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Hindi Section (07 Jan 2019 NewAgeIslam.Com)


Early History of Muslims Needs Fresh Appraisal — VII संगठित उलेमा की बेड़ियों ने इस्लाम को बंधक बना लिया



एम आमिर सरफ़राज़

२८ नवंबर, २०१८

आज जिस ईसाइयत पर अमल किया जा रहा है यह वह ईसाइयत नहीं है जिसके लिए अल नासरह के हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने अपनी जान लगा दी थीl जब इसकी शुरुआत हुई तो यह वर्तमान स्थिति के खिलाफ बगावत थीl गरीब किसान उन बेईमान पादरियों के खिलाफ उठ खड़े हुए जो रोमन गवर्नर की आमद से उन्हें अधीनस्थ करने के लिए अपने धर्म (यहूदियत) का प्रयोग कर रहे थेl जब ईसा मसीह ने माल बटोरने वालों की दुकानों पर हमला किया और गिरजा घर के बड़े पादरियों को खुले आम चैलेंज किया तो उन्हें बागी ठहरा कर सूली पर लटका दिया गयाl उनके बलिदान के बाद ईसा मसीह का आंदोलन हर ओर फ़ैल गया और उनके भाई जेम्ज़ के नेतृत्व में धार्मिक प्रबंधन सुलझा लिया गयाl इस सुधारवादी आंदोलन के बढ़ते हुए प्रभाव से डर कर धार्मिक संस्थाओं ने अपने कारखाने का अंतिम हथकंडा प्रयोग कियाl

पोल (वास्तविक नाम तोरस या सावल) इस आंदोलन का एक प्रतिबद्ध शत्रु था और जहां तक हो सकता था उसने अपने अनुयायियों का जीवन कठिनाइयों में डाल दियाl अपनी विजय का अंदाजा होने पर उसने ‘दमिश्क की सड़क पर प्रयोग’ किया और ईसा मसीह का बड़ा अनुयायी बन गयाl एक करिश्माई व्यक्ति होने के कारण वह जल्द ही नेतृत्व की कुर्सी तक पहुँच गयाl हालांकि विभिन्न मौकों पर उसे उसके अतिवादी विचारधारा और हिंसक उपायों के लिए चेतावनी भी दी गईl रोमन अधिकारियों के साथ मिल कर काम करने पर सेंट पाल की हैसियत से “ईसाइयत” के नेतृत्व पर कब्ज़ा करने में उसे अधिक समय नहीं लगाl रज़ा अरसलान ने अपनी सबसे अधिक बिकने वाली किताब ‘The Zealot’ में बयान किया है कि किस प्रकार एक सुधारवादी आंदोलन ने अपने इंकलाबी किरदार को एक और संगठित धर्म के रूप में परिवर्तित कर दिया जिसका नाम ईसाइयत पड़ाl

इस्लाम भी एक इंकलाबी दीन था क्योंकि यह अरब घाटी और उसेक बाहर भी तेज़ी के साथ फैलाl तथापि, लगभग ७०० ईसवी में खुफिया मजूसी (आतिश परस्त) और उनके साथी पुराने (अरबी) और नए (अजमी) मुसलमानों को एक दोसरे के विरुद्ध भड़काने में व्यस्त थेl बनू उमय्या हुकूमत के अंत पर मुसलामानों के बीच एक बड़े विभाजन की बुनियाद डाल दी गई जिसमें उन्होंने हज़रत अली की औलादों की हुक्मरानी के हक़ या इसके विपरीत की हिमायत कीl

इस्लाम में इन लोगों ने अनजाने में या जान बुझ कर एक और रह्बानी रास्ता परिचित कराया जो छुटकारा तो चाहते थे लेकिन निष्पक्ष भी रहना चाहते थेl इस दृष्टिकोण से देखने वाला सबसे पहला बुद्धिजीवी वासिल बिन अता था जिसने इमामत के मसले पर (हज़रत अली के पोते) इब्नुल हनफिया और एक सूफी हसनुल बसरी से अलग हो कर एक दोसरा दृष्टिकोण स्थापित कियाl वह रिवायात (हदीसों), तसव्वुफ़ और (शिया सुन्नी) की राजनीति के दलदल से निकलने के लिए विकल्प और बुद्धिवाद को बढ़ावा देने लगाl

बिन अता का सिद्धांत आने वाले वर्षों में फ़ैल गया जहां उसने और उसके उत्तराधिकारियों ने ना केवल यह कि अपने विरोधियों के पराजित किया बल्कि यूनानी फलसफे के माध्यम से इस हमले से इस्लाम को भी सुरक्षित कियाl इस्लाम उस समय उंचाई पर था जब ब्रामका ने अपने दोस्त खलीफा हारून रशीद को बुद्धिवादियों और उसके राजनीतिक प्रभाव के बढ़ते हुए असर व रसूख के बारे में सचेत कियाl

उन्होंने ब्रामका को अपनी भाषाई कौशल के माध्यम से इस आंदोलन को अप्रभावी करने के लिए कहाl जैसे ही बुद्धिवादियों के बीच शिया सुनी का तफरका पैदा हुआ और शीईयत की ओर रुझान रखने वाले बशर बिन मोतमर के तहत बग़दाद में अपनी बुनियादें मजबूत करने के लिए बसरा छोड़ कर निकल गए, बग़दाद का (इमामी) मकतब मामून सहित अब्बासियों के करीब हो गया, और उनका मसलक पुरे देश में फ़ैल गया जिसके लिए कभी कभी जबरदस्ती का भी सहारा लिया गयाl लेकिन अभी तक उनका असल उद्देश्य स्पष्ट नहीं हुआ थाl

अबुल हसन अशअरी ने बसरी मकतबे फ़िक्र में शिक्षा प्राप्त कीl वह एक सीनियर और नामवर शिष्य थेl विकल्प की स्वतन्त्रता के मसले में उन्होंने अचानक अपने उस्ताद से मतभेद किया और वहाँ से चले गएl इसके बाद जल्द ही उन्हें अपना एक अलग अशअरी मकतबे फ़िक्र स्थापित करने के लिए ‘इलाही हिमायत’ प्राप्त हुई जहां प्राचीन कुरआन जैसे रुढ़िवादी अवधारणा का बचाव करने के लिए बुद्धिवादियों की कार्यशैली का प्रयोग किया गयाl

भाग्य अर्थात सब कुछ ‘खुदा की मर्ज़ी’ से होता है, इस पर अशअरी का अकीदा राजनीतिक तौर पर अय्यार खलीफा अल मुतवक्किल को काफी भायाl उसने इस सिद्धांत को अपने शासकों को लोकप्रिय बनाने के लिए लोगों पर जबरदस्ती करने के लिए प्रयोग किया चाहे वह न्यायप्रिय हों या अत्याचारीl आखिरकार उनकी हुकूमत “खुदा की मर्ज़ी” का ही तो एक हिस्सा थी, जिसके बारे में बहस व तकरार की कोई गुंजाइश नहीं थीl उसने अपने साम्राज्य की सीमा में अशअरी फ़िक्र व अकीदे को लागू किया और बुद्धिवादियों की जम कर सरकोबी कीl

अशअरी और उनके उत्तराधिकारियों ने इस्लाम के साथ वही किया जो पाल ने ईसाइयत के साथ किया थाl अशअरी मकतबे फ़िक्र ने मजहबे इस्लाम के सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक वर्गों के सभी पहलुओं पर कब्ज़ा कर लिया और आज तक इस मकतबे फ़िक्र को प्रभुत्व प्राप्त हैl जबकि उस दौर में गज्जाली और इब्ने तैमिया जैसे लोग भी पैदा हुए लेकिन केवल बुद्धिवादियों को समाप्त करने के लिएl

बुद्धिवादियों को नष्ट कर दिया गया और उनके बौद्धिक कारनामों को संगठित तरीके से गडमड और तबाह व बर्बाद कर दिया गयाl उन्हें मुल्हिद फलसफी के तौर पर पेश किया गया जिनका मानना था कि बुद्धि व तर्क वही से अधिक महत्वपूर्ण हैl इसी बीच शियों ने मज़लूमियत की अपनी अलग दास्तानें तैयार कर लीं जिन्हें हर ज़माने में बढ़ावा मिलता गया, जिसकी समय समय पर कई शाखें भी अपनी एक विशेष फिकही दृष्टिकोण के साथ अस्तित्व में आती गईं, जिन्हें केवल अत्याचार व हिंसा, अलगाव और पिछड़ापन के संदर्भ में ही समझा जा सकता हैl और इन सब घटनाओं व हादसों का परिणाम यह हुआ कि इस्लाम एक और संगठित धर्म बन कर सामने आ गयाl

कुछ लोगों ने मुसलामानों को फिर से अपने असल से जोड़ने की जी तोड़ कोशिशें कीं लेकिन केवल धमकियां और जोर व जफा उनके हाथ लगीl संगठित उलेमा की बेड़ियाँ इतनी मजबूत हैं कि इस्लाम हमेशा उनके हाथों बंधक ही बना रहाl उपमाहाद्विप में अल्लामा इकबाल ही ‘इस्लाम में मज़हबी विचारधारा और सिद्धांतों के उत्थान’ के सबसे बड़े हामी थेl उन्होंने १९०८ के करीब पूरी गर्मजोशी के साथ इसकी शुरुआत की लेकिन जल्द ही वह कौमी राजनीति में व्यस्त हो गए और असरारे ख़ुदी के प्रचार पर मुल्हिद करार दिए जाने के बाद अपनी हार मान लीl जो लोग इस काम को आगे बढ़ाना चाहते हैं उनके लिए उन्होंने रास्ते स्पष्ट कर दिए हैंl उन्होंने इस बात की रहनुमाई फरमाई कि हम किस प्रकार केवल कुरआन ही के माध्यम से इस्लाम का पुनरोद्धार कर सकते हैं जो कि स्वयं मजुसियत से प्रभावित अनुवाद और हदीसों और शाने नुज़ूल पर आधारित तफसीरों के कारण खो कर रह गया हैl

इस्लाम के पुनरोद्धार का जो फार्मूला अल्लामा इकबाल ने पेश किया है वह बहुत महत्वपूर्ण और अति दूरगामी हैl उनका मानना था कि इस्लाम में कुरआन ही एक केवल वास्तविकता हैl और वास्तविक इस्लाम को समझने के लिए किसी को कुरआन के सिवा किसी और चीज की आवश्यकता ही नहीं है; और कुरआन को भी समझने के लिए केवल कुरआन की ही आवश्यकता है क्योंकि खुदा के फरमान के अनुसार यह स्वयं को बयान करता हैl इसलिए, एक अज़ीम शायरी की तरह कुरआन भी नाक़ाबिले तर्जुमा (अनुवाद) है, इसका असल अर्थ केवल कुरआन ए करीम के ‘कीवर्ड” के अर्थ पर गौर करके ही लिया जा सकता है जिसके अंदर अपरिवर्तनीय अवधारणाएं निहित होती हैं-------

स्रोत:

dailytimes.com.pk/326920/early-history-of-muslims-needs-fresh-appraisal-vii/

URL for English article: http://www.newageislam.com/islamic-history/m-aamer-sarfraz/the-shackles-of-organised-clergy-put-islam-a-hostage--early-history-of-muslims-needs-fresh-appraisal-—-vii/d/117032

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/m-aamer-sarfraz,-tr-new-age-islam/early-history-of-muslims-needs-fresh-appraisal-—-vii--منظم-علماء-کی-بیڑیوں-نے-اسلام-کو-یرغمال-بنا-لیا/d/117345

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/m-aamer-sarfraz,-tr-new-age-islam/early-history-of-muslims-needs-fresh-appraisal-—-vii--संगठित-उलेमा-की-बेड़ियों-ने-इस्लाम-को-बंधक-बना-लिया/d/117380

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