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Hindi Section (15 Jan 2016 NewAgeIslam.Com)



Religious Extremism or Extremely Religious; A Feminine Perspective धार्मिक उग्रवाद या बेहद धार्मिक होना ; एक स्त्री का नजरिया

 

 

 

इनास यूनिस, न्यु एज इस्लाम

किसी प्रसिद्ध हास्य अभिनेता ने कहा है, "आप आसानी से शांति के किसी भी धर्म का पता लगा सकते हैं इसके अतिवादी सदस्य अत्यंत शांतिपूर्ण होंगे। कहने का अर्थ यह है कि माडरेट या चरम शांति जैसी कोई चीज नहीं है। सभी धार्मिक सिद्धांतों की तरह शांति अपने आप में पूरी होती है, इसमें कुछ जोड़ा या घटाया नहीं जा सकता है। यह जो है बस है। और चूंकि धर्म मानव अस्तित्व के अनंत से संबंध रखता है, तो इसपर भी उग्रवाद का कोई असर नहीं होना चाहिए।  जब धर्म अतिवादी हो जाता है, तब धर्म, धर्म नहीं रहता है बल्कि एक धर्मनिरपेक्ष विचारधारा बन जाता है। अपने माहौल से बाहर निकलते  ही इसकी प्रकृति बदल जाती है। लेकिन धर्म के द्वारा लगाए गए प्रतिबंध ही ईश्वर के प्रति सच्चे पुरुषों को अतिवादी नहीं बनाते हैं, इसके और भी कारण होते हैं। इस मामले में हकीकत भी कुछ ऐसा ही बयान करती है। उग्रवाद मुख्यतः धर्मनिरपेक्ष होता है, क्योंकि नैसर्गिक कानून को लागू करनेके लिए, चरमपंथ आवश्यक शर्त है। भौतिक विज्ञान के नियम बदलते नहीं है और उन्हें बिल्कुल ठीक से और सटीक तरीके से लागू किया जाना चाहिए। गणितीय समीकरण का एक ही हल होता है, इसे अंदाजन नहीं बताया जा सकता है। कोई थोड़ा सा मरा हुआ नहीं हो सकता या कोई स्त्री थोड़ी सी गर्भवती नहीं हो सकती। जब जंगल में, कोई पेड़ गिरता है तो आवाज होती है, चाहें वहां कोई इसे सुनने के लिए हो या नहीं हो।

धर्मनिरपेक्ष दुनिया में हमारी धारणाएं अप्रासंगिक हैं। धर्मनिरपेक्ष दुनिया में तर्क चलता है और  सारा अस्तित्व, व्यवस्था और सटीकता के प्रति प्रतिबद्धता का परिणाम है। धार्मिक अतिवाद इस प्रक्रिया में कोई अपवाद नहीं है। धार्मिक अतिवाद वास्तव में अस्थिर कालातीत सिद्धांतों के लिए स्थिर कानूनों को लागू करने का असफल प्रयास मात्र है; यह एक ऐसा प्रयास है, जो  व्यर्थ भी है और घातक भी ।

एक आदमी की चेतना को नियंत्रित करने के लिए गणित की तरह के तर्क लागू करने की इच्छा, निरपेक्षता की जरूरत से पैदा होती है। लोग भौतिक संसार में  सबसे अच्छी तरह कार्य करते है क्योंकि वे भौतिक संसार के स्वामी के रूप में महारत हासिल कर सकते हैं। लोग, अनिश्चयता को समझ नहीं पाते हैं  और इसलिए उन्हें धर्म को  विज्ञान के काले और सफेद सूत्रों में बांधना ज्यादा अच्छा लगता है।

हमें बहुत गुस्सा आता है जब कोई हमें बताता है कि हमारा धर्म  विरोधाभासों से भरा हुआ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारे नए विचारों के लिए भी स्थान  बना रहें। उदाहरण के लिए, हमें शांति बनाए रखने और युद्ध करने के लिए कहा गया है। दूसरा गाल आगे करें, लेकिन दूसरी ओर से थप्पड़ मारें। पवित्रता को भी मानें और अरे हाँ सेक्स करने के लिए भी पीछे न रहें। दया दिखाएं और न्याय भी करें। यह मानें कि हमारे अच्छे कर्म हमें बचा लेगें लेकिन यह भी स्वीकार करें कि अंततः हमारा उद्धार ईश्वर की इच्छा पर निर्भर है न कि हमारे कार्यों पर। हमें स्वतंत्र इच्छा और पूर्वनियति में विश्वास करना चाहिए। इनके माध्यम से अपने तरीके से बातचीत करने के लिए आदमी को धार्मिक न्यायशास्त्र के विरोधाभासो को सूक्ष्म रूप से सोचने की क्षमता विकसित करनी चाहिए। उसे इतना सक्षम होना चाहिए कि वह अलग-अलग विचारों को समझ सकें और विभिन्न संदर्भों के लिए उन्हें लागू कर सके । धार्मिक होने के लिए बुद्धिमान होना जरूरी है। धार्मिक होने का मतलब खुले दिमाग का होना नहीं है यह भी उतना ही खतरनाक हो सकता है जितना बंद दिमाग।   इसका मतलब है कि धार्मिक होने के लिए आप की सोच सक्रिय होनी चाहिए । धार्मिक होना इसपर निर्भर करता है कि आप कितने सचेत है। दूसरी तरफ उग्रवाद, इन भावनात्मक कारणों को बिल्कुल नहीं मानता है, यह किसी भी कीमत पर अपनी तरह की सामाजिक व्यवस्था चाहता है।

उग्रवाद के विभिन्न कार्य भगवान या धर्म से  प्रेरित नहीं होते हैं, बल्कि इसकी वजह आदमी की यह सिद्ध करने  की चाह होती है कि वह उन चीजों को नियंत्रित कर सकता है जो प्रकृति-मानव चेतना के स्थिर कानूनों के अनुसार नहीं हैं। उग्रवादियों को सांसारिक सुख की इच्छा नहीं होती, वे अपनी आखरत को निश्चित करना चाहते हैं। ऐसा चाहें मनोवैज्ञानिक या राजनीतिक रूप से प्रेरित हो, सभी तरह के उग्रवाद की जड़ में चिंता और भय ही होता है।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उग्रवाद का इलाज धर्म ही है। हमनें हिटलर जैसे धर्मनिरपेक्ष विचारधारा वाले आदमी को बुरा कहने की भयानक गलती की है। जबकि हम इसी तरह के लोगों को मुस्लिम उग्रवादी कहते हैं। धर्म के साथ उग्रवाद को जोड़कर, हमनें अपना वह सबसे बड़ा हथियार खो दिया है, जिससे उग्रवाद को रोका जा सकता था। हम माडरेट लोग चाहें उग्रवाद में वृद्धि के लिए जिम्मेदार नहीं हैं, लेकिन वास्तव में हम अपने दिमाग में धर्म के साथ उग्रवाद को जोड़ने के लिए जिम्मेदार हैं। हम प्यार और दया की बात नहीं करते हैं। हमनें धर्म के आद्यात्मिक पक्ष को छोड़ दिया है, जिसमें इस स्थिति को सुधारने की अपार संभावनाएं हैं।         

इससे भी ज्यादा बुरा यह हुआ है कि हम माडरेट होने को समाजिक उदारता और धर्म को न मानने के बराबर मानते हैं। इसी बात को माडरेट लोगों को बदनाम करने के लिए प्रयोग किया जाता है।

जो व्यक्ति यह कहे कि सब चलता है, वह माडरेट है ऐसा नहीं है । माडरेट सामाजिक और आद्यात्मिक विकास के लिए बहुलवाद और सकारात्मक काम को जरूरी मानता है। माडरेट व्यक्ति यथास्थिति में खुश नहीं रहता है क्योंकि उसने अपने आपको ईश्वर पर छोड़ दिया है, उसे सामाजिक पूंजी एकत्र करने और किसी से जुड़कर प्रतिष्ठा प्राप्त करने की कोई लालसा नहीं होती। माडरेट होने का मतलब मस्त होना नहीं है। बल्कि उनका इस बात पर दृढ़ विश्वास होता है कि अंतरात्मा की स्वतंत्रता किसी भी प्रकार की जबरदस्ती और मनोवैज्ञानिक दवाब में नहीं रह सकती है। माडरेट अभी तक फिकह के मामले में अपनी जानकारी का सिक्का नहीं जमा पाए हैं। इसलिए जबतक हम अपने आपको इतना नहीं सुधार लेते है कि हमारी पहचान ऐसी हो जिसपर हमारे धार्मिक साथियों के ब्लैकमेल का कोई असर न हो, तबतक हमें शांति से नहीं बैठना चाहिए, बल्कि हमेशा संघर्ष करते रहना चाहिए। हमें बात करनी चाहिए और आगे बढ़ते रहना चाहिए। हमें शांति से नहीं बैठना चाहिए, लेकिन आपस में शांति से रहना चाहिए। अल्लाह आपपर शांति बनाए रखे।

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