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Hindi Section (11 Jul 2018 NewAgeIslam.Com)


Muslims Must Seize Any Opportunity to Reform Their Madrasas मुसलामानों को अपने मदरसों के सुधार के लिए हर एक मौक़ा अपनाना चाहिए

 

 

 

अरशद आलम, न्यू एज इस्लाम

17 नवंबर 2017

हाल ही में उत्तर प्रदेश में योगी आदित्य नाथ की सरकार ने एलान किया कि अब मदरसों के छात्र अपने पारम्परिक पाठ्यक्रम के बजाए एनसीईआरटी की पुस्तक पढ़ेंगेl इसके अलावा कुछ समय पहले उनके एक मंत्री ने कहा था कि मदरसों को मौजूदा दौर में गैर लाभप्रद विषयों के बजाए विज्ञान और गणित की शिक्षा प्रदान करना चाहिएl हमें इन एलानों को किस तरह देखना चाहिए जो बज़ाहिर इस्लामी मदरसों को आधुनिकीकरण के रास्ते पर ला सकते हैं? इसलिए कि अपने भूमिका और चरित्र के एतेबार से योगी सरकार का रवय्या मुसलामानों के साथ मुरव्वत और सहानुभूति का नहीं हैl असल में उनका संबंध एक ऐसी पार्टी से है जिसने विधानसभा चुनाव में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया थाl इसकी एक ताज़ा मिसाल ताज महल पर बीजेपी की ओर से पैदा किया हुआ विवाद है जिसे मुख्यमंत्री ने अब तक हल नहीं किया हैl इसलिए, यह बात समझ में आती है कि इस्लामी मदरसों में एनसीईआरटी की किताबें परिचित कराने के पीछे मुसलामानों के अन्दर उत्तर प्रदेश सरकार के इरादे में शक पैदा होंगेl यह बिलकुल संभव है कि इस तरह की हरकत के पीछे सरकार का उद्देश्य कोई ताज़ा विवाद पैदा करना होl लेकिन क्या हम इसे अपने मदरसों की दुर्दशा पर बहस के एक मौके के तौर पर देख सकते हैं?

इस बात से सभी परिचित हैं कि मौजूदा स्थिति संतोषजनक नहीं हैl इन संस्थाओं में जो शिक्षा दी जाती है मध्यकालीन और पुरानी है; वहाँ तर्क (मंतिक) की किताबें पढ़ाई जाती हैं जिन पर छात्र कई कई घंटे लगाते हैं लेकिन इससे उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होताl एक समय था जब मदरसों से ना केवल फिकही विशेषज्ञों बल्कि बेहतरीन फलसफी, गणितज्ञ और यहाँ तक कि बेहतरीन वास्तुकार भी पैदा होते थेl लेकिन 1857 के बाद मदरसों में शिक्षा का दायरा केवल धार्मिक शिक्षा तक ही सीमित हो कर रह गयाl दरसे निज़ामी के नए पाठ्यक्रम में कि जिसका प्रारम्भ देवबंद ने किया था इसके बाद जिसे दक्षिण एशिया के सभी मदरसों में रिवाज हासिल हुआ, कुरआन और हदीस की शिक्षा को केन्द्रीय स्थान प्राप्त हो गईl आज़ादी के बाद कुछ राज्यों ने मदरसों को विभिन्न राजकीय मदरसा बोर्डों के माध्यम से संगठित किया और आधुनिक विषयों से परिचित करा कर इसकी स्थिति को बेहतर बनाने की कोशिश कीl लेकिन वहाँ आज़ाद मदरसे भी मौजूद थे जिनकी संख्या राजकीय मदरसों के मुकाबले में बहुत अधिक थी और वह मदरसे अब भी अनुपयोगी और पुराने पाठ्यक्रम को ही जारी रखे हुए हैंl राजकीय मदरसे योग्य शिक्षकों की कमी का शिकार हैं जबकि आज़ाद मदरसों को मौजूदा दौर की आवश्यकताओं का प्रायोजन करने के लिए शायद अपने पूर्ण पाठ्यक्रम का फिर से समीक्षा करने की आवश्यकता हैl

सच्चर कमेटी और उससे भी पहले 1986 में गोपाल सिंह रिपोर्ट हमें बार बार यह याद दिलाती है कि मुसलमान शैक्षिक आधार पर एक पिछड़ा अल्पसंख्यक हैंl मौजूदा शैक्षिक आँकड़ों से पता चलता है कि मुसलामानों का शैक्षिक घाटा प्रारम्भिक चरण में शुरू होता है जहां स्कूल एक बड़ी संख्या में छात्रों के स्कूल छोड़ने के कारण उन्हें स्कूल में बनाए रखने में असफल रहे हैंl इसका मदरसों के साथ कुछ संबंध हैl जैसे कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में मदरसे स्कूली निजाम के समानांतर हैंl इसलिए, मदरसे जाने वाले बच्चे कभी भी स्कुल में शिक्षा प्राप्त करने की खुशी का अनुभव नहीं कर सकतेl क्या यह बेहतर नहीं होता कि मदरसे के शैक्षिक समय को इस प्रकार सेट किया जाता कि बच्चों को दोनों जगह शिक्षा प्राप्त करने का मौक़ा मिलताl यह आसान कदम स्कूलों में मुस्लिम बच्चों को बनाए रखने के स्तर को बेहतर बनाने में सहायक होगाl

समाज की बदलती जरूरतों को प्रतिबिंबित करने के लिए इसके पाठ्यक्रम में बदलाव करने की जरूरत है। आखिर कार इस प्रकार के उलेमा किस काम के हैं जो आधुनिक इतिहास, राजनीति या भूगोल के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं रखते?यहाँ तक कि अगर कोई आलिम इस्लाम की तबलीग करना चाहता है तो उसे तबलीग भी इसी दुनिया में करना है इसलिए कम से कम इस बात का कुछ ज्ञान होना चाहिए कि आज दुनिया किस तरह चलती हैl वरना हम केवल ऐसे उलेमा की ही उम्मीद कर सकते हैं जो केवल टेलीविज़न स्टूडियो में दिखलावा करते हैंl मुस्लिम समाज को यह अनुभव करना होगा कि आज मदसों का निज़ाम उनकी चाहतों के लिए बहुत हानिकारक हैl उन मदरसों का आधुनिकीकरण करने और उनमें आधुनिक विषय की शिक्षा से परिचित कराने की अत्यंत आवश्यकता हैl ऐसा नहीं हो सकता कि हमारा मुस्लिम धार्मिक रहनुमा वर्तमान परिस्थितियों के उंच नीच से अनजान होl इसलिए कि उसे धर्म की सेवा इसी दुनिया में करनी हैl इसलिए, दुनिया और उसकी सभी पेचीदगियों को समझना इस्लामी शिक्षा सहित सभी शिक्षाओं का बुनियादी उद्देश्य होना चाहिएl

यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि इन मदरसों में लाखों बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं जिनकी वर्तमान स्थिति उन्हें इस काबिल भी बनाने के लायक नहीं है कि वह दुनिया के नक़्शे पर विभिन्न देशों की स्थित जगह का भी निर्धारण कर सकेंl अपनी परंपरा की सुरक्षा के नाम पर क्या हम उन मुस्लिम बच्चों का भविष्य कुर्बान नहीं कर रहे हैं? हो सकता है कि योगी आदित्य नाथ अपने राजनीतिक उद्देश्यों के तहत ऐसा कर रहे हों लेकिन हमें अपने मदरसों में उच्च श्रेणी के पाठ्यक्रम का विरोध क्यों करना चाहिएl

मदरसों के निज़ाम की दुर्दशा अत्यंत अबतर हैl केवल आधुनिक पाठ्यक्रम को परिचित कराने से इसमें बेहतरी नहीं पैदा हो सकतीl आखिरकार मदरसों में इन दरसी किताबों का क्या होगा जब उनको पढ़ाने के लिए कोई अध्यापक ही मौजूद ना हो? हमदर्द एजुकेशन सोसाइटी की तरफ से किए जाने वाले एक सर्वे में पता चला है कि इन मदरसों में ट्रेंड टीचर मौजूद ही नहींl बहुत ही अफ़सोस की बात यह है कि विभिन्न मदरसों में ऐसे अध्यापक विज्ञान और गणित की शिक्षा देते हुए पाए गए जो उन विषयों की शिक्षा देने के काबिल ही नहीं थेl इसके अलावा बहुत कम मदरसों ने आधुनिकीकरण की स्कीम से लाभ उठाया है और यहाँ तक कि उनके विषय गलती से पाठ्यक्रम में सम्मीलित किए गए हैंl

औसतन मदरसे के छात्रों पर पहले से ही धार्मिक पाठ्यक्रम का अधिक बोझ होता है आधुनिक विषयों की वृद्धि करने से केवल उनका बोझ बढ़ेगाl इसलिए, एक ऐसे योजना की आवश्यकता है कि इन आधुनिक विषयों को किस प्रकार सफल अंदाज़ में परिचित कराया जा सकता है और अगर संभव हो तो हम किस तरह धार्मिक पाठ्यक्रम के मवाद में कमी कर सकते हैंl मदरसों के बारे में इस प्रकार की खुली बहस के बिना कुछ भी उचित नहीं होने वाला हैl मुस्लिम रहनुमाओं को यह समझना चाहिए कि ना ही कांग्रेस ने और ना ही बीजेपी ने उनके लिए बहुत कुछ किया हैl इसलिए, अब यह मुसलामानों के उपर है कि उन्हें उन सभी मौकों का लाभ उठाना चाहिए जो मुस्लिम समाज की भलाई के लिए होंl

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