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Hindi Section (02 Jul 2018 NewAgeIslam.Com)


Muslim Jurists Are Wrong, Husbands Cannot Beat Wives मुस्लिम फुकहा का स्टैंड गलत, पति पत्नियों को नहीं मार सकते

 

 

 

टी, ओ, शनावास एम डी, न्यू एज इस्लाम

23 मई 2018

इस्लाम से नफरत करने वाले बहुत सारे लोग कुरआन को ज़न बेज़ार धार्मिक पुस्तक साबित करने के लिए कुरआन की यह आयत पेश करते हैं:

 الرجال قوامون علی النساء بما فضل الله بعضهم علی بعض وبما أنفقوا من أموالهم فلاصالحات بأن الله واللاتی تخافون نشو(الرِّجَالُ قَوَّامُونَ عَلَى النِّسَاءِ بِمَا فَضَّلَ اللَّهُ بَعْضَهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ وَبِمَا أَنْفَقُوا مِنْ أَمْوَالِهِمْ ۚ فَالصَّالِحَاتُ قَانِتَاتٌ حَافِظَاتٌ لِلْغَيْبِ بِمَا حَفِظَ اللَّهُ ۚ وَاللَّاتِي تَخَافُونَ نُشُوزَهُنَّ فَعِظُوهُنَّ وَاهْجُرُوهُنَّ فِي الْمَضَاجِعِ وَاضْرِبُوهُنَّ ۖ فَإِنْ أَطَعْنَكُمْ فَلَا تَبْغُوا عَلَيْهِنَّ سَبِيلًا ۗ إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَلِيًّا كَبِيرًا

“मर्दो का औरतों पर क़ाबू है क्योंकि (एक तो) ख़ुदा ने बाज़ आदमियों (मर्द) को बाज़ अदमियों (औरत) पर फ़ज़ीलत दी है और (इसके अलावा) चूंकि मर्दो ने औरतों पर अपना माल ख़र्च किया है पस नेक बख्त बीवियॉ तो शौहरों की ताबेदारी करती हैं (और) उनके पीठ पीछे जिस तरह ख़ुदा ने हिफ़ाज़त की वह भी (हर चीज़ की) हिफ़ाज़त करती है और वह औरतें जिनके नाफरमान सरकश होने का तुम्हें अन्देशा हो तो पहले उन्हें समझाओ और (उसपर न माने तो) तुम उनके साथ सोना छोड़ दो और (इससे भी न माने तो) मारो मगर इतना कि खून न निकले और कोई अज़ो न (टूटे) पस अगर वह तुम्हारी मुतीइ हो जाएं तो तुम भी उनके नुक़सान की राह न ढूंढो ख़ुदा तो ज़रूर सबसे बरतर बुजुर्ग़ हैl”

और इस आधार पर इस्लाम के आलोचक यह कहते हैं कि चूँकि कुरआन वैवाहिक हिंसा की अनुमति देता है इसलिए इस्लाम एक जन बेज़ार धर्म हैl अगर कुरआन की इस आयत को कुरआन की बाक़ी शिक्षाओं से अलग करके देखा जाए तो उनका दावा देखने में सही लगता हैl हम मुसलामानों को यह पूछना चाहिए कि “क्या कोई किसी ऐसी महिला को जानता है जिसे वैवाहिक हिंसा में “सुन्दरता और सम्मान” दोनों प्राप्त हो?” हो सकता है मासोकिज्म (masochism) नामक असामान्य मानसिक स्वास्थ्य से पीड़ित महिलाओं को इसमें “सुन्दरता और गरिमा” दोनों मिलता होl उपर्युक्त आयत पर निर्भर करते हुए फुकहा ने जो वैवाहिक हिंसा का औचित्य पेश किया है उसमें “सुन्दरता या गरिमा” की कोई गुंजाइश ही नहीं हैl नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जीवन में हमें एक भी घटना ऐसी नहीं मिलती है जिससे यह सिद्ध होता हो कि आपने अपनी किसी भी बीवी के साथ कभी कोई मार पीट की होl और अगर मुसलामानों का यह दावा सहीह है कि इस्लाम महिलाओं को आज़ादी प्रदान करता है, तो मुसलामानों को पतियों की ओर से पत्नियों को मार पीत किए जाने के मामले में फुकहा के औचित्य को रद्द करना चाहिएl

आयत 4:34 को अच्छी तरह समझने के लिए हमें इस आयत के संदर्भ और इसके संदेश को समझना आवश्यक हैl इस आयत के संदर्भ के संबंध में मुफ़स्सेरीन के बीच कोई एक राय नहीं हैl

कुछ मुफ़स्सेरीन यह कहते हैं कि यह आयत उस समय नाज़िल हुई जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की एक पत्नी हज़रत सौदा बिन्ते जमआ रज़ीअल्लाहु अन्हा (मृत्यु 54/674) को इस बात का खतरा हुआ कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उन्हें तलाक दे देंगे, इसलिए, आपने अपने कुछ अधिकार माफ़ कर दिए ताकि वह उन्हें तलाक ना देंl

लेकिन यह रिवायत गलत है, क्योंकि उन मुफ़स्सेरीन को यह कैसे मालुम हो सकता है कि सौदा बिन्ते जमआ के दिल में क्या था? इसके अलावा अल्लाह ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पत्नियों को आपका चुनाव करने का अधिकार दिया थाl

दुसरे मुफ़स्सेरीन का कहना है कि यह आयत उस समय नाज़िल हुई जब पति की दूसरी शादी से पति और पत्नी के बीच झगड़ों का सिलसिला बढ़ गयाl

इसलिए मुफ़स्सेरीन के बीच इस आयत के नुज़ूल के शान पर इत्तेफाक ना होने की वजह से हम उन मरवी नुज़ूल के शान से इस आयत का सहीह अर्थ नहीं हासिल कर सकतेl मुफ़स्सेरीन केवल इस बात पर एकमत हैं कि इस आयत का उद्देश्य यह है की पति और पत्नी के बीच सुलह अलग होने से बेहतर हैl [स्रोत: (Conference of the Books) खालिद एम, अबुल फज़ल]

फुकहा का कहना है कि कुरआन में अरबी शब्द “नुशुज़” का अर्थ और “अहंकार और सरकशी” है, और नाशिज़ “अहंकारी सरकश व नाफरमान” को कहते हैंl इब्ने रश (मृतक ५२०/११२६) ने कहा कि नाशिज़ वह सरकश खातून है जो नमाज़ पढ़ने, रोज़े रखने या आलुदगियों से पाक होने के लिए तैयार ना होl लेकिन शब्द नुशुज़ का इस्तेमाल पुरुषों के लिए भी किया जाता हैl

अल्लाह फरमाता है:

وَإِنِ امْرَأَةٌ خَافَتْ مِنْ بَعْلِهَا نُشُوزًا أَوْ إِعْرَاضًا فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا أَنْ يُصْلِحَا بَيْنَهُمَا صُلْحًا ۚ وَالصُّلْحُ خَيْرٌ ۗ وَأُحْضِرَتِ الْأَنْفُسُ الشُّحَّ ۚ وَإِنْ تُحْسِنُوا وَتَتَّقُوا فَإِنَّ اللَّهَ كَانَ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرًا

“और अगर कोई औरत अपने शौहर की ज्यादती व बेतवज्जोही से (तलाक़ का) ख़ौफ़ रखती हो तो मियॉ बीवी के बाहम किसी तरह मिलाप कर लेने में दोनों (में से किसी पर) कुछ गुनाह नहीं है और सुलह तो (बहरहाल) बेहतर है और बुख्ल से तो क़रीब क़रीब हर तबियत के हम पहलू है और अगर तुम नेकी करो और परहेजदारी करो तो ख़ुदा तुम्हारे हर काम से ख़बरदार है (वही तुमको अज्र देगा)” (कुरआन 4:128)l शब्द नुशुज़ की जो परिभाषा फुकहा ने (अहंकारी और सरकश व नाफरमान इंसान) की है उसको दिमाग में रखते हुए हमें यह प्रश्न करना चाहिए कि क्या उक्त आयत में शब्द नुशुज़ से मुराद पति की ओर से अपनी पत्नी की अवज्ञा मुराद हैl” इस प्रश्न से परेशान होंकर फुकहा ने यह कहा कि पत्नी के मामले में (नुशुज़) का अर्थ अवज्ञा है, और पति के मामले में एक गंभीर गुनाह (فاحشة مبینة) हैl वह एक ही जैसी स्थिति में एक ही शब्द के लिए अलग अलग अर्थ क्यों पेश कर रहे हैं? क्या इसका अर्थ यह है की पत्नी के मामले में भी नुशुज़ का अर्थ एक गंभीर और स्पष्ट गुनाह है? यह प्रश्न बिलकुल सहीह हैंl

मरवी है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने आखरी हज में फरमाया कि, “ऐ लोगों. मैं तुम्हें महिलाओं के साथ अच्छे व्यवहार का आदेश देता हूँ क्योंकि वह तुम्हारी मददगार हैंl इसके अलावा उन पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है यहाँ तक कि वह कोई संगीन स्पष्ट गुनाह (فاحشة مبینة) कर बैठेंl अगर वह ऐसा कर बैठें तो उनसे अपना बिस्तर अलग कर लो और हलकी मार लगाओ, लेकिन वह बाज़ आ जाएं तो उन के खिलाफ हद से आगे ना बढ़ो”l स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर खालिद एम अबुल फज़ल लिखते हैं: “मुझे यह लगता है रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने शब्द فاحشة مبینة का प्रयोग शब्द (नुशुज़) के पर्यावाची के तौर पर किया है, और शब्द (नुशुज़) का अर्थ فاحشة مبینة (एक संगीन और प्रसिद्ध गुनाह) है”l [स्रोत: (Conference of the Books) खालिद एम. अबुल फज़ल]l अगर ऐसा है तो शब्द नुशुज़ का अर्थ “अवज्ञा या केवल मतभेद” नहीं हो सकता, बल्कि इसका अर्थ बदकारी होगाl

पति की ओर से अपनी पत्नियों को मारने के मामले में फुकहा के जवाज़ को रद्द करने के विभिन्न कारण हैंl जिनमें से कुछ का ज़िक्र यहाँ किया जा रहा हैl खुदा से डरने वाले एक मिसाली मुसलमान पति को इंसानी फितरत पर कुरआन का यह खुलासा जानना आवश्यक है (कुरआन 2:128): “(और) ऐ हमारे पालने वाले तू हमें अपना फरमाबरदार बन्दा बना हमारी औलाद से एक गिरोह (पैदा कर) जो तेरा फरमाबरदार हो, और हमको हमारे हज की जगहों को दिखा दे और हमारी तौबा क़ुबूल कर, बेशक तू ही बड़ा तौबा कुबूल करने वाला मेहरबान हैl” संभव है कि यह इसे न्याय करने से रोक देl अल्लाह का फरमान है:

“ऐ ईमानदारों ख़ुदा (की ख़ुशनूदी) के लिए इन्साफ़ के साथ गवाही देने के लिए तैयार रहो और तुम्हें किसी क़बीले की अदावत इस जुर्म में न फॅसवा दे कि तुम नाइन्साफी करने लगो (ख़बरदार बल्कि) तुम (हर हाल में) इन्साफ़ करो यही परहेज़गारी से बहुत क़रीब है और ख़ुदा से डरो क्योंकि जो कुछ तुम करते हो (अच्छा या बुरा) ख़ुदा उसे ज़रूर जानता हैl” [कुरआन 5:8]

इसलिए, गुस्से और नाराजगी की हालत में मर्द फैसला करने वाला और न्याय प्रिय नहीं हो सकता और ख़ास तौर पर अपनी उस बीवी के साथ जिसकी तरफ से उसे नुशुज़ (बदकारी) का डर होl इसके अलावा नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया:

“फैसल (न्याय करने वाला) को दो लोगों के बीच उस समय न्याय नहीं करना चाहिए जब वह गुस्से में होl” (सुनन तिरमिज़ी 1334);

“जो अपनी बीवियों को मारता है उसे अपने बीच अच्छा इंसान नहीं पाओगेl” (अबू दाउद: सुनन जिल्द 1, पृष्ठ 292);

“तुममें सबसे बेहतर वह है जो अपनी बीवी के साथ बेहतर है” (इब्ने माजा: सुनन बाब हसीन मआशरत अन्निसा पृष्ठ 142)l

इसलिए अलीम व रहीम अल्लाह की मर्जी नुशुज़ (बदकारी) के लिए बीवियों को अपने शौहरों से मार खिलवाने की नहीं हैl इसलिए, नुशुज़ के लिए मुकदमा चलाना, सज़ा देना और इसके लिए सज़ा की प्रकृति का निर्धारण करना जज का काम है शौहर का नहींl

और मामला जब कानूनी अदालत में हो तो अपने बचाव में गवाही पेश करना मियाँ बीवी का काम हैl

“और जो लोग पाक दामन औरतों पर (ज़िना की) तोहमत लगाएँ फिर (अपने दावे पर) चार गवाह पेश न करें तो उन्हें अस्सी कोड़ें मारो और फिर (आइन्दा) कभी उनकी गवाही कुबूल न करो और (याद रखो कि) ये लोग ख़ुद बदकार हैं (4) मगर हाँ जिन लोगों ने उसके बाद तौबा कर ली और अपनी इसलाह की तो बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है (5) और जो लोग अपनी बीवियों पर (ज़िना) का ऐब लगाएँ और (इसके सुबूत में) अपने सिवा उनका कोई गवाह न हो तो ऐसे लोगों में से एक की गवाही चार मरतबा इस तरह होगी कि वह (हर मरतबा) ख़ुदा की क़सम खाकर बयान करे कि वह (अपने दावे में) जरुर सच्चा है (6) और पाँचवी (मरतबा) यूँ (कहेगा) अगर वह झूट बोलता हो तो उस पर ख़ुदा की लानत (7) और औरत (के सर से) इस तरह सज़ा टल सकती है कि वह चार मरतबा ख़ुदा की क़सम खा कर बयान कर दे कि ये शख्स (उसका शौहर अपने दावे में) ज़रुर झूठा है (8) और पाँचवी मरतबा यूँ करेगी कि अगर ये शख्स (अपने दावे में) सच्चा हो तो मुझ पर खुदा का ग़ज़ब पड़े (9)” [24:4-9]

इन आयतों के अनुसार नुशुज़ (बदकारी) का आरोप लगाना एक गंभीर मामला है और आरोप लगाने वाले के ऊपर जरुरी है कि वह इसे साबित करने के लिए चार गवाहों को पेश करेl केवल एक इत्तेफाकी गवाह काफी नहीं हैl और अगर इसका कोई चश्मदीद गवाह ना हो तो पति से गवाह के तौर पर चार मर्तबा कसम लिया जाएगा शर्त यह है कि बीवी कसम लेने से इनकार करेl और अगर बीवी आरोप से इनकार कर दे और खुदा के नाम पर कसम उठा लेती है तो इसका मतलब यह है कि उसने शौहर के आरोप को ख़ारिज कर दियाl

इस कानूनी कार्य प्रणाली में अभिशाप के बाद इस बात का फैसला नहीं होता कि कानूनी तौर पर अपराधी कौन है; दोनों पक्ष सभी कानूनी परिणाम से बरी कर दिए जाते हैंl

नुशुज़ का आरोप सिद्ध हो जाने के बाद चाहे इसका प्रतिबद्ध पति ने किया हो (कुरआन 4:128) चाहे बीवी ने (कुरआन 4:34) सज़ा दोनों के लिए बराबर हैl इसलिए कि खुदा की नज़र में इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मुजरिम कौन है बल्कि फैसला अमल के आधार पर किया जाता हैl न्याय, इनाम और इन्तेकाम का हुक्म मर्द और औरत दोनों पर बराबर है:

“मर्द हो या औरत जो शख़्श नेक काम करेगा और वह ईमानदार भी हो तो हम उसे (दुनिया में भी) पाक व पाकीज़ा जिन्दगी बसर कराएँगें और (आख़िरत में भी) जो कुछ वह करते थे उसका अच्छे से अच्छा अज्र व सवाब अता फरमाएँगेंl” (कुरआन 16:97)

“तो उनके परवरदिगार ने दुआ कुबूल कर ली और (फ़रमाया) कि हम तुममें से किसी काम करने वाले के काम को अकारत नहीं करते मर्द हो या औरत (उस में कुछ किसी की खुसूसियत नहीं क्योंकि) तुम एक दूसरे (की जिन्स) से हो जो लोग (हमारे लिए वतन आवारा हुए) और शहर बदर किए गए और उन्होंने हमारी राह में अज़ीयतें उठायीं और (कुफ्फ़र से) जंग की और शहीद हुए मैं उनकी बुराईयों से ज़रूर दरगुज़र करूंगा और उन्हें बेहिश्त के उन बाग़ों में ले जाऊॅगा जिनके नीचे नहरें जारी हैं ख़ुदा के यहॉ ये उनके किये का बदला है और ख़ुदा (ऐसा ही है कि उस) के यहॉ तो अच्छा ही बदला हैl” (कुरआन 3:195)l

“और तुम पहाड़ों को देखकर उन्हें मज़बूर जमे हुए समझतें हो हालाकि ये (क़यामत के दिन) बादल की तरह उड़े उडे फ़िरेगें (ये भी) ख़ुदा की कारीगरी है कि जिसने हर चीज़ को ख़ूब मज़बूत बनाया है बेशक जो कुछ तुम लोग करते हो उससे वह ख़ूब वाक़िफ़ हैl” (कुरआन 27:88)

अंत में जज पहले उन्हें अपना सुधार करने और इससे भी काम ना बने तो फिर बिस्तर अलग कर लेने जैसे चरणबद्ध अंदाज़ में सज़ा का हुक्म दे सकता हैl कुरआनी हिकमत का उद्देश्य दम्पत्ति के बीच सद्भाव के साथ सुलह कायम करना है:

“और अगर कोई औरत अपने शौहर की ज्यादती व बेतवज्जोही से (तलाक़ का) ख़ौफ़ रखती हो तो मियॉ बीवी के बाहम किसी तरह मिलाप कर लेने में दोनों (में से किसी पर) कुछ गुनाह नहीं है और सुलह तो (बहरहाल) बेहतर है और बुख्ल से तो क़रीब क़रीब हर तबियत के हम पहलू है और अगर तुम नेकी करो और परहेजदारी करो तो ख़ुदा तुम्हारे हर काम से ख़बरदार है (वही तुमको अज्र देगा)l” [कुरआन 4:128]

अगर सरकश बीवी या सरकश शौहर पर यह सभी तरीके बेकार हों तो आख़िरी तदबीर के तौर पर जज मुजरिम के लिए जिस्मानी तौर पर किसी सज़ा का निर्धारण कर सकता हैl यहाँ तक कि इस स्थिति में भी बदकारी के लिए बीवी या शौहर को मारने की बात केवल नाम के लिए हैl और इससे मुराद “चोट या दर्द के बिना केवल एक ज़र्ब” हैl [स्रोत: इब्ने माजा: सुनन, पृष्ठ 133l मुस्लिम: सहीह, जिल्द-1, पृष्ठ 291]l और गर इस तरह के अलामती मार से काम ना बने और शौहर/बीवी कुरआनी अहकाम की तकमील करने से असमर्थ हों तो:

“...........उनके साथ अच्छे से बोदोबाश रखो.........” शौहर कानूनी तौर पर शादी शुदा नहीं रह सकताl

कुरआन की शिक्षा है:

“और जब तुम अपनी बीवियों को तलाक़ दो और उनकी मुद्दत पूरी होने को आए तो अच्छे उनवान से उन को रोक लो या हुस्ने सुलूक से बिल्कुल रुख़सत ही कर दो और उन्हें तकलीफ पहुँचाने के लिए न रोको ताकि (फिर उन पर) ज्यादती करने लगो और जो ऐसा करेगा तो यक़ीनन अपने ही पर जुल्म करेगा और ख़ुदा के एहकाम को कुछ हँसी ठट्टा न समझो और ख़ुदा ने जो तुम्हें नेअमतें दी हैं उन्हें याद करो और जो किताब और अक्ल की बातें तुम पर नाज़िल की उनसे तुम्हारी नसीहत करता है और ख़ुदा से डरते रहो और समझ रखो कि ख़ुदा हर चीज़ को ज़रुर जानता हैl” [कुरआन 2:231]l

खुलासा यह है कि बीवियों की तरफ से नुशुज़ की स्थिति में शौहर दावेदार, फैसल और सज़ा देने वाले नहीं बन सकतेl इस मामले में हकीकत क्या है इसका निर्धारण करना केवल न्यायालय का काम हैl अगर तम्बीह करने, बिस्तर अलग करने, अलामती ज़र्ब लगाने या उचित तरीके से सुलह से काम नहीं बन्दा तो उस स्थिति में शौहर और बीवी की तरफ से सहीह इक़दाम ए एहसान के साथ तलाक देना हैl आयत 4:34 के संबंध में फुकहा की ज़नबेजार व्यख्या के विपरीत, इस आयत की जो व्याख्या मैंने पेश की है उसमें मुझे “सुन्दरता और गरिमा” दोनों नज़र आता हैl इसके अलावा, यह किसी भी कुरआनी आयत के अर्थ के विरोधाभास के बिना आंतरिक तौर पर संगत भी हैl

URL for English article: http://www.newageislam.com/islam,-women-and-feminism/to-shanavas-md,-new-age-islam/muslim-jurists-are-wrong,-husbands-cannot-beat-wives/d/115332

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