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Hindi Section (03 Jan 2019 NewAgeIslam.Com)


Early Muslim History Needs Fresh Appraisal — V मजुसियों के माध्यम से हम तक पहुँचने वाला मुस्लिम इतिहास विरोधाभासों का पुलिंदा है



एम आमिर सरफ़राज़

१५ नवंबर, २०१८

हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ ने हुर बिन अब्दुर्रहमान को स्पेन का गवर्नर नियुक्त किया थाl उन्हीं के शासन काल में मुस्लिम सेनाएं दक्षिण फरसा तक प्रवेश कर चुकी थींl वह अरबी भाषा में महत्वपूर्ण घटनाओं पर आधारित एक पत्रिका लिखा करते थेl ९२० ईसवी के करीब उनकी एक डायरी खस्ता हालत में एक हसपानवी अफसर समून अश्बिलिया के हाथ लगी जिसका अनुवाद उन्होंने हसपानवी भाषा में कियाl १९१० में एक ब्रिटिश शोधकर्ता डेंस माउन्टगोमरी ने बहुत सावधानी के साथ इसकी जांच की और अंग्रेजी में इसका अनुवाद किया क्योंकि इसमें १०० हिजरी में पेश आने वाले महत्वपूर्ण घटनाओं का उल्लेख था इस डायरी के सामग्री से हुसैन काज़िम जादे अब्दुल कादिर मुसुवी और साथ ही अब्दुल जब्बार फ़ातमी के लेखों का समर्थन होता है जो इस्तम्बोल आर्काइव में सुरक्षित हैl

बिन अब्दुर्रहमान ने लिखा है कि किस प्रकार पहले कुछ दशकों के बीच ज़रतश्तियों की साजिशों ने ईराक़ में फ़ितना व फ़साद बरपा कर रखा था, और वह अब भी समय समय पर शरारत करते रहते हैंl ईराक़ के गवर्नर के तौर पर हज़रत अली और हज़रत हुसैन ने इस धरती को जन्नत निशान बना दिया था लेकिन जमशेद ख़ुरासानी और जब्बान बिन हरमुजान नामक दो मजुसियों ने उन्हें शहीद कर दियाl लेकिन हज़रत अली और हज़रत हुसैन का खून बेकार नहीं गया क्योंकि १०० हिजरी में उस समय कूफ़ा और बसरा में सीरिया और मिस्र से अधिक अमन और खुशहाली थीl और यह कहने की तो कोई आवश्यकता ही नहीं कि इसमें कर्बला त्रासदी का कोई उल्लेख ही नहीं हैl इस डायरी का अंत ११६ हिजरी (७३२ ईसवी) के करीब पेश आने वाले एक महत्वपूर्ण घटना के उल्लेख के साथ होता है जब मुस्लिम सेनाओं ने अब्दुर्रहमान गाफ्की के नेतृत्व में फ़्रांस पर चढ़ाई कीं जहां अब्दुर्रहमान शहीद होने से पहले पूरी हिम्मत और जवां मर्दी के साथ लड़ेl अगर मुसलमान यह जंग जीत गए होते तो योरोप और बाकी दुनिया का इतिहास ही अलग होताl

पाठकों के दिल में अवश्य यह ख़याल पैदा होता होगा कि इतिहास का यह पहलू गुमनाम क्यों रहाl इसकी वजह यह है कि असल दस्तावेज़ अब्बासी सलतनत के दौर में संगठित तरीके से तबाह कर दिए गए थे और इसके बाद से सदियों तक सरकारी इतिहास ही हर जगह चलती रही जिसे हमारे उलेमा की जबर्दस्त हिमायत प्राप्त हैl जब १२४८ ईसवी में बगदाद का पतन हुआ तो (मजूसी मूल के) नसीरुद्दीन तूसी (हमला करने वाले हलाकू खान का सलाहकार था और एक खुफिया मजूसी इब्ने अल्कमी (वास्तविक नाम नस्र नौशेर अल्कमी) (मफ्तुह) खलीफा मोअतसिम बिल्लाह का वज़ीरे आज़म थाl जब अल्कमी की खुफिया दावत पर हलाकू खान ने बग़दाद पर हमला किया तो इसके परिणाम क्या सामने आए होंगे आप इसकी कल्पना कर सकते हैंl ऐसा करने से पहले अल्कमी ने इस बात को निश्चित कर लिया था कि फ़ौज टुकड़ियों में बटी रहे और मुसलमान दुआओं में और हलाल व हराम पर बहस करने में लगे रहेंl सामने जो भी आया मंगोलों ने उन सभी को क़त्ल कर दिया (और आखीर में अल्कमी को भी मार दिया) और मजुसियों ने अल्कमी की निगरानी में दुनिया की सबसे बड़ी लायब्रेरी की सारी किताबें तबाह कर दींl

जो इतिहास मजुसियों और उनके सहयोगियों के माध्यम से हम तक पहुंचा वह जबर्दस्त विरोधाभासों का पुलिंदा हैl मैं यहाँ एक दिलचस्प लेकिन गैर मारुफ़ मिसाल पेश करना चाहता हूँ

जब ६४२ ईसवी में फारस फतह हुआ तो जंगी कैदी मदीने लाए गएl उनमें फारस के बादशाह यजुद गुर्द-III की तीन बेटियाँ भी शामिल थींl हज़रत उमर ने उन तीनों की शादी हज़रत हुसैन, हज़रत मोहम्मद बिन अबी बकर और हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर से करने का फैसला कियाl इसके पीछे यह ख़याल था कि दरिया दिली के इस प्रदर्शन से दोनों देशों के बीच अच्छे संबंध पैदा होंगेl जबकि दूसरी रिवायत के अनुसार यजुद गुर्द की दो बेटियाँ थीं जिनमें एक की शादी हज़रत हसन और दूसरी की शादी हज़रत हुसैन से हुईl इतिहास की इन दो रिवायतों में से दुरुस्त जो भी हो लेकिन एक ही घटना की दो एतेहासिक रिवायतें हजम करना मुश्किल हैl पहली बात तो यह है कि जब यजुद गुर्द गद्दी पर बैठा तो उसकी आयु १२-२१ वर्ष थी और उसके गद्दी पर बैठने के कुछ वर्ष बाद फारस उसके हाथों से निकल गयाl इतने कम समय में शादी की आयु की उसकी दो बेटियाँ कैसे हो सकती हैं? दूसरी बात यह है कि हज़रत हुसैन की पैदाइश ५-४ हिजरी में हुई और १६ हिजरी में इस घटना के समय उनकी उमर ११-१२ वर्ष थी इस स्थिति में यह शादी कैसे हो सकती है? अगर यह बात आपकी समझ से बाहर है तो मैं और दो उदाहरण पेश करता हूँ जिनके अनुसार यह लड़कियां यजुद गुर्द की बहनें थीं और यजुद गुर्द के भाई की बेटियाँ थींl

मैं ऐसे ही अनेकों विरोधाभास बयान कर सकता हूँ लेकिन मैं यहाँ केवल उन बिदआत का ज़िक्र करना चाहता हूँ जो मजुसियों की साज़िश के परिणाम में इस्लाम के अन्दर दाखिल हो गईं: खलीफा जमीन पर खुदा का साया बन गया, नौ रोज़ (ज़रतश्ती/ फ़ारसी नया वर्ष) सरकारी तौर पर मनाया जाने लगा, शबे बराअत (ज़रतश्ती कल्पना) को एक धार्मिक रंग रूप दे दिया गया, धार्मिक नियम अवामी नियम से अलग हो गए जिसके परिणामस्वरूप (उलेमा बनाम सरकार) के दो समानांतर संस्था वजूद में आ गए, तकदीर के अकीदे में एक नई जान डाल दी गई, तसव्वुफ़ (रूहानी मुजाहेदात के जरिये खुदा के साथ कलाम) के कल्पना को बढ़ावा प्राप्त हुआम, ज़कात में केवल २.५ प्रतिशत रकम विशेष करके सरमाया दारी को बढ़ावा दिया गया और जेहाद की सहीह कल्पान धुंधली हो गईl संक्षिप्त यह कि अल्लामा इकबाल के अनुसार बदकिस्मती से फारस की फतह के परिणाम स्वरुप इस्लाम पर मजुसियत ग़ालिब हो गई ना कि इसका उलटाl

इस्लाम कोई नया धर्म नहीं हैl इस्लाम इस लिए नहीं भेजा गया क्योंकि लोग नमाज़ें अदा नहीं करते थे, रोज़े नहीं रखते थे या सदके और खैरात नहीं देते थेl बल्कि इस्लाम मानवीय चेतना में पदोन्नति के कारण कुछ वृद्धि के साथ अल्लाह के पिछले रसूलों के जरिये लाए गए संदेशों का ही नवीकरण करने के लिए आया हैl इसका उद्देश्य बराबरी और न्याय स्थापित करना, दौलत का न्यायपूर्ण बटवारा और खुदा और बंदों के बीच (कुरआन के जरिये) सीधे संबंध स्थापित करना हैl तथापि, इस्लाम की यह कल्पना राजनीतिक और धार्मिक हलकों को रास नहीं आई क्योंकि वह अवाम को महकूम रखना और खुद को अल्लाह और बंदे के बीच सेल्फ मेड थर्ड पार्टी बनाना चाहते थेl वह अब्बासियों की ओर से स्थापित की गई इस धार्मिक फिज़ा को बरकरार रखने के लिए अब भी एक दुसरे के साथ मिल कर अपना काम जारी रखे हुए हैं और उन्होंने मुसलमानों को ऐसी रिवायतों में व्यस्त कर दिया है जिनके अर्थ बदल गए हैं और ऐसे विवाद इनके बीच पैदा कर दिए हैं जो कभी समाप्त होने वाले नहीं हैंl

स्रोत:

dailytimes.com.pk/322214/early-muslim-history-needs-fresh-appraisal-v/

URL for English article: http://www.newageislam.com/islamic-history/m-aamer-sarfraz/muslim-history-which-has-reached-us-through-magians-and-their-allies-has-bizarre-contradictions--early-muslim-history-needs-fresh-appraisal-—-v/d/116960

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/m-aamer-sarfraz,-tr-new-age-islam/early-muslim-history-needs-fresh-appraisal-—-v--مجوسیوں-کے-ذریعہ-ہم-تک-پہنچنے-والی-مسلم-تاریخ-تضادات-کا-پلندہ-ہے/d/117323

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/m-aamer-sarfraz,-tr-new-age-islam/early-muslim-history-needs-fresh-appraisal-—-v--मजुसियों-के-माध्यम-से-हम-तक-पहुँचने-वाला-मुस्लिम-इतिहास-विरोधाभासों-का-पुलिंदा-है/d/117344

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