
मुजाहिद हुसैन, न्यु एज इस्लाम
27 जनवरी, 2013
भारत के साथ बढ़ते हुए तनाव के कारण पाकिस्तान के सशस्त्र धार्मिक दल कुछ हद तक राहत महसूस कर रहे हैं और इस उम्मीद में हैं कि ये तनाव अतीत की तरह का रुख़ अख्तियार करेगा और एक बार फिर सत्तारूढ़ लोगों का शक्तिशाली गुट मुहिम चलाने की ओर आकर्षित हो जाएंगे। इसमें कोई शक नहीं कि भारत के साथ किसी प्रकार के क्षेत्रीय सहयोग की किसी संभावना को हमेशा 'आंतरिक हाथों' ने शक के मद्देनजर आगे बढ़ने से रोका है। यही काम भारत में कट्टरपंथी धार्मिक ताकतें करती हैं। भारतीय मीडिया के लड़ाके भी इसमें शामिल हो जाते हैं और इस प्रकार दोनों ओर तोपें तनी हुई नज़र आती हैं। दोनों देशों के अतिवादी अपने आपको लेकर फूले नहीं समाते और राष्ट्रीय स्तर पर गुस्से की फसल तैयार होती रहती है। बाहर बैठे हुए जो लोग इस दुश्मनी को सिर्फ क्षेत्रीय दुश्मनी का नाम देकर ''कूटनीतिक मोर्चे' पर इसके समाधान के हमेशा नए तरीके और संभावनाएं तलाश करने में व्यस्त रहते हैं। वो ये भूल जाते हैं कि दोनों ओर के चरमपंथियों ने दुश्मनी की एक अधिक घातक और प्रभावशाली परिभाषा निर्धारित कर दी है जो सिर्फ क्षेत्रीय नहीं बल्कि विशुद्ध रूप से धार्मिक है। पाकिस्तान के चरमपंथियों को पूरा भारत एक मंदिर के रूप में नज़र आता है जिसमें हिंसक हिंदू पुजारी पाकिस्तान की बर्बादी की मन्नतें मांग रहा होता है जबकि भारतीय चरमपंथियों को पाकिस्तान एक व्यापक मस्जिद के रूप में नज़र आता है जिसके आंगन में इस्लामी सैनिक हिंदू भारत पर चढ़ाई की अमली तैयारी में लगे होते हैं।
अगर हम एक अर्से से देरी का शिकार इस 'पवित्र युद्ध' के बारे में जायज़ा लेने के लिए अपने चारों तरफ नज़र डालें बल्कि सिर्फ ये देखें कि कि हमारे सत्तारूढ़ लोगों ने पाकिस्तान की नई पीढ़ी की शिक्षा और प्रशिक्षण की भावना के तहत पाकिस्तान के पड़ोसियों के बारे में किस तरह का पाठ्यक्रम तैय्यार किया है तो ये बात बहुत स्पष्ट होकर सामने आती है कि पाकिस्तान में बच्चों को पढ़ाई जाने वाली किताबों में भारत हमारा सबसे खतरनाक और घातक दुश्मन है। इसकी वजह भारत की हिंसक हिंदू मानसिकता है जो पाकिस्तान के मुसलमानों को किसी स्थिति में बर्दाश्त नहीं कर सकता। इस दृष्टिकोण को भारत के धार्मिक जुनूनी भी परवान चढ़ाते हैं और पाकिस्तान के बारे में उनकी दुश्मनी सिर चढ़कर बोलती हुआ मिलता है। दोनों ओर के जंग चाहने वाले लोग अच्छी तरह जानते हैं कि 'बुज़दिल' राजनेता दोनों देशों में युद्ध से डरे रहते हैं और आसानी के साथ ऐसी किसी हालात को पैदा नहीं होने देंगे कि दो परमाणु शक्ति सम्पन्न पड़ोसी एक दूसरे को मिट्टी में मिला देंगे। ये वो दृष्टिकोण है जो छोटे पैमाने पर घुसपैठ को बढ़ावा देता है और दोनों ओर सशस्त्र दल मजबूत होते रहते हैं। दोनों देशों के सैन्य संगठन और खुफिया एजेंसियां आसानी से ऐसे सशस्त्र समूहों के संरक्षण में व्यस्त रहती हैं जो सीमा पार या सीमा के भीतर ही विरोधी पक्ष के हितों को नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखती हैं।
जब छोटे पैमाने की घुसपैठ का सिलसिला चल निकलता है तो हिंसक धार्मिक समूहों में ऐसे लोग भी घुस जाते हैं जो अपनी विस्तार नीति के विचार के प्रभाव में सीमाओं से परे आतंकवाद के रसिया होते हैं। इसकी कई मिसालें हमारे सामने हैं, जैसे ड्रोन हमले में मौत के वक्त हरकतु जिहादे इस्लामी के प्लेटफार्म से जिहादे कश्मीर और बाद में जिहादे अफगानिस्तान में सक्रिय रहने वाले इलियास कश्मीरी की भूमिका है। इलियास कश्मीरी एक समय में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों की आंखों का तारा था और पूर्व राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने उसे उसकी बहादुरी को देखते हुए एक लाख रुपये इनाम दिया क्योंकि वो कश्मीर में लड़ाई के दौरान एक भारतीय सैनिक अधिकारी का सिर काटकर साथ ले आया था। इसके बाद इलियास कश्मीरी आगे बढ़ता हुआ अलकायदा से जुड़ गया। उसने परवेज़ मुशर्रफ पर हमलों से लेकर महरान बेस कराची तक जिहादी कार्रवाईयों का जाल फैला दिया और मौका मिलने पर सांप्रदायिक हत्याओं में भी शामिल रहा। ऐसी सैकड़ों मिसालें मौजूद हैं कि किस तरह 'सीमित पैमाने' पर जिहादी कार्रवाईयों से हिंसा की शुरूआत करने वाले आतंकवाद के बिंदु चरम पर पहुंचे और फिर वो अपने पहले के सहयोगियों के खिलाफ लड़ाई को तैय्यार हो गये।
अब ऐसे लगता है कि जैसे पाकिस्तान और भारत के आपसी सम्बंधों के हवाले से फैसले दोनों देशों के पास नहीं रहे। पाकिस्तान इस तरह के अधिकार से बहुत पहले छोड़ चुका था जबकि भारत तेजी के साथ इस प्रकृति के अधिकार को छोड़ने की प्रक्रिया से गुज़र रहा है। जहां पाकिस्तान में कई दशकों से भारत के बारे में हिंसक मानसिकता बनाई गयी है वहीं भारत में ये भूमिका वहां के जुनूनी तत्वों ने बखूबी निभाई है और दोंनो ओर ऐसे संगठन और समूह इतने शक्तिशाली हो चुके हैं कि वो जब चाहें दोनों देशों की फौज को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दें। अगर एक तरफ गोधरा की घटना एक स्पष्ट मिसाल है तो दूसरी ओर मुंबई हमला इससे भी स्पष्ट मिसाल है। दोनों देश ऐसे तत्वों के सामने बेबस हैं और मजबूरन इन हिंसक समूहों के तैयार किये 'देश प्रेम' को कुबूल करने को तैयार हैं। ये एक तकलीफदेह स्थिति है जो दोनों देशों की बहुसंख्यक जनता के हितों को कुचल कर रख देती है। दोनों देशों के विदेश मंत्री या राज़्य के दूसरे नुमाइदे लोग जब एक दूसरे के साथ मिलने के लिए आते हैं तो उनके हाथों में थमी हुई फाइलों में से अतिवादी झांकते हुए साफ दिखाई देते हैं। द्विपक्षीय वार्ता वास्तव में एक दूसरे के यहां परवरिश पाने वाले हिंसक चरमपंथियों के बीच विचारों और इरादों के तबादले तक सीमित होकर रह जाते हैं। इससे ज़्यादा आतंकवादियों की कार्यक्षमता का अनुमान क्या लगाया जा सकता है कि दोनों देशों के प्रतिनिधि मंडल एक दूसरे के सामने उग्रवादियों और आतंकवादियों के तैयार किये गये खाकों के प्रभाव में 'अर्थपूर्ण' वार्तालाप करते हैं। अर्थपूर्ण वार्तालाप के मद्देनज़र लड़ने पर अमादा मीडिया एक दूसरे के खिलाफ शब्दों की जंग छेड़े रखते हैं और इस तरह दुनिया समझ जाती है कि दक्षिण एशिया के दो परमाणु शक्ति सम्पन्न पड़ोसी धीरे धीरे 'शांति' की ओर बढ़ रहे हैं।
पाकिस्तान के धार्मिक नेताओं को विश्वास है कि भारत का अंत जिहाद के तहत होगा। लश्करे तैयबा के प्रकाशन संस्थान ने एक ज़बरदस्त जिहादी किताब 'गज़वए हिंद, में इस तरह के खात्मे के पवित्र खुशखबरी सुना दी है, दूसरी ओर भारतीय चरमपंथियों को पाकिस्तान जल्द ही भगवा रंग में रंगा नज़र आता है। अगर बाहरी दुनिया ये सोचती है कि पाकिस्तान और भारत की सरकारें अपने अपने यहां ताकतवर चरमपंथियों की अनदेखी करके किसी क्षेत्रीय सहयोग और शांति की बुनियाद रख सकेंगे तो ये एक मुश्किल काम है , लेकिन इस बात की संभावना अधिक है कि किसी भी ओर से 'पवित्र हमला' दक्षिण एशिया को अशांति और युद्ध के तूफान में धकेल देगा।
हाल ही में लिखी "पंजाबी तालिबान" सहित नौ पुस्तकों के लेखक, मुजाहिद हुसैन अब न्यु एज इस्लाम के लिए एक नियमित स्तंभ लिखते हैं। वो लगभग दो दशकों से इंवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट के तौर पर मशहूर अखबारों में लिख रहे हैं। उनके लेख पाकिस्तान के राजनीतिक और सामाजिक अस्तित्व, और इसके अपने गठन के फौरन बाद से ही मुश्किल दौर से गुजरने से सम्बंधित क्षेत्रों को व्यापक रुप से शामिल करते हैं। हाल के वर्षों में स्थानीय, क्षेत्रीय और वैश्विक आतंकवाद और सुरक्षा से संबंधित मुद्दे इनके अध्ययन के विशेष क्षेत्र रहे है। मुजाहिद हुसैन के पाकिस्तान और विदेशों के संजीदा हल्कों में काफी पाठक हैं। स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग की सोच में विश्वास रखने वाले लेखक मुजाहिद हुसैन, बड़े पैमाने पर तब्कों, देशों और इंसानियत को पेश चुनौतियों का ईमानदाराना तौर पर विश्लेषण पेश करते हैं।
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