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Hindi Section (11 Jan 2019 NewAgeIslam.Com)


Hazrat Nizamuddin Aulia- His Life And Sayings हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया महबूब ए इलाही का जीवन और उनकी शिक्षाएं



गुलाम गौस सिद्दीकी, न्यू एज इस्लाम

सुल्तानुल मशाइख ख्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया रहमतुल्लाह अलैह शैख़ फरीदुद्दीन गंज शकर के खुलेफा में से थेl आपका नाम मोहम्मद बिन अहमद बिन अली बुखारी और आपका लक़ब सुलातानुल मशाइख निज़ामुद्दीन औलिया थाl अल्लाह पाक की बारगाह में महबूब और मुकर्रब थेl आपकी बरकतों के प्रभाव से भारत लबरेज़ हैl आपके दादा अली बुखारी और नाना ख्वाजा अरब दोनों इकट्ठे बुखारा से लाहौर तशरीफ लाएl यहाँ एक लम्बे समय तक रहने के बाद बदायूं चले गए और वहाँ स्थायी निवास विकल्प कियाl (अख्बारुल अखियार, शैख़ अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी)

हज़रत निज़ामुद्दीन के नाना का नाम शैख़ अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी की तसनीफ़ अख्बारुल अखियार के अनुसार ख्वाजा अरब और वालिद का नाम अल्लामा शाह मुराद सहरवर्दी की तसनीफ़ महफ़िल ए औलिया के अनुसार ख्वाजा अहमद अरब हैl

महफ़िल ए औलिया में है कि “आपके पिता ख्वाजा अहमद अरब बड़े बाकमाल सालेह और साहबे दिल बुज़ुर्ग थेl समय के शासक ने उन्हें चुन करके बदायूं का क़ाज़ी नियुक्त कर दिया थाl आपकी माता बीबी जुलेखा भी बहुत बुज़ुर्ग थीं बदायूं में शादी हुई और यहीं आप पैदा हुएl २७ सफ़र ६३४ हिजरी में इधर आप पैदा हुए उधर दिल्ली में अगले ही महीने उस सन में हज़रत कुतुबुल अकताब साहब का इन्तेकाल हो गयाl”

जब हज़रत निज़ामुद्दीन पांच ही वर्ष के थे कि आपके पिता दुनिया से चल बसे और आपका मज़ार बदायूं में है जो ज़्यारत गाहे खालाएक बना हुआ हैl इसके बाद आपकी माता ने आपको एक मदरसे में दीनी तालीम प्राप्त करने के लिए दाखिल कराया, जहां आपने कुरआन पाक के अलावा दूसरी दीनियात पढ़नी शुरू कीl

आपकी माता ने बहुत ध्यान से आपको शिक्षा दिलाईl जब पचीस वर्ष की आयु हो गई तो आप अपनी मां को साथ ले कर दिल्ली गए और पहले पुराने किले के पास एक व्यक्ति के दरवाज़े में कयाम किया फिर एक दोसरे के खुस पोश बाम पर रहने लगेl मौलाना शमसुद्दीन शम्सुल मलिक जैसे नामवर फाज़िले वक्त के दर्स में शरीक हो गएl मुकामाते हरीरी उन्हीं से पढ़ीl मौलाना कमालुद्दीन ज़ाहिद से मशारिकुल अनवार पढ़ीl (महफिले औलिया)

अख्बारुल अखियार में है कि हज़रत निज़ामुद्दीन ने सदरे विलायत शम्सुल मलिक से इल्मे हदीस भी पढ़ीl और आप चूँकि इल्मे मंतिक में माहिर थे इसलिए दोसरे छात्र आपको निज़ामुद्दीन मंतिकी कहा करते थेl

यह ज़माना बड़े फक्र व फाके में गुजरा और तंगी तो शुरू से ही थीl जब घर में फाका होता तो मां कहतीं कि बेटा आज रोजा है और आप खुश व संतुष्ट हो जातेl (महफिले औलिया)

दिल्ली से शिक्षा पूर्ण करने के बाद शैख़ बाबा फरीदुद्दीन गंज शकर के शौक ए इरादत में हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया पाक पतन तशरीफ ले गए उस समय आपकी आयु बीस वर्ष की थी, पाक पतन पहुँच कर आपने शैख़ बाबा फरीदुद्दीन गंज शकर से कुरआन ए पाक के छः पारे तजवीद के साथ पढ़े, अवारिफ के छः बाब का दर्स लिया, तम्हीद अबू शकूर सलमी और कुछ दुसरे किताब भी शैख़ फरीदुद्दीन से पढ़ने का शरफ हासिल कियाl (अख्बारुल अखियार)

हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने बाबा फरीदुद्दीन गंज शकर से अर्ज़ किया कि “क्या अब शिक्षा छोड़ कर इबादत में लगा रहूँ” तो जवाब मिला “मैं किसी को शिक्षा से नहीं रोकता यह भी करो वह भी करो” फिर फरमाया, “दरवेश के लिए ज्ञान आवश्यक है ताकि वह शैतान के फरेब से सुरक्षित रहे” (महफ़िल ए औलिया)l इस जवाबी वाक्यों में आज के जाहिल पीरों और तथाकथित सूफियों के लिए इबरत का मकाम है जो यह समझते हैं कि शरई उलूम को प्राप्त करने की उन्हें कोई आवश्यकता नहींl हज़रत बाबा फरीद का यह वाक्य कि दरवेश के लिए इल्म आवश्यक है से निश्चित तौर पर दीन के इल्म की तरफ इशारा है क्योंकि इन्ही उलूम से शैतान के फरेब से सुरक्षित रहा जा सकता हैl واللہ اعلم بالصوا ب

६७२ में हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया को खिलाफत भी अता कर दी गईl आप फरमाते हैं कि उन दिनों शैख़ बाबा फरीद पर बड़ी तंगी थी, मुरीद ही अपने हाथों लकड़ियाँ पानी और करीर लाते और वह उबाल कर सब खाते एक दिन मैंने थोड़ा नमक डाल दिया तो आपने फरमाया मुश्ता है नहीं खाता, हज़रत निज़ामुद्दीन ने अर्ज़ किया कि क़र्ज़ ला कर नमक डाला है तो हज़रत ने फरमाया दरवेश फाकों से मर जाएंगे मगर नफ्स की लज्ज़त के लिए क़र्ज़ नहीं लेंगेl इसलिए कि क़र्ज़ और तवक्कुल में बादुल मुशरेकीन हैl लेकिन मुझे चलते समय दुआ दी कि किसी का मोहताज ना रहे गा, और दुश्मनों को खुश रखना और जिससे कभी क़र्ज़ लिया हो उसे अदा करनाl (महफ़िल ए औलिया)

हज़रत दिल्ली आकर पहले जंगलों में इबादत में व्यस्त रहे फिर गैबी हुक्म से आप गयास पूरा आ गए और हिदायत ए खल्क में मशगूल हो गए, रियाज़ात ए शाक्का करते रहे, हमेशा रोज़ादार रहे, और इफ्तार करते भी तो बासी रोटी खातेl कभी कभी तो रोज़े पर रोज़ा रखा सेवक ज़ोर देते तो फरमाते दरवेश तो फाके से पड़े रहें और मैं हलक से रोटी उतारूँ यह कैसे संभव हैl (महफ़िल ए औलिया)

महफिले औलिया और अख्बारुल अखियार दोनों किताबों में यह घटना उल्लेखित है लेकिन हम अख्बारुल अखियार उर्दू एडिशन के शब्द नक़ल कर रहे हैं कि जब गयास पूरा में हज़रत के कयाम फरमाने के बाद जब मुइज़ुद्दिन कीकबाद ने वहाँ एक नया शहर आबाद करना चाहा तो उस समय लोग बहुत अधिक मेरे पास आने लगे, यहाँ तक बादशाह, रईस व अमीर सभी लोग मेरी ओर रुजुअ करने लगे तो मेरे दिल में ख़याल आया कि अब यहाँ से भी चला जाना चाहिए, मैं इसी ख़याल में था कि ज़ुहर की नमाज़ पढ़ने के बाद मेरे पास एक नाज़ुक अंदाम खुबसूरत आदमी आया और उसने यह शेर पढ़ा:

آں روز کہ مہ شدی نمی دانستی

کانگشت نمائے عالمے خواہی شد

अर्थात जब आप माहताब (चाँद) बने थे उस समय यह क्यों ना समझा कि तुम दुनिया के अंगुश्त नुमा बनों गे

फिर उस जवान ने कहा कि तरीका यह है कि पहले तो प्रसिद्ध ही नहीं होना चाहिए और अगर प्रसिद्धि आम हो जाए तो फिर इस तरह रहना चाहिए कि कल को महशर के मैदान में नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने शर्मिंदगी ना उठानी पड़ेl फरमाया कि यह ताकत और हिम्मत की बात नहीं कि अल्लाह के मखलूक से छुप कर खुदा की याद की जाए, बल्कि ताकत और हिम्मत तो यह है कि अल्लाह की मखलूक में रह कर खुदा की याद की जाए------हज़रत निज़ामुद्दीन ने उस समय अपने दिल से अहद कर लिया कि अब यहाँ से किसी और जगह ना जाऊँगाl (अख्बारुल अखियार)

हज़रत महबूब ए इलाही निजामुद्दीन औलिया और समाअ का मसला

एक बार महबूबे इलाही हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने फरमाया कि समाअ ना बिलकुल जायज है और ना ही बिलकुल हराम और नाजायज हैl लोगों ने पूछा, हज़रत समाअ का क्या हुक्म है? आपने फरमाया जैसे सुनने वाले हों (फिर विस्तार से फरमाया) कि समाअ तो एक खुश और बेहतरीन आवाज़ के सुनने का नाम है इसलिए इसे नाजायज नहीं कहा जा सकता बल्कि वह समाअ जिसमें मज़ामीर और बाजे इत्यादि हों वह सबके नजदीक बिलकुल हराम है (अख्बारुल अख्यार)

आला हज़रत फाज़िले बरेलवी समाअ का मसला बयान करते हुए लिखते हैं:

सैयद मौलाना मोहम्मद बिन मुबारक बिन मोहम्मद अलवी किरमानी मुरीद हुजुर पुरनूर शैखुल आलम फरीदुल हक़ गंजशकर व खलीफा हुजुर सैयदना महबूबे इलाही निजामुल हक़ वद्दीन सुलतानुल औलिया रज़ीअल्लाहु अन्हुम किताबे मुस्तताब सैरुल औलिया में फरमाते हैं:

हज़रत सुलतानुल मशाइख कुद्दा सिर्रुहू फरमाते हैं कुछ चीजें हों तो समाअ मुबाह होगा (१) मसमाअ अर्थात सुनाने वाला बालिग़ मर्द हो बच्चा और औरत ना हो (२) मुस्तमे अर्थात सुनने वाला जो कुछ सुने वह हक़ की याद पर आधारित हो (३) मस्मूअ (जो कुछ सूना गया) जो कुछ वह कहें वह बेहूदगी और मज़ाक से पाक हो (४) समाअ के असबाब: गाने बजाने के उपकरण सारंगी, रुबाब आदि, चाहिए कि वह मजलिस के बीच ना होंl अगर यह सभी शर्तें पाई जाती हैं तो समाअ (अर्थात क़व्वाली) हलाल और जायज हैl

उसी में है: किसी व्यक्ति ने हज़रत सुलतानुल मशाइख की सेवा में यह शिकायत पेश की कि आस्ताने के कुछ दरवेशों ने इस महफ़िल में रक्स किया जिसमें चंग व रुबाब और मज़ामीर प्रयोग हुए आपने फरमाया उन्होंने ने अच्छा नहीं किया क्योंकि जो काम नाजायज है उसे पसंदीदा करार नहीं दिया जा सकताl

उसी में है: स्वयं हुज़ूरे पुरनूर सुलतानुल मशाइख महबूबे इलाही रज़ीअल्लाहु अन्हु के मलफुजात अल फ़वाद शरीफ में है: मज़ामीर हराम अस्तl (मसाइले समाअ, फतावा रिजविया जिल्द २४ १५१ से १५२)

इन उद्धरण के प्रकाश में यह दृष्टिकोण स्पष्ट करना आवश्यक है कि कुछ लोग मज़ामीर और बाजे वाले समाअ के जवाज़ की निस्बत चिस्तिया सिलसिले की ओर मंसूब करते हैं हालांकि सरकार निज़ामुद्दीन महबूबे सुबहानी इसके निरपेक्ष वैधता के कायल नहीं जैसा कि उपर गुजराl कहने का मतलब यह है कि किसी काम को करना और बात है मगर उस काम को किसी बुज़ुर्ग की ओर मंसूब करके नाजायज को जायज बनाना बहुत बुरी बात हैl

मलफुजात व इरशादात

हज़रत निज़ामुद्दीन महबूबे इलाही की नियमित तसनीफ़ के बारे में अध्ययन नहीं लेकिन प्रसिद्ध बात है कि आपने अपने पीर व मुर्शिद बाबा फरीदुद्दीन गंज शकर के मलफुजात को “राहतुल क़ुलूब” के नाम से मुरत्तब किया थाl हाँ हज़रत निज़ामुद्दीन महबूबे इलाही के खलीफा हज़रत अमीर ख़ुसरो ने “अफजलुल फवाइद” और खलीफा हज़रत अमीर हसन अल सजज़ी ने “फवाईदुल फवाइद” के नाम से दो किताबें मुरत्तब किये जिनमें हज़रत निज़ामुद्दीन महबूबे इलाही के मलफुजात व इरशादात को जमा किया गया जो “हश्त बहिश्त” नामक प्रसिद्ध पुस्तक में शामिल हैंl

निम्नलिखित कुछ इरशादात हैं:

पूछा गया कि मोहब्बत की असलियत क्या है तो फरमाया: “दोस्ती की सफाई हैl इस लिए कि हक़ से प्यार करने वाले दुनिया और आखिरत प्राप्त करने को अपना शरफ़ नहीं समझते थेl बल्कि वह हक़ को पा लेने में अपना शरफ़ जानते थेl المرء مع من احبہ” फिर पूछा गया कि मोहब्बत में मुसीबत क्यों होती है?, फरमाया: “हर एक कमीना इसका दावा ना करेl और जब उस पर मुसीबत पड़े तो पीठ दिखा जाएl”

समझदार और बुद्धिमान वही व्यक्ति है जो पेश आने वाले सफर अर्थात मौत के लिए तैयारी करे और अपने साथ कुछ तोशा लेl

डर (अल्लाह का डर) बेअदब बंदों के लिए कोड़ा हैl जिससे उनकी दुरुस्ती की जाती हैl

जिसे अल्लाह पाक महफूज़ रखे, चाहे लाखों इब्लीस दर पैकार हों, उसे ज़र्रा बराबर भी नुक्सान नहीं पहुंचताl

जब इंसान को कोई शख्स तकलीफ दे कोई चीज छीन ले, उसे बद्दुआ नहीं करनी चाहिए बल्कि दांत पीस कर रह जाना चाहिए ताकि उसका उद्देश्य प्राप्त हो जाए और अल्लाह पाक अपने बंदों के इकबाल को बड़ी अच्छी तरह जानता हैl

शरीअत में चाहे दिल हाज़िर हो या ना हो, नमाज़ सहीह होती हैl मगर तरीकत में असहाब ए सुलूक कहते हैं कि जब दिल हाज़िर ना हो और अल्लाह पाक के सिवा किसी और का ख्याल दिल में आए, नमाज़ जायज़ नहीं होती, इसे फिर पढ़ना चाहिए क्योंकि ख्यालों का आना नमाज़ का फासिद हैl

आरिफ की पहचान यह है कि वह खामोश रहता हैl अगर बात करता भी है तो आवश्यकतानुसारl

मैंने एक बुज़ुर्ग से सूना है कि जो शख्स अपने नफ्स का आशिक बनता है उस पर खुद पसंदी, हसद और अपमान आशिक हो जाते हैंl

औलिया का ज़िक्र करने से राहत नाज़िल होती हैl

ताअत लाज़मी और मुतअद्दी हैl लाज़मी वह है जिसका लाभ केवल करने वाले की ज़ात को पहुंचेl और यह नमाज़, रोज़ा, हज, विर्द और तस्बीह हैl मुतअद्दी वह है जिससे औरों को लाभ पहुंचे, इल्तेफात, शफकत, गैर के हक़ में मेहरबानी करना आदि इसे मुतअद्दी कहते हैं, इसका सवाब अनगिनत हैl लाज़मी ताअत में अख़लाक़ का होना आवश्यक हैl ताकि कुबूल हो लेकिन मुतअद्दी ताअत का चाहे किसी भी तरह की जाए सवाब मिल जाता हैl

सदके में पांच शर्तें हों तो बेशक सदका कुबूल होता हैl उनमें से दो अता से पहले, दो अता के समय और एक (अता के) बाद में होती हैl अता से पहले की दो शर्तें (यह) हैं: पहला: जो कुछ दे वह हलाल की कमाई होl दोसरे: किसी नेक मर्द को दे जो उसे बुरे कार्य में खर्च ना करेl अता के समय की दो शर्तें यह हैं: पहला: तवाज़ो और हंसी ख़ुशी से देl दोसरे: छुपा कर देl बाद की शर्त यह है कि जो कुछ दे उसका नाम ना ले बल्कि भूल जाएl (लिया गया है فوائد الفوائد اور افضل الفواد , इन इरशादात की टाइपिंग वसीम रजवी साहब के लेख “हज़रत ख्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया हालात, खिदमात और तालीमात से लिया गया है”)

अख्बारुल अखियार में है: हज़रत महबूबे सुबहानी का इरशाद है कि चलने वाला कमाल की ओर आकर्षित रहता है, अर्थात सालिक जब तक सुलूक के मराहिल तय करता रहता है तो कमाल का उम्मीदवार रहता हैl उम्मीदवार की तीन किस्में: सालिक. वाकिफ़ और राजेअl सालिक वह है जो राहे सुलूक में लगातार चलता रहेl वाकिफ़ वह है जिसकी राहे सुलूक में कोई वक्फा पेश आए, इस मकाम पर लोगों नें अर्ज़ किया सालिक को भी इस राह में वक्फा पेश आ जाता है? फरमाया हाँ! उस समय जब सालिक को इबादत करने में कोई कमी और लगजिश हो जाए जिससे इबादत का जौक व मज़ा ख़त्म हो जाए तो उस समय सालिक के लिए भी वक्फ़ा पैदा हो जाता है, इस हालत में अगर सालिक फ़ौरन कोई तदबीर करके अल्लाह के हुजुर तौबा कर ले तो अपनी असली हालत पर रह सकता है और अगर खुदा ना करे वह अपनी मौजूदा हालत पर ही रहे तो फिर इस बात का सख्त खतरा है कि कहीं राजेअ ना बन जाए इसके बाद सालिक से जो सुलूक के रास्ते पर चलते हुए लग्ज़िशें हो जाती हैं उनको बयान किया कि वह सात हैंl एराज़, हिजाब, ताफासिल, सल्ब ए मजीद, सल्ब ए कदीम, तसल्ली, अदावत फिर फरमाया कि आशिक व माशूक दो दोस्त हैं जो बाहम दीगर एक दुसरे की मोहब्बत में रहते हैं जैसा कि किसी ने कहा हैl

उल्फत का जब मज़ा है कि दोनों हों बेक़रार दोनों तरफ हो आग बराबर लगी हुई

इसी हालत में अगर आशिक से कोई ऐसी चीज सरज़द हो जाए जो माशूक को नापसंद हो तो माशूक अपने आशिक से एराज़ करता है, अर्थात अपना ध्यान उसकी ओर नहीं करता, इसलिए आशिक के लिए आवश्यक है कि वह फ़ौरन ही तौबा करके क्षमा याचना करे जिसके नतीजे में उस पर माशूक अवश्य खुश हो जाएगा और आशिक अगर अपनी गलती पर अड़ा रहे और क्षमा याचना ना करे तो यह एराज़ उस समय हिजाब बन जाता है, अर्थात माशूक अपने और आशिक के बीच पर्दा डाल लेता है, इस स्थिति में आशिक पर जरूरी है कि रो धो कर तौबा करे, अगर इस मरहले में ज़रा सी कोताही से काम लिया गया तो यह हिजाब, तफासिल अर्थात जुदाई से परिवर्तित हो जाएगा, अर्थात यूँ होता है कि माशूक अपने आशिक से जुदा हो जाता है, अगर इस हालत पर भी कोई क्षमा याचना ना करे तो फिर तफासिल, सल्बे मजीद से तब्दील हो जाता है, अर्थात आशिक से दरूद, वजीफ़ा, इबादत आदि का जौक और लुत्फ़ खत्म कर दिया जाता है जो पहले से हासिल था वह छीन लिया जाता है, इस हालत में भी अगर तौबा व इस्तिग्फार में कोताही से काम लिया गया तो सल्बे क़दीम, तसल्ली बख्श में दोसरी शक्ल विकल्प कर लेता है अर्थात माशूक दिल से अपने उस आशिक की जुदाई का चाहने वाला हो जाता है इस समय भी अगर तौबा व इस्तिग्फार में गफलत से काम लिया गया तो तसल्ली, अदावत में बदल जाती है अल्लाह पाक हम सबको गलतियों और लग्जिशों से महफूज़ रखेl (अख्बारुल अखियार)

एक बार फरमाया कि कल कयामत के दिन कुछ लोगों को चोरों की जमात के साथ खडा किया जाएगा यह लोग कहेंगे कि (ऐ रब्बे ज़ुलजलाल) हमने तो दुनिया में कोई चोरी नहीं की थी (फिर हमें चोरों के साथ क्यों खड़ा किया गया है) तो आवाज़ आएगी कि तुमने जवां मर्दी का लिबास तो पहना मगर अमल कोई ना कीl आखिरकार यह लोग भी नेक लोगों की शिफाअत से निजात पाएंगेl (अख्बारुल अखियार)

शैख़ निज़ामुद्दीन औलिया ने फरमाया कि एक बार मैं अपने शैख़ के साथ कश्ती में सवार था, शैख़ ने मुझे बुलाया और फरमाया कि मेरे सामने आओ मुझे तुमसे कुछ कहना है, सुनो, जब दिल्ली पहुँचो, मुजाहेदा करते रहना, बेकार रहने में कोई फायदा नहीं, रोज़ा रखना आधी मंजिल है, और बाकी आमाल जैसे नमाज़, हज यह दोसरी आधी मंजिल हैl फिर एक बार शैख़ फरीद ने फरमाया कि मैंने अल्लाह से दुआ की है कि आप अल्लाह से जो मांगे गे वह मिल जाएगाl एक बार यह भी फरमाया कि ऐ निज़ामुद्दीन हमने तुम्हारे लिए अल्लाह से दुनियावी कुव्वत भी मांग ली हैl (अख्बारुल अखियार)

एक बार महबूबे सुबहानी ख्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया ने फरमाया कि एक घटना में मुझे खत दिया गया जिसमें लिखा था कि जब तक और जितना संभव हो लोगों के दिलों को आराम पहुँचाओ क्योंकि मुसलमान का दिल वास्तव में खुदा के ज़हूर का मकाम है, कीमत के बाज़ार में कोई सामान इतना मकबूल नहीं होगा जितना दिलों को आराम पहुंचाना मकबूल हैl (अख्बारुल अखियार)

(Translated from Urdu by New Age Islam)

URL for Urdu article:http://www.newageislam.com/urdu-section/ghulam-ghaus-siddiqi,-new-age-islam/hazrat-nizamuddin-aulia--his-life-and-sayings--حضرت-نظام-الدین-اولیا-محبوب-الہی-کی-زندگی-اور-تعلیمات/d/117265

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/ghulam-ghaus-siddiqi,-new-age-islam/hazrat-nizamuddin-aulia--his-life-and-sayings--हज़रत-निज़ामुद्दीन-औलिया-महबूब-ए-इलाही-का-जीवन-और-उनकी-शिक्षाएं/d/117422

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