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Hindi Section (30 Jul 2018 NewAgeIslam.Com)


Parents’ Rights After Their Death from Islamic Perspective माता-पिता की मौत के बाद संतान पर माता-पिता के अधिकार

 

 

 

गुलाम गौस सिद्दीकी, न्यू एज इस्लाम

माता-पिता का देहांत हो जाने के बाद संतान  पर माता-पिता के लिए क्या अधिकार हैं?

इसका उत्तर फतावा रिजविया (तख़रीज शुदा) जिल्द 24 में शामिल रिसाला “अल हुकूक ली तर्हुल उकुक” पृष्ठ 392 में है, जिसमें सवाल करने वाले (मुंशी शौकत अली साहब फारुकी) ने आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा से सवाल किया कि मृत्यु हो जाने के बाद संतान पर माता-पिता का क्या अधिकार रहता है? इसके जवाब में आला हज़रत निम्नलिखित अधिकार बयान फरमाते हैं फिर इसके बाद उनके सबूत में 21 हदीसें ज़िक्र करते हैंl हम भी उनके इस जवाब का अंश उसी क्रम से लिखते हैं, जिससे हमारे प्रश्न का उत्तर स्पष्ट होगा और अत्यधिक लाभ प्राप्त होंगेl फरमाते हैं:

(1)  (माता-पिता के मृत्यु के बाद) सबसे पहला अधिकार मौत के बाद उनके जनाज़े की तजहीज़, गुस्ल व कफ़न व नमाज़ व दफ़न है और इन कामों में सुनन व मुस्तहब्बात की रियायत जिससे उनके लिए हर खूबी व बरकत व रहमत व वुसअत की उम्मीद होl

(2)  उनके लिए दुआ व इस्तिग्फार हमेशा करते रहना इससे कभी लापरवाही ना करनाl

(3)  सदका व खैरात व अच्छे काम का सवाब उन्हें पहुंचाते रहना, शक्ति के अनुसार इसमें कमी ना करना, अपनी नमाज़ के साथ उनके लिए भी नमाज़ पढ़ना, अपने रोजों के साथ उनके लिए भी रोज़े रखना बल्कि जो नेक काम करे सबका सवाब उन्हें और सब मुसलामानों को बख्श देना कि उन सबको सवाब पहुँच जाएगा और उसके सवाब में कमी ना होगी बल्कि बहुत तरक्कियां पाएगाl

(4)  उन पर कोई उधार किसी का हो तो उसके अदा करने में हद से ज़्यादा जल्दी और कोशिश करना और अपने माल से उनका उधार अदा होने को दोनों जहां की सआदत समझना, खुद क़ुदरत ना हो तो और अज़ीज़ों करीबों फिर बाकी खैर वालों से इसकी मदद लेनाl

(5)  उनपर कोई फर्ज़ रह गया तो जितनी कुदरत हो उसके अदा करने में कोशिश करना, हज ना किया हो तो उनकी तरफ से हज करना या हज्जे बदल कराना, ज़कात या उशर का मुतालबा उन पर रहा तो उसे अदा करना, नमाज़ या रोज़ा बाकी हो तो उसका कफ्फारा देना व अला हाज़ल कयास हर तरीके से उनकी जिम्मे से बरी होने में कोशिश करनाl

(6)  उन्होंने जो वसीयत जायज और शरई की हो जहां तक हो सके उसके निफाज़ में कोशिश करना चाहे अपने ऊपर लाजिम ना हो चाहे अपने नफ्स पर बार हो जैसे वह आधे जायदाद की वसीयत अपने किसी अज़ीज़ गैर वारिस या अजनबी के लिए कर गए तो शरअन तिहाई माल से अधिक में बे इजाज़त वारिसान नाफ़िज़ नहीं मगर औलाद को मुनासिब है कि उनकी वसीयत मानें और उनकी खुशखबरी पुरी करने को अपनी इच्छा पर वरीयता देंl

(7)  उनकी कसम मरने के बाद भी सच्ची रखना जैसे माँ बाप ने कसम खाई थी कि मेरा बेटा फलां जगह ना जाएगा या फलां से ना मिलेगा या फलां काम करेगा तो उनके बाद यह ख़याल ना करना कि अब वह तो नहीं उनकी कसम का ख्याल नहीं बल्कि इसका वैसे ही पाबन्द रहना जैसा उनकी ज़िंदगी में रहता जब तक कोई शरई हर्ज ना हो और कुछ कसम ही और सब कुछ कसम ही पर मौकूफ नहीं हर तरह के जायज काम में मरने के बाद भी उनकी मर्ज़ी का पाबंद रहनाl

(8)  हर जुमे को उनकी कब्र की ज्यारत के लिए जाना, वहाँ यासीन शरीफ पढ़ना ऐसी आवाज़ से कि वह सुनें और इसका सवाब उनकी रूह को पहुंचाना, रास्ते में जब कभी उनकी कब्र आए बिना सलाम व फातिहा ना गुज़रनाl

(9)  उनके रिश्तेदारों के साथ जिन्दगी भर नेक सुलूक करते रहनाl

(10)                 उनके दोस्तों से दोस्ती निभाना, हमेशा उनका सम्मान रखनाl

(11)                कभी किसी के माता-पिता को बुरा कह कर जवाब में उन्हें बुरा ना कहलवानाl

(12)                 सबमें कठिन हक़ है कि कभी कोई गुनाह करके उन्हें कब्र में तकलीफ ना पहुंचाना, उसके सब कामों की खबर माता-पिता को पहुँचती है, नेकियाँ देखते हैं तो खुश होते हैं और उनका चेहरा ख़ुशी से चमकता और दमकता है, और गुनाह देखते हैं तो गमगीन होते हैं और उनके दिल पर सदमा होता है, माँ बाप का यह हक़ नहीं कि उन्हें कब्र में भी तकलीफ पहुंचाई जाएl

अल्लाह पाक हम सब मुसलामानों को नेकियों की तौफीक दे गुनाहों से बचाए, हमारे बड़ों की कब्रों में हमेशा नूर व सुरूर पहुंचाए कि वह कादिर है और हम आजिज़, वह गनी हम मोहताज,

وحسبنا اﷲ ونعم الوکیل نعم المولٰی ونعم النصیر ولاحول ولاقوۃ الاباﷲ العلی العظیم، وصلی اﷲ تعالٰی علی الشفیع علی الرفیع العفو الکریم الرؤف الرحیم سیّدنا محمّد واٰلہٖ واصحابہٖ اجمعین اٰمین والحمدﷲ ربّ العٰلمین۔

(फतावा रिजविया तखरीज शुदा जिल्द 24” रिसाला अल हुकुक ली तरहिल उकुक” नाफ़रमानी को ख़तम करने के लिए अधिकारों का विवरण, पृष्ठ 392 से 394)

इसके बाद आला हज़रत 21 हदीसें ज़िक्र करते हैं जिनसे उन्होंने उपर्युक्त निष्कर्षण किएl

आप स्वयं फरमाते हैं:

अब वह हदीसें जिनसे फकीर (इमाम अहमद रज़ा) ने यह अधिकार निष्कर्षण किए उनमें से कुछ किफायत से ज़िक्र करूँ:

हदीस न० 1: कि एक अंसारी रज़ी अल्लाहु अन्हु ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सेवा में हाज़िर होकर अर्ज़ किया: या रसूलुल्लाह! माँ बाप के मरने के बाद कोई तरीका उनके साथ नेकी का बाक़ी है जिसे मैं बजा लाऊंl फरमाया:

نعم اربعۃ الصلاۃ علیھما والاستغفار لھما وانفاذ عھدھما من بعدھما واکرام صدیقھما وصلۃ الرحم التی لارحم لک الا من قبلھما فھذا الذی بقی من برھما بعد موتھما۔ رواہ ابن النجار ۱؎ عن ابی اسید الساعدی رضی اﷲ تعالٰی عنہ مع القصۃ، ورواہ البیھقی۲؎ فی سننہ عنہ رضی اﷲ تعالٰی عنہ قال قال رسول اﷲ صلی اﷲ تعالٰی علیہ وسلم لایبقی للولد من برالوالد الا اربع الصلٰوۃ علیہ والدعاء لہ وانفاذ عھدہ من بعدہ وصلۃ رحمہ واکرام صدیقہ۔

हाँ चार बातें हैं: उन पर नमाज़, और उनके लिए मगफिरत की दुआ, और उनकी वसीयत नाफ़िज़ करना, और उनके दोस्तों की बुज़ुर्ग दाश्त, और जो रिश्तेदार केवल उन्हीं की तरफ से हों नेक बर्ताव से उसका कायम रखना, यह वह नेकी है कि उनकी मौत के बाद उनके साथ करनी बाकी है (इब्ने नजार ने अबी उसैद साअदी  रज़ीअल्लाहु अन्हु से किस्से के साथ रिवायत कियाl और बेहकी ने अपनी सुनन में उन्हीं से रिवायत किया, कहा फरमाया रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने: पिता के साथ नेकी की चार बातें हैं: उस पर नमाज़ पढ़ना और उसके लिए मगफिरत की दुआ करना, उसकी वसीयत नाफ़िज़ करना, उसके रिश्तेदारों से नेक बर्ताव करना, उसके दोस्तों का एहतिराम करना)

(۱؎ کنزالعمال   بحوالہ ابن النجار   حدیث ۴۵۹۳۴  موسسۃ الرسالۃ بیروت   ۱۶ /۵۷۹) (۲؎ السنن الکبرٰی  کتاب الجنائز  باب مالا یستحب لولی المیت الخ   دارصادر بیروت   ۴ /۶۱ و ۶۲)

हदीस 2:- रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं:

استغفار الولد لابیہ من بعد الموت من البر۔ رواہ ابن النجار عن ابی اسید بن مالک بن زر ارۃ رضی اﷲ تعالٰی عنہ۔

माता-पिता के साथ नेक सुलूक से यह बात है कि संतान उनके बाद उनके लिए दुआ ए मगफिरत करे (इब्ने नज्जार ने अबी उसैद बिन मालिक बिन ज़रारह रज़ीअल्लाहु अन्हु से इसे रिवायत कियाl)

(कंज़ुल आमाल हवाला इब्नुल नज्जार हदीस संख्या 45449 मुवस्ससतुल रिसाला बैरुत 16/463)

हदीस 3: कि फरमाते हैं रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम:

اذا ترک العبد الدعاء للوالدین فانہ ینقطع عنہ الرزق ۔ رواہ الطبرانی فی التاریخ والدیلمی عن انس بن مالک رضی اﷲ تعالٰی عنہ۔

आदमी जब माँ बाप के लिए दुआ छोड़ देता है उसका रिज्क क़ता हो जाता है (तबरानी ने तारीख में और देलमी ने अनस बिन मालिक रज़ीअल्लाहु अन्हु से इसे रिवायत कियाl)

(کنزالعمال ، الطبرانی فی التاریخ والدیلمی عن انس حدیث ۴۵۵۵۶  موسسۃ الرسالۃ بیروت  ۱۶ /۴۸۲)

हदीस 4 व पांच: कि फरमाते हैं सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम:

اذا تصدق احدکم بصدقۃ تطوعا فلیجعلھا عن ابویہ فیکون لہما اجرھا ولاینقص من اجرہ شیئا۔ رواہ الطبرانی فی الاوسط ۱؎ وابن عساکر۲؎ عن عبداﷲ بن عمر ورضی اﷲ تعالٰی عنہما ونحوہ الدیلمی فی مسند الفردوس ۳؎ عن معٰویۃ ابن حیدۃ القشیری رضی اﷲ تعالٰی عنہ۔

जब तुममें से कोई व्यक्ति कुछ नफिल खैरात करे तो चाहिए कि उसे अपने माँ बाप की तरफ से करे कि इसका सवाब उन्हें मिलेगा और उसके सवाब में से कुछ नहीं घटेगा (इस हदीस को तबरानी ने अवसत में और इब्ने असाकर ने अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ीअल्लाहु अन्हु से रिवायत किया और ऐसे ही देलमी ने मसनदुल फिरदौस में मुआविया इब्ने हैदा कैशरह रज़ीअल्लाहु अन्हु से रिवायत कियाl)

(۱؎ المعجم الاوسط   حدیث ۶۹۴۶   مکتبۃ المعارف ریاض   ۷ /۴۷۹) (۲؎ الجامع الصغیر  بحوالہ ابن عساکر   حدیث ۷۹۴۳  دارالکتب العلمیہ بیروت   ۲ /۴۸۵) (۳؎ الفردوس بماثور الخطاب  عن معاویہ بن حیدۃ   حدیث ۶۳۴۲  دارالکتب العلمیہ بیروت  ۴ /۱۰۹)

हदीस 6: कि एक सहाबी रज़ीअल्लाहु अन्हु ने हाज़िर हो कर अर्ज़ किया: या रसूलुल्लाह! मैं अपने माँ बाप के साथ ज़िन्दगी में नेक सुलूक करता था अब वह मर गए उनके साथ नेक सुलूक का क्या रास्ता है? फरमाया:

ان من البربعد الموت ان تصلی لھما مع صلٰوتک وتصوم لھما مع صیامک۔ رواہ الدارقطنی۔
मरने के बाद नेक सुलूक से यह है कि तू अपनी नमाज़ के साथ उनके लिए भिही नमाज़ पढ़े और अपने रोजों के साथ उनके लिए रोज़ा रखे (इसे दारुल कितनी ने रिवायत किया)

(ردالمحتار  بحوالہ الدارقطنی   کتاب الحج   باب الحج عن الغیر  داراحیاء التراث العربی بیروت ۲ /۲۳۷)

अर्थात जब अपने सवाब मिलने के लिए कुछ नफिल नमाज़ पढ़े या रोज़े रखे तो कुछ नफिल नमाज़ उनकी तरफ कि उन्हें सवाब पहुंचाए या नमाज़ रोज़ा जो नेक काम करे साथ ही उन्हें सवाब पहुँचने की भी नीयत कर ले कि उन्हें सवाब मिलेगा और तेरा भी कम ना होगा,

کما یدل علیہ لفظ _مع_ انہ یحتمل لوجھین بل ھذا الصق بالمعیۃ۔

जैसा कि शब्द “मअ” इस पर दाल है क्योंकि इसमें उक्त दोनों संभावना हैं बल्कि आखरी वजह मअय्यत को अधिक उपयुक्त हैl

मुहीत फिर तातार खानिया फिर रद्दुल मोहतार में है:

الافضل لمن یتصدق نفلا ان ینوی لجمیع المؤمنین والمؤمنات لانھا تصل الیھم ولاینقص من اجرہ شیئ۔

जो व्यक्ति नफ्ली सदका दे उसके लिए अफज़ल यह है कि सभी ईमान वालों की नीयत करे क्योंकि उन्हें भी सवाब पहुंचे गा और उसका सवाब भी कम नहीं होगाl)

(ردالمحتار  بحوالہ الدارقطنی   کتاب الحج   باب الحج عن الغیر  داراحیاء التراث العربی بیروت ۲ /۲۳۶)

हदीस 7: कि फरमाते हैं सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम:

من حجّ عن والدیہ اوقضی عنہما مغرما بعثہ اﷲ یوم القیٰمۃ مع الابرار ۔ رواہ الطبرانی ۱؎ فی الاوسط والدار قطنی ۲؎ فی السنن عن ابن عباس رضی اﷲ تعالٰی عنھما۔

जो अपने माँ बाप की तरफ से हज करे या उनका क़र्ज़ अदा करे कयामत के दिन नेकियों के साथ उठेगा (इसे तबरानी ने अवसत में दार ए कितनी ने सुनन में इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहु अन्हुमा से रिवायत कियाl)

(۱؎ المعجم الاوسط حدیث ۷۷۹۶ ، مکتبۃ المعارف ریاض   ۸ /۳۹۳) (۲؎ سنن الدارقطنی  کتاب الحج   باب المواقیت حدیث ۱۱۰  نشرالسنۃ ملتان   ۲ /۲۶۰)

हदीस 8: अमीरुल मोमिनीन उमर फारुक आज़म रज़ीअल्लाहु अन्हु पर अस्सी हज़ार क़र्ज़ थे वफात के समय अपने पुत्र हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ीअल्लाहु अन्हुमा को बुला कर फरमाया:

بع فیھا اموال عمر فان وفت والا فسل بنی عدی فان وفت والافسل قریشا ولاتعدھم۔

मेरे दैन (कर्ज़) में पहले तो मेरा माल बेचना अगर काफी हो जाए बहुत अच्छा वरना मेरी कौम बनी अदी से मांग कर पूरा करना अगर यूँ भी पूरा ना हो तो कुरैश से मांगना और उनके सिवा औरों से सवाल मत करनाl फिर साहबज़ादा मौसूफ़ से फरमाया: اضمنھا तुम मेरे कर्ज़ की ज़मानत कर लो, वह जामिन हो गए और अमीरुल मोमिनीन के दफन से पहले बड़े मुहाजेरीन व अंसार को गवाह कर लिया वह अस्सी हज़ार मुझ पर हैं, एक हफ्ता नहीं गुजरा था कि अब्दुल्लाह रज़ीअल्लाहु अन्हु ने वह सारा कर्ज़ अदा कर दियाl

رواہ ابن سعد فی الطبقات عن عثمان بن عروۃ

(इसे इब्ने साद ने तबकात में उसान बिन उर्वा से रिवायत किया)

(الطبقات الکبرٰی لابن سعد ذکراستخلاف عمررضی اﷲ عنہ  دارصادر بیروت  ۳ /۳۵۸)

हदीस 9: कबीला जहीना से एक बीबी रज़ीअल्लाहु अन्हा ने हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ किया: या रसूलुल्लाह! मेरी माँ ने हज करने की मन्नत मानी थी वह अदा ना कर सकीं और उनका इन्तेकाल हो गया क्या मैं उनकी तरफ से हज कर लूँ, फरमाया:

حجی عنھا ارأیت لوکان علی امک دین اکنت قاضیتہ اقضوا اﷲ فاﷲ احق بالوفاء۔ رواہ البخاری عن ابن عباس رضی اﷲ تعالٰی عنھما۔

हाँ उसकी तरफ से हज कर, भला तू देख तो तेरी माँ पर अगर दैन होता तो तू अदा करती या नहीं? यूँ ही खुदा का दैन अदा करो कि वह अधिक हक़ अदा रखता है (इसे बुखारी ने इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहु अन्हु से रिवायत किया)

( صحیح البخاری   ابواب العمرۃ   باب الحج والنذر عن المیت   قدیمی کتب خانہ کراچی ۱ /۲۵۰) (صحیح البخاری   کتاب الاعتصام   باب شبّہ اصلاً معلوماً الخ   قدیمی کتب خانہ کراچی  ۲ /۱۰۸۸

हदीस 10: फरमाते हैं सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम:

اذا حج الرجل عن والدیہ تقبل منہ ومنھما واستبشرت ارواحھما فی السماء وکتب عند اﷲ برا۔ رواہ الدار قطنی عن زید بن ارقم رضی اﷲ تعالٰی عنہ۔

इंसान जब अपने माता-पिता की तरफ से हज करता है वह हज उसकी और उसके माता-पिता की तरफ से कुबूल किया जाता है और उनकी रूहें आसमान में उससे खुश होती हैं, और यह व्यक्ति अल्लाह पाक के नजदीक माँ बाप के साथ नेक सुलूक करने वाला लिखा जाता है (इसे दार कितनी ने ज़ैद इब्ने अर्कम रज़ीअल्लाहु अन्हु से रिवायत कियाl)

(سنن الدارقطنی کتاب الحج  باب المواقیت   حدیث ۱۰۹  نشرالسنۃ ملتان ۲ /۲۶۰)

हदीस 11: कि फरमाते हैं रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम:

من حج عن ابیہ وامہ فقد قضی عنہ حجتہ فکان لہ فضل عشر حجج۔ رواہ الدارقطنی عن جابر بن عبداﷲ رضی اﷲ تعالٰی عنہما۔

जो अपने माँ बाप की तरफ से हज करे उनकी तरफ से हज अदा हो जाए और उसे दस हज का सवाब मिलेl (दार कितनी ने जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ीअल्लाहु अन्हु से इसे रिवायत किया)

(سنن الدارقطنی  کتاب الحج   باب المواقیت   حدیث ۱۱۲ نشرالسنۃ ملتان   ۲ /۲۲۰)

हदीस 12: कि फरमाते हैं सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम:

من حج عن والدیہ بعد وفاتھما کتب لہ عتقا من النار وکان للمحجوج عنھما اجر حجۃ تامۃ من غیران ینقص من اجورھما شیئا۔ رواہ الاصبھا نی فی الترغیب والبیھقی فی الشعب عن ابن عمر رضی اﷲ تعالٰی عنہما۔

जो अपने माता-पिता के मरने के बाद उनकी तरफ से हज करे अल्लाह पाक उसके लिए दोज़ख से आज़ादी लिखे और उन दोनों लिए पुरे हज का सवाब हो जिसमें वास्तव में कमी ना होl (इसे इबहानी ने तरगीब में और बेहकी ने शअब में इब्ने उमर रज़ीअल्लाहु अन्हु से रिवायत कियाl)

(شعب الایمان   حدیث ۷۹۱۲  دارالکتب العلمیۃ بیروت  ۶ /۲۰۵)

हदीस 13: कि फरमाते हैं सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम:

من برقسمھما وقضی دینھما ولم یستسب لھما کتب بارا و ان کان عاقا نی حیاتہ و من لم یبر قسمھما ولم یقض دینھما و استسب لھما کتب عاقا وان کان بارا فی حیاتھما۔ رواہ الطبرانی فی الاوسط عن عبدالرحمٰن بن سمرۃ رضی اﷲ تعالٰی عنہ۔

जो व्यक्ति अपने माँ बाप के बाद उनकी कसम सच्ची करे और उनका क़र्ज़ अदा करे और किसी के माँ बाप को बुरा कह कर उन्हें बुरा ना कहलवाए वह माता-पिता के साथ नेक लोगों में लिखा जाता है हालांकि उनकी ज़िंदगी में आज्ञाकारी नहीं था और जो उनकी कसम पुरी ना करे और उनका कर्ज़ ना उतारे औरों के माता-पिता को बुरा भला कह कर उन्हें बुरा कहलवाए वह आक लिखा जाएगा हालांकि उनकी ज़िन्दगी में नेक था (इसे तबरानी ने अवसत में अब्दुर्रहमान बिन समरा रज़ीअल्लाहु अन्हु से रिवायत किया)

(المعجم الاوسط  حدیث ۵۸۱۵  مکتبۃ المعارف ریاض   ۶ /۳۸۴)

हदीस 14: कि फरमाते हैं सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम:

من زارقبر والدیہ اواحدھما فی کل یوم جمعۃ مرۃ غفراﷲ لہ وکتب برا۔ رواہ الامام الترمذی العارف باﷲ الحکیم فی نوادر الاصول عن ابی ھریرۃ رضی اﷲ تعالٰی عنھما۔

जो अपने माता-पिता दोनों या एक के कब्र पर हर जुमे के दिन ज़ियारत के लिए हाज़िर हो अल्लाह पाक उसके गुनाह बख्श दे और माँ बाप के साथ अच्छा बर्ताव करने वाला लिखा जाए (इमाम हकीम आरिफ बिल्लाह तिरमिज़ी ने नवादिरुल उसूल में अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहु अन्हु से इसे रिवायत किया)

(نوادرالاوصول للترمذی الاصل الخامس عشر  دارصادر بیروت   ص۲۴)

हदीस 15: कि फरमाते हैं सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम:

من زارقبر ابویہ اواحدھما یوم الجمعۃ فقرأ عندہ یٰس غفرلہ۔ رواہ ابن عدی ۳؎ عن الصدیق الاکبر رضی اﷲ تعالٰی عنہ وفی لفظ من زار قبروالدیہ اواحدھما فی کل جمعۃ فقرأ عندہ یٰس غفراﷲ لہ بعدد کل حرف منھا۔ رواہ ھو دالخلیلی وابوشیخ والدیلمی۱؎وابن النجار والرافعی وغیرھم عن ام المؤمنین الصدیقۃ عن ابیھا الصدیق الاکبر رضی اﷲ تعالٰی عنھما عن النبی صلی اﷲ تعالٰی علیہ وسلم۔

जो व्यक्ति जुमे के दिन अपने माता-पिता या एक के कब्र की ज़्यारत करे और उसके पास यासीन पढ़े बख्श दिया जाए (इसे अदी ने सिद्दीक अकबर रज़ीअल्लाहु अन्हु से रिवायत किया हैl और दुसरे शब्दों में) जो हर जुमे के दिन माता-पिता या एक के कब्र की ज़्यारत करके वहाँ यासीन पढ़े यासीन शरीफ में जितने अक्षर हैं उन सब की गिनती के बराबर अल्लाह पाक उसके लिए मगफिरत फरमाए (इसे रिवायत किया तिरमिज़ी, अल खैली और अबू शैख़ और देलमी और इब्ने नजार और राफई वगैरा ने मोमिनीन की माँ आयशा सिद्दीका से उन्होंने अपने वालिद सिद्दीक ए अकबर रज़ीअल्लाहु अन्हुमा से उन्होंने नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से)

(الکامل لابن عدی   ترجمہ عمربن زیادبن عبدالرحمان بن ثوبان   دارالفکر بیرو ت   ۵ /۱۸۰۱)

 

(۱؎ اتحاف السادۃ للمتقین   بحوالہ ابی الشیخ وغیرہ   بیان زیارۃ القبور والدعاء للمیت  دارالفکر بیروت   ۱۰ /۳۶۳)

हदीस 16: कि फरमाते हैं सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम:

من زارقبر ابویہ اواحدھما احتسابا کان کعدل حجۃ مبرورۃ ومن کان زوارا لھما زارت الملئکۃ قبرہ۔ رواہ الامام الترمذی الحکیم وابن عدی عن ابن عمر رضی اﷲ تعالٰی عنھما۔

जो सवाब की नियत से अपने माता-पिता दोनों या एक के कब्र की ज़्यारत करे मकबूल हज के बराबर सवाब पाए, और जो कसरत से उनके कब्र की ज़्यारत किया करता हो फरिश्ते उसकी कब्र की ज़्यारत को आएं (हकीम तिरमिज़ी और इब्ने अदि ने इब्ने उमर रज़ीअल्लाहु अन्हुमा से इसे रिवायत कियाl)

( نوادرالاصول للترمذی   الاصل الخامس عشر  دارصادربیروت  ص۲۴) (الکامل لابن عدی   ترجمہ حفص بن سلمہ الخ  دارالفکر بیروت   ۲ /۸۰۱)

इमाम इब्नुल जौज़ी मुहद्दिस किताब उयुनुल हकायात में खुद की सनद मुहम्मद इब्नुल अब्बास वराक से रिवायत फरमाते हैं कि एक व्यक्ति अपने बेटे के साथ सफ़र को गया रास्ते में बाप का इन्तेकाल हो गया वह जंगल दरख्तान मुकल अर्थात गोगल के पेड़ों का था उनके नीचे दफ़न करके बेटा जहां जाना था चला गया जब पलट कर आया उस मंज़िल में रात को पहुंचा बाप की कब्र पर ना गया तो नागाह सूना कि कोई कहने वाला कहता है:

رأیتک تطوی الدوم لیلا ولاترٰی   علیک باھل الدوم ان تتکلما

 

وبالدوم ثا ولو ثویت مکانہ       فمر باھل الدوم عاج فسلما

(मैंने तुझे देखा कि तू रात में इस जंगल को तै करता है और वह जो उन पेड़ों में है उससे कलाम करना अपने उपर लाज़िम नहीं जानता हालांकि इन पेड़ों में वह रहता है कि अगर उसकी जगह तू होता और वह यहाँ से गुज़रता तो वह राह से फिर कर आता और तेरी कब्र पर सलाम करताl)

(شرح الصدور   بحوالہ عیون الحکایات   باب زیارۃ القبور علم الموتی     خلافت اکیـڈمی منگورہ سوات ص۹۱)

हदीस 17: कि फरमाते हैं सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम:

من احب ان یصل اباہ فی قبرہ فلیصل اخوان ابیہ من بعدہ۔ رواہ ابویعلٰی وابن حبان عن ابن عمر رضی اﷲ تعالٰی عنہما۔

जो चाहे कि बाप की कब्र में उसके साथ अच्छा सुलूक करे वह बाप के बाद उसके अज़ीज़ों दोस्तों से नेक बर्ताव रखे (अबू याला व इब्ने हिबान ने इब्ने उमर रज़ीअल्लाहु अन्हु से इसे रिवायत किया)

(مسند ابویعلٰی  حدیث ۵۶۴۳  مؤسسۃ علوم القرآن بیروت   ۵ /۲۶۰)

हदीस 18: फरमाते हैं सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम:

من البر ان تصل صدیق ابیک، رواہ الطبرانی فی الاوسط عن انس رضی اﷲ تعالٰی عنھما۔

 

बाप के साथ नेकी करने से है यह कि तो उसके दोस्त से अच्छा बर्ताव करेl (तबरानी ने अवसत में अनस रज़ीअल्लाहु अन्हु से इसे रिवायत किया)

(المعجم الاوسط   حدیث ۷۲۹۹   مکتبۃ المعارف ریاض     ۸ /۱۴۹)

हदीस 19: कि फरमाते हैं सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम:

ان البر ان یصل الرجل اھل ود ابیہ بعد ان یولی الاب ۔ رواہ الائمۃ احمد والبخاری فی الادب المفرد و مسلم فی صحیحہ وابوداؤد والترمذی عن ابن عمر رضی اﷲ تعالٰی عنھما۔

बेशक बाप के साथ सारी नेकियों से बढ़ कर नेकी है कि आदमी बाप के बाद उसके दोस्तों से अच्छी रविश पर निबाहे (इसे इमामों अहमद और बुखारी ने अदबुल मुफरद में और मुस्लिम ने अपनी सहीह में और अबू दाउद और तिरमिज़ी ने इब्ने उमर रज़ीअल्लाहु अन्हुमा से रिवायत कियाl)

(صحیح مسلم   کتاب البر والصلۃ   باب فضل صلۃ اصدقاء الاب والام   قدیمی کتب خانہ کراچی   ۲ /۳۱۴)

 

(کنزالعمال   بحوالہ حم خذم ، د، ت  حدیث ۴۵۴۶۲  موسسۃ الرسالۃ بیروت   ۱۶ /۴۶۵)

हदीस 20: कि फरमाते हैं रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम:

احفظ ودّ ابیک لاتقطعہ فیطفئ اﷲ نورک۔ رواہ البخاری فی الادب المفرد والطبرانی فی الاوسط والبیھقی فی الشعب عن ابن عمر رضی اﷲ تعالٰی عنھما۔

अपने माँ बाप की दोस्ती पर निगाह रख उसे कता ना करना कि अल्लाह पाक नूर तेरा बिछा देगा (इसे बुखारी ने अद्बुल मुफरद में और तबरानी ने अवसत में और बेहकी ने शअब में इब्ने उमर रज़ीअल्लाहु अन्हु से रिवायत कियाl)

(المعجم الاوسط   حدیث ۸۶۲۸   مکتبۃ المعارف ریاض  ۹/ ۲۸۸)

(کنزالعمال  بحوالہ خد، طس، ھب عن ابن عباس   حدیث ۴۵۴۶۰  مؤسسۃ الرسالہ بیروت ۱۶ /۴۶۴)

हदीस 21: कि फरमाते हैं सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम:

تعرض الاعمال یوم الاثنین والخمیس علی اﷲ تعالٰی وتعرض علی الانبیاء وعلی الاباء والامھات یوم الجمعۃ فیفرحون بحسناتھم ویزدادون وجوھھم بیضاء ونزھۃ فاتقوا اﷲ ولا توذوا موتاکم۔ رواہ الامام الحکیم عن والد عبدالعزیز رضی اﷲ تعالٰی عنہ۔

हर सोमवार व बृहस्पतवार को अल्लाह पाक के हुजुर आमाल पेश होते हैं और अम्बिया अलैहिस्सलात वत्तस्लीम और माँ बाप के सामने हर जुमे को, वह नेकियों पर खुश होते हैं और उनके चेहरों की सफाई व ताबिश बढ़ जाती है, तो अल्लाह से डरो और अपने मुर्दों को अपने गुनाहों से तकलीफ ना पहुँचाओ (इसे इमाम हकीम ने अपने वालिद अब्दुल अज़ीज़ रज़ीअल्लाहु अन्हु से रिवायत कियाl)

(نوادرالاصول للترمذی   الاصل السابع والستون والمائۃ الخ  دارصادر بیروت   ص۲۱۳)

वाक्य का सारांश यह है कि माता-पिता का अधिकार वह नहीं कि इंसान उससे कभी जिम्मे से बरी हो वह उसके हयात व वजूद के कारण हैं तो जो कुछ नेमतें दीनी व दुनयावी पाएगा सब उन्हीं के तुफैल में हुईं कि हर नेमत व कमाल वजूद पर मौकूफ है और वजूद के सबब वह हुए तो सिर्फ माँ बाप होना ही ऐसे अज़ीम हक़ का कारण है जिससे बरीउज्ज़िम्मा कभी नहीं हो सकता ना कि उसके साथ उसकी परवरिश में उनकी कोशिशें, उसके आराम के लिए उनकी तकलीफें विशेषतः पेट में रखने, पैदा होने में, दूध पिलाने में माँ की तकलीफें, इनका शुक्र कहाँ तक अदा हो सकता है, खुलासा यह कि वह उसके लिए अल्लाह व रसूल जल्ले जलालुहू व सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के साए और उनकी रबुबियत व रहमत के मज़हर हैं, इसलिए कुरआन पाक में अल्लाह पाक, ने अपने हक़ के साथ उनका ज़िक्र फरमाया कि ‘‘ان اشکرلی ولوالدیک’’ (अनुवाद) हक़ माँ मेरा और अपने माँ-बाप काl (कुरआन करीम 14/31)

हदीस शरीफ में है कि एक सहाबी रज़ीअल्लाहु अन्हु ने हाज़िर हो कर अर्ज़ किया: या रसूलुल्लाह! एक राह में ऐसे गर्म पत्थरों पर कि अगर गोश्त उन पर डाला जाता है तो कबाब हो जाता है 6 मील तक अपनी माँ को गर्दन पर सवार करके ले गया हूँ क्या अब उसके हक़ से बरी हो गया?

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया:

لعلہ ان یکون بطلقۃ واحدۃ۔ رواہ الطبرانی فی الاوسط عن بریدۃ رضی اﷲ تعالٰی عنہ۔

तेरे पैदा होने में जितने दर्दों के झटके उसने उठाए हैं शायद उनमें से एक झटके का बदला हो सके (इसे तबरानी ने अवसत में बुरैदा रज़ीअल्लाहु अन्हु से रिवायत कियाl)

(کنزالعمال   بحوالہ طس عن بریدہ   حدیث ۴۵۵۰۶   مؤسسۃ الرسالۃ بیروت  ۱۶ /۴۷۳) (مجمع الزوائد  بحوالہ الطبرانی فی الصغیر   کتاب البروالصلۃ باب ماجاء فی البر وحق الوالدین   دارالکتب ۸ /۱۳۷)

अल्लाह पाक उकुक से बचाए और अदाए हुकुक की तौफीक अता फरमाए

اٰمین اٰمین برحمتک یا ارحم الراحمین وصلی اﷲ تعالٰی علٰی سیّدنا ومولانا محمد واٰلہ وصحبہ اجمعین اٰمین والحمدﷲ ربّ العٰلمین۔ واﷲ تعالٰی اعلم۔

 

(فتاوی رضویہ ج ۲۴ تخریج شدہ ، رسالۃ الحقوق لطرح العقوق ، ص ۳۹۴ تا ۴۰۳)

कहने का तात्पर्य यह है कि माता-पिता के मर जाने के बाद औलाद को चाहिए कि वह उनके जनाज़े की तजहीज़, गुस्ल व कफ़न व नमाज़ व तद्फीन को सुनन व मुतहेब्बात की रिआयत के साथ अदा करें, उनके लिए हमेशा दुआ व इस्तिग्फार करते रहें, सदका व खैरात व नेक काम का सवाब उन्हें हमेशा पहुंचाते रहें, अपनी नमाज़ और रोजों के साथ उनके लिए भी नमाज़ पढ़ें और उनके लिए भी रोज़े रखें, माता-पिता पर कोई उधार हो तो उसे जल्दी अदा करें, उनपर कोई फर्ज़ रह गया हो तो अपनी कुदरत के अनुसार उसे पूरा करें जैसे उनकी तरफ से हज्जे बदल कराना आदि, अगर माँ बाप ने कोई जायज और शरई वसीयत की हो तो उसके निफाज़ की पूरी कोशिश करना, उनकी कसम पुरी करना, हर जुमे को उनके कब्र की ज़्यारत के लिए जाना, वहाँ यासीन शरीफ की तिलावत करना और उसका सवाब उनकी रूह को पहुंचाना, माँ बाप के रिश्तेदारों, दोस्तों के साथ उमर भर नेक सुलूक करना और उनका सम्मान करना, और इसी तरह कोई गुनाह करके उन्हें कब्र में तकलीफ ना पहुंचाना आदिl

 

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