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Hindi Section (10 Aug 2018 NewAgeIslam.Com)


On the Meaning of Khatm e Nabuwwat खत्मे नबूवत का अर्थ

 

 

नसीर अहमद, न्यू एज इस्लाम

4 अगस्त 2018

इस लेख को लिखने का कारण कुरआन पाक की आयत 33:40 में वारिद होने वाले शब्द खातेमुन्नबीय्यीन की तौज़ीह और तफहीम के लिए एक गुजारिश हैl जिसकी एक भिन्न समझ मुसलामानों में तफ़रक़ा बाज़ी और आपसी फूट पैदा कर रही हैl खास तौर पर पाकिस्तान में इसका अधिक प्रभाव हैl इसका तीन अक्षरों वाला माद्दा (خ ت م) कुरआन में आठ बार चार विभिन्न रूपों में वारिद हुआ है:

पांच बार क्रिया के रूप में (खत्म)

एक बार नाम के रूप में (खातिम)

एक बार नाम के रूप में (खित्म)

एक बार कर्म के रूप में (मख्तूम)

आइए हम उन आठ जगहों का एक एक करके समीक्षा करते हैं:

क्रिया: मुहर लगाने के अर्थ में

خَتَمَ اللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ وَعَلَىٰ سَمْعِهِمْ ۖ وَعَلَىٰ أَبْصَارِهِمْ غِشَاوَةٌ ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ

“उनके दिलों पर और उनके कानों पर (नज़र करके) खुदा ने तसदीक़ कर दी है (कि ये ईमान न लाएँगे) और उनकी ऑंखों पर परदा (पड़ा हुआ) है और उन्हीं के लिए (बहुत) बड़ा अज़ाब हैl” (2:7)

قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِنْ أَخَذَ اللَّهُ سَمْعَكُمْ وَأَبْصَارَكُمْ وَخَتَمَ عَلَىٰ قُلُوبِكُم مَّنْ إِلَٰهٌ غَيْرُ اللَّهِ يَأْتِيكُم بِهِ ۗ انظُرْ كَيْفَ نُصَرِّفُ الْآيَاتِ ثُمَّ هُمْ يَصْدِفُونَ

“(कि क़िस्सा पाक हुआ) (ऐ रसूल) उनसे पूछो तो कि क्या तुम ये समझते हो कि अगर ख़ुदा तुम्हारे कान और तुम्हारी ऑंखे लें ले और तुम्हारे दिलों पर मोहर कर दे तो ख़ुदा के सिवा और कौन मौजूद है जो (फिर) तुम्हें ये नेअमतें (वापस) दे (ऐ रसूल) देखो तो हम किस किस तरह अपनी दलीले बयान करते हैं इस पर भी वह लोग मुँह मोडे ज़ाते हैंl” (6:46)

الْيَوْمَ نَخْتِمُ عَلَىٰ أَفْوَاهِهِمْ وَتُكَلِّمُنَا أَيْدِيهِمْ وَتَشْهَدُ أَرْجُلُهُم بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ

“आज हम उनके मुँह पर मुहर लगा देगें और (जो) कारसतानियाँ ये लोग दुनिया में कर रहे थे खुद उनके हाथ हमको बता देगें और उनके पाँव गवाही देगेंl” (36:65)

أَمْ يَقُولُونَ افْتَرَىٰ عَلَى اللَّهِ كَذِبًا ۖ فَإِن يَشَإِ اللَّهُ يَخْتِمْ عَلَىٰ قَلْبِكَ ۗ وَيَمْحُ اللَّهُ الْبَاطِلَ وَيُحِقُّ الْحَقَّ بِكَلِمَاتِهِ ۚ إِنَّهُ عَلِيمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ

“क्या ये लोग (तुम्हारी निस्बत कहते हैं कि इस (रसूल) ने ख़ुदा पर झूठा बोहतान बाँधा है तो अगर (ऐसा) होता तो) ख़ुदा चाहता तो तुम्हारे दिल पर मोहर लगा देता (कि तुम बात ही न कर सकते) और ख़ुदा तो झूठ को नेस्तनाबूद और अपनी बातों से हक़ को साबित करता है वह यक़ीनी दिलों के राज़ से ख़ूब वाक़िफ हैl” (42:24)

أَفَرَأَيْتَ مَنِ اتَّخَذَ إِلَٰهَهُ هَوَاهُ وَأَضَلَّهُ اللَّهُ عَلَىٰ عِلْمٍ وَخَتَمَ عَلَىٰ سَمْعِهِ وَقَلْبِهِ وَجَعَلَ عَلَىٰ بَصَرِهِ غِشَاوَةً فَمَن يَهْدِيهِ مِن بَعْدِ اللَّهِ ۚ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ

“भला तुमने उस शख़्श को भी देखा है जिसने अपनी नफसियानी ख़वाहिशों को माबूद बना रखा है और (उसकी हालत) समझ बूझ कर ख़ुदा ने उसे गुमराही में छोड़ दिया है और उसके कान और दिल पर अलामत मुक़र्रर कर दी है (कि ये ईमान न लाएगा) और उसकी ऑंख पर पर्दा डाल दिया है फिर ख़ुदा के बाद उसकी हिदायत कौन कर सकता है तो क्या तुम लोग (इतना भी) ग़ौर नहीं करतेl” (45:23)

उपर्युक्त आयतों में मुहर लगाने से मुराद पूर्ण रूप से बंद करना और किसी चीज का सद्दे बाब करना हैl

नाम

مَّا كَانَ مُحَمَّدٌ أَبَا أَحَدٍ مِّن رِّجَالِكُمْ وَلَٰكِن رَّسُولَ اللَّهِ وَخَاتَمَ النَّبِيِّينَ ۗ وَكَانَ اللَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمًا

“(लोगों) मोहम्मद तुम्हारे मर्दों में से (हक़ीक़तन) किसी के बाप नहीं हैं (फिर जैद की बीवी क्यों हराम होने लगी) बल्कि अल्लाह के रसूल और नबियों की मोहर (यानी ख़त्म करने वाले) हैं और खुदा तो हर चीज़ से खूब वाक़िफ हैl” (33:40)

يُسْقَوْنَ مِن رَّحِيقٍ مَّخْتُومٍ

“उनको सर ब मोहर ख़ालिस शराब पिलायी जाएगीl” (83:25)

خِتَامُهُ مِسْكٌ ۚ وَفِي ذَٰلِكَ فَلْيَتَنَافَسِ الْمُتَنَافِسُونَ

“जिसकी मोहर मिश्क की होगी और उसकी तरफ अलबत्ता शायक़ीन को रग़बत करनी चाहिएl” (83:26)

आयतों 83:25-26 में मुहर लगाने का उद्देश्य किसी चीज को गंदगी से सुरक्षित रखना और उसके शुद्ध होने का प्रमाण प्रदान करना हैl

मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कई कारणों से आखरी नबी हैं:

1- आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने स्वयं से पहले आने वाले नबियों की नबूवत और उनकी वास्तविक शिक्षाओं का प्रमाणीकरण और पुष्टिकरण कियाl

2- आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पिछले आसमानी किताबों का प्रमाणीकरण और पुष्टिकरण कियाl

3- आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पिछले आसमानी किताबों के उन हिस्सों को स्पष्ट किया जिनमें विकृत और बदलाव हो चुका थाl

4- आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन मामलों को हल किया जिन पर लोगों का मतभेद हो गया थाl

5- अल्लाह पाक ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के माध्यम से अपने दीन और इंसानों के लिए अपने संदेश को पूर्ण कर दियाl

आयत 33:40 में खातेमुन्नबिय्यीन का अर्थ मेरे राय के अनुसार एक ऐसा नबी है जिसके माध्यम से अल्लाह का दीन कामिल और मुकम्मल (पूर्ण) हो गया है और जिसने अपने से पहले के सभी नबियों और आसमानी किताबों पर सच्चाई का मुहर लगा दिया और साथ ही साथ भविष्य में किसी भी नबी की आमद के अंत की ओर संकेत भी कर दियाl मुहर के बाद और हो क्या सकता है? मुहर बंद किए जाने का भी संकेत करता हैl

अब हम इस प्रश्न का एक अलग तरीके से अवलोकन करते हैंl अगर अल्लाह ने भविष्य में और नबियों को भेजने की योजना बना ली तो फिर क्या? अब हमें इस मामले में कुरआन से उम्मीद रखनी चाहिए?

अल्लाह अपनी सुन्नत परिवर्तित नहीं करता है

(17:77) وَلَا تَجِدُ لِسُنَّتِنَا تَحْوِيلًا

(33:62, 48:23) وَلَن تَجِدَ لِسُنَّةِ اللَّهِ تَبْدِيلًا

(35:43) وَلَن تَجِدَ لِسُنَّتِ اللَّهِ تَحْوِيلًا

अगर लोगों की हिदायत के लिए भविष्य में और नबियों को भेजना अल्लाह का इरादा होता तो अल्लाह अपनी सुन्नत के अनुसार उम्मते मुहम्मदिया से भी वादा अवश्य लेता जैसा कि अल्लाह पाक ने पैगम्बर की मदद और उसकी सहायता के लिए पहली उम्मतों से वादा लियाl

وَإِذْ أَخَذَ اللَّهُ مِيثَاقَ النَّبِيِّينَ لَمَا آتَيْتُكُم مِّن كِتَابٍ وَحِكْمَةٍ ثُمَّ جَاءَكُمْ رَسُولٌ مُّصَدِّقٌ لِّمَا مَعَكُمْ لَتُؤْمِنُنَّ بِهِ وَلَتَنصُرُنَّهُ ۚ قَالَ أَأَقْرَرْتُمْ وَأَخَذْتُمْ عَلَىٰ ذَٰلِكُمْ إِصْرِي ۖ قَالُوا أَقْرَرْنَا ۚ قَالَ فَاشْهَدُوا وَأَنَا مَعَكُم مِّنَ الشَّاهِدِينَ

“(और ऐ रसूल वह वक्त भी याद दिलाओ) जब ख़ुदा ने पैग़म्बरों से इक़रार लिया कि हम तुमको जो कुछ किताब और हिकमत (वगैरह) दे उसके बाद तुम्हारे पास कोई रसूल आए और जो किताब तुम्हारे पास उसकी तसदीक़ करे तो (देखो) तुम ज़रूर उस पर ईमान लाना, और ज़रूर उसकी मदद करना (और) ख़ुदा ने फ़रमाया क्या तुमने इक़रार लिया तुमने मेरे (एहद का) बोझ उठा लिया सबने अर्ज़ की हमने इक़रार किया इरशाद हुआ (अच्छा) तो आज के क़ौल व (क़रार के) आपस में एक दूसरे के गवाह रहनाl” (3:81)

“और इसमें भी शक नहीं कि ख़ुदा ने बनी इसराईल से (भी ईमान का) एहद व पैमान ले लिया था और हम (ख़ुदा) ने इनमें के बारह सरदार उनपर मुक़र्रर किए और ख़ुदा ने बनी इसराईल से फ़रमाया था कि मैं तो यक़ीनन तुम्हारे साथ हूं अगर तुम भी पाबन्दी से नमाज़ पढ़ते और ज़कात देते रहो और हमारे पैग़म्बरों पर ईमान लाओ और उनकी मदद करते रहो और ख़ुदा (की ख़ुशनूदी के वास्ते लोगों को) क़र्जे हसना देते रहो तो मैं भी तुम्हारे गुनाह तुमसे ज़रूर दूर करूंगा और तुमको बेहिश्त के उन (हरे भरे ) बाग़ों में जा पहुंचाऊॅगा जिनके (दरख्तों के) नीचे नहरें जारी हैं फिर तुममें से जो शख्स इसके बाद भी इन्कार करे तो यक़ीनन वह राहे रास्त से भटक गयाl” (5:12)

لَقَدْ أَخَذْنَا مِيثَاقَ بَنِي إِسْرَائِيلَ وَأَرْسَلْنَا إِلَيْهِمْ رُسُلًا ۖ كُلَّمَا جَاءَهُمْ رَسُولٌ بِمَا لَا تَهْوَىٰ أَنفُسُهُمْ فَرِيقًا كَذَّبُوا وَفَرِيقًا يَقْتُلُونَ

“हमने बनी इसराईल से एहद व पैमान ले लिया था और उनके पास बहुत रसूल भी भेजे थे (इस पर भी) जब उनके पास कोई रसूल उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ हुक्म लेकर आया तो इन (कम्बख्त) लोगों ने किसी को झुठला दिया और किसी को क़त्ल ही कर डालाl” (5:70)

मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के उम्मत के जिम्मे ऐसा कोई अहद व पैमान नहीं हैl अल्लाह के साथ हमारा अहद निम्नलिखित है:

“(ऐ रसूल) हमने तुमको (तमाम आलम का) गवाह और ख़ुशख़बरी देने वाला और धमकी देने वाला (पैग़म्बर बनाकर) भेजा (8) ताकि (मुसलमानों) तुम लोग ख़ुदा और उसके रसूल पर ईमान लाओ और उसकी मदद करो और उसको बुज़ुर्ग़ समझो और सुबह और शाम उसी की तस्बीह करो (9) बेशक जो लोग तुमसे बैयत करते हैं वह ख़ुदा ही से बैयत करते हैं ख़ुदा की क़ूवत (कुदरत तो बस सबकी कूवत पर) ग़ालिब है तो जो अहद को तोड़ेगा तो अपने अपने नुक़सान के लिए अहद तोड़ता है और जिसने उस बात को जिसका उसने ख़ुदा से अहद किया है पूरा किया तो उसको अनक़रीब ही अज्रे अज़ीम अता फ़रमाएगा (10)” (48:8-10)

अल्लाह के साथ हामारा अहद केवल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर ईमान लाना और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मदद करना हैl

मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की उम्मत को उलेमा और इमामों की इताअत से भी आज़ाद रखा गया है, हर मुसलमान स्वयं कुरआन का अध्ययन कर सकता है और अपनी समझ के अनुसार उस पर अमल भी कर सकता हैl कुरआन एक ऐसी किताब है जो हक़ के रास्ते के चाहने वालों के लिए हर चीज को ऐसा स्पष्ट करके पेश करती है जिसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं रहती है, इसमें किसी भी बहाने के तहत किसी भी बातिल की पैरवी की कोई गुंजाइश नहीं हैl अल्लाह ने हम में से हर एक को कुरआन के बारे में अपने इल्म और कुरआन की बेहतर समझ के अनुसार इसकी पैरवी करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की हैl

हम किसी इमाम या किसी उस्ताद की पैरवी कर सकते हैं, लेकिन हम जो करते हैं और जो अकीदा रखते हैं उसके ज़िम्मेदार हम स्वयं हैंl

उपरोक्त विवरण के बाद मैं यह भी कहना चाहूँगा कि अहमदिया के अकीदे पर इस प्रकार की प्रतिक्रिया अकारण है, और इनका दावा निम्नलिखित फिरकों से भिन्न नहीं हैl

1 –मेहदी फिरका जो मेहदी पर विश्वास रखता है जो पहले ही आ चुके हैं

2 –सुन्नी जो मेहदी मौउद पर ईमान रखते हैं

3 –शिया जो एक वंशानुगत इमामत पर विश्वास रखते हैं और यह मानते हैं कि एक मेहदी छिपे हुए हैं जो एक दिन ज़ाहिर होंगेl’

4 –सुफिया जो यह मानते हैं कि उनके अनुयायी अल्लाह पर या नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ओर से सीधे इल्म प्राप्त करते हैं और पीर के अंदर अल्लाह की बारगाह में शफाअत करने की शक्ति हैl

अहमदिया बिरादरी पर ऐसी गंभीर प्रतिक्रिया, हठ और ईर्ष्या पर आधारित है क्योंकि वह एक खुशहाल और शिक्षित बिरादरी हैं, और इस प्रतिक्रिया का उनके अकीदे से कोई लेना देना नहीं हैl

यह बदकिस्मती की बात है कि अहमदिया अपने इमाम को एक पैगम्बर करार देते हैं, लेकिन साथ ही साथ अपने अकीदे से हट कर मैं हर अकीदे को बुरा समझता हूँl उनके नाम के अलावा उनके अकीदे में ऐसी कोई ख़ास बात नहीं है जिसे गलत कहा जा सकेl अगर उन्होंने अपने रहनुमा मिर्ज़ा गुलाम अहमद कादियानी को नबी के बजाए एक इमाम करार दिया होता तो कोई समस्या ही नहीं पैदा होतीl मेरी राय में अहमदिया की वेबसाईट कुरआन पाक की बेहतरीन तफसीर प्रदान करती है और अहमदी अच्छे मुसलमान हैं जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और अल्लाह का सम्मान करते हैंl उनके अकीदे इस्लाम के लिए अपमान का कारण नहीं हैं, और वह ऐसे लोग हैं जिन पर हम गर्व कर सकते हैं और दोस्ती भी कर सकते हैंl तथापि, अल्लाह ने हम से ऐसा कोई वादा नहीं लिया है कि हम दूसरों को अपना अकीदा कुबूल करने पर मजबूर करेंl

“बेशक जिन लोगों ने आपने दीन में तफरक़ा डाला और कई फरीक़ बन गए थे उनसे कुछ सरोकार नहीं उनका मामला तो सिर्फ ख़ुदा के हवाले है फिर जो कुछ वह दुनिया में नेक या बद किया करते थे वह उन्हें बता देगा (उसकी रहमत तो देखो)” (6:159)

हालांकि अल्लाह पाक हमें फिरका वाराना राजनीति में हस्तक्षेप ना करने और इसका निर्णय अल्लाह पर छोड़ने का आदेश देता है, लेकिन पाकिस्तान ने इसके विपरीत करके स्वयं को अपनी ही लानत में गिरफ्तार कर लिया है इसलिए कि:

1 –इसका तौहीन ए रिसालात का कानून अनुचित हैl

2 –अहमदियों को गैर मुस्लिम करार देने वाला इसका कानून अनुचित हैl

और इस प्रकार पाकिस्तान ने साम्प्रदायिक तत्वों को देश का वातावरण गंदा करने के लिए उनको प्रोत्साहित किया हैl परिणाम सबके सामने हैंl आज पाकिस्तान कमज़ोर हो चुका है और तंग नज़र साम्प्रदायिकता ने देश का शीराज़ा मुंतशिर कर दिया है और अंततः यह अल्लाह की निम्नलिखित आयतों को सच साबित करके रहे गाl

قُلْ هُوَ الْقَادِرُ عَلَىٰ أَن يَبْعَثَ عَلَيْكُمْ عَذَابًا مِّن فَوْقِكُمْ أَوْ مِن تَحْتِ أَرْجُلِكُمْ أَوْ يَلْبِسَكُمْ شِيَعًا وَيُذِيقَ بَعْضَكُم بَأْسَ بَعْضٍ ۗ انظُرْ كَيْفَ نُصَرِّفُ الْآيَاتِ لَعَلَّهُمْ يَفْقَهُونَ

“(ऐ रसूल) तुम कह दो कि वही उस पर अच्छी तरह क़ाबू रखता है कि अगर (चाहे तो) तुम पर अज़ाब तुम्हारे (सर के) ऊपर से नाज़िल करे या तुम्हारे पॉव के नीचे से (उठाकर खड़ा कर दे) या एक गिरोह को दूसरे से भिड़ा दे और तुम में से कुछ लोगों को बाज़ आदमियों की लड़ाई का मज़ा चखा दे ज़रा ग़ौर तो करो हम किस किस तरह अपनी आयतों को उलट पुलट के बयान करते हैं ताकि लोग समझेl” (6:65)

पाकिस्तान इस प्रकार के नियमों को समाप्त करके साम्प्रदायिक दंगों की इस लानत से निजात प्राप्त कर सकता है, इसलिए कि

إِنَّ اللَّهَ لَا يُغَيِّرُ مَا بِقَوْمٍ حَتَّىٰ يُغَيِّرُوا مَا بِأَنفُسِهِمْ ۗ وَإِذَا أَرَادَ اللَّهُ بِقَوْمٍ سُوءًا فَلَا مَرَدَّ لَهُ ۚ وَمَا لَهُم مِّن دُونِهِ مِن وَالٍ

“(उसके नज़दीक) सब बराबर हैं (आदमी किसी हालत में हो मगर) उस अकेले के लिए उसके आगे उसके पीछे उसके निगेहबान (फरिश्ते) मुक़र्रर हैं कि उसको हुक्म ख़ुदा से हिफाज़त करते हैं जो (नेअमत) किसी क़ौम को हासिल हो बेशक वह लोग खुद अपनी नफ्सानी हालत में तग्य्युर न डालें ख़ुदा हरगिज़ तग्य्युर नहीं डाला करता और जब ख़ुदा किसी क़ौम पर बुराई का इरादा करता है तो फिर उसका कोई टालने वाला नहीं और न उसका उसके सिवा कोई वाली और (सरपरस्त) हैl (13:11)

आशा करता हूँ कि लोग होश के नाख़ून लेंगे और दुसरे लोगों और उनके अकीदों के लिए सहिष्णुता का प्रदर्शन करके अपने अन्दर परिवर्तन पैदा करेंगे, इससे पहले कि अल्लाह अपना अज़ाब उतार देl

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