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Hindi Section (29 Jun 2018 NewAgeIslam.Com)


Islamic Postulates of Ijtihad (Rethinking) And ‘Ismah’ (Infallibility) इज्तेहाद और ‘इस्मत’ का इस्लामी सिद्धांत और जंगे जमल की रौशनी में सहाबा के बीच मतभेद की वास्तविकता भाग-1

 

 

 

गुलाम रसूल देहलवी, न्यू एज इस्लाम

02 जून 2018

एक प्रतिष्ठित भारतीय आलिम और क्लासिकी इस्लामी ज्ञान के विशेषज्ञ डॉक्टर अलीम अशरफ जायसी ने अपने हालिया अरबी लेख में बजा तौर पर यह कहा है की हमारे सामने जो समस्याएं हैं उसकी बुनियादी वजह यह हैं:

पहली वजह यह है की हम अपने अकीदे के इल्म और कलाम के इल्म से संबंधित मामलों में गुफ्तगू करते हुए फिकह, खुतबात और फ़ज़ाइल की किताबों पर भरोसा करते हैंl

दूसरी वजह यह है की हम अपने शेखों और उलेमा पर इतना आँख बंद करके भरोसा करते हैं की उनके बयानों को इस्मत का दर्जा अता कर देते हैंl हम उनसे और ख़ास तौर पर इस उम्मत की पहली नस्ल से गलती या गुनाह की संभावना भी कल्पना नहीं कर सकतेl और अगर उनके बारे में कुछ साबित हो भी जाए लेकिन वह हमारे खयालात या कयास के खिलाफ हो तो हम खामोशी अख्तियार कर लेते हैं या तावील की मदद से हम अपने फिकही स्टैंड के जवाज़ पेश करते हैं और कभी कभी बात मुनाज़रे और विवाद तक भी पहुँच जाती हैl इसकी अनगिनत मिसालें हैंl जिसमें से एक जंगे जमल की घटना हैl

इज्तेहाद और इस्मत

इस्लामी अकीदों में से एक विशेष अकीदा “इस्मत” अर्थात खुदा की मदद से गुनाहों और मानवीय गलतियों से पाक होने का अकीदा हैl लेकिन इसे केवल नबियों और रसूलों की तरफ ही मंसूब किया जा सकता हैl नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सहाबा सहित सभी लोग अपने धार्मिक और सांसारिक दोनों मामलों में गलतियां कर सकते हैंl तथापि, अगर उनसे इज्तेहाद में कोई खता सरजद हो जाए तो भी नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सहाबियत के शरफ से वह महरूम नहींl

इस्लामी इतिहास में कुछ घटनाएं ऐसे भी घटित हो चुके हैं जिनसे यह ज़ाहिर होता है की नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के करीबी सहाबा से भी “इज्तेहादी खता” सरजद हो चुकी हैl बेशक उनकी इस इज्तेहादी खता को जान बुझ कर नहीं बल्कि अनजाने में कल्पना किया जाएगाl और उनकी लगभग सभी इज्तेहादी खता की बुनियाद कुरआन की भिन्न समझ और मज़हबी नियमों की भिन्न व्याख्या पर थीl इसे हम फिकह इस्लामी की इस्तेलाह में “ इज्तेहादी खता” कहते हैंl

इस्लामी फिकही कानून के अनुसार अगर किसी मुसलमान के अन्दर इज्तेहाद की सलाहियत मौजूद है तो उसे किसी दुसरे मुजतहिद की पैरवी करना जरुरी नहीं हैl कुरआन और सुन्नत के बाद इस्लामी अहकामात और कानून प्राप्त करने में इज्तेहाद का एक महत्वपूर्ण किरदार हैl शरीअत के पहले दो बुनियादी स्रोत के विपरीत कि जिन का सिलसिला रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की रहलत के साथ ही टूट चुका है, बौद्धिक और रचनात्मक सोच और दीन के मामलों में समकालीन समस्याओं पर गौर व फ़िक्र का अमल मुसलसल इज्तेहादी ही हैl लेकिन इसके मजाज़ केवल वही लोग हैं जो कुरआन व हदीस के नुसुस से सीधे अर्थ और अहकाम प्राप्त करने के काबिल हैंl चूँकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सहाबा फिकह के बुनियादी स्रोत- नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से करीब तरीन थे और बुनियादी इस्लामी उलूम में अच्छी महारत भी रखते थे, इसलिए इज्तेहाद उनके लिए एक जायज अमल थाl इसलिए, रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लगभग सभी सहाबा मुजतहिद थे और इसी लिए कभी कभी उन्होंने दूसरों के इज्तेहाद पर निर्भर नहीं रहे और उन मामलों में उन्होंने अपने इज्तेहाद पर अमल किया जिसका कोई स्पष्ट आदेश कुरआन या प्रमाणित हदीसों में उन्हें नहीं मिलाl

जब हम यह जान चुके कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के हर सहाबी मुजतहिद की हैसियत रखते थे इसलिए, वह अपने समाजी व मज़हबी और राजनीतिक मामलों के हल के लिए अपने दृष्टिकोण को चुनने में हक़ पर थे, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की यह हदीस भी हमारे ज़ेहन में होनी चाहिए: “अगर कोई इल्म वाला या बुद्धिमान इज्तेहाद करता है और वह सहीह फैसले तक पहुँच जाता है तो उसे दो अज्र मिलेंगेl और अगर वह उसमें खता करता है तो उसे एक अज्र मिलेगा” (बुखारी, मुस्लिम और अबू दाउद)l

इसलिए, इस्लाम के शुरूआती दौर में राजनीतिक विवाद, अंतर्विरोध और गृहयुद्ध जैसे जो हालात पैदा हुए वह सीधे तौर पर सहाबा के इज्तेहादी खताओं और उनके इज्तेहाद से सहाबा के मतभेद का नतीजा थेl तथापि, नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सहाबा से इस तरह के फिकही मतभेद में किसी भी मुफ़ादपरस्ती का गुमान नहीं किया जा सकताl क्योंकि अल्लाह ने पैगम्बर ए इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सोहबत और अखलाकी और रूहानी तरबियत के जरिये उन नुफुस ए कुदसिया को बुरी खस्लतों और गलत इरादों से पाक कर दिया था, जैसा कि कुरआन में अल्लाह का फरमान है:

“ख़ुदा ने तो ईमानदारों पर बड़ा एहसान किया कि उनके वास्ते उन्हीं की क़ौम का एक रसूल भेजा जो उन्हें खुदा की आयतें पढ़ पढ़ के सुनाता है और उनकी तबीयत को पाकीज़ा करता है और उन्हें किताबे (ख़ुदा) और अक्ल की बातें सिखाता है अगरचे वह पहले खुली हुई गुमराही में पडे थेl” (3:164)

जंग ए जूमल

इस्लामी इतिहास में सहाबा के बीच राय में मतभेद और इज्तेहाद में मतभेद के नतीजे में जो सबसे अलम नाक हादसा पेश आया वह जंग ए जमल का हादसा थाl इस जंग में 5 हज़ार से अधिक लोग हलाक हुए थे लेकिन इसके बाद भी कोई स्पष्ट तौर पर यह नहीं कह सकता की कौन गलत था या कौन सहीह थाl

असल में, इस मतभेद की प्रकृति राजनीतिक थी ना कि सामाजिक या धार्मिकl लेकिन अत्यंत रक्तरंजित इस्लामी इतिहास में इस मतभेद पर एक बहुत बड़ा विवाद पैदा हो गया जिसका नतीजा एक बड़े युद्ध के रूप में सामने आयाl अगर हम वास्तव में एक हकीकत पसंदाना दृष्टिकोण से जंग ए जमल का विश्लेषण करना चाहें तो हमें उस जंग के कारण को समझने के लिए इस पुरे घटना को समझने की जरुरत हैl

जंग की पुरी कहानी

मदीना के एक बागी गिरोह की तरफ से तीसरे इस्लामी खलीफा हज़रात उस्मान रज़ीअल्लाहु अन्हु के कत्ल के बाद नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दो बड़े सहाबा हज़रत जुबैर और तलहा ने इमाम अली (रज़ीअल्लाहु अन्हुम अजमईन) से हज़रात उस्मान के कातिलों को कुरआनी अहकाम के मुताबिक़ सज़ा देने का मुतालबा कियाl इमाम अली (रज़ीअल्लाहु अन्हु) ने कहा की दूसरों के अपराध के लिए किसी को भी जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए और इस तरह हज़रात अली ने उनसे मतभेद कियाl बल्कि हज़रात अली ने कुरआन करीम के इस स्पष्ट हुक्म पर अमल किया:

“और याद रहे कि कोई शख्स किसी दूसरे (के गुनाह) का बोझ नहीं उठाएगा और अगर कोई (अपने गुनाहों का) भारी बोझ उठाने वाला अपना बोझ उठाने के वास्ते (किसी को) बुलाएगा तो उसके बारे में से कुछ भी उठाया न जाएगा अगरचे (कोई किसी का) कराबतदार ही (क्यों न) हो (ऐ रसूल) तुम तो बस उन्हीं लोगों को डरा सकते हो जो बे देखे भाले अपने परवरदिगार का ख़ौफ रखते हैं और पाबन्दी से नमाज़ पढ़ते हैं और (याद रखो कि) जो शख्स पाक साफ रहता है वह अपने ही फ़ायदे के वास्ते पाक साफ रहता है और (आख़िरकार सबको हिरफिर के) खुदा ही की तरफ जाना हैl” (35:18)

हजरत अली का दृष्टिकोण सुनने के बाद जो कि उनके इज्तेहादी स्टैंड के विपरीत था, नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के यह दोनों सहाबी हज़रत जुबैर और हज़रत तलहा तीसरे खलीफ़ा खलीफा हज़रत उस्मान रज़ीअल्लाहु अन्हु के कत्ल का बदला लेने के लिए मक्का गए और उन्होंने हज़रत आयशा रज़ीअल्लाहु अन्हा के साथ एक मीटिंग कीl हज़रत आयशा रज़ीअल्लाहु अन्हा ने उनके स्टैंड की पुष्टि कीl उस समय अब्दुल्लाह बिन आमिर मक्का में आमिल थाl वह हज़रत आयशा रज़ीअल्लाहु अन्हा की हिमायत करने के लिए तैयार हो गएl और वह साज़िश करने वालों और कातिलों को तलाश करने और उनका दमन करने के लिए बसरा शहर की तरफ निकलेl

उधर दूसरी तरफ मदीना में फ़सादियों ने सहयोगी सेना के खिलाफ जंग लड़ने के लिए हज़रत अली रज़ीअल्लाहु अन्हु पर दबाव डाल दियाl यह वही समय था जब हज़रत अली के बड़े बेटे हज़रत इमाम हसन ने अपने वालिद को मशवरा दिया था की मुसलामानों को विरुद्ध ना निकलेंl हज़रत इमाम हुसैन के बड़े भाई इमाम हसन रज़ीअल्लाहु अन्हु ने जो की अभी प्रारम्भिक आयु में थे अपने वालिद को किसी भी सशस्त्र विवाद में शामिल ना होने के मशवरा दिया थाl अमन पसंद हज़रत अली रज़ीअल्लाहु अन्हु ने सुलह के जरिये अमन बहाल करने की पुरी कोशिश कीl इस अज़ीम उद्देश्य के लिए उन्होंने अमन मुजाकरात के लिए अपने एक अनुयायी कअकाअ बिन अम्र को नियुक्त कियाl

हज़रत अली रज़ीअल्लाहु अन्हु ने अगले दिन बसरा रवाना होने का एलान किया, लेकिन साथ ही साथ उन्होंने इस बात की भी तस्दीक की कि उनका मकसद जंग व जिदाल नहीं बल्कि अमन का कयाम हैl उन्होंने एक यह सरकारी हुक्म भी जारी किया है की जो हज़रत उस्मान गनी रज़ीअल्लाहु अन्हु का घेराव करने में किसी भी तौर पर शामिल था वह मेरी फ़ौज से निकल जाएl आपने मुनाफिकों और इस्लाम के भीतरी दुश्मनों के बीच खौफ व हरास का माहौल पैदा कर दियाl मुनाफिकों और फ़सादियों ने यह महसूस किया कि अब तक तो केवल तलहा और जुबैर ही हज़रत उस्मान रज़ीअल्लाहु अन्हु के कातिलों को तलाश कर रहे थे, लेकिन अब तो ऐसा लगता है की अली रज़ीअल्लाहु अन्हु भी उन्ही के साथ शामिल होने वाले हैंl इसपर उसे यह महसूस हुआ कि अगर मुसलामानों के इन दोनों गिरोहों ने मकतूल हज़रत उस्मान रज़ीअल्लाहु अन्हु की खातिर एकमत हो गए तो वह जरुर वास्तविक अपराधियों अर्थात उनके अपने ही अनुयायियों को ढूंड लेंगेl इसलिए उसने अपने अनुयायियों की एक सामूहिक मीटिंग की जिसमें उसने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के उन तीन सहाबा हज़रत तलहा, हज़रत जुबैर और हज़रत अली रिज़वानुल्लाह तआला अलैहिम अजमईन को कत्ल करने का हुक्म दे दियाl तथापि, उसने कुछ स्पष्ट कारणों की बिना पर उन्हें हज़रत अली रज़ीअल्लाहु अन्हु का खेमा ना छोड़ने का मशवरा दियाl

सुलह की कोशिश

हकीकत तो यह थी की दोनों गिरोहों के रहनुमा अमन बहाल करना और जंग से बचना चाहते थेl उन्हें इस बात का पूरा एहसास था की जंग से उन्हें कुछ भी हासिल होने वाला नहीं हैl यहाँ तक कि जब दोनों फौजें एक दुसरे के आमने सामने हुईं तो अमन समझौते अंजाम दे दिए गए थे और खुशगवार वार्ता कामयाबी के साथ अंजाम दिए जा चुके थेl लेकिन हज़रत अली की फ़ौज में छिपे हुए शरारती तत्व (मुनाफिक और इस्लाम के भीतरी दुश्मन) जिन्होंने हज़रत उस्मान के खिलाफ बगावत की थी, उनके अन्दर यह तास्सुर पैदा हुआ कि इस मामले में किसी भी प्रकार की सुलह से उनके हितों पर जद लगेगीl इसलिए, उन्होंने सुलह की कोशिश में खलल डाल दिया और एक ऐसी स्थिति पैदा की कि दोनों गिरोह एक दुसरे के खिलाफ हथियार उठाने पर मजबूर हो गएl उन्होंने एक योजना तैयार की और दो छोटे छोटे गिरोह तैयार किएl एक ने हज़रत अली रज़ीअल्लाहु अन्हु की फ़ौज पर हमला किया और दुसरे ने इत्तेहादी फ़ौज पर हमला कर दियाl दोनों में से हर एक ने यह समझा कि दुसरे ने हमला किया है जो कि अमन समझौते के विपरीत है, और फिर वह हिंसा पर उतर आए और बदला लेने लगेl इस तरह का हादसा पेश आया हो की दो मुस्लिम गिरोहों के बीच एक खुंरेज़जंग साबित हुईl

बेशक, जंग ए जमल पुरी मुस्लिम उम्मत के लिए बड़ी तबाही का कारण बनी जिसमें हज़रत तलहा और जुबैर (रज़ीअल्लाहु अन्हुमा) सहित हज़ारों हज़ार सहाबा क़त्ल किए गए और हज़रत आयशा रज़ीअल्लाहु अन्हा गिरफ्तार की गईंl इसके बावजूद आज हमारे लिए यह मुनासिब नहीं है कि हम किसी एक पक्ष को जंग ए जमल का आरोपी ठहराएंl एक ओर नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की प्यारी बेटी हज़रत फातमा के शौहर और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चाचा के बेटे अली रज़ीअल्लाहु अन्हु थे और दूसरी तरफ नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की महबूब बीवी और तफसीर, हदीस, फिकह और दुसरे अरबी और इस्लामी उलूम में माहिर हज़रत आयशा सिद्दीका रज़ीअल्लाहु अन्हा थींl

सुफियानियत का बढ़ावा

जंग ए जमल के एक निष्पक्ष विश्लेषण से यह बात बिलकुल स्पष्ट हो जाती है की इस्लाम में सुफियानियत का फितना इसी जंग से शुरू हुआ हैl

बेशक, किसी भी दृष्टिकोण से यह कल्पना नहीं किया जा सकता कि जंग ए जमल के पीछे दोनों सेनानी पक्षों के लीडर हज़रत अली या हज़रत आयशा के पेशेनजर कोई राजनीतिक लाभ थाl इसलिए कि स्पष्ट तौर पर इसकी वजह पूर्ण रूप से इज्तेहाद की बुनियाद पर एक फिकही मतभेद थी, जिसका बाद में फ़सादियों ने अपने तुच्छ लाभ के प्राप्ति के लिए शोषण कियाl

लेकिन यह असल में ऐसा पहला मौक़ा था जब मुसलामानों में वह भी इस्लाम की सबसे उच्च नस्ल में एक दुसरे के खिलाफ मुठभेड़ और जंग का हादसा पेश आयाl असल में अगर यह हादसा पेश ना आया होता तो जंग ए सिफ्फीन (657 ई०) में एक बार फिर खाना जंगी की स्थिति पैदा नहीं होतीl और इस तरह हमारे इतिहास में इस्लाम के अन्दर सुफियानियत का खतरा इतना बड़ा नहीं होताl अबू सुफियान के बेटे अमीर मुआविया के दौर ए हुकूमत में उमवी हुकूमत के लिए इस्लाम के सुनहरे दौर को तानाशाही, अत्याचार और निरंकुश शाशन में परिवर्तित करना आसान नहीं होताl और सबसे बड़ी बात यह है की यज़ीदी बुराइयों से इस्लाम को निजात दिलाने वाले और हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के प्यारे नवासे हज़रत इमाम हुसैन की शहादत कर्बला में ना हुई होती जो की इस्लामी इतिहास का सबसे खुंरेज़ वाकिया हैl

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URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/ghulam-rasool-dehlvi,-new-age-islam/islamic-postulates-of-ijtihad-(rethinking)-and-‘ismah’-(infallibility)--اجتہاداور--عصمت-کا-اسلامی-اصول-اور-جنگ-جمل-کی-روشنی-میں-صحابہ-کرام-کے-درمیان-اختلاف-رائے-کی-حقیقت---حصہ-1/d/115490

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/ghulam-rasool-dehlvi,-new-age-islam/islamic-postulates-of-ijtihad-(rethinking)-and-‘ismah’-(infallibility)--इज्तेहाद-और-‘इस्मत’-का-इस्लामी-सिद्धांत-और-जंगे-जमल-की-रौशनी-में-सहाबा-के-बीच-मतभेद-की-वास्तविकता-भाग-1/d/115672

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