेमा से मराजेअत करने के बजाए गुलाम अहमद परवेज़ से रुजूअ करना प्रारम्भ कर दियाl

अल्लामा असलम जय राजपुरी और परवेज़ की यह नजदीकियां इसी प्रकार जारी रहीं यहाँ तक कि परवेज़ १९४७ में कराची हस्तांतरित हो गएl इस बीच उन्होंने अल्लामा इकबाल से मिलने के लिए एक साथ लाहौर के कई सफ़र भी कियेl इस दौरान परवेज़ ने १९३५ में अल्लामा असलम जय राजपुरी के साथ छः महीने गुज़ारे ताकि वह हर हर पहलु से अरबी भाषा में अपनी महारत को खूब निखार संवार लेंl साथ ही साथ दोनों को यह एहसास भी हुआ कि वृद्धावस्था और व्यस्तता के कारण अल्लामा जय राजपुरी के लिए कुरआन पाक की लुगत तैयार करने की जिम्मेदारी शायद उनकी सकत से अधिक भारी हैl इसलिए, परवेज़ ने अपनी नौकरी के अलावा इस अजीम मिशन का बोझ भी अपने कंधों पर ले लिया और पाकिस्तान के लिए जिनाह की नौकरी से बाहर हो गएl उन्होंने (सरकारी नौकर होने के कारण) प्रेस में एक फर्जी नाम का प्रयोग करते हुए राष्ट्रवादी (Nationalist) और पाकिस्तान विरोधी मौलवियों का रद्द भी कियाl उस समय उनकी यह बहुमूल्य तहरीरें प्रकाशित हुईं जो कि आज इतिहासकारों के लिए हवाला देने का एक महत्वपूर्ण माध्यम हैंl जिनाह परवेज़ के इस काम से इतने प्रभावित हुए कि वह केवल दो ऐसे व्यक्तियों में से एक थे जिन्हें बिना किसी अग्रिम सूचना के जिनाह से मिलने की अनुमति थीl

अल्लामा परवेज़ (कुरआन और पाकिस्तान) के अपने इस मिशन को अकेले ही लेकर आगे बढ़ते रहे यहाँ तक कि १९८५ में उन्होंने अपनी आखरी साँसें लींl जब परवेज़ की मआरिफुल कुरआन की पहली जिल्द १९३९ में प्रकाशित हुई तो उस समय सबसे अधिक ख़ुशी अल्लामा असलम जय राजपुरी को हुईl इसके बाद १९६० में लुगातुल कुरआन प्रकाशित हुई और मफहुमुल कुरआन १९६१ में सामने आईl परवेज़ कुरआन और पाकिस्तान के लिए अपनी पूरी जिंदगी हर किसी से टकराते रहे, यहाँ तक कि उन्होंने अपने पुराने दोस्त मौदूदी का भी इस मामले में कोई लिहाज़ नहीं किया, और इसके लिए उन्होंने अपनी जिंदगी, सेहत और दौलत सब कुछ दावं पर लगा दी थीl

स्रोत:

dailytimes.com.pk/332129/early-history-of-islam-needs-fresh-appraisal-x/

URL for English article: http://www.newageislam.com/islamic-history/m-aamer-sarfraz/madani,-azad,-maududi-and-their-posterity-have-the-same-vision-of-islam--early-history-of-islam-needs-fresh-appraisal-—-x/d/117198

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/m-aamer-sarfraz,-tr-new-age-islam/early-history-of-islam-needs-fresh-appraisal-—-x--مدنی-،-آزاد،-مودودی-اور-ان-کے-اَخلاف-ایک-ہی-اسلامی-نظریات-کے-حامل-ہیں/d/117412

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/m-aamer-sarfraz,-tr-new-age-islam/early-history-of-islam-needs-fresh-appraisal-—-x--मदनी,-आज़ाद,-मौदूदी-और-इनके-अखलाफ-ही-इस्लामी-सिद्धांतों-के-हामिल-हैं/d/117466

New Age Islam, Islam Online, Islamic Website, African Muslim News, Arab World News, South Asia News, Indian Muslim News, World Muslim News, Women in Islam, Islamic Feminism, Arab Women, Women In Arab, Islamphobia in America, Muslim Women in West, Islam Women and Feminism





TOTAL COMMENTS:-    


Compose Your Comments here:
Name
Email (Not to be published)
Comments
Fill the text
 
Disclaimer: The opinions expressed in the articles and comments are the opinions of the authors and do not necessarily reflect that of NewAgeIslam.com.

Content