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Hindi Section (04 Mar 2016 NewAgeIslam.Com)



Religious and Theological Underpinning of Global Islamist Terror अंतर्राष्ट्रीय इस्लामी आतंकवादियों की धार्मिक और थियोलाजी संबंधी बुनियाद: इंटर्नेशनल काउंटर टेरररिज्म सम्मेलन, 2016


सुल्तान शाहीन, संस्थापक संपादक, न्यु एज इस्लाम

3 फरवरी 2016

 

सिर्फ एक साल में दुनिया भर के 100 देशों के तीस हजार से अधिक मुसलमानों को तथाकथित इस्लामी राज्य और अबू बकर अल बगदादी की स्वयंभू खिलाफत ने जितनी आसानी और तेजी से आकर्षित किया है इससे बहुत से लोग हैरान हैं। लेकिन भारत में हमारे लिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए। क्योंकि भारतीय उपमहाद्वीप से ही, एक सौ साल से भी कम समय पहले कम से कम 18 हजार मुसलमानों ने अंतिम उस्मानी खिलाफत के लिए लड़ने की खातिर अपने घरों और यहां तक ​​कि सरकारी नौकरी छोड़कर, पलायन किया था। यह एक जुनून ही था। अधिकांश लोगों ने अपना जीवन बर्बाद कर दिया और कुछ लोग मारे गए। लेकिन उन्हें गाजी और शहीद माना गया। मौलाना अबुल कलाम आजाद सहित बड़े विद्वानों ने भारत में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जिसे वह दारूलहरब समझते थे, जिहाद या यहां से पलायन करने की मांग करते हुए फतवा जारी किया, और उसे एक धार्मिक कर्तव्य बताया।

 इसलिए मुसलमानों के एक बड़े वर्ग के लिए एक ऐसी खिलाफत स्थापित करने का आकर्षण जिसकी सरकार पूरी दुनिया में हो और जो दूसरे सभी धर्मों और विशेष रूप से सभी प्रकार की मूर्तिपूजा का सफाया कर दे और इस्लाम की सच्चाई को स्थापित कर दे, कोई नई बात नहीं है। जब बगदादी ने अपनी खिलाफ़त की घोषणा की, तो भारत के कई मुस्लिम अखबारों में उसका स्वागत किया । नदवातुल उलेमा के एक प्रभावशाली मौलवी तो इस हद तक चले गए कि उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर इस तथाकथित खलीफा को एक पत्र भी पोस्ट कर दिया जिसमें उन्होंने इसे अमीरुल मोमिनीन और सभी मुसलमानों के आध्यात्मिक नेता के नाम से संबोधित  किया। जिसका कोई विरोध नहीं हुआ, यहां तक कि नदवातुल उलेमा या दारुल उलूम देवबंद ने भी इसका विरोध नहीं किया।

तथाकथित इस्लामी राज्य जितने गर्व से यौन गुलामी जैसे वहशी अत्याचार और अमानवीय व्यवहार को प्रसारित कर रहा है इससे बहुत से लोग अब शर्मिंदगी महसूस कर रहा हैं। और उनके समर्थन में भी कमी आई है। लेकिन इसे केवल पाखंड ही कहा जा सकता है। भारत के सबसे लोकप्रिय इस्लामी उपदेशक और अहले हदीस टी वी पर सबसे ज्यादा दिखने वाले खतीब जाकिर नाइक कई सालों से यह कह रहे हैं कि "अल्लाह ने मुसलमानों को गुलाम और बांदियों के साथ यौन संबंध वैध करार दिया है।" मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने कभी भी इसका विरोध नहीं किया। लेकिन जब आईएस आईएस उनके फ़तवों और इन वहाबी / सल्फ़ी शिक्षाओं का तार्किक निष्कर्ष निकालकर इनका उपयोग करते हैं और यज़ीदी, ईसाई और शिया महिलाओं का अपहरण करते हैं और उन्हें सेक्स गुलाम बनाते हैं, तो मुसलमानों को शर्मिंदगी होती है और कुछ विद्वान यह कहना शुरू कर देते हैं कि इस्लाम का आतंकवाद से कोई संबंध नहीं है।

 

इसमें कोई शक नहीं है कि इस्लाम का आतंकवाद से कोई संबंध नहीं है। यह मोक्ष प्राप्त करने के लिए एक आध्यात्मिक जीवन व्यवस्था है,  दुनिया पर हावी होने के लिए कोई राजनीतिक विचारधारा नहीं है। हज़रत मोहम्मद पैगंबर(सल्लअम) एक आध्यात्मिक नेता थे जिन्हें अल्लाह के दूत के रूप में चुना गया था। कुरान में ऐसी अनगिनत आयतें हैं, जिनमें हर कीमत पर शांति की मांग की गई है, यहां तक ​​कि एक आयत में यह व्याख्या भी मौजूद है कि एक निर्दोष व्यक्ति की हत्या पूरी मानवता की हत्या के बराबर है और एक निर्दोष आदमी को बचाना पूरी मानवता की रक्षा के बराबर है (कुरान 5:32)। यही शिक्षा नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हदीस में भी पाई जाती हैं। खुद नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सीरत-ए-तैयबा से यह साबित होता है कि आपने हुदैबिया के प्रसिद्ध समझौते में मुसलमानों के लिए न्याय की कीमत पर शांति को स्वीकार किया था। खाई युद्ध में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने रक्तपात से बचने के लिए अपने साथियों के साथ मदीना के चारों ओर एक खाई खोद कर मदीना शहर को सुरक्षित किया। आप सल्लल्लाहु अलहवसल्लम ने खून खराबे के बिना मक्का के जीत के दिन मक्का वालों को आम माफी की घोषणा की जबकि तत्कालीन प्रचलित प्रथा के अनुसार मक्का वालों को नरसंहार और गिरफ्तारी की आशंका थी। केवल कुरान ही निर्दोष लोगों के खिलाफ हर तरह की हिंसा का निषेध नहीं करती है और आक्रामकता के खिलाफ बार बार चेतावनी नहीं देती है बल्कि खुद नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस्लाम के प्रारंभ के अत्यंत कठिन समय में हिंसा से परहेज  करने का हर संभव प्रयास किया।

 यह सच है कि मदरसों और मस्जिदों में प्रत्यक्ष रूप से हिंसा और आतंकवाद की  शिक्षा नहीं दी जाती है। लेकिन यह भी सच है कि मदरसों में पढ़ाई जाने वाली किताबें सर्वश्रेष्ठतावाद, दूसरों से घृणा, अलगाववाद और असहिष्णुता की शिक्षा देती हैं। इसप्रकार , वे अपने छात्रों में यह भावना डालकर कि मुस्लिम / काफ़िर अलग हैं और ये एक साथ नहीं रह सकते उग्रवादी विचारधारा के लिए आधार बना देते हैं। नतीजतन,  कुछ मुसलमानों ने अपने आपको मुख्यधारा से ही अलग कर लिया है। उदाहरण के लिए वैश्विक मुस्लिम मिशनरी संगठन तबलीकी जमात, जिसके अब 200 से अधिक देशों में 150 लाख अनुयायी हैं,  अपना पूरा ध्यान मुसलमानों को  मुख्यधारा से अलग करने पर लगाती है, यह उनसे अपनी अलग पहचान बनाने और ऐसी किसी भी परंपरा का पालन न करने के लिए कहती है जिसे गैर मुस्लिम बहुमत मानता हो। इस वहाबी / सल्फ़ी संगठन को हाल ही में पाकिस्तानी पंजाब विश्वविद्यालय परिसर में निषिद्ध कर दिया गया है, लेकिन भारत में इसपर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है।

इसमें कोई शक नहीं है कि मुसलमानों से, चारों ओर से जिहाद की मांग की जा रही है,  यह एक ऐसा जिहाद है जिसमें अध्यात्म नहीं है, बल्कि जिसका इस्तेमाल हत्या के विकल्प के रूप में किया जाता है। यहां तक ​​कि 20 वीं सदी के उर्दू उपन्यासकार नसीम हिजाज़ी के लिखे हुए ऐतिहासिक उपन्यास को जिहाद के लिए आमंत्रण माना जा सकता है,  जो किसी भी जिहादी साहित्य से कहीं अधिक प्रभावी है। उदाहरण के लिए उर्दू भाषा में कल्पनाशील कहानियों की सबसे लोकप्रिय किताब कथा अमीर हमजा जिसका मुख्य चरित्र राक्षसों और एक खुदा में विश्वास न रखने वाले काफिरों से युद्ध करता है। सूफ़ी मजारों पर एक मुसलमान को इस प्रकार की कब्बाली सुनाई पड़ती है कि: आज भी डरते हैं काफ़िर हैदरी तलवार से। यहां तक ​​कि अरबों की लिखी हुई नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पहली जीवनी को "मगाज़ी रसूलाल्लाह" यानी नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के युद्धों की कहानियां है।  सर्वप्रथम मुसलमान बनने वाले अरब, शांति, संयम, मानव अधिकार और धर्म के प्रति उनके आध्यात्मिक दृष्टिकोण को अपनी आस्था का केंद्र नहीं बना सके। वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को केवल एक महान योद्धा और एक युद्ध नायक के रूप में ही प्रस्तुत कर सके, जैसे आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नहीं थे। आपने पैगम्बर घोषित होने  के 14 वर्षों के बाद 54 साल की उम्र में केवल रक्षा के लिए ही शायद एक या दो बार तलवार उठायी थी। 1400 वर्षों से हर शुक्रवार के धर्मोपदेश के दौरान एक मुसलमान हमेशा जो प्रार्थना सुनता है वह काफिरों पर मुसलमानों की जीत, इस्लाम की सत्यता की स्थापना, पूरी दुनिया पर शासन, मूर्ति पूजा के उन्मूलन के लिए होता है और इन सभी बातों से सर्वश्रेष्ठवाद , अलगाववाद, दूसरो से घृणा और असहिष्णुता पैदा होती हैं।

इसलिए, काफिरों के साथ एक स्थायी टकराव का सिद्धांत हमारी रगों में दौड़ता है। उग्रवादी विचारक अक्सर जिन आयात की तिलावत करते हैं उनमें अल्लाह दो स्थानों पर मुसलमानों को इस बात का भरोसा दिलाते है कि अल्लाह काफिरों के दिलों में डर डाल देगा (8:12 और 3: 151)। यह भी दूसरी आयतों की तरह संदर्भित आयत हैं उग्रवाद और असहिष्णुता वाली आयतें इस्लाम के प्रारंभिक दिनों में आईं थी जब मुसलमान अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे थे। कोई भी समझदार मुसलमान यही कहेगा कि युद्ध से संबंधित ये आयतें आज हम पर लागू नहीं होती। लेकिन आतंकवादी विचारधारा का खंडन करने की कोशिश करने वाले उदारवादी विद्वानों को भी कभी यह  कहते नहीं सुना जाता। सच तो यह है कि इनका खंडन भी आतंकवाद और हिंसक थियोलाजी को ही सही ठहराता है।

"आईएस आईएस का खंडन " शीर्षक से एक अरबी किताब की लाखों प्रतियां अभी हाल ही में सीरिया और इराक में वितरित की गईं हैं। यह अंग्रेजी में भी ऑनलाइन उपलब्ध है। इसमें कोई शक नहीं है कि इस पुस्तक के लेखक शेख मोहम्मद अल-याकूबी अपनी इस कोशिश के प्रति गंभीर हैं। उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की है कि बगदादी और उसके साथी मूर्ख हैं, लेकिन उन्होंने भी इसके लिए कयामत से संबंधित हदीसों से ली गई उन भविष्यवाणियों का सहारा लिया  है जिनका प्रयोग आईएस आईएस करता है। अलकाईदा कयामत से पहले की भविष्यवाणियों की बात नहीं करता है, लेकिन आइएस आइएस के विचार कयामत से पहले की भविष्यवाणियों पर आधारित हैं। वे अपने युद्ध के औचित्य का आधार इसी बात को बनाते हैं कि अंतिम दौर में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह भविष्यवाणी की थी। आईएस आईएस ने दाविक जैसे सैन्य रूप में मामूली एक शहर पर कब्जा करने के लिए अनगिनत लोगों की जान कुर्बान कर दीं क्योंकि कयामत की भविष्यवाणी में इस शहर में युद्ध का हवाला मिलता है। उन्होंने अपनी पत्रिका का नाम भी दाविक रखा है।

मुस्लिम युवाओं को क़यामत के युद्धों का हिस्सा बनाने के लिये आकर्षित करने के लिए ये भविष्यवाणियां आइएस आइएस का सबसे महत्वपूर्ण हथियार है। जैसी कि भविष्यवाणी की गई है, पूरी दुनियां कुछ वर्षों में समाप्त होने वाली है, पूरी दुनिया में इस्लाम को जीत मिलने वाली है और काफिर समाप्त होने वाले हैं, तो क्यों न जीतने वाली पार्टी का हाथ थामा जाए। यह एक ऐसी दलील है जो बहुत से लोगों को आकर्षित करती है। इसलिए, आईएस आईएस का विरोध करने की कोशिश करने वालों को, आईएस आईएस की रणनीति को मजबूत नहीं बनाना चाहिए। लेकिन ये विद्वान या कोई और आईएसअईएसआईएश को बल प्रदान करने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते। सभी विद्वानों का विश्वास भी उसी थियोलाजी पर है जिन पर आतंकवादियों का है। ये भविष्यवाणी संबंधी हदीस (कथित तौर पर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कथनों) से आईं हैं और सभी मतों के विद्वानों उन्हें वही की तरह ही मानते हैं। अंतिम दिनों के बारे में इन हदीसों का विश्लेषण केवल इन कथनों की विश्वसनीयता पर प्रश्न  करके ही किया जा सकता है जिन्हें नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मृत्यु के बाद 300 वर्षों तक एकत्रित किया गया और जिन्हें उनके द्वारा कहा गया माना गया, बस उन्हें वही का दर्जा नहीं दिया गया।

उनमें से कुछ भविष्यवाणियां कुरान की दो अन्योक्ति रूपक आयतों (4: 159, 43:61) के अटकलों से लगाए गए अर्थ पर आधारित है। जिन्हें मोतशावेहात कहा जाता है। मुसलमानों को उनके अर्थ के बारे में अटकलें लगाने से मना किया गया है और उन्हें ऐसे ही छोड़ने का आदेश दिया गया है। लेकिन मुसलमान अटकलें लगाते हैं और परिणाम हमारे सामने है।

इसी तरह, अभी  हाल ही में, दुनिया भर से 120 विद्वानों की ओर से जारी किया गया, 14 हजार शब्द वाला फतवा (अगस्त 2015) बुनियादी रूप से उग्रवादियों के विचारों के अनुसार ही है। बगदादी के नाम अपने खुले पत्र में भी हदीस को वही के समकक्ष बताया गया है, जबकि वे इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि निर्दोष नागरिकों की हत्या का औचित्य वह इस हदीस से सिद्ध करते हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने गुलेल के उपयोग से ताइफ़ पर एक हमले में निर्दोष लोगों की हत्या की अनुमति दी थी: (मुस्लिम 19: 4321 और बुखारी 4: 52: 256)। इस हदीस का प्रयोग, अलकाईदा भी, जन संहार के हथियारों के प्रयोग का औचित्य साबित करने के लिए करता है।

खुले पत्र के प्वाइंट 16 में हुदूद (दण्ड), के बारे में, उदारवादी विद्वानों के फतवे में एक सामान्य नियम स्थापित किया गया है: “हुदूद दण्ड (धर्मत्याग आदि के लिए मृत्यु दण्ड) कुरान और हदीस में निर्धारित है और वह निश्चित रूप से इस्लामी कानून में अनिवार्य हैं” "बगदादी के मुख्य तर्क को स्वीकार करने के बाद, ये तथाकथित इस्लामी राज्य में इसके कार्यान्वयन की आलोचना करते है। लेकिन एकबार उदारवादी विद्वानों ने   7 वीं सदी के अरब बद्दूओं की संस्कृति पर और कुरान की कुछ आयतों पर आधारित हुदूद (दण्ड) के मूल आधार को मान लिया,  तो उदारवाद और चरमपंथ के बीच क्या अंतर रह गया।

फतवे का बिंदु 20 में जब उदारवादी विद्वान केवल "नबियों या उनके सहाबा की कब्र" को छोड.कर, शिर्क (मूर्ति पूजा) के सभी प्रतीकों को नष्ट करने को इस्लामी दायित्व कहते हैं, तो  ऐसा लगता है कि उदारवादी विद्वान  मूर्तियों और सूफी दरगाहों को तोड़ने और उन्हें नष्ट करने को उचित ठहराते हैं।

खुले पत्र के बिंदु 22 में '' खिलाफत '' शीर्षक के तहत, उदारवादी विद्वानों एक बार फिर बगदादी समूह के मुख्य तर्क से सहमत लगते है: "विद्वानों के बीच इस बात पर सहमति है कि खिलाफत की स्थापना उम्माह की एक जिम्मेदारी है। हालांकि, 1924 ईसवी के बाद से मुसलमानों का कोई खलीफा नहीं है "।

इस उदारवादी फतवे में निराकरण(abrogation) के सिद्धांत पर भी विश्वास व्यक्त किया गया है, जबकि आतंकवाद के सिद्धांत निर्माताओं ने इस्लाम के प्रारंभिक दिनों में नाज़िल होने वाली शांतिपूर्ण मक्के की आयातों को रद्द घोषित कर दिया है। इसप्रकार, शेख याकूब का "आईएस आईएस का खंडन" करने वाले इस फतवे से भी आतंकवादी सिद्धांत को बल मिलता है, चाहें यह उनके कार्यों की निंदा करता है।

यह आश्चर्य की बात नहीं है। अधिकांश मुसलमानों द्वारा मानी जाने वाली इस्लामी थियोलोजी, जेहादी थियोलोजी की निम्नलिखित बातों को मानती है:

1. ये ईश्वर को एक संगदिल व्यक्ति के रूप पेश करते है जो उन लोगों के साथ स्थायी रूप से युद्ध करता है जो उसके व्यक्तित्व में विश्वास नहीं रखते, जबकि वैदिक या सूफी अवधारणा में ईश्वर को सार्वभौमिक चेतना के रूप में पेश किया गया है जो ब्रह्मांड के जर्रे-जर्रे पर अपनी रहमत की बारिश करता है;

2. जैसे कुरान ईश्वर का सृजित न किया गया एक पक्ष है, यह शाश्वत पुस्तक की एक ऐसी प्रति है जो स्वर्ग की तिजोरी  में सुरक्षित रखी है। इसलिए इसकी सभी आयतों के शाब्दिक अर्थ को, संदर्भ पर ध्यान दिए बिना मुसलमानों के लिए एक अनन्त मार्गदर्शन माना जाना चाहिए।

3. हदीसों या हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की कही गई बातों को वही के बराबर माना जाए, जबकि इन्हें पैगंबर की मृत्यु के दो तीन सौ वर्षों के बाद तक जमा किया गया;

4. शरीयत कानून को दिव्य आदेश माना जाना, हालांकि इसे कुरान की अंतिम आयतों में से एक में इस्लाम के पूरा होने की घोषणा के 120 साल बाद पहली बार तैयार किया गया है;

5. किताल (युद्ध) के अर्थ में जिहाद को इस्लाम के छठे स्तंभ के रूप में मानना।;

6. कुरान की कुछ प्रारंभिक आयतों को हटाया गया और उनकी जगह बेहतर और अधिक उपयुक्त आयतों को बाद में रखा गया । कट्टरपंथी विचारधारा, रद्द करने की इस आम सहमति के सिद्धांत को यह दावा करने के लिए प्रयोग करती है कि सभी 124 मूलभूत, मक्के वाली  शांति, बहुलवाद, अन्य धार्मिक समुदायों के साथ सह-अस्तित्व, करुणा, पड़ोसियों के लिए दया आदि से संबंधित आयतों को बाद में रद्द कर दिया गया था  और उनकी जगह मदीने वाली युद्ध, विद्वेष और असहिष्णुता की आयतों को रखा गया था।

7.हिजरा को (दारुल हरब से दारुल इस्लाम के लिए प्रवास) एक धार्मिक कर्तव्य और भक्ति का एक रूप मानना।

8. खिलाफत की स्थापना मुसलमानों (वैश्विक मुस्लिम समुदाय) पर वाजिब है।

बीसवीं शताब्दी के विद्वानों जैसे मिस्र की मुस्लिम ब्रदरहुड के सैयद कुतुब (1906-1966) और जमाते इस्लामी की बुनियाद रखने वाले, भारत के और बाद में पाकिस्तान के अबुल अला मौदूदी (1903-1979) को आधुनिक इस्लामी आतंकवाद या जिहादयत का संस्थापक माना जाता है। जिहादी विचारधारा को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अधिक समकालीन विचारक में अब्दुल्ला यूसुफ अज्जाम (1941-89) और अबू मोहम्मद मुक़द्दसी (जन्म-1959) हैं।

कई मुस्लिम विद्वान आज इन उग्रवादी विद्वानों से किनारा करेंगे। लेकिन जिहादयत कई लोगों के लिए इतनी प्रभावशाली और आकर्षक इसलिए है कि जिहादी विचारधारा इब्ने तैमिया ((1263-1328), मोहम्मद इब्न अब्दुल वहाब (1703 -1792), जैसे महत्वपूर्ण क्लासिकल अरब धर्मशास्त्रियों ने या मुजद्दिद अलिफ सानी, शेख अहमद सरहिन्दी ( 1564 -1624), और शाह वलीउल्लाह देहलवी (1703-1762) जैसे प्रमुख भारतीय धर्मशास्त्रियों के लोकप्रिय फ़िक़्ही सिद्धांतों पर आधारित है।

अब सैकड़ों सालों से, बड़े मुस्लिम धर्मशास्त्री इस्लाम की पहुँच  को बढ़ाने के लिए ,इसे सर्वश्रेष्ठतावाद, दूसरों से घृणा, अलगाववाद और असहिष्णुता की विचारधारा बनाने में लगे हैं। इन्होंने जिहाद के निम्न रूप अर्थात युद्ध को, जो युवा और सशक्त मुसलमानों के लिए अनिवार्य बताया है। इस्लामी हस्तियों ने एक ऐसी थियोलोजी तैयार की है जो मुख्य रूप से यह कहती है कि इस्लाम को दुनिया पर हावी होना चाहिए और इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सभी मुसलमानों को हर संभव तरीके से अपना योगदान देना चाहिए, यह उनका धार्मिक कर्तव्य है।

 यह सभी विद्वान सर्वश्रेष्ठतावाद, दूसरों से घृणा, अलगाववाद और असहिष्णुता की विचारधारा और असहिष्णु इस्लामी विचारधारा प्रस्तुत करते हैं जिसका आज के धार्मिक विद्वानों पर जबरदस्त प्रभाव है।

क्लासिकल धर्मशास्त्रियों के विचारों को स्वीकार करना और उनकी आधुनिक उग्रवादी शाखाओं को अस्वीकृति करना उसी तरह असंभव है जिस तरह अबु बकर अल बगदादी को खारिज करना और जाकिर नाइक के विचारों को स्वीकार करना और इसका  कारण केवल यह हो कि जाकिर नाइक वास्तविक रूप सेक्स गुलाम के साथ यौन संबंध  नहीं बना रहा है जैसी कि बगदादी की दिनचर्या है। हमारे कट्टरपंथी युवा बहुत अच्छी तरह उन पाखंड का अनुमान लगा सकते हैं कि एक तरफ तो इब्ने तैमिया, अब्दुल वहाब, सरहिन्दी और वली अल्लाह का सम्मान करते हैं और दूसरी ओर सैयद कुतुब, मौदूदी, अज्जाम और मुक़्कद्दसी और उनके अनुयायियों ओसामा बिन लादेन और अबूबकर का विरोध करने का दावा  करते हैं। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है कि 21 वीं सदी की हमारी शिक्षित, इंटरनेट का उपयोग करने वाली युवा पीढ़ी अपने माता पिता, समुदाय के नेताओं, राजनेताओं, मदरसा शिक्षकों, मस्जिदों के इमामों और दानशोरान, आदि की तरह बेईमान बनने के बजाय ईमानदार आतंकवादी बनना पसंद करे, जो हमेशा यह कहते रहते हैं कि इस्लाम एक शांतिपूर्ण धर्म है जबकि वह जिहादी विचारधारा में विश्वास करते हैं और उसे ही इस्लाम मानते हैं।

धर्म के मामलों में अल्लाह के मुख्य मार्गनिर्देशों में से एक निर्देश संयम का है (4: 171 और 5:80)। और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बार-बार यह ताकीद भी की है कि "धर्म में चरमपंथ से खबरदार रहें क्योंकि यह आपसे पहले वालों को नष्ट कर चुका  है।" [सहीहुल जामी (संख्या 1851 और 3248),अल-.अलबानी, संख्या 2680, और एम. एन का अल- साहिहाह अल-.अलबानी, संख्या  1283.]

लेकिन उग्रवाद, इस्लाम की शुरुआत से ही इसके पूरे इतिहास में स्वाभाविक रूप से मौजूद रहा है। मुसलमान इन हदीसों के संकलन से पहले खुद आपस में अनगिनत भयानक युद्ध कर चुके थे, जिन्हें अब वे दिव्य समझते हैं, और पूरी दुनिया पर शरिया के कानून लागू करना, अपनी धार्मिक जिम्मेदारी समझते हैं ।

मुसलमान अब तक कुरान में दी गईं उग्रवादी आयतों का हल खोजने में सफल नहीं हो सके हैं। कुरान की सभी आयतों को शाश्वत मानने से कुरान की उन आवश्यक, बुनियादी और महत्वपूर्ण आयतों की सार्वभौमिकता कमजोर हो जाती है जिन्हें इस्लाम के आरंभ में मुख्यतः मक्का में भेजा गया था। हाल ही में (सितंबर 2015) पोप फ्रांसिस ने हमें अच्छी सलाह दी, जो कुरान की कई आयतें के अनुरूप है। कुरान को शांति की पेशकश करने वाली एक आसमानी किताब बताते हुए पोप फ्रांसिस ने मुसलमानों से आयतों के सर्वश्रेष्ठ अर्थ खोजने की मांग की। कुरान भी मुसलमानों को अपनी आयतों पर विचार करने और उनका सर्वश्रेष्ठ अर्थ खोजने का आदेश बार बार देती है। उदाहरण के लिए कुरान की सूरत 39 निम्नलिखित आयतों का अध्ययन किया जा सकता है:

(55; 39: 18; 39: 55; 38: 29, 2: 121; 47: 24)

हदीस और शरिया को प्रेरित और उन्हें इस्लामी आस्था का मूल तत्व करार देना तर्कहीन है। यह कहना कि पृथ्वी पर ईश्वर की संप्रभुता को स्थापित करने में मदद करना और शरीयत कानून को पूरी दुनिया पर लागू करना, एक मुसलमान का मुख्य धार्मिक कर्तव्य है, उग्रवाद को बढ़ावा देना है, यह इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है। जब लाखों मुसलमान जिन्हें अरब जगत में तथाकथित दारुल इस्लाम ने शरण देने से मना कर दिया गया है,  लगभग नंगे पैर यूरोप के लिए पलायन कर रहे हैं और ये तथाकथित दारुल हर्ब में, शरण मांग रहे हैं, ऐसे समय में काफिरों के खिलाफ जिहाद और इस्लामी राज्य  के लिए पलायन करने के लिए एक धार्मिक कर्तव्य करार देने का कोई मतलब नहीं है।

मुसलमानों के पास आम तौर पर मानी जाने वाली  इस मौजूदा थियोलाजी को छोड़ने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है, जो उन्हें सर्वश्रेष्ठतावाद और हिंसा की ओर ले जाती है। हमें अपने साहित्य को दोबारा पढ़ना होगा, जिनमें लोकप्रिय कहानियां भी शामिल हैं और अपने युवाओं को यह बताना होगा कि अब हम एक बहु-सांस्कृतिक, बहु-धार्मिक दुनियां में रह रहे हैं, मुसलमान और काफिर को एक दूसरे का विरोधी समझना, अपने आप को अलग-थलग रखना ठीक नहीं है। यहां तक कि सऊदी अरब को भी, जो अपने स्कूलों में, सर्वश्रेष्ठतावाद, दूसरों से घृणा, अलगाववाद और असहिष्णुता की विचारधारा का सबसे खराब रूप पढ़ाता है, उसे भी अन्य धार्मिक समुदायों से व्यवहार करना पड़ता है।

हो सकता है कल आई एस आई एस सैन्य रूप से हार जाए और इसका अस्तित्व समाप्त हो जाए। लेकिन मुस्लिम उग्रवाद की समस्या तब तक हल नहीं होगी, जब तक हमारें मदरसे और शैक्षणिक संस्थाएं, अपने पीड़ित होने की कहानियों के साथ-साथ मौजूदा थियोलोजी का प्रचार करके, अपने आपको अलग रखने और और उग्रवाद के लिए आधार तैयार करते रहेंगें और मुसलमान आधुनिक दुनियां की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए संघर्ष करते रहेंगें।

उदारवादी और प्रगतिशील मुसलमानों को  जल्दी ही एक वैकल्पिक थियोलोजी बनानी चाहिए और उसका प्रचार करना चाहिए, जिसमें इस्लाम की शिक्षा के अनुरूप शांति और बहुलवाद, मानवाधिकार और स्त्रियों के लिए न्याय हो और यह मौजूदा और आने वाले समय के समाज के लिए उचित हो। साथ ही उन्हें हिंसा और सर्वश्रेष्ठतावादी वर्तमान थियोलोजी का भी खंडन करना चाहिए।

दुर्भाग्य से, जैसाकि अभी हमने देखा यह आसान काम नहीं है।उग्रवाद एक दिन में नहीं आया है। जिहादी थियोलोजी सैकड़ों साल में विकसित हुई है। इस्लाम का अध्ययन करने वाले प्रमुख विद्वानों ने इस धर्म की आध्यात्मिकता को छोड़कर, केवल इसका राजनैतिक पक्ष सामने रखा है।

जबकि, मुख्यतः मुसलमानों की यह जिम्मेदारी है कि वे इस्लाम के अंदर के इस वैचारिक युद्ध को लड़े, लेकिन यह केवल मुसलमानों के लिए ही चिंता का विषय नहीं है। दुनिया को भी मुस्लिम विद्वानों से उनकी थियोलोजी में मौजूद सर्वश्रेष्ठतावाद और उग्रवाद के बारे में प्रश्न करना चाहिए और उनसे इस्लाम पर पुनर्विचार करने को कहना चाहिए। प्रगतिशील मुसलमानों को भी इस्लामिक थियोलोजी में उग्रवाद को खत्म करने में उनका साथ देना चाहिए।

URL for English article: http://newageislam.com/radical-islamism-and-jihad/sultan-shahin,-founding-editor,-new-age-islam/religious-and-theological-underpinning-of-global-islamist-terror--full-text-of-speech-at-international-counter-terrorism-conference2016-in-jaipur/d/106233

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/sultan-shahin,-founding-editor,-new-age-islam/religious-and-theological-underpinning-of-global-islamist-terror-अंतर्राष्ट्रीय-इस्लामी-आतंकवादियों-की-धार्मिक-और-थियोलाजी-संबंधी-बुनियाद--इंटर्नेशनल-काउंटर-टेरररिज्म-सम्मेलन,-2016/d/106542

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