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Hindi Section (14 Jun 2018 NewAgeIslam.Com)


Refutation of Kashmiri Militant Zakir Musa’s Recent Statement कश्मीरी उग्रवादी ज़ाकिर मुसा का कश्मीर के नरमदलीय मुसलामानों के सर कलम करने वाले हालिया बयान की तरदीद (भाग-2)

 

 

 

गुलाम गौस सिद्दीकी, न्यू एज इस्लाम

30 मई 2018

लेख के पहले भाग में ज़ाकिर मुसा के तबाह कुन एजेंडे को उजागर किया गया और कश्मीर की सरजमीं पर तथाकथित इस्लामी हुकूमत कायम करने के उसके सिद्धांत की तरदीद की गईl इसमें सबसे पहले ज़ाकिर मुसा के उस धमकी भरे सन्देश का विश्लेषण किया गया जिसमें उसने हुर्रियत के उन नेताओं का सर कलम करने की बात की थी जो कश्मीर की आज़ादी के संघर्ष को इस्लामी हुकूमत कायम करने के लिए एक धार्मिक संघर्ष के बजाए एक राजनीतिक संघर्ष करार देते हैंl फिर इसके बाद फिकही दृष्टिकोण से ज़ाकिर मुसा के एक और धमकी भरे पैगाम की तरदीद करेंगे जिसमें उसने कश्मीर के अलगाववादी नेताओं को यह धमकी दी है कि “वह सेकुलर राज्य की हिमायत करने वाले नरमपंथियों को फांसी पर लटका देगा “और” अगर हम सेकुलरिज्म के लिए आज़ादी हासिल करते हैं तो हमें उनके खिलाफ एक और जंग शुरू करनी होगी”l

इस लेख का मूल उद्देश्य ज़ाकिर मुसा और उस जैसे युवाओं की सुधार करना है जो बदकिस्मती से अलकायदा नेटवर्क के बढ़ते प्रभावों से प्रभावित हो चुके हैंl इसका बुनियादी शीर्षक नरमपंथी, सेकुलरिज्म और इस्लाम है, जैसा की ज़ाकिर मुसा का कहना है, “मैं उन नरमपंथियों को फांसी पर लटका दूंगा जो सेकुलर राज्य की हिमायत करते हैं”l इसलिए जरुरी है की मुसलमान सेकुलरिज्म और इस्लाम के बीच सद्भाव की कल्पना को समझें और इस्लाम के साथ नरमपंथियों के संबंध को जानेl

भारतीय सेकुलरिज्म और इस्लाम समेत सभी धर्म के बीच सद्भाव

सेकुलरिज्म की तारीफ़ हर देश के लिए भिन्न हैl शब्द सेकुलरिज्म का इस्तेमाल अक्सर आम ज़िंदगी और सरकारी मामलों से धर्म का लगाव या सादा जुबान और राजनीति के अलगाव के लिए किया जाता हैl अक्सर तथाकथित विकसित देश धर्मों को स्वीकार नहीं करते, इसलिए वह किसी धर्म को कोई ख़ास अहमियत नहीं देतेl भारतीय सेकुलरिज्म की खुसूसियत यह है कि यहाँ सेकुलरिज्म का तसव्वुर दुसरे देशों से अलग है और भारतीय रियासत सभी धर्मों को बराबर का दर्जा देती हैl भारत के संविधान में 1976 ई० की 42 वीं संसोधन के अनुसार संविधान के मुकद्दमे में इस बात पर जोर दिया गया कि भारत एक सेकुलर देश हैl हालांकि ना तो भारत के संविधान में और ना ही उसके नियमों में धर्म और राज्य के बीच संबंधो का कोई स्पष्टीकरण पेश किया गया है, तथापि, भारत हर धर्म को स्वीकार करता है और उनके लिए बराबर सम्मान को निश्चित बनाता हैl भारत के शहरियों को पूर्ण स्वतन्त्रता के साथ हिन्दू मत, इस्लाम, ईसाइयत, जैन मत, बुद्ध मत और सिख मत आदि जैसे अपने अपने धर्म पर अमल करने की अनुमति हासिल हैl

एक सेकुलर बुनियाद परस्त मणि शंकर अय्यर अपनी किताब में लिखते हैं “भारतीय सेकुलरिज्म धर्म विरोधी या गैर मज़हबी नहीं हो सकता, क्योंकि हमारे देश की अक्सरियत मज़हबी हैl मसीही देशों के विपरीत जहां इस शब्द का जन्म हुआ है, भारत में सेकुलरिज्म धार्मिक अथारटी के खिलाफ रियासत को खड़ा नहीं करता है, बल्कि यह धार्मिक मामलों को व्यक्तिगत दायरे में और राज्य के मामलों को सार्वजनिक दायरे में रखता हैl” (अय्यर 2004: एक सेकुलर बुनियाद परस्त का एतेराफ)l

क्योंकि भारतीय सेकुलरिज्म हर शहरी को अपने अपने तौर पर मजहबी फ़रीज़े व जिम्मेदारियां अदा करने की आजादी देता है, इस लिए यहाँ सेकुलरिज्म को मज़हब विरोधी या इस्लाम विरोधी समझना बेकार हैl ज़ाकिर मुसा को इस हकीकत का एतेराफ करना चाहिए की भारितीय सेकुलरिज्म इसे इसकी बुनियादी मज़हबी फरीजों की अदायगी से नहीं रोकता हैl कुरआन का फरमान है “और मैंने जिन और आदमी इसी लिए बनाए कि मेरी बंदगी करें” (51:56)l भारतीय सेकुलरिज्म से कश्मीरी मुसलामानों समेत दुसरे मुसलामानों को अल्लाह की इबादत करने की पूर्ण स्वतंत्रता देता हैl हाँ, वह तकवा इख्तियार करने और रूहानी तरक्की हासिल करने जैसी मज़हबी जिम्मेदारियों को अदा कर सकते हैंl यहाँ कश्मीरियों समेत मुसलामानों को पांच वक़्त की नमाजों को अदा करने, रोज़ा रखने, हज करने, ज़कात देने, रूहानी मुराक्बे करने, अल्लाह के ज़िक्र में मशगुल रहने और रूहानी कमाल हासिल करने से रोकने वाला कोई नहींl तो फिर भारतीय सेकुलरिज्म को मज़हब विरोधी या इस्लाम विरोधी क्यों तसव्वुर किया जाए? ऐसी सूरत में कश्मीर को भारत का ही हिस्सा क्यों नहीं रहना चाहिए? यह कश्मीरी अलगाव वादियों के लिए भी एक लम्हा ए फिक्रिया हैl

अनेक इस्लामी माहेरीन और उलेमा ने सेकुलरिज्म को इस्लाम के साथ हम आहंग करार दिया हैl मिसाल के तौर पर एमोरी यूनिवर्सिटी (Emory University) में कानून के प्रोफेसर और किताब ‘Islam and the secular state: negotiating the Future of Sharia’ के लेखक अब्दुल्लाह अहमद अल नईम लिखते हैं, “ शरीअत को रियासती ताकत के जोर पर नाफ़िज़ करने से इस की मज़हबी हैसियत ख़तम हो जाती है, क्योंकि इस सूरत में मुसलमान रियासत के कानून पर अमल पैरा होंगे, बहैसियत मुस्लिम आज़ादी से अपनी मज़हबी ज़िम्मेदारी पर नहीं” [Islam and the secular state------कैम्ब्रिज हावर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस 2008]

उपर्युक्त बहस की बुनियाद पर ज़ाकिर मुसा का यह ब्यान की वह “सेकुलर रियासत की हिमायत करने वाले नरमपंथीयों को फांसी पर लटका देगा” गैर इस्लामी साबित होता हैl फांसी पर लटकाने का उसका अमल गैर कानूनी होगा जिसके लिए उसे क़यामत के दिन अल्लाह की बारगाह में हिसाब देना होगाl

एतेदाल पसंदी और इस्लाम

ज़ाकिर मुसा के धमकी भरे पैगाम से दो प्रश्न सामने आते हैं; 1) क्या सेकुलर रियासत के हामी फांसी के हकदार हैं? 2) नरमदलीय मुसलमानों के बारे में इस्लाम का स्टैंड क्या है? उपर्युक्त बहस से हम यह समझ चुके हैं की मज़हबी आज़ादी अता करने वाली किसी सेकुलर रियासत की हिमायत करने वाला फांसी का हकदार नहीं है, इसलिए ज़ाकिर मुसा का बयान शरीअत पर झूट बाँधने के बराबर हैl अब हम इस्लाम के साथ एतेदाल पसंदी के संबंध को समझते हैंl

एक आलिमा फाज़िला कनीज़ फातिमा newageislam.com पर प्रकाशित होने वाले अपने एक लेख "Teachings of Moderation and Balance in Islam" में लिखती हैंl

“नरमपंथी ज़िन्दगी के सभी मामलों में दो अंत के बीच एक बीच का रास्ता इख्तियार करना हैl इस्लाम ज़िंदगी के सभी मामलों अर्थात अकीदे, इबादत व इतवार, संबंधों, दृष्टिकोण, रुसूम व रिवाज, लें दें, रोजाना की सरगर्मियों और इंसानी ख्वाहिशात में नरमपंथी और नरम दलीय  पर जोर देता हैl कुरआन करीम ने स्पष्ट तौर पर नरमपंथी के अवधारणा को कायम किया हैl

अल्लाह पाक का फरमान है:

“और बात यूँ ही है कि हमने तुम्हें नरमदलीय उम्मत बनाया” (अनुवाद; कन्जुल ईमान २:१४३)

इस आयत के अन्दर उम्मते मुस्लिमा की तारीफ़ में अरबी शब्द “اُمۃً وَسَطًا” का इस्तेमाल किया गया हैl शब्द ‘वस्त’ का अनुवाद आम तौर पर नरमपंथी किया जाता हैl इसलिए इस उम्मत की खुसूसियत यह है कि यह ज़िन्दगी के सभी पहलुओं में चाहे वह किरदार हो चाहे अमल, नरमपंथी का रास्ता इख्तियार करती हैl यह ऐसे लोग हैं जो इन्तेहा की तरफ नहीं झुकते हैंl ना तो वह इबादत की अदायगी में गफलत से काम लेते हैं और ना ही उनमें वह उन लोगों का इन्तेहा पसंदाना रवय्या इख्तियार करते हैं जो इस दुनिया को तर्क करके पहाड़ों में रहने के लिए चले जाते हैंl

जो विशेषता मुस्लिम उम्मत को दूसरों से मुमताज़ करती है वह उनका नरमपंथी होना है, (एक ऐसे शब्द का अंग्रेजी में दरमियानी, मोतदिल, मुंसिफाना, मुतवस्सित, दरमियान, मरकज़ी या मुतावाज़ुन जैसे विभिन्न शब्दों से किया जाता है)l शब्द वुस्त के अर्थ की वजाहत के लिए आम तौर पर मुफ़स्सेरीन ने अरबी सिफत मोतदिल का इस्तेमाल किया है, और इस्म एतेदाल जिसका अर्थ “बराबर होना “ है, इन दोनों का माद्दा अदल है जिसका अर्थ “बराबर होना या बराबर करना” हैl

इमाम राज़ी आयत २:१४३ की तफसीर में लिखते हैं कि: दर हकीकत असल नरमपंथी दो इन्तेहा के बीच एक बीच का रास्ता हैl इसमें कोई शक नहीं है की बोह्तात और इसराफ के दोनों किनारे तबाही का जरिया हैं, इसलिए, किरदार में नरमपंथी रखने से उन दोनों किनारों से दूर होना है, और यही मुंसिफाना और नेक रवय्या हैl (तफसीर कबीर; इमाम राज़ी २:१४३)

अपनी अरबी लुगत में इब्ने मंज़ूर लिखते हैं;

“हर काबिले कद्र खुसूसियत के दो काबिले मुज़म्मत किनारे होते हैंl लेकिन बखीली और इसराफ के बीच का रास्ता इख्तियार करना फराख दिली हैl जुरात बुजदिली और बे एहतियाती के बीच का रास्ता इख्तियार करने में हैl इंसानों को इस तरह की हर मुज़म्मत के काबिल खसलत से बचने का हुक्म दिया गया हैl” (लिसानुल अरब 209/15)

एक यमनी मुसलिम रिवायत पसंद वहाब इब्ने मम्ब लिखते हैं, “बेशक हर चीज के दोसरे होते हैं और इसमें दरमियानी रास्ता होता हैl अगर कोई एक सिरा इख्तियार किया जाए तो दुसरा अपना संतुलन खो देगाl और अगर दरमियानी रास्ता इख्तियार किया जाए तो दोनों सिरे मुतवाज़ुन हो जाएँगेl हर चीज में दरमियानी रास्ता इख्तियार करना जरुरी हैl (हुलियतुल औलिया 4818)

मरवी है की हज़रात हुज़ैफा रज़ि अल्लाहु अन्हु ने फरमाया, “ऐ लोगों सीधे रास्ते पर चलते रहो तुम्हें बड़ी कामयाबी मिलेगी, लेकिन अगर तुम दाएं या बाएँ हुए तो फिर गुमराह हो जाओगेl” (सहीह बुखारी ६८५३, हदीस सहीह)

हज़रत इब्ने मसूद से मर्वी है की: रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने दस्ते मुबारक से एक लकीर खीची और फरमाया, “ यह अल्लाह का सीधा रास्ता है” l फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दाएं और बाएँ लकीर खींची और फरमाया की “यह दुसरे रास्ते हैं और उनके बीच को राह ऐसी राह नहीं है मगर यह की इस पर शैतान बैठा हुआ हैऔर अपनी तरफ दावत दे रहा हैl” फिर नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कुरआन की यह आयत तिलावत फरमाई “और यह कह कि यह है मेरा सीधा रास्ता तो इस पर चलो और राहें ना चलों”l (6:153) (मुसनद अहमद 4423, हदीस सहीह)

हमें ज़िन्दगी के हर क्षेत्र में नरमपंथी और तवाजुन की तालीमात पर अमल करना चाहिए, चाहे उनका संबंध मज़हब के फ़राइज़ से हो चाहे दुनियावी ज़िन्दगी की जिम्मेदारियों से होl

अल्लाह पाक का फरमान है,

“और जो माल तुझे अल्लाह ने दिया है उससे आखिरत का घर तलब कर और दुनिया में अपना हिस्सा ना भूलl” (28:77)

हंज़ला अल उसैदी से मरवी है की मैंने कहा’

 “ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, जब हम आपकी बारगाह में होते हैं और हमें जन्नत और जहन्नम की बाते बताई जाती हैं तो हम यह महसूस करते हैं की हम उन्हें अपनी आँखों से देख रहे हैं, लेकिन जब हम आपको छोड़ कर रुखसत होते हैं और अपनी बीवी, बच्चों, और अपने कारोबार में मशगुल होते हैं तो यह चीज अक्सर हमारे ज़हनों से गायब हो जाती हैंl”

इस पर नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया,

कसम है उस ज़ात की जिसके कब्ज़े में मेरी जान है, अगर तुम्हारी ज़हनी कैफियत वही रहे जो मेरी मौजूदगी में होती है और तुम्हारे ज़ेहन हमेशा अल्लाह कीयाद में मशगुल रहें, तो फरिश्ते तुम्हारे बिस्तरों और सड़कों पर तुमसे हाथ मिलाएंl ऐ हंजला इसके बजाए दुसरे कामों में भी समय खर्च करना चाहिएl (सहीह मुस्लिम 2750, हदीस सहीह)

इसलिए इस शिक्षा के अनुसार हमें नमाज़, रोज़ा और यहाँ तक की सदका जैसे आमाल में एतेदाल पसंद रहना चाहिएl जैसे कि हमारी नमाज़ें मोतदिल आवाज़ में होनी चाहिए, ना ही आवाज़ अधिक उंची हो और ना ही अधिक नरम होl

अल्लाह पाक फरमाता है,

“और अपनी नमाज़ ना बहुत आवाज़ से पढ़ो ना बिलकुल आहिस्ता और उन दोनों के बीच में रास्ता चाहो”(17:10)

हज़रात अबू मुसा की सनद से यह रिवायत मरवी है कि उन्होंने कहा, “हम नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ एक सफ़र पर थे, उस दौरान जब लोगों ने बुलंद आवाज़ से अल्लाहुअक्बर पुकारा तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया:

“ऐ लोगों, अपने साथ नरमी के साथ काम लो क्योंकि तुम उसे नहीं पुकार रहे हो जो सुनने से माज़ूर है या गैर हाज़िर हैl बल्कि, तुम उसे पुकार रहे हो जो सुनने वाला देखने वाला हैl” (सहीह बुखारी 3910)

हज़रत जाबिर बिन साम्राह से मरवी है उनहोंने कहा की,

“मैं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ नमाज़ अदा कर रहा था, और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की नमाज़ और आप का खुतबा मोतदिल थेl” (सहीह मुस्लिम 866, हदीस सहीह)

नफ्ली इबादात के सिलसिले में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कई मौकों पर अपने सहाबा को उनकी नफ्ली इबादतों को सीमित करने का हुक्म दिया ताकि वह अपने अहले खाना के साथ अपने फाराइज़ अंजाम दे सकें और अपनी सेहत भी कायम रख सकेंl

मरवी है की हज़रात अब्दुल्लाह बिन अम्र ने कहा, “ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझसे फरमाया, “ऐ अब्दुल्लाह मुझे यह मालुम हुआ है की तुम दिन भर रोज़ा रखते हो और रात भर इबादत करते होl” मैंने कहा, “हाँ या रसूलुल्लाह! “नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, “ऐसा मत किया करोl कभी रोज़ा रखो और कभी खाओ, रात को नमाज़ अदा करो और सो भी जाया करोl बेशक तुम्हारे जिस्म का तुम पर हक़ है, तुम्हारी आँखों का तुम पर हक़ है और तुम्हारी बीवी का भी तुम पर हक़ हैl” (सहीह बुखारी ४९०३, हदीस सहीह)

हज़रत सलमान फ़ारसी रज़ी अल्लाहु अन्हु फरमाते हैं,

“तुम्हारे उपर तुम्हारे रब का हक़ है, तुम्हारे उपर तुम्हारे जिस्म का हक़ है, और तुम्हारे उपर तुम्हारे खानदान का हक़ है, इसलिए तुम हर हक़ वाले का हक़ अदा करोl” (सहीह बुखारी १८६७, हदीस सहीह)

यही पैगाम हमें इस हदीस से भी मिलता है,

“सबसे बेहतर मज़हब सबसे आसान हैl” [अहमद]

नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया,

“जो यह चाहता है की उसकी ज़िंदगी बहुत लंबी हो और उसे अधिक मुराआत अता की जाएं और बुरे खात्मे से महफूज़ हो जाए, तो उसे चाहिए की वह खुदा से डरे और रिश्तेदारों के साथ अच्छे संबंध कायम रखे”l (अल हाकिम]

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह भी फरमाया,

“ऐ लोगों! सलाम फैलाओ, लोगों को खाना खिलाओ, रिश्तेदारों के साथ ताल्लुकात बरकरार रखो और रात को जब लोग सो रहे हों तो नमाज़ पढ़ो तू हिफाज़त के साथ जन्नत में दाखिल हो जाओगेl (अल हाकिम)

इस्लाम मुसलामानों को सदका देने में भी एतेदाल पसंदी की तालीम देता हैl यह मुसलामानों को इतना खर्च करने का हुक्म देता है जितना जरूरत मंद के लिए काफी हो; लेकिन यह इतना माल रखने का भी हुक्म देता है जो उसके खानदान और खुद की देख भाल के लिए काफी होl

अल्लाह पाक फरमाता है:

“और वह कि जब खर्च करते हैं ना हद से बढ़ें और ना तंगी करें और इन दोनों के बीच नरमदलीय  रहेंl” (25:67)

इसलिए हमें दूसरों के साथ अपने ताल्लुकात में भी एतेदाल पसंद होना चाहिएl हमें लोगों के लिए भी वही पसंद करना चाहिए जो हम अपने लिए पसंद करते हैं लेकिन हमें उनकी मुहब्बत में इस हद से नहीं गुज़रना चाहिए की हम उनकी गलत कार्यों की हिमायत करेंl

हज़रात उमर रज़ी अल्लाहु अन्हु ने फरमाया,

“तुम्हारी मुहब्बत शैफ्तगी ना हो जाए और तुम्हारी नफरत तबाही ना हो जाएl” कहा गया “यह कैसै हो सकता है?” हज़रात उमर ने जवाब दिया, “ जब तुम किसी से मुहब्बत करते हो तो इसकी मुहब्बत में बच्चों की तरह फरेफ्ता हो जाते होl और अगर किसी से नफरत करते हो तो तुम अपने साथी के लिए उसकी तबाही चाहते हो” (अल अद्बुल मुफरद १३२२, हदीस सहीह)

इब्ने हिबान मुसलामानों को गैर मुस्लिमों के साथ मामले में दरमियानी रास्ता इख्तियार करने की तजवीज पेश करते हुए लिखते हैं, “उनसे कुरबत हासिल करने में हद से आगे ना बढ़ो, और ना ही उनसे दूरी इख्तियार करने में हद से आगे बढ़ोl” (ताफ्सीरुल मुरद 60:8)

इब्ने हिबान यह कहना चाहते हैं कि मुसलामानों को गैर मुस्लिमों के साथ कुर्बत हासिल करने में इस्लाम की खिलाफवर्जी नहीं करनी चाहिए और इसी तरह ना ही उन्हें उनसे दूरी बनाने में इस हद से गुज़र जाना चाहिए कि उनके अन्दर किसी किस्म की नफरत या असुरक्षा का एहसास पैदा हो जाएl

हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया:

“अल्लाह की कसम वह मोमिन नहीं है, वह मोमिन नहीं है, वह मोमिन नहीं है,” कहा गया, “कौन या रसूलुल्लाह? (आपने फरमाया) जो पड़ोसियों को अमन और सलामती फराहम ना कर सकेl “(सहीह बुखारी, जिल्द 8, नम्बर 45)

इस हदीस के अन्दर शब्द “पड़ोसियों” में मुसलमान और गैर मुस्लिम दोनों में शामिल हैंl

कुछ और हदीसें जिनमें मुसलामानों और गैर मुस्लिमों के साथ अच्छे संबंधों की हौसला अफजाई की गई है, निम्नलिखित हैं-

“क्या तुम्हें मालुम है की सदका, रोज़ा और नमाज़ से बेहतर क्या है? यह लोगों के दरमियान अमन और अच्छे संबंध कायम रखना है, इसलिए की झगड़े और बुरे जज़्बात इंसानों को तबाह कर देते हैंl (अल बुखारी व मुस्लिम)

“ जो कोई लोगों के साथ मेहरबानी करता है अल्लाह उसके साथ मेहरबानी करेगाl इसलिए तुम ज़मीन के उपर इंसानों पर रहम करो और आसमान वाला तुम पर रहम करेगाl” (अबू दाउद और तिरमिज़ी)

खुलासा यह की इस्लाम ने मुसलामानों को अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी के सभी मामलों में मुसलामानों को एतेदाल पसंदी का दर्स दिया हैl उन्हें उस शैतान को खुश करने वाली किसी भी किस्म की इन्तेहा पसंदी से बचना चाहिए जो उन्हें सीधी राह से गुमराह करता हैl एतेदाल पसंदी और तवाजुन की इस तालीम के साथ मुसलमान इन्तेहा पसंदी की बढ़ती हुई लहरों का मुकाबला कर सकते हैं जिनसे मुसलामानों और गैर मुस्लिमों दोनों को खतरा हैl

[उपरोक्त उद्धरण newageislam.com पर प्रकाशित होने वाले कनीज़ फ़ातिमा के लेख “Teachings of Moderation and Balance in Islam” से लिया गया है]

खुलासा यह है की यह लेख ज़ाकिर मुसा जैसे कट्टरवादीयों से इस हकीकत को स्वीकार करने का मुतालबा करता है कि हिंदुस्तानी सेकुलरिज्म मज़हबी आज़ादी की ज़मानत देता है और सभी मज़हबी बिरादरियों के साथ यकसां सुलूक करता हैl दुसरे शब्दों में भारतीय सेकुलरिज्म मज़हब मुखालिफ नहीं है बल्कि यह इस्लाम सहित सभी धर्मों के मानने वालों को अपने अपने तौर पर मज़हबी फ़राइज़ व जिम्मेदारियां अदा करने की इजाज़त देता हैl उन्हें यह भी जानना चाहिए की नरमपंथी इस्लामी तालीमात का लाज़मी हिस्सा हैl इसलिए, ज़ाकिर मुसा का यह धमकी आमेज़ बयान की “वह उन एतेदाल पसंदों को फांसी दे गा जो एक सेकुलर रियासत की हिमायत करते हैं” गैर कानूनी और इन्तिहाई गैर इस्लामी बयान हैl

अल्लाह पाक नकारात्मक दृष्टिकोण के हामेलीन से सादा लौह मुसलामानों को बचाए!

URL for English article: http://www.newageislam.com/radical-islamism-and-jihad/ghulam-ghaus-siddiqi,-new-age-islam/refutation-of-kashmiri-militant-zakir-musa’s-recent-statement-threatening-to-hang-moderate-muslims-supporting-secularism---part-2/d/115397

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/ghulam-ghaus-siddiqi,-new-age-islam/refutation-of-kashmiri-militant-zakir-musa’s-recent-statement--کشمیری-عسکریت-پسند-ذاکر-موسی-کا-کشمیر-کے-معتدل-مسلمانوں-کے-سر-قلم-کرنے-والے-حالیہ-بیان-کی-تردید---حصہ-2/d/115502

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/ghulam-ghaus-siddiqi,-new-age-islam/refutation-of-kashmiri-militant-zakir-musa’s-recent-statement--कश्मीरी-उग्रवादी-ज़ाकिर-मुसा-का-कश्मीर-के-नरमदलीय-मुसलामानों-के-सर-कलम-करने-वाले-हालिया-बयान-की-तरदीद-(भाग-2)/d/115535

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