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Hindi Section (21 Dec 2018 NewAgeIslam.Com)


Early Muslim History Needs Fresh Appraisal — I मुस्लिम इतिहासकारों ने इस्लामी इतिहास में मौजुअ (गढ़ी हुई) रिवायतें भर कर इसका मज़ाक बनाया है

 

 

एम आमिर सरफराज़

२८ अक्टूबर, २०१८

इस्लाम एक सादा और प्रेक्टिकल धर्म थाl लेकिन दुर्भाग्यवश यह दीन भी उसी प्रकार की चुनौतियों का शिकार हो कर रह गया है जिनका शिकार अक्सर दोसरे धर्म होते रहे हैंl इस्लाम धर्म के हवाले से इस बेचैनी का बुनियादी कारण यह है कि प्रारम्भिक मुस्लिम इतिहास किस रूप में और किस प्रकार हमारे सामने पेश किया गया हैl प्रारम्भिक मुस्लिम इतिहास ने कुछ लोगों को उलझन में डाल दिया है और कुछ को फेर दिया हैl लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इसने कई लोगों को इस्लाम धर्म से ही बेज़ार कर दिया हैl प्रारम्भिक मुस्लिम इतिहास में घटनाओं और व्यक्तित्व को इस अंदाज़ में पेश किया गया है जो कुरआन की मंशा और इसकी शिक्षाओं के बिलकुल उलट हैl जिसका परिणाम यह है कि लोग यह सोचने पर मजबूर हैं कि किस पर भरोसा किया जाए और किस पर भरोसा ना किया जाएl

वास्तविकता यह है कि ऐसे बहुत कम मूल स्रोत आज उपलब्ध हैं जो प्रारम्भिक इस्लाम पर प्रकाश डाल सकते हैंl इसमें से कुछ का कारण तो प्राकृतिक आपदा हैं लेकिन इसमें से अक्सर का कारण वह बहुआयामी साजिशें हैं जो इस्लाम के खिलाफ इसके पहले दिन से ही की गई हैंl कुरआन के अलावा, जैसा कि बर्मिंघम म्यूजियम में पाई जाने वाली एक ओरिजनल कापी से इसकी एक बार फिर पुष्टि हो चुकी है, अब बहुत कम मवाद ही अपनी असल शकल में उपलब्ध है या है भी तो वह बनावटी और गढ़ी हुई हैl स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि पश्चिम के कुछ बुद्धिजीवी अब यह कह कर पुरे इस्लाम की वास्तविकता को ही प्रश्नों के दायरे में ला रहे हैं इसे अतीत में खलीफा अब्दुल मलिक और दोसरों ने तैयार किया हैl अब हम अपने इन कुछ बुनियादी या दुसरे स्रोतों पर गौर करते हैं जिन पर इस्लाम की हमारी मौजूदा समझ की बुनियाद हैl

मोहम्मद बिन इसहाक़ बिन यस्र (७०४-७६७ ईसवी) इन जुबानी रिवायतों को जमा करने वाले सबसे पहले इतिहासकार है जिन पर नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सीरत निगारी की बुनियाद रखी गई हैl हज़रत खालिद बिन वलीद ने जब उनके दादा को कैदी बनाया था तब वह कुफा में ईसाइयत से इस्लाम में दाखिल हुए थेl

अंततः उन्हें एक ऐसी औरत से रिवायत करने के बाद मदीने से बाहर निकाल दिया गया था जिससे उनकी कभी बात ही नहीं हुई थीl उनके जीवन में विभिन्न मौके पर उन पर यहूदी और एक खुफिया मजूसी होने का आरोप भी लगाया गयाl उन्होंने खलीफा मंसूर के दरबार से सहायता प्राप्त करने से पहले मिस्र, ईरान और दुसरे देशों का सफ़र किया, जिसने उन्हें इतिहास की एक व्यापक पुस्तक लिखने पर नियुक्त किया थाl हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सीरत इसी का एक हिस्सा थीl यह किताब बगदाद की लायब्रेरी में रखी गई थी लेकिन बाद में किसी तरह ग़ायब हो गईl

आश्चर्य की बात है कि इब्ने इसहाक का इतिहास थोड़े अंतर के साथ इब्ने हश्शाम (५० वर्ष बाद) और इब्ने जरीर तबरी (१५० वर्ष बाद) और कुछ दुसरे इतिहासकारों की पुस्तकों में भी पेश की गईl उनके अधिकतर स्रोत खुले तौर पर मौजुअ, मजूसी और यहूदी थेl उनके समकालीन इमाम मालिक ने इब्ने इसहाक को कज्ज़ाब (झूठा) कहाl इमाम इब्ने हम्बल ने फिकह में उनकी राय को अस्वीकार कर दिया है और इमाम बुखारी ने शायद ही अपने सहीह में उनकी रिवायतों को शामिल किया हैl

इब्ने शहाब अल ज़हरी ( ५०-१२४ हिजरी) को प्रारम्भिक मुस्लिम इतिहासकारों और हदीसों के और रावियों में एक मरकज़ी हैसियत हासिल हैl इनका भी व्यक्तित्व बहुत रहस्यमय है, इनके बारे में यह माना जाता है कि इन्होने मदीना छोड़ दिया था और दमिश्क में खलीफा अब्दुल मालिक की खिलाफत में नौकरी कर ली थी और वह अपनी मौत तक उमवी हुक्मरानों की ही सेवा करते रहेl

जब उनकी मौत हुई तो अब्बासी हुक्काम (अधिकारियों) ने तबरी को ख़ुफ़िया तौर पर दफन किया क्योंकि उन्हें हिंसा का डर थाl तबरी ने अबू मह्नाफ, सैफ बिन उमर, इब्नुल कलबी जैसे इतिहासकारों और उस जमाने में गर्दिश करने वाली जुबानी रिवायतों पर भरोसा किया हैl उन्होंने इन घटनाओं के लगभग तीन सौ साल बाद मुसलामानों का प्रारम्भिक इतिहास अधिकतर इब्ने इसहाक पर भरोसा करते हुए (‘शैतानी आयात’ की इख्तेरा के अलावा) लिखीl कहीं कहीं तबरी का नाम इब्ने जरीर बिन रुस्तम और कहीं तबरी बिन यज़ीद भी आता है; दोनों ही एक ही जन्म के दिन और मृत्यु के दिन के साथ इतिहासकार हैंl

अल ज़हरी के जीवन का कोई प्रमाणित हवाला उपलब्ध नहीं है क्योंकि इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता कि वह दोबारा मदीना गए थेl उन्हें अप्रामाणिक समझा गया क्योंकि अगर कोई लिखित तौर पर उनसे कुछ पूछता तो वह जान बुझ कर इसी प्रश्न के तीन असंगत उत्तर देते थेl वह कथित तौर पर ज़रतश्ती खानदान से संबंध रखते थे जो फारस पतन के बाद कुफा, बसरा और बग़दाद जैसे ईराकी शहरों में आबाद हो गए थेl वह वही हैं जिन्होंने कुरआन पाक के विभिन्न अनुवादों का सिद्धांत पेश किया और कुछ आयतों को दूसरी कुछ आयतों से मंसूख बताया, नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सहाबा के बीच मतभेद को प्रदर्शित किया और अपनी फिरका वाराना लड़ाइयों की हास्यास्पद घटनाएं दर्ज किएl

अबू जाफ़र मोहम्मद बिन जरीर अल तबरी (८३९ -९२३ ईसवी) इस्लामी इतिहास में सबसे मुख्य इतिहासकार हैंl जब मुम्ताद ने उन्हें अपने शरण में लिया तो उनकी आयु पचास वर्ष थीl उनकी आयु सत्तर वर्ष थी जब पहली बार पैगम्बरों और बादशाहों का इतिहास तेरह जिल्दों में प्रकाशित हुआl इसके बाद वह प्रसिद्ध तो हुए लेकिन उनका व्यक्तित्व विवादित हो कर रह गया जिनके घर पर नियमित रूप से पत्थर फेंके जाते थेl जब उनकी मौत हुई तो अब्बासी हुक्काम ने तबरी को खुफिया तौर पर दफन किया क्योंकि उन्हें हिंसा का डर थाl तबरी ने अबू मह्नाफ, सैफ बिन उमर, इब्नुल कलबी जैसे इतिहासकारों और उस जमाने में गर्दिश करने वाली जुबानी रिवायतों पर भरोसा किया हैl

उन्होंने इन घटनाओं के लगभग ३०० वर्ष बाद मुसलमानों की प्रारम्भिक इतिहास अधिकतर इब्ने इसहाक पर भरोसा करते हुए (‘शैतानी आयात’ की इख्तेरा के अलावा) लिखीl कहीं कहीं तबरी का नाम इब्ने जरीर बिन रुस्तम और कहीं तबरी बिन यज़ीद भी आता है; दोनों एक ही दिन की पैदाइश और एक ही दिन की मृत्यु के साथ इतिहासकार हैंl इनके बाद आने वाले सभी इतिहासकारों ने शब्दशः तबरी पर भरोसा किया हैl

वह लिखते हैं, “मैं बयान करने वालों से जो सुनता हूँ वही इस किताब में लिख रहा हूँl अगर मेरी इस किताब में कुछ फ़ालतू या अनुचित लगे तो इसका जिम्मेदार मुझे ना ठहराया जाए और ना ही मैं इसका उत्तरदायी हूँगाl बल्कि मेरी इस किताब में पाई जाने वाली सभी त्रुटियों के जिम्मेदार वह लोग होंगे जिन्होंने यह घटनाएं मुझ से बयान किये हैंl “इसलिए, क्या तबरी की बातें अक्सर अफवाहों पर आधारित हैं?

इब्ने खलदून (१३३२-१४०६ ईसवी) अपनी किताब ‘मुकदमा’ की वजह से आधुनिक इतिहास के सरदार माने जाते हैंl उन्होंने लिखा है कि मुस्लिम इतिहासकारों ने गढ़ी हुई रिवायतें और अनुचित व्याख्या से भर कर मुस्लिम इतिहास का मज़ाक बनाया हैl तथापि, शाह अब्दुल अज़ीज़ (१७४६-१८२४ ईसवी) ने इस बात पर प्रकाश डाली कि मुकदमा इब्ने खलदून के छः पृष्ठ शुरू से ही ग़ायब कर दिए गए हैंl

इन पृष्ठों में कथित तौर पर इस्लामी इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण पहलु अर्थात यज़ीद की सल्तनत और कर्बला की घटनाओं के बारे में प्रश्न उठाए गए थेl यहाँ तक कि कुछ आधुनिक प्रकाशन के हाशिये में यह बात लिखी गई है कि वह पृष्ठ रहस्यमय तौर पर ग़ायब कर दिए गए हैंl जब जलालुद्दीन सुयूती (१४४५-१५०५ ईसवी) ने तारीखुल खुलफा लिखी तो अब्दुल अज़ीज़ ने उनकी आलोचना की और यह कहा कि यह किताब इस बात की मिसाल है कि किस तरह हमारे इतिहासकारों ने अँधेरे में तीर चलाने का काम किया हैl इससे पहले कि अल सुयूती को नवीं शताब्दी का एक मुजतहिद करार दिया जाता, उलेमा और हुक्काम ने इस अम्र से पर्दा उठा दिया कि किस तरह सूफी वर्ग की वित्तीय सहायता की जा रही हैl

स्रोत:

dailytimes.com.pk/315373/early-muslim-history-needs-fresh-appraisal-i

URL for English article: http://www.newageislam.com/islamic-history/m-aamer-sarfraz/muslim-historians-have-made-a-mockery-of-islamic-history-by-filling-it-with-fabrications--early-muslim-history-needs-fresh-appraisal-—-i/d/116825

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/m-aamer-sarfraz,-tr-new-age-islam/early-muslim-history-needs-fresh-appraisal-—-i--مسلم-مؤرخوں-نے-اسلامی-تاریخ-میں-موضوع-روایات-بھر-کر-اس-کا-مذاق-بنایا-ہے/d/117183

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/m-aamer-sarfraz,-tr-new-age-islam/early-muslim-history-needs-fresh-appraisal-—-i--मुस्लिम-इतिहासकारों-ने-इस्लामी-इतिहास-में-मौजुअ-(गढ़ी-हुई)-रिवायतें-भर-कर-इसका-मज़ाक-बनाया-है/d/117216

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TOTAL COMMENTS:-   1


  • Ye aapke western aaqaa ne aapko sikhaya hai
    Unka maqsad Islam ko dhana hai 
    Aisa paath aap sabko padhaya ki wahi zaban bolne lag gaye
    Jhoot thoda kam bola karen

    By Zaid - 12/21/2018 5:55:28 AM



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