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Hindi Section (06 Jul 2018 NewAgeIslam.Com)


Darul Uloom Deoband Against The ‘Erroneous’ Thoughts Of The Tablighi Jama’at दारुल उलूम देवबंद तबलीगी जमाअत के 'गलत' सिद्धांतों के खिलाफ

 

 

 

गुलाम रसूल देहलवी, न्यू एज इस्लाम

8 सितम्बर 2017

हैरत की बात है कि दारुल उलूम देवबंद ने सौ वर्षीय इतिहास में पहली बार अपनी सैद्धांतिक शाख – तबलीगी जमाअत पर अपना दरवाज़ा बंद कर दिया हैl मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार तबलीगी जमाअत पर दारुल उलूम की “चार दिवारी” के अन्दर किसी हर तरह की गतिविधि अंजाम देने पर प्रतिबंध लगा दिया गया हैl 10 अगस्त को बड़े पैमाने पर उर्दू प्रेस में प्रकाशित होने वाले एक रिपोर्ट के अनुसार हाल ही में मदरसा प्रशासन ने एलान किया है कि अगर किसी भी छात्र को किसी भी रूप में तबलीगी जमाअत के तहरीक में लिप्त पाया गया तो उस पर दंडात्मक कार्यवाही की जाएगीl

काफी देर से दारुल उलूम देवबंद ने तबलीगी जमाअत को “गुमराह”, “गुमराह करने वाले सिद्धांतों का प्रकाशन करने वाली”, और “कुरआन व हदीस की गलत व्याख्या करने वाली जमाअत” करार देकर उसके खिलाफ एक दो टोक फतवा जारी किया हैl देवबंद ने यह भी कहा कि तबलीगी जमाअत के मौजूदा सरबराह मौलवी सअद कांधलवी ‘खुदा की बारगाह में तौबा’ कर लेंl उन पर ‘सैद्धांतिक तौर पर गुमराही’ इस्लामी नुसुस की गलत व्यख्या और नबूवत की बेहुरमती’, करने का आरोप लगाते हुए उलेमा ए देवबंद के फतवे में यह कहा गया है कि: “मुसलामानों और ख़ास तौर पर तबलीगी जमाअत के साथ जुड़े लोगों को इस बात से खबरदार करना हमारा मज़हबी फरीज़ा है कि जमाअत के मौजूदा सरबराह, मौलवी सअद कांधलवी कुरआन व हदीस की गलत व्यख्या कर रहे हैं”l

दारुल उलूम देवबंद के दारुल इफ्ता ने भोपाल में आयोजित तबलीगी जमाअत के इस्तेमाअ में उसके सरबराह मौलवी सअद कांधलवी के खिताब से जुड़े विभिन्न बयानों का हवाला पेश किया हैl मौलवी सअद कांधलवी ने बहुत सारी ऐसी बातें की हैं जो देवबंद के मुफ्तियों के अनुसार इस्लाम की फिकही समझ के खिलाफ हैंl उर्दू में इस फतवा की सुर्खी है:

“मौलाना मुहम्मद सअद कांधलवी के कुछ गलत सिद्धांतों के सिलसिले में दारुल उलूम देवबंद का सर्वसम्मति स्टैंड”

यह पूरा फतवा दारुल उलूम देवबंद की वेबसाईट पर मौजूद हैl (www.darulifta-deoband.com/home/ur/Dawah--Tableegh/147286)

तबलीगी जमाअत के खिलाफ देवबंद के फतवे में एक महत्वपूर्ण आरोप यह भी है कि तबलीगी जमाअत अपने अनुयायियों को जिस किताब “फजाइल ए आमाल” की शिक्षा देती है वह ऐसे अनेकों मवाद पर आधारित है जो कुरआन और मुस्तनद हदीसों से बिलकुल विपरीत हैंl तबलीगी जमाअत और उसके तबलीग के तरीके के बारे में इस प्रकार के आपत्ति इससे पहले भी बार बार उठाए गए हैंl खुद दारुल उलूम ने इस बात के एतेराफ किया है कि इससे पहले बंगलादेश और पाकिस्तान सहित- जहां ‘तबलीगी जमाअत के सरबराह के गुमराह करने वाले सिद्धांतों का प्रकाशन हुआ है’ – विभिन्न स्रोतों से इस तरह की शिकायत मिल चुकी हैंl

लेकिन यह बात समझ से बाहर है कि तबलीगी जमाअत के इतने खतरनाक स्टैंड को क्यों अनदेखा किया गया जो अपने तबलीग के पाठ्यक्रम में मौजूद सैद्धांतिक जिहादियत की बीज बो रहा हैl “फजाइल ए आमाल” और “ तालीम ए इस्लाम” जैसी किताबें जिहादियत नवाज़ शिक्षाओं पर आधारित हैंl लेकिन इन दो निसाबी किताबों को तबलीगी जमाअत के अनुयायी इस्लाम के दो बुनियादी नुसुस कुरआन व हदीस जैसी अहमियत देते हैंl असल में तबलीगी जमाअत के साझा अनुयायी इस किताब को कुरआन मजीद से भी एक कदम आगे बढ़ कर अधिक महत्व देते हैंl तबलीगी जमाअत के संस्थापक सिद्धांत निर्माताओं में से एक “तालीम ए इस्लाम” में जिहादी दृष्टिकोण की व्यख्या में लिखते हैं: “जिहाद कलमा (अल्लाह के कलाम) को फैलाना और अल्लाह के अहकाम को नाफ़िज़ (लागू) करना हैl”

असल में खुदा के कलाम की इशाअत तबलीगी जमाअत तक ही सीमित नहीं हैl सभी इस्लामी, ईसाई, यहूदी और दूसरी गॉस्पेल संगठने दावत व तबलीग की बुनियाद पर लगभग यही काम कर रही हैंl लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि “अल्लाह के अहकाम लागू करने” के बारे में तबलीगी जमाअत के सपष्ट अहकाम हैंl

धार्मिक इस्तेलाह में अरबी शब्द कलमा इस्लाम का एक ऐसा पहला रुक्न है जो एक मुसलमान को इस बात की गवाही देने का आदेश देता है कि “अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह के आखरी रसूल हैं”l लेकिन तबलीगी जमाअत के 6 निकाती निसाब में शामिल किए जाने के बाद इसकी बिलकुल उलटी ताबीर कर दी गई है जैसा कि इसका ज़िक्र ‘फजाइल ए आमाल’ में हैl इस किताब का एक उद्धरण; “मुसलमान बुराई के खिलाफ जंग के अर्थों में जिहाद की एक मुसलसल हालत में हैंl उनका हथियार दावत (मजहब की तबलीग) है और उनकी लड़ाइयों की फतह या शिकस्त दिलों में है”l

जमाअत से जुड़े कुछ मुबल्लेगीन और उलेमा को छोड़ कर तबलीगी जमाअत के लगभग सभी मेंबर का काम केवल आम मुसलामानों के सामने फ़ज़ाइल ए आमाल पढ़ कर सुनाना हैl तबलीगी मुबल्लेगीन अपने नाज़रीन के ज़ेहन व फ़िक्र पर – जिन में अधिकतर अशिक्षित और भोले मुस्लिम युवा होते हैं- झूटी कहानियां और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मंसूब मन गढ़त हदीसें बयान करके कब्ज़ा जमाते हैंl एक बड़ी संख्या में इस्लामी शोधकर्ताओं का कहना है कि तबलीगी जमाअत का पूर्ण पाठ्यक्रम साधारणतः और फजाइल ए आमाल विशेषतः मौजूअ हदीसों से भरी हुई हैl

फजाइल ए आमाल की शिक्षा है कि एक वास्तविक इस्लामी जीवन व्यतीत करना इस दुनिया के लिए घृणा और शत्रुता पैदा किए बिना संभव ही नहीं हैl असल में तबलीगी जमाअत मौत से पहले पुरी जिंदगी को बेकार और अनर्थ समझती हैl फजाइल ए आमाल में लिखा है कि “ यह दुनिया एक बैतूल खुला (शौचालय) या एक जेल की तरह है”l इस अकीदे की अहमियत का अंदाज़ा इस हकीकत से लागाया जा सकता है कि अधिकतर तबलीगी मुब्ल्लेगीन इस किताब को कुरआन से एक दर्जा अधिक महत्व देते हैंl परिणाम स्वरूप, तबलीगी जमाअत के मुब्ल्लेगीन इस बात पर गर्व करते हैं कि वह ‘केवल या तो जन्नत की या कब्र की बात करते हैं और बीच में दुनिया की कोई बात नहीं करते’l ऐसे मुतअस्सिब मज़हबी ख्यालात असल में कुरआन मजीद की इन आयतों से स्पष्ट तौर पर परस्पर विरोधी हैं जिन में रहबानियत को निषिद्ध करार दिया गया हैl

तबलीगी जमाअत की पुरी इमारत इन छः नम्बरों पर कायम है जिनका विवरण “तहरीक ए ईमान” के शुरू में पेश किया गया हैइ वह छः बिंदु इस तरह हैं: (1) ईमान, (2) नमाज़, (3) इल्म व ज़िक्र, (4) इकराम ए मुस्लिम (मुसलमानों का सम्मान), (5) इखलास ए नियत, (6) तफरीग ए वक्त (दावत व तबलीग के लिए समय निकालना)”l

किताब “तालीम ए इस्लाम” में एक उप शीर्षक (आम उसूल”, के तहत छः नंबर पर टिप्पणी करते हुए लेखक लिखते हैं: “माध्यमिक महत्व के किसी भी नम्बर पर किसी भी समय कोई बहस नहीं की जानी चाहिएl बल्कि बात हमेशा केवल तबलीग के महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ही होनी चाहिए-------तबलीगी जमाअत का काम और इसका तंत्र विकल्प किए बिना और इस पर कठोरता के साथ अमल किए बिना ना कोई लाभ नहीं है, ना कोई सम्मान है, ना कोई ख़ुशी है और ना ही जीवन में कोई अमन व सुकून हैl”

इस तरह अपने छः बिंदु वाले पाठ्यक्रम में तबलीगी जमाअत ने दावत के अपने बुनियादी उद्देश्य की वजाहत की है जो कि “अल्लाह के अहकाम लागू करने” के एक विशेष कल्पना पर आधारित हैl तबलीगी जमाअत के सिद्धांत निर्माताओं का मानना है कि तबलीगी जमाअत में शामिल होने वाले मुसलमान “امر بالمعروف و نہی عن المنکر” अर्थात नेकी का हुक्म देने और बुराई से मना करने के कुरआनी हुक्म पर अमल करेंगेl उन्होंने इसे कुरआन की उस आयत से लिया है जिसमें अल्लाह का फरमान है: “तुम बेहतरीन उम्मत हो जो लोगों के लिए पैदा की गई है कि तुम नेक बातों का हुक्म करते हो और बुरी बातों से रोकते हो, और अल्लाह पर ईमान रखते हो” (3:110)l

बज़ाहिर, आज जिस तरह लफ्ज़ परस्त इस्लाम पसंद “नेकी” की दावत दे रहे हैं और “बुराई” से रोक रहे हैं वह कभी कभी अवांछित और शर्मनाक होता हैl इसकी एक मिसाल सऊदी अरब के मक्का में पेश आने वाले एक हालिया घटना से पेश की जा सकती है जिसकी आलोचना हालांकि केन्द्रीय धारे की मीडिया में नहीं लेकिन कुछ प्रगतिशील सऊदी अखबारों में जरुर की गईl 11 मार्च, 2002 को सऊदी अरब की इस्लामी पुलिस ने छात्राओं को एक जलते हुए स्कुल से फरार होने की अनुमति नहीं दी क्योंकि वह लडकियां हिजाब में मलबूस और ‘एक मर्द अभिभावक के साथ, नहीं थींl सऊदी अरबी दैनिक उकाज़ के अनुसार “नेकी का हुक्म देने और बुराई से मना करने” के इस प्रदर्शन में पन्द्रह नौजवान छात्राएं हलाक हुईं और पचास छात्राएं घायल हो गईंl

उत्तर प्रदेश के एक इस्लाम पसंद दीन के आलिम मौलवी मुहम्मद इलियास कांधलवी के जरिये 1926 में कायम किए हुए जमाअत का उद्देश्य “गुमराह” या “मुनहरिफ़” (बिदअती) मुसलामानों को खालिस मोमिन बनाना हैl प्यु रिसर्च सेंटर के रिलीजन एंड पब्लिक लाइफ के अनुसार तबलीगी जमाअत 150 से अधिक देशों में फैली हुई है जिससे 12 से 80 मिलियन तक लोग जुड़े हैंl तबलीगी जमाअत उस समय मीडिया के ध्यान का केंद्र बनी जब एक ज़माने में सोवियत यूनियन का भाग रहे उजबेकिस्तान, ताजकिस्तान और कज़ाकिस्तान ने यह आरोप लगाते हुए इस पर प्रतिबन्ध लगा दी कि तबलीगी जमाअत मजहब की रुजअत पसंदाना शिक्षा पेश करती हैl

उपमहाद्वीप में कई प्रगतिशील इस्लामी उलेमा का यह कहना है कि इस्लाम पसंद तफ़व्वुक़ परसती और रूढ़ीवाद तबलीगी जमाअत जैसी रुजअत पसंदाना तहरीक की पैदावार हैl एक महत्वपूर्ण किताब “Faith-Based Violence and Deobandi Militancy in Pakistan” में तबलीगी अतिवाद के विभिन्न रंगों और मज़हब पर आधारित तास्सुब के निहितार्थ के विभिन्न पहलुओं पर रौशनी डाली गई हैl अर्शी सलीम हाशमी जिन्होंने इस किताब में देवबंदी अतिवाद की एतेहासिक बुनियादों पर एक बाब लिखी है लिखती हैं “ बुनियाद परस्त इस्लाम की इस जेहत को केन्द्रीय धारे के मीडिया और शैक्षिक छात्रवृत्ति में बड़े पैमाने पर या तो अन देखा कर दिया गया है या इसे गलत अंदाज़ में समझा गया है”l

URL for English article: http://newageislam.com/islamic-society/ghulam-rasool-dehlvi,-new-age-islam/darul-uloom-deoband-against-the-‘erroneous’-thoughts-of-the-tablighi-jama’at--a-critical-analysis-of-the-key-allegations-in-the-deoband’s-fatwa-against-the-tj/d/112468

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/ghulam-rasool-dehlvi,-new-age-islam/darul-uloom-deoband-against-the-‘erroneous’-thoughts-of-the-tablighi-jama’at-دارالعلوم-دیوبند-تبلیغی-جماعت-کے--غلط--نظریات-کے-خلاف--تبلیغی-جماعت-کے-خلاف-دیوبند-کے-فتوی-میں-اہم-الزامات-کا-تجزیہ/d/113098

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/ghulam-rasool-dehlvi,-new-age-islam/darul-uloom-deoband-against-the-‘erroneous’-thoughts-of-the-tablighi-jama’at--दारुल-उलूम-देवबंद-तबलीगी-जमाअत-के--गलत--सिद्धांतों-के-खिलाफ/d/115742

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