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Hindi Section (17 Sep 2018 NewAgeIslam.Com)


Islam: A Religion of Peace or Violence? The Evidence in Quran- Part 2 इस्लाम धर्म शांति या हिंसा? कुरआनी प्रमाण

 

कनीज़ फातमा, न्यू एज इस्लाम

9 अगस्त 2018

इस लेख के पहले भाग में हमने कुरआनी आयतों में यह देखा कि अल्लाह को अत्याचार और हिंसा पसंद नहींl अल्लाह युद्ध की अनुमति तभी देता है जब कोई और रास्ता ना बचे, कुरआन का फरमान है:

“मगर जो लोग किसी ऐसी क़ौम से जा मिलें कि तुममें और उनमें (सुलह का) एहद व पैमान हो चुका है या तुमसे जंग करने या अपनी क़ौम के साथ लड़ने से दिलतंग होकर तुम्हारे पास आए हों (तो उन्हें आज़ार न पहुंचाओ) और अगर ख़ुदा चाहता तो उनको तुमपर ग़लबा देता तो वह तुमसे ज़रूर लड़ पड़ते पस अगर वह तुमसे किनारा कशी करे और तुमसे न लड़े और तुम्हारे पास सुलाह का पैग़ाम दे तो तुम्हारे लिए उन लोगों पर आज़ार पहुंचाने की ख़ुदा ने कोई सबील नहीं निकालीl” (4:90)

“ऐ अहले किताब तुम्हारे पास हमारा पैगम्बर (मोहम्मद सल्ल) आ चुका जो किताबे ख़ुदा की उन बातों में से जिन्हें तुम छुपाया करते थे बहुतेरी तो साफ़ साफ़ बयान कर देगा और बहुतेरी से (अमदन) दरगुज़र करेगा तुम्हरे पास तो ख़ुदा की तरफ़ से एक (चमकता हुआ) नूर और साफ़ साफ़ बयान करने वाली किताब (कुरान) आ चुकी है (15) जो लोग ख़ुदा की ख़ुशनूदी के पाबन्द हैं उनको तो उसके ज़रिए से राहे निजात की हिदायत करता है और अपने हुक्म से (कुफ़्र की) तारीकी से निकालकर (ईमान की) रौशनी में लाता है और राहे रास्त पर पहुंचा देता है (16)” (5: 15-16)

“(और मुसलमानों) तुमको क्या हो गया है कि ख़ुदा की राह में उन कमज़ोर और बेबस मर्दो और औरतों और बच्चों (को कुफ्फ़ार के पंजे से छुड़ाने) के वास्ते जेहाद नहीं करते जो (हालते मजबूरी में) ख़ुदा से दुआएं मॉग रहे हैं कि ऐ हमारे पालने वाले किसी तरह इस बस्ती (मक्का) से जिसके बाशिन्दे बड़े ज़ालिम हैं हमें निकाल और अपनी तरफ़ से किसी को हमारा सरपरस्त बना और तू ख़ुद ही किसी को अपनी तरफ़ से हमारा मददगार बनाl” (4:75)

“और अगर ये कुफ्फार सुलह की तरफ माएल हो तो तुम भी उसकी तरफ माएल हो और ख़ुदा पर भरोसा रखो (क्योंकि) वह बेशक (सब कुछ) सुनता जानता हैl” (8:61)

यह कुरआन ए पाक की वह आयतें हैं जिन पर विचार करना चाहिएl जिसने इस्लाम को एक धर्म के तौर पर पसंद किया (3:19) और इसे भाईचारगी और अमन व आश्ती के पैगामात से भर दिया, वह जंग पर अमन को इस हद तक वरीयता देता है कि पुरी मुस्लिम उम्मत और यहाँ तक कि खुद मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को भी अमन की पेशकश कुबूल करने का हुक्म देता है हालांकि दुश्मनों की नियत बुरी होl

सुलह हुदैबिया के पीछे असल जज़्बा यही थाl इब्ने इसहाक, इब्ने हश्शाम, इब्ने खलदून, इब्ने कसीर जैसे इतिहासकारों ने नक़ल किया है कि जब पैगम्बरे इस्लाम मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हज अदा करने के लिए मदीना से मक्का आए तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ सत्रह सौ सहाबा थे जो सारे इस्लाम के दुश्मनों से लड़ने के लिए आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इशारे पर अपना सब कुछ कुर्बान करने के लिए तैयार थे, लेकिन उन्हें कभी भी जंग करने की अनुमति नहीं दी गईl उन्हें कुरैश कबीले के उन दो सौ सवारों के साथ भी लड़ने की अनुमति नहीं दी गई जो सरकशी के साथ पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के खेमे तक पहुँच चुके थेl

जब पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने सत्रह सौ सहाबा के साथ हुदैबिया के मुकाम पर पहुंचे तो काफिरों ने उन्हें मक्का में दाखिल होने और हज अदा करने की अनुमति नहीं दीl पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह देखा कि जबरदस्ती मक्का शहर में दाखिल होने से खून ख़राबा होगाl यही कारण था कि आपने एक समझौता किया कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और आपके सहाबा को अगले साल हज करने से नहीं रोका जाएगा तब तक के लिए उन गिरोहों के बीच कोई जंग नहीं होगीl

इब्ने इसहाक लिखते हैं कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ मौजूद वह सभी सत्रह सौ बहादुर सहाबा इस अमन समझौते के हक़ में नहीं थेl हज़रत अबू बकर हज़रत उमर फारुक और हज़रत अली जैसे बड़े सहाबा इस समझौते के हक़ में बिलकुल नहीं थेl इब्ने हश्शाम ने जो रिवायत नक़ल की है उसके अनुसार हज़रत उमर फारुक ने तो पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से यहाँ तक सवाल कर लिया था कि क्या आप अल्लाह के रसूल नहीं हैंl

इस पर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जवाब दिया: “हाँ मैं जरूर अल्लाह का रसूल हूँ लेकिन हम मोमिन हैं और वह मोमिन नहीं”l इसके बाद हज़रत उमर रज़ीअल्लाहु अन्हु ने पुछा कि हमें क्यों अपने मज़हब के बारे में इतना डरना चाहिए और हमें क्यों दुश्मन का सामना करने से परहेज करना चाहिएl इस पर पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बड़ी सब्र व इस्तेकामत के साथ जवाब दिया:

मैं अल्लाह पर ईमान रखता हूँ और उसका रसूल हूँl मैं कभी अल्लाह के हुक्म के खिलाफ नहीं जाउंगाl” (इब्ने इसहाक, इब्ने हश्शाम- जिल्द-2 पृष्ठ 220)

अल्लाह की मर्जी यह थी कि पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और मक्के के काफिरों के बीच खून ख़राबा ना हो बल्कि इन दोनों पक्षों के बीच समझौता और अमन होl अंततः इस घटना के बाद पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सहाबा ने अमन समझौते का सबक सीखाl पूरा मामला कुछ इस प्रकार है:

पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के हुक्म की तामील में हज़रत अली रज़ीअल्लाहु अन्हु को अमन का समझौता लिखने का हुक्म दिया गया जिसका प्रारंभ बिस्मिल्ला हिर्रहमानिर्रहीम से थाl तथापि एक सख्त दिल काफिर सुहैल बिन उमर ने आपत्ति किया कि हम इस जुमले से परिचित नहीं हैंl उसने कहा कि इसके बजाए “बिस्मिकल्लाहुम्मा” लिखा जाना चाहिएl पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत अली को वही लिखने का हुक्म दिया जो सुहैल चाहता थाl हज़रत अली ने ऐसा ही कियाl

जब इस समझौते में शब्द “मुहम्मदुर्रसुलुल्लाह” लिखा गया तो सुहैल ने एक और आपत्ति की और कहा, “अगर हम मुहम्मद को अल्लाह का रसूल मान ही लेते तो हमारे बीच ना कोई मतभेद होता ना कोई जंग होतीl” उसने कहा कि मुहम्मद रसूलुल्लाह के बजाए आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का और आपके पिता का नाम लिखा जाएl

इस पर पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत अली को शब्द “रसूलुल्लाह” काटने का हुक्म दिया, लेकिन हज़रत अली इन शब्दों को मिटाना नहीं चाहते थेl मुहब्बत और फर्ज़ के बीच एक अजीब दुविधा शुरू हो गई लेकिन पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मज़ीद इस विवाद को बढ़ने से रोक दिया और खुद आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने शब्द “मुहम्म्दुर्रसुलुल्लाह” ,काट कर “मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह” लिख दियाl

मेरा उद्देश्य यहाँ इस अमन समझौते का पूरा विवरण पेश करना नहीं है, लेकिन मैं यहाँ एक महत्वपूर्ण बात अवश्य पेश करना चाहूंगी कि इस अमन समझौते के बीच बहुत सारे ऐसे नाज़ुक हालात पैदा हुए लेकिन हमारे पैगम्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अमन, आश्ती और सद्भाव के लिए सुहैल बिन उमर के सभी मांग स्वीकार कर लिएl

इतिहास हमें यह बताता है कि इस अमन समझौते को मक्के के काफिरों ने तोड़ा और इसके बाद जंग हुई, इसके बाद जब हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक विजेता की हैसियत से मक्के में दाखिल हुए तो आपने यह एलान फरमाया:

जो सुफियान के घर में पनाह ले वह मामून है, जो हकम बिन हज़म के घर में रहे वह भी मामून है”l

उद्देश्य इस बिंदु को स्पष्ट करना है कि आयत 2:191 नाज़िल हुई और हमारे पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सहाबा ने मुशरेकीन से जंग नहीं की बल्कि जंग केवल उन्हीं से की गई जिन्होंने समझौते तोड़े और मुसलमानों पर हमले किएl पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अमन पसंद मुशरेकीन और मुशरेकीन सेनानियों के बीच इम्तियाज़ करते हुए निम्नलिखित एलान फरमाया:

“जो सुफियान के घर में पनाह ले वह मामून है, हकम बिन हज़म के घर में रह रहे वह भी मामून हैंl”

इब्ने असीर की रिवायत के अनुसार पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने सहाबा से वादा लिया था कि मक्का विजय के दिन वह उस वक्त तक किसी को क़त्ल नहीं करेंगे जब तक कोई हथियार ना उठा ले और उन पर हमला ना करेl जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम काबे में आए तो आपने काफिरों और मुशरिकों से खिताब किया, आपने उन सबको माफ़ फरमा दिया और फरमाया, “आज भाईचारगी और सिला रहमी का दिन हैl” आपने केवल उसी दिन को भाईचारगी और सिला रहमी का दिन घोषित नहीं किया बल्कि जब आपने यह फरमाया तो उसमें आपने पूरी मानवता से खिताब किया:

“ऐ इब्ने आदम और पूरी दुनिया के महिलाओं और पुरुषों! तुम्हारा खून तुम्हारी दौलत और तुम्हारी इज्जत हमेशा हमेशा के लिए हराम कर दी गईl वह इसी तरह से हराम है जिस तरह यह दिन, यह पाक महीना और यह बैतूल हराम”l

उस दिन पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इंसानी ज़िन्दगी की हुरमत का एलान कियाl इस्टेनली लीन पोल ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सहिष्णुता, दरगुज़र और उदारता का इज़हार इन शब्दों में किया है:

“तथ्य कड़वे होते हैं और यह भी एक वास्तविकता है कि अपने दुश्मनों पर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सबसे बड़े विजय का दिन खुद उनके लिए अपने आप पर सबसे बड़े विजय का दिन थाl उन्होंने कुरैश के उन सभी अत्याचारों को माफ़ कर दिया जो उन्होंने इतने सालों तक आपके उपर ढाए थेl” उन्होंने उस दिन मक्का की पुरी आबादी को आम माफ़ी अता कर दी थीl (The Prophet and Islam)

एस पी इस्काट लिखते हैं:

“आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की फराखदिली और इंसानी दिल के बारे में आपका गहरा ज्ञान जिसने आपको एक महान लीडर बना दिया, आपके महान किरदार और मक्का विजय के दिन कुरैश के काफिरों की आम माफ़ी से स्पष्ट हैl”

(History of the Moorish Empire in Europe, Vol -1, pp 98-99 op.cit. The Arabian Prophet, p-390)

इस हवाले से कुछ बुनियादी सिद्धांत प्रदान करते हुए कुरआन कहता है:

“इसी सबब से तो हमने बनी इसराईल पर वाजिब कर दिया था कि जो शख्स किसी को न जान के बदले में और न मुल्क में फ़साद फैलाने की सज़ा में (बल्कि नाहक़) क़त्ल कर डालेगा तो गोया उसने सब लोगों को क़त्ल कर डाला और जिसने एक आदमी को जिला दिया तो गोया उसने सब लोगों को जिला लिया और उन (बनी इसराईल) के पास तो हमारे पैग़म्बर (कैसे कैसे) रौशन मौजिज़े लेकर आ चुके हैं (मगर) फिर उसके बाद भी यक़ीनन उसमें से बहुतेरे ज़मीन पर ज्यादतियॉ करते रहेl” (5:32)

सुलह हुदैबिया के घटना से मक्का विजय के दिन अबू सुफियान के और हकम बिन हज़म के घर में अमन व शांति की ज़मानत से हमें इस्लाम की मंशा का अंदाज़ा लगाना चाहिएl इस दौर में जब कुछ लड़ाकू गिरोह इस्लाम को बदनाम करने के दर पे हैं हमें लगातार कुरआन के इन संदेशों का प्रचार करना चाहिए जिनका अमन स्थापित करने में एक बड़ा हिस्सा हैl इस्लाम मोमिनों को उन हालात में भी अमन स्थापित करने का हुक्म देता है कि जब कोई दुश्मन अमन की पेशकश करेl

अल्लाह का फरमान,

“और अगर ये कुफ्फार सुलह की तरफ माएल हो तो तुम भी उसकी तरफ माएल हो और ख़ुदा पर भरोसा रखो (क्योंकि) वह बेशक (सब कुछ) सुनता जानता हैl” (8:61)

इस्लाम का संदेश बहुत स्पष्ट हैl इसके बावजूद भी हम यह देखते हैं कि कुछ लड़ाका गिरोह जमीन के उपर आतंकवाद और फसाद मचा रहे हैंl ऐसे लड़ाकों के लीडर हो सकता है कि इस तरह के इस्लामी संदेशों से अवगत हों या अनभिज्ञ हों, लेकिन हमें यह बात दिमाग में रखनी चाहिए कि आज के युवा इस तरह के लीडरों के प्रोपेगेंडे का शिकार हो रहे हैंl इसी लिए हमें इस्लाम के असल पैगामों का प्रचार करते रहना चाहिए, इस आशा पर कि newageislam.com पर अतिवाद के खिलाफ हमारे संघर्ष के साकारात्मक परिणाम बरामद हो रहे हैंl इसके अलावा यह कि दुसरे देशों को भी मुसलामानों के धार्मिक अधिकारों सहित दुसरे इंसानी अधिकारों की पासदारी को भी सुनिश्चित बनाना चाहिए, इसलिए कि हो सकता है कि उनके अधिकारों के उल्लंघन से इन लड़ाका गिरोहों को भोले मुस्लिम युवाओं की नाकारत्मक मन बनाने में मदद मिले ताकि वह इस्लाम के बारे में उनकी गलत शिक्षाओं को स्वीकार करें और इन लड़ाकों के रास्ते पर निकल पड़ें, और इसके बाद सुधार की कोई भी कोशिश उन्हें अमन के रास्ते पर दुबारा नहीं ला सकतीl

URL for English article: http://www.newageislam.com/islamic-ideology/kaniz-fatma,-new-age-islam/islam--a-religion-of-peace-or-violence?-the-evidence-in-quran--part-2/d/116083

URL Part-1:  http://www.newageislam.com/urdu-section/kaniz-fatma,-new-age-islam/islam--a-religion-of-peace-or-violence?-the-evidence-in-quran---part-1--(اسلام-امن-یا-تشدد-کا-مذہب؟-(-حصہ-1/d/116108

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URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/kaniz-fatma,-new-age-islam/islam--a-religion-of-peace-or-violence?-the-evidence-in-quran--part-2--इस्लाम-धर्म-शांति-या-हिंसा?-कुरआनी-प्रमाण/d/116393

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