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Hindi Section (02 Feb 2019 NewAgeIslam.Com)


Do Muslims Support Triple Talaq Bill Brought by the Government of India? मुसलमान एक साथ तीन तलाक़ ए बिदअत के खिलाफ सरकार की ओर से पेश की गई बिल का समर्थन और इसका स्वागत करते हैं?



मौलाना डाक्टर फुरकान मेहरबान अली अल मदनी

१० जनवरी, २०१९

केंद्र सरकार की ओर से २७ दिसंबर, २०१८ को पार्लियामेंट में एक बैठक की तीन तलाक़ के खिलाफ जो बिल पेश किया गया है कुरआन और हदीस की इत्तेबा करने वाले मुसलमान जो सल्फी और अहले हदीस के नाम से पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं इसका स्वागत करते हैं, इसलिए कुरआन और हदीस के दलीलों से यही साबित है कि एक बैठक की एक साथ तीन तलाक़ तलाक़ ए बिदअत है, हराम हैl और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की अत्यधिक नाराजगी का कारण हैl अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक ही बैठक में तीन तलाक़ देने का कुरआन के साथ मज़ाक और खिलवाड़ बताया है, और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ऐसे व्यक्ति पर गंभीर क्रोध को देख कर एक सहाबी ने उस व्यक्ति को आपसे क़त्ल करने की अनुमति मांगी, इसलिए कि यह कुरआनी आयतों के विरुद्ध है, इसी प्रकार रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सहिहुल सनद हदीसों और फतवों के भी विरुद्ध हैl और एक साथ तीन तलाक़ देने वालों को अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर रज़ीअल्लाहु अन्हु कोड़ों की सज़ा भी देते थे, उसके बाद फर्क कराते थेl अगर कोई एक बैठक में तीन तलाक़ देता है तो वह कुरआन व हदीस के अनुसार केवल एक तलाक़ ए रजई स्थित होगी तीन नहीं और तलाक़ देने वाले पति को इद्दत के पूरा होने से पहले पहले अपनी तलाक़ से रुजूअ (वापसी) करने का पूरा हक़ प्राप्त होगा और इद्दत गुज़र जाने के बाद दोनों दोबारा आपस में मिलना चाहें तो नए महर के वाली की अनुमति और नए अकद ए निकाह के साथ मिल सकते हैं, इसी लिए अक्सर मुस्लिम देशों ने एक बैठक में तीन तलाक़ को बातिल करार दे कर इस पर बैन (BAN) लगा कर इसके विरुद्ध कानून पास कर दिया हैl

इस प्रकार वहाँ यह मुश्किल बहुत पहले जड़ से समाप्त हो चुकी हैl और इस तलाक़ ए बिदअत के खिलाफ बिल के विरुद्ध हज़रत मौलाना बदरुद्दीन अजमल साहब जैसे वही लोग कर रहे हैं जो कुरआन व हदीस की स्पष्ट नुसूस के मुकाबले अपने उलेमा ए अईम्मा और मशाइख की तकलीद की दलदल में फंसे हुए हैं, और अपने आँखों पर उन्होंने तकलीद की पट्टी बहोत कास कर बाँध रखी है जिसकी वजह से उन्हें कुरआन व हदीस के दलीलों की रौशनी दिखाई नहीं देती या कुछ नज़र आती भी है तो इससे वह जानबूझ कर जाहिल बन जाते हैंl या इस रौशनी के उनके इमाम के कौल के खिलाफ होने के कारण इसके साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार विकल्प करते हैं और जो मानते हैं उनसे शत्रुता करते हैंl ऐसे ही मुतअस्सिब मुकल्लिदीन हज़रात लोग तीन तलाक़ ए बिदअत के शैदाई हैं और इस जाहिलाना कार्य और ज़ालिमाना बिदअत को हर कीमत पर बाकी रखना चाहते हैं, जब कि उनके विश्वसनीय किताब हिदाया में एक शब्द से तीन तलाक या एक तुहुर में तीन तलाक़ को सराहतन बिदअत कहा गया हैl (अल हिदाया, किताबुत्तलाक, संकलन: अल शैख़ अली बिन अबी बकर अलमुर गैनानी (५९३ हिजरी) जिल्द:१, पृष्ठ: २४७, दारुल क़ुतुब अल इल्मिया बैरुत लेबनान) और मुतअस्सिब मुकल्लेदीन हज़रात एक मजलिस की तीन तलाक़ के जवाज़ के साथ साथ एक दो रात के लिए नाजायज निकाह ए हलाला के जवाज़ के भी कायल हैं बल्कि इसे सवाब का काम भी समझते हैं और इससे उनका उद्देश्य केवल अपनी तकलीदी मसलक की हिफाज़त करना है जब कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हलाला करने वाले और करवाने वाले दोनों पर अल्लाह पाक की लानत भेजी है, इसके करने वाले को मलउन और माँगा हुआ सांड बताया हैl और हज़रत अमीरुल मोमिनीन उमर रज़ीअल्लाहु अन्हु ने हलाला करने वाले और करवाने वाले और जिस औरत का हलाला किया जाए उसको पत्थर से मार मार कर रजम करके हालाक करने की धमकी भी दी हैl और हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ीअल्लाहु अन्हु के बयान के अनुसार सहाबा रज़ीअल्लाहु अन्हु इस प्रकार के हलाला मुरव्वजा गैर शरईया बिनियतुल तहलील को सफाह अर्थात ज़िना शुमार करते थेl

और इस प्रकार के नाजायज निकाह हलाला सभी सहाबियों और उनके बाद जम्हूर उलेमा के नज़दीक औरत को पहले पति के लिए हलाल करने की शर्त या नियत के साथ निकाह हलाला निकाहे फासिद और बातिल है इसलिए इसके माध्यम से वह औरत अपने पहले पति के लिए हलाल भी नहीं होगीl और मुतअस्सिब मुकल्लेदीन हज़रात की ओर से एक मजलिस की तीन तलाक़ के खिलाफ बिल की मुखालफत इसी लिए है कि एक मजलिस की तीन तलाक़ के जवाज़ और उसके जारी रहने ही की शकल में लोग उनसे प्रचलित हलाला के जवाज़ का फतवा लेने आने पर मजबूर होंगेl इसी प्रकार तीन तलाक़ ए बिदअत के खिलाफ बिल से वह लोग परेशान नज़र आ रहे हैं जिन्हें एक तीन तलाक़ वाक़े होने की सूरत में मुत्लका सलासा औरत का हलाला करने के लिए शरीअत पर अमल करने कराने के नाम पर मिस्कीन कमज़ोर पीड़ित परेशान औरत की इज्जत व आबरू लुटने का सुनहरा मौक़ा मिल जाता थाl और कभी कभी उनमें से कुछ लोगों को कुछ आमदनी भी हीओ जाती थीl और इस बिल से वह लोग भी परेशान और नाराज़ हैं जो बेइज्ज़ती के इस काम प्रचलित हलाला को सवाब का काम समझ कर अंजाम देते थे और दोसरों को भी इस देवसी के काम को सवाब का काम बता कर अंजाम देने की तरगीब दिलाते थेl इस तरह एक मजलिस की तीन तलाक़ के तीन जारी रहने से बहोत लोगों के गलत और नाजायज उद्देश्य पुरे हो रहे थे इसलिए एक मजलिस की तीन तलाक़ पर बैन (BAN) लगने से उनका परेशान होना आश्चर्य की बात नहींl

शायद पाठक आश्चर्य से पूछेंगे कि क्या कोई भला मुसलमान प्रचलित हलाला जैसे बेईज्ज़ती और देवसी के बुरे काम को अज्र व सवाब का काम समझ सकता है तो मैं कहूँगा कि हाँ ऐसे भी मुसलमान मौजूद हैं यकीन ना आए तो फतावा दारुल उलूम देवबंद सातवीं जिल्द पृष्ठ संख्या: ४९२ जिसमें मुरत्तब फतावा शैख़ जफीर साहब फतावा दुर्रे मुख्तार की इबारत नकल फरमाते हैं: وکرہ التزو ج للثانی تحریماً لحدیث ’’ لعن المحلّل و المحلّل لہ‘‘ بشرط التحلیل الخ و ان حلّت للّا وّل الخ ۔ أمّااذا أضمر ذلک لا یکرہ ، بل یحلّ لہ فی قولھم جمعاً ، و کان ما جوو القصد الاصلاح (वद्दुल मोह्तार अला अद्द्वुल मुख्तार, लील शैख़ मोहम्मद अमीन अल शहीर बा बिन अशामी (१२५२ हिजरी) ज़करिया बुक डिपो, ४८,५)l अरबी इबारत का अनुवाद: मुत्लका सलासा को पहले पति के लिए हलाल करने के लिए किसी दोसरे व्यक्ति से उसका निकाह करते समय हलाल करने की शर्त के साथ निकाह करना मकरूह तहरीमी (अर्थात हराम) है, हालांकि इस प्रचलित निकाह हलाला (मकरूह तहरीमी) के जरिये वह औरत पहले पति के लिए हलाल हो जाएगीl और इस निकाह का मकरूह तहरीमी होना रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इस हदीस की वजह से है जिसमें नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हलाला करने वाले और कराने वाले दोनों पर अल्लाह की लानत भेजी है, लेकिन अगर हलाला करने वाला निकाह करते समय खुले शब्दों में हलाला की शर्त नहीं करता लेकिन अपने दिल में पहले पति के लिए इस औरत को हलाल करने की नियत करता है तो यह निकाह हलाला मकरूह तहरीमी नहीं होगा बल्कि जायज होगाl और अगर हलाला करने वाले की नियत इस्लाह की है अर्थात पहले पति की मदद और घर आबाद करने की है तो उसका यह एक दो रात के लिए निकाह हलाला करना उसके लिए सवाब का कारण होगा, अर्थात इस प्रकार हलाला करने पर अज्र व सवाब भी मिलेगाl

आपने देखा कि इन मुफ्तियों ने किस तरह नाजायज हराम, बेगैरती और देवसी के अमल को उसकी नियत और इरादे के बावजूद हलाल और जायज करार दे दिया जबकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया انّما الأعمال بالئیّات ، و انّما لکل امری ء ما نوی (अल बुखारी, किताब बादउल वहि, हदीस नंबर:१) (अनुवाद: बेशक सभी कामों का दारोमदार उन कामों के करने वाले की नियत पर हैl अपने अमल से जो जैसी नियत करेगा वही उसको मिलेगा) बल्कि हलाल और जायज होने के मुकाम से बढ़ कर उसे अज्र व सवाब का कारण भी करार दे दिया तो एक साथ तीन तलाक़ बिदअत के खिलाफ सरकार की ओर से पेश की गई बिल की मुखालिफत करने वाले शायद वह ही लोग हैं जो मियाँ बीवी के बीच सुधार के लिए अज्र व सवाब की नियत से इस देवसी के अमल को बाकी और जारी रखना चाहते हैं और किसी भी कीमत पर इस अज्र व सवाब से वंचित होना नहीं चाहतेl और हमारा कहना यह है कि एक मजलिस की तीन तलाक़ इस्लाम में नाजायज हराम और तलाक़ ए बिदअत है इसलिए इस बिदअत को जल्द से जल्द समाप्त होना चाहिए, जैसा कि यह तलाक़ ए बिदअत बहुत पहले दोसरे मुस्लिम देशों में समाप्त की जा चुकी है, इसलिए कि बेगैरती और देवसी का यह अमल (प्रचलित हलाला) तीन तलाक़ ए बिदअत के नाफ़िज़ (लागू) और जारी रहने के फतवों का परिणाम और कारण हैl अगर हमारे देश के गयूर गैरत मंद मुसलमान लानती प्रचलित हलाला के अमल से अपनी इज्ज़तदार गैरतमंद औरतों को बचाना चाहते हैं तो उनको चाहिए कि वह सरकार की ओर से पार्लियामेंट में तलाक़ ए बिदअत के खिलाफ पेश किये हुए बिल की भरपूर हिमायत और सरकार के इस अच्छे काम का शुक्रिया अदा करेंl

इसलिए कि कुरआन व हदीस से साबित यही बात हक़ और सच हैl और हर हक़ बात इस बात की अधिक हकदार है कि इसको स्वीकार किया जाए चाहे इसका कहने वाला, इसका लिखने वाला, इसको लागू करने वाला कोई भी होl और दिलों का हाल तो अल्लाह पाक ही जानता है, वही गैब का जानने वाला है, हम दिलों के हाल को जानने और उस पर हुक्म लगाने के मुकल्लफ़ नहीं हैंl हम किसी की नियत पर हमला करने का हक़ नहीं रखतेl और रही बात मौलाना बदरुद्दीन अजमल कासमी साहब की सल्फी अहले हदीस हज़रात अर्थात कुरआन और हदीस की इत्तेबा करने वाले मुसलमानों पर दहशत गर्दी की तोहमत लगाने और आरोप लगाने की तो इस सिलसिले में जामिया सल्फिया बनारस के नाज़िम ए आला मोहतरम शैख़ अब्दुल्लाह सऊद साहब ने (दिनांक २८-१२-२०१८) मौलाना बदरुद्दीन अजमल के नाम अपने पैगाम में उन्हें जो तंबीह की है वह बजा है, बरहक़ है, बरवक्त है और काफी हैl इसी प्रकार उनको या उनके रास्ते चलने वाले दोसरे अतिवादियों को रोजनामा इन्कलाब के सम्मानित एडिटर साहब ने बड़ी हकीमाना, मुख्लिसाना, हकीकत पसंदाना, मुसलेहाना, हमदर्दाना, सिद्दिकाना कीमती नसीहत पर आधारित अपना संदेश दिया हैl और दहशतगर्दी की तोहमत लगाने का मुंसिफाना, मुह्क्किकाना तजज़िया भी किया है, इसके खतरनाक नुकसानों का उल्लेख भी किया है, जिस से दोनों पक्षों को सबक हासिल करना चाहिए और एक दोसरे पर आरोप लगाने से बचना चाहिए, इसलिए कि इसमें हर हाल में अपना ही नुक्सान हैl काश की वह इसको गौर से पढ़ लें और कौम के हमदर्द एक सफल पत्रकार से नसीहत हासिल करेंl और यह बात भी उल्लेखनीय है कि मोहतरम एडिटर साहब ने केवल उन्हीं को नहीं बल्कि सारे मुसलमानों को और ख़ास तौर पर उनके रहनुमाओं को बड़ी अच्छी नसीहत की है, चाहे वह किसी भी पक्ष में से होंl (इन्कलाब, इदारती सफह: ८, दिनांक ३१-१२-२०१८)

दोनों पक्षों के अतिवादी लोगों को इनकी नसीहत से अवश्य लाभ उठाना चाहिएl लेकिन मौलाना बदरुद्दीन अजमल साहब से मैं एक गुजारिश अवश्य करूँगा कि उन्होंने जिस विशेष जगह बैठ कर अहले हक़ कुरआन और हदीस की इत्तेबा करने वालों (जिनका दोसरा नाम सल्फी और अहले हदीस है) पर यह आरोप लगाया और उन्हें उनके इस बोहतान लगाने से बहुत दिली तकलीफ पहुंची हैl इसलिए उनको चाहिए कि वह उसी जगह (भारत के पार्लियामेंट हाउस) में बैठ कर ही इस आरोप लगाने पर अपनी माफ़ी का इज़हार और एलान करेंl और खुले शब्दों में इसकी तरदीद करेंl और सल्फी अहले हदीस मुसलमानों को उनकी इस गलत बयानी से जो तकलीफ पहुंची है उस पर मौलाना बदरुद्दीन अजमल को उनसे पार्लियामेंट में ही बैठ कर माफ़ी मांगनी चाहिए ताकि जो सम्मानित पार्लियामेंट सदस्य बोहतान लागाते समय वहाँ उपस्थित थे उनके सामने भी हकीकत और सच्चाई आ जाए और अपने अपने क्षेत्र में जाकर वह इस गलत बयानी और आरोप लगाने का प्रचार ना करेंl और मेरी नजर में मौलाना बदरुद्दीन अजमल साहब का अपनी गलत बयानी और आरोप लगाने पर तुरंत ही माज़रत और शर्मिंदगी का इज़हार और एलान कर देना और खुल कर अपनी गलती का एतेराफ कर लेना यहाँ का काबिले तहसीन अमल है, मुझे इसकी कद्र हैl और अब मुझे उनसे यह भी पूरी उम्मीद है कि वह सल्फी अहले हदीस हज़रात पर अपनी इस इलज़ाम तराशी, गलत बयानी की तरदीद भी पार्लियामेंट ही में करके अवश्य शुक्रिया का मौक़ा देंगेl और मुझे अपने सल्फी भाइयों से भी उम्मीद है कि वह उनकी माज़रत को उनसे कुबूल कर लेंगे और उन्हें माफ़ करके अपने अच्छे अख़लाक़ और आला जर्फ़ का सबूत देंगेl

इसमें कोई सहक नहीं कि एक मजलिस की तीन तलाक और प्रचलित हलाला कुरआन व हदीस की रो से हराम हैं, नाजायज हैं, बिदअत हैं, औरतों पर अत्याचार हैं, और प्रचलित हलाला बहुत बेगैरती और देवसी का काम है और बड़ा नापाक अमल है और इस्लाम और मुसलमानों की बदनामी का कारण है, जिनको जल्द से जल्द समाज से समाप्त होना चाहिए इसी को कुरआन और हदीस से साबित करने के लिए मैंने अल्लाह की तौफीक से एक हज़ार पृष्ठ पर आधारित किताब लिखी है जिसमें कुरआन और हदीस के दलीलों को विस्तार के साथ बयान करने के साथ साथ रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के एक सहाबी रुकाना बिन अब्दे यज़ीद रज़ीअल्लाहु अन्हु को फतवे का भी ज़िक्र किया है जिन्होंने एक मजलिस में तीन तलाक़ दे दी थी, फिर वह अपने गलती पर बहुत अधिक दुखी हुए और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से उन्होंने फतवा लिया तो आपने उनकी तलाक को एक तलाक़ ए रजई मां कर अपनी तलाक़ से रुजूअ कर लेने का फतवा दियाl और नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फतवा के इत्तेबाअ में एक सौ सत्रह से अधिक उलेमा ए इस्लाम मुफ्तियों के फतवे भी हवालों के साथ ज़िक्र किये हैं जिनमें कुछ उलेमा वह भी हैं जो मौलाना बदरुद्दीन अजमल साहब के बुजुर्गों और अकाबिर व असलाफ में शामिल हैं जिन्होंने यह फतवा दिया है या इसकी पुरजोर ताईद की है जैसे: मौलाना मुफ़्ती अतिकुर्रह्मान साहब उस्मानी पूर्व सदस्य शुरा दारुल उलूम देवबंद, मौलाना सईद अहमद अकबराबादी पूर्व सदस्य शुरा दारुल उलूम देवबंद, मौलाना मह्फुज़ुर्रह्मान कासमी बस्तवी, मौलाना अब्दुल हलीम कासमी लाहौर, मौलाना मुर्तुजा हसन कासमी सुम्मुल मदनी जौनपुर, मौलाना सुहैब कासमी सदर जमाते उलेमा ए हिन्द देहली की एक मजलिस की तीन तलाक़ और प्रचलित हलाला के खिलाफ अल्लाह के फज़ल व करम से संघर्ष रंग लाइl अल्लाह पाक उन्हें इस अच्छे काम पर जज़ाए खैर अता फरमाएl और यह बात भी जान लेनी चाहिए कि एक मजलिस की तीन तलाक का मसला प्रचलित हलाला का मसला बीस से अधिक मुस्लिम देशों में पहले ही समाप्त हो चुका हैl

अल्लाह पाक ने अपने फज़ल व करम से उन मुस्लिम देशों की मुस्लिम औरतों को बहोत पहले ही इन कठिनाइयों से निजात देदी है, इसलिए उनकी सरकारों ने एक मजलिस की तीन तलाक़ के बातिल होने को अपने यहाँ कानून बना कर पास कर दिया है और सब ने इस कानून को स्वीकार भी कर लिया है और इस पर अमल भी हो रहा हैl और अल्लाह का शुक्र है कि हमारे देश में भी हमारी केंद्र सरकार और ख़ास तौर पर हमारे देश के प्रधानमंत्री भाई नरेंद्र मोदी जी की कोशिशों के परिणाम में एक मजलिस की तीन तलाक़ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की ओर से यह कानून पास हो गया है अब अगर कोई इसका विरोध करता है तो उसको इसकी सज़ा अवश्य मिलनी चाहिए जैसे हज़रत उमर रज़ीअल्लाहु अन्हु एक मजलिस की तीन तलाक़ ए बिदअत देने वाले को कोड़ों की सज़ा देते थे और ज़माने के बदलने से ताज़ीरी सज़ा भी बदल सकती हैl इसलिए अब वह ताज़ीरी सज़ा जेल या जुर्माने की सज़ा भी हो सकती हैl और अब अंत में मेरी अपने सभी मुसलमान भाइयों से अदब से गुजारिश है कि वह अपने अकीदे और ईमान में अपनी इबातों में अपने मामलों, अपने निकाह व तलाक़ में, अपने अख़लाक़ में बल्कि अपनी ज़िन्दगी के हर मामले में कुरआन व हदीस का पूरा पूरा इत्तेबा करें ताकि वह हमेशा सिरात ए मुस्तकीम पर बाकी रह सकें और चल सकें जैसा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज्जतुल विदाअ के मौके पर सहाबा से फरमाया: کت فکم امرین لن تضلو اما تمتکتم بہما : किताबुल्लाह व सुन्नत ए नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम (हसन, मौता लिल इमाम मालिक रज़ीअल्लाहु अन्हु, हदीस नंबर: १६१९, व सिलसिलतुल अहादीस अल सहिहतुल मुहद्दिस अल बानी तहतुल हदीस रकम: १७६१) जिसका अनुवाद यह है: ऐ मुसलमानों! मैं तुम्हारे लिए दो ऐसी चीजें छोड़ कर जा रहा हूँ कि जब तक उन्हें मजबूती से पकड़े रहो गे अर्थात पूरी तरह इन पर अमल करते रहोगे तो कभी भी सिरात ए मुस्तकीम से गुमराह ना होगेl उनमें से पहली चीज अल्लाह की किताब कुरआन है और दोसरी चीज मेरी सुन्नत अर्थात मेरी हदीसें और मेरी पूरी सीरत ए तय्यबाl और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह भी फरमाया : جعل الد لۃ و الصفار علی من خالف امری (अल बुखारी ताअलिका, किताबुल जिहाद वल सैर, कबलल हदीस रकम: २९१४) कि ऐ मुसलमानों! तुम यह बात अच्छी तरह जान लो कि जो भी मेरे अवामिर व नवाही, मेरी हिदायत व तालीमात की मुखालिफत करेगा उसके लिए अल्लाह पाक की तरफ से ज़िल्लत व रुसवाई और हिकारत व बे इज्ज़ती लिख दी गई हैl और आज हम इस ज़िल्लत व रुसवाई के बहुत सारे दृश्य अपनी आँखों से खुद देख रहे हैंl अल्लाह पाक हर मुसलमान की इस प्रकार की रुसवाई और बेईज्ज़ती से हिफाज़त फरमाएl और हर तरह की ज़िल्लत व रुसवाई से बचाएl आमीन

आखीर में मेरी दुआ है कि अल्लाह पाक सारे मुसलमान भाइयों को पूरी तरह कुरआन व हदीस की इत्तेबा की तौफीक अता फरमाएl आमीन या रब्बुल आलमीन

१० जनवरी, २०१९ सौजन्य से: इन्कलाब, नई दिल्ली

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/maulana-furqan-meharban-ali-al-madni/do-muslims-support-triple-talaq-bill-brought-by-the-government-of-india?--مسلمان-ایک-ساتھ-تین-طلاق-بدعت-کے-خلاف-حکومت-کی-جانب-سے-پیش-کردہ-بل-کی-تائید-اور-اس-کاخیر-مقدم-کرتے-ہیں؟/d/117579

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/maulana-fmali-al-madni,tr-new-age-islam/do-muslims-support-triple-talaq-bill-brought-by-the-government-of-india?--मुसलमान-एक-साथ-तीन-तलाक़-ए-बिदअत-के-खिलाफ-सरकार-की-ओर-से-पेश-की-गई-बिल-का-समर्थन-और-इसका-स्वागत-करते-हैं?/d/117621

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