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Hindi Section (22 Nov 2018 NewAgeIslam.Com)



Promoting Sectarian and Religious Hatred In the guise of Julus-e-Muhammadi जुलूस ए मोहम्मदी की आड़ में साम्प्रदायिक और धार्मिक घृणा को बढ़ावा देने की कोशिश

 

 

सुहैल अरशद, न्यू एज इस्लाम

२० नवंबर, २०१८           

पैगम्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जन्म दिन पर जुलुस ए मोहम्मदी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम निकालने की परम्परा बंगाल में अधिक पुरानी नहीं हैl बंगाल में संभवतः कलकत्ता के मुस्लिम बहुल क्षेत्र मटिया ब्रिज से जुलुस ए मोहम्मदी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम निकालने का सिलसिला लगभग दस वर्ष पहले प्रारम्भ हुआ था और देखते देखते यह सिलसिला बंगाल के अन्य शहरों और कस्बों में भी शुरू हुआl इस मौके पर जलसे भी होते हैं और मुसलामानों में जोश व उत्साह भी अधिक होता हैl पिछले कुछ वर्षों में इस मौके पर सजावट और नुमाइश में लाखों रुपये खर्च करने का चलन भी चल पड़ा हैllll इस मौके पर झंडे, बैनर और पोस्टर की बिक्री भी अधिक होने लगी हैl लोग छोटे छोटे झंडे अपनी साइकिलों और बाइक पर लगाने में भी गर्व समझते हैं और इस प्रकार झंडों और बैनरों के कारोबार को भी बढ़ावा मिलता हैl मगर जुलुस ए मोहम्मदी का इतिहास भारत में बहुत प्राचीन नहीं हैl इसका सिलसिला बीसवीं शताब्दी ही में भारत में प्रारम्भ हुआl यह सिलसिला भारत में सम्भवतः कानपुर से १९१३ में प्रारम्भ हुआl इसका आयोजन जमीयत उलेमा हिन्द देवबंद की कानपुर शाखा ने किया थाl जमियत उलेमा की एक प्रेस रिलीज़ से इसकी तारीख का अंदाजा होता हैl

जमियत उलेमा शहर कानपुर के नेतृत्व व ज़ेरे एहतेमाम निकाला जाने वाला बड़ा व एशिया का सबसे बड़ा जुलुस ए मोहम्मदी पिछले १०४ वर्षों से रजबी रोड ग्राउंड (परेड ग्राउंड) से निकलता चला आ रहा हैl इससे पहले शहर में किसी भी प्रकार का कोई मुस्लिम मज़हबी जुलुस नहीं निकाला जाता थाl पूरी दुनिया को मानवता, सद्भावना, सहिष्णुता, प्रेम और एकता का सन्देश और दर्स देने वाले रह्मतुल्लिल आलमीन के जन्मदिन के मौके पर मुसलमान अपने घरों पर या बाहर किसी मैदान में मीलाद शरीफ या सीरतुन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जुलुस का आयोजन कर लिया करते थेl परेड ग्राउंड परेड ईस्ट इंडिया कंपनी के तहत अंग्रेजी (ब्रिटिश) सेना की छावनी का एक भाग था और जनता का इस क्षेत्र में प्रवेश वर्जित थाl १९१३ में मस्जिद मछली बाज़ार के घटना के बाद जब महात्मा गांधी सहित कई राष्ट्रीय नेताओं मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, बैरिस्टर आसिफ अली सहित पचासों हिन्दू मुस्लिम रहनुमा, राजनीतिज्ञ, कानून विशेषज्ञ और समाज सेवक कानपुर आए जिन्होंने ब्रिटिश सरकार को ललकारते हुए कानपुर शहर में सेना के छावनी क्षेत्र में सरकार और जिला प्रशासन की कई रुकावटों के बावजूद परेड ग्राउंड में बिलकुल उस रोज़ दाख़िल हुए जिस रोज़ सरवरे कायनात सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का जन्मदिन थाl उनके साथ चलने वालों में सैंकड़ों मुसलमान और अधिक संख्या में हिन्दू भाई भी थे जिन्होंने बेमिसाल एकता का प्रदर्शन किया जिसे देख कर ब्रिटिश सरकार अचम्भे में रह गई और उनको रोकने की हिम्मत नहीं कर सकीl अपने जीवन को दावं पर लगा कर परेड में जलसा किया और जलसे के समाप्ति पर सभी प्रतिभागी जुलुस की शकल में कब्रिस्तान गए जहां उन्होंने अकीदों के अनुसार शहीद मस्जिद मछली बाज़ार को श्रद्धांजलि पेश कियाl

दुसरे वर्ष १९१४ में हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जन्मदिन के मौके पर उपरोक्त घटना की याद में राजबी ग्राउंड पर एक जलसा ए आम हुआ और एक जुलुस भी निकाला गया जो आगे चल कर हर साल निकाला जाने लगाl इन जलसों में समाज के सभी बुद्धिजीवी वर्ग के लोग प्रसिद्ध उलेमा, वकील, बैरिस्टर, डाक्टर, हकीम, इंजिनियर, शिक्षा विशेषज्ञ, शिक्षक पत्रकार, साहित्यकार और कवि आदि भाग लिया करते थेl इसमें सभी धर्मों के लोग शामिल व शरीक होते थेl १९४५-४६ में अंग्रेजों के हुकूमत के दौर में विभिन्न कारणों और कारकों के परिणाम स्वरूप यह जुलुस नहीं निकालाl आज़ादी के बाद भी यह जुलुस नहीं निकल सका क्योंकि स्थिति बेहद तनावपूर्ण थेl १९४८ में यह हाल था कि शहर में कोई भी व्यक्ति कोई भी संगठन इस जुलुस को निकालने व उठाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा थाl उस समय जमियत उलेमा कानपुर ने जुलुस निकालने का बीड़ा उठायाl उस समय जमियत उलेमा कानपुर के सदर क़ाज़ी मुख्तार अहमद थेl जिन्होंने मुजाहिदे आज़ादी बाबा मोहम्मद खिज्र अपने साथी और मुजाहिदे आज़ादी मौलाना अब्दुल बाक़ी अफ़गानी, काज़ी शहर मौलाना काज़ी अहमद हुसैन, प्रत्रकार व संपादक हश्मतुल्लाह, बुज़ुर्ग पत्रकार सम्पादक अहमद हुसैन बारवी, शमीम अहमद फारुकी, मुंशी साबिर हुसैन, लियाकत हुसैन भारती, मोहम्मद रशीद साहिर हाशमी, ख्वाजा अब्दुस्सलाम, नवाब युसूफ अली एडवोकेट, अब्दुल हमीद कुरैशी एडवोकेट, मुजाहिदे आज़ादी करीम बख्श आज़ाद, हाजी सगीर अहमद, हाजी मोहम्मद सलीम, हाफ़िज़ अब्दुल मोमिन, हाफ़िज़ मोहम्मद मोहसिन, हाफ़िज़ हमीद अहमद, गुरु, मोहम्मद फरीक और मोहम्मद हाशिम सौदागर के साथ मिलकर उनके सहयोग व साझा से आज़ादी के बाद का पहला जुलुस ए मोहम्मदी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम परेड ग्राउंड से निकालाl तब से अब तक जमियत उलेमा शहर कानपुर के ज़ेरे एहतेमाम यह जुलुस निकल रहा हैl”

इससे अंदाजा होता है कि जुलुस ए मोहम्मदी का आरम्भ किसी एक फिरके के इश्के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का परिणाम नहीं था बल्कि जमियत उलेमा ए हिन्द ने भी इसके एहतिमाम में ना केवल जोश व खरोश का प्रदर्शन किया बल्कि अंग्रेजों के दौर में इस संगठन ने जान हथेली पर लेकर इसका एहतिमाम कियाl आज़ादी से पहले इसकी प्रकृति धार्मिक नहीं थी बल्कि ख़ास स्थिति में इसका प्रारम्भ किया गया था सुर इसमें गैर मुस्लिम हस्तियों ने भी बढ़ चढ़ कर भाग लिया थाl मगर आज़ादी के बाद सांप्रदायिक तनाव इतनी थी कि इसमें हिन्दुओं की शिरकत नहीं हो सकी और यह एक धार्मिक जुलुस में परिवर्तित हो गयाl इसके बाद से पुरे देश में इसका सिलसिला धीरे धीरे चल पड़ाl

बंगाल में चूँकि इसका सिलसिला नया है इसलिए गैरमुस्लिमों के अन्दर इसकी नकारात्मक प्रतिक्रिया हुई हैl उन्होंने ने भी राम जुलुस निकालना शुरू किया हैl उनके लोगों ने भी मोटर साइकिलों और बाइक पर नारंगी झंडे लगाने शुरू कर दिए हैं और अपने मुहल्लों में नारंगी झंडे गाड़ कर हिंदुत्व के जज़्बे का इज़हार करते हैंl कुछ साम्प्रदायिक तत्व इस मौके पर मुसलामानों के खिलाफ भड़काऊ नारे भी लगाते हैं जिससे सांप्रदायिक तनाव बढ़ता हैl पिछले वर्ष दुर्गा पूजा के मौके पर हिन्दू बहुल क्षेत्रों में ऐसे भी कैसेट बजाए गए जिनमें मुसलामानों के खिलाफ मुनाफ़िरत अंगेज़ नारे थे और हिन्दुस्तान को हिन्दू राष्ट्र बनाने और मातृभूमि की रक्षा के लिए तलवार उठाने की बात भी की गई थीl मुसलामानों को पाकिस्तान जाने का मशवरा भी दिया गया थाl जबकि इससे पहले इस प्रकार का दृश्य कम से कम बंगाल में नहीं थाl इसलिए, हमें आत्मनिरीक्षण करना होगा कि कहीं ईमान के जोश में हम अपने मुल्क के भाइयों के अन्दर असुरक्षा या खतरे का एहसास तो पैदा नहीं कर रहे हैंl ईद मीलादुन्नबी सल्लाल्लाहु अलैहि वसल्लम के मौके पर हम नात पाक के जो कैसेट बजाते हैं उनमें नातों के बीच भड़काऊ नारे भी होते हैं जो साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह का मज़हर होते हैंl हम जिस समाज में रहते हैंl उसमें गैर मुस्लिम बहुमत में हैं और वह हमारी हर बात पर नज़र रखते हैंl इस प्रकार के नारे साम्प्रदायिक मतभेद को हवा देते हैं और गैर मुस्लिमों में भी नकारात्मक प्रतिक्रिया का कारण बनते हैंl यह कैसेट किसी बड़ी साज़िश का हिस्सा हैंl इसलिए मुसलामानों की धार्मिक और कौमी संगठन इस प्रकार के कैसेट का नोटिस लें और मुसलमानों को ऐसे कैसेट बजाने से रोकें जो सांप्रदायिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाने वाले हैंl नातिया कैसेट में भड़काऊ नारे दाख़िल करने के पीछे कौन लोग हैं यह पता लगाना आवश्यक है और इस कैसेटों के प्रोड्यूसर कौन हैंl नातिया कैसेटों पर किसी मुसलमान को एतेराज़ नहीं हो सकता मगर उनमें भड़काऊ साम्प्रदायिक नारे इस्लामी रूह के खिलाफ हैंl देश में साम्प्रदायिक माहौल तैयार करने के लिए फासीवादी शक्तियां भी सरगर्म हैं और वह मुसलमानों के जज़्बात का शोषण करके स्वयं उन्हें मुसीबत में डाल सकती हैंl इन कैसेटों में इस प्रकार के नारे हैंl

गुस्ताख़ ए मुहम्मद की एक दवा

सर तन से जुदा सर तन से जुदा

हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की महफ़िल में किसी को अनुमति नहीं थी कि कोई हुजुर पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने ऊँची आवाज़ में बात करेl कुरआन भी मोमिनों को हुक्म देता है कि हुजुर ए पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की आवाज़ से अपनी आवाज़ को उंचा ना करें क्योंकि इससे उनके आमाल बर्बाद हो जाते हैंl तो फिर कैसेटों में हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को संबोधित करते हुए जब कोई कहता है कि “या रसूलुल्लाह हम आपके नामूस की हिफाज़त करेंगेl” तो वह किस प्रकार से इस्लामी अमल हुआl बल्कि यह तो कुरआन के हुक्म के खिलाफ हैl हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को संबोधित करने का यह तरीका इश्क ए रसूल का मज़हर कैसे हुआ?

मुसलामानों में एक वर्ग ऐसा भी है जो सारे मुसलामानों पर इसमें शामिल होने को फर्ज़ करार देता है जबकि किसी भी जुलुस में शामिल होना सबके लिए संभव नहीं होताl इसका अर्थ यह नहीं है कि जो इस जुलुस में शरीक ना हो उसमें इश्क ए रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कम हैl पिछले वर्ष एक पोस्ट भी नज़र से गुजरा जिसमें इस दिन दुकानें बंद कर के जुलुस में शामिल ना होने वालों को ताना दिया गया था और उन्हें दौलत का लालची करार दिया गया थाl रोहंगिया मुसलामानों पर होने वाले अत्याचार पर कोई मुसलमान ऐसा नहीं होगा जो दर्द से ना तडपा होगा मगर सारे मुसलमान उनकी हिमायत में निकलने वाले विरोध प्रदर्शन में शरीक नहीं हो सकेl इसका अर्थ यह नहीं था कि जो लोग इन जुलूसों में शरीक नहीं हो सके वह रोहंगीय मुसलामानों से हमदर्दी नहीं रखते थे या इन जुलूसों के विरोधी थे या बर्मी हुकूमत के हक़ पर समझते थेl

हिन्दू इस देश में बहुमत में हैं और मौजूदा दौर में साम्प्रदायिक संगठन मुसलामानों के खिलाफ गैर मुस्लिमों को भड़काने के बहाने खोजते रहते हैंl हमारे अन्दर पनपने वाले गैर इस्लामी रुझानों का लाभ यह संगठन उठा सकती हैंl अगर हिन्दू संगठन भी हर शहर में राम जुलुस निकालने लगें और उन पर भी इन जुलूसों में शरीक होना धर्म की रौ से फर्ज़ कर दिया जाए और इस दिन शहर के सारे हिन्दू सड़को पर आ जाएँ तो क्या स्थिति पैदा होगीl और अगर कोई साम्प्रदायिक संगठन का व्यक्ति किसी जुलुस में शर अंगेज़ी कर दे और जुलुस हिंसक हो जाए तो फिर क्या होगा इसकी कल्पना कठिन नहीं हैl

इसलिए, जमाने की हवा को देखते हुए हम अपने सभी त्यौहारों को सादगी और अमन के साथ मनाएं और ऐसा कोई काम ना करें जिसे देशवासियों को बदगुमानी हो और एक अविश्वास की फिज़ा कायम होl इस त्यौहार को साम्प्रदायिक दृष्टिकोण से ना देखेंl नुमाइश में लाखों रुपये खर्च करने के बजाए इसी रकम का इस्तेमाल मिसकीनों को खिलाने पर खर्च किया जाए क्योंकि कुरआन में मिसकीनों और भूकों को खिलाने की सख्त ताकीद आई हैl इस मौके पर माइक का इस्तेमाल बहुत ही कम हो ताकि जनता को अपने दुनियावी और दीनी मामुलात की अदायगी में रोड़ा ना पड़े और हम गुनाहगार न बनेंl

URL for Urdu article:http://www.newageislam.com/urdu-section/s-arshad,-new-age-islam/promoting-sectarian-and-religious-hatred-in-the-guise-of-julus-e-muhammadi--جلوس-محمدی-ؐ-کی-آڑ-میں-مسلکی-اور-مذہبی-منافرت-کے-فروغ-کی-کوشش/d/116924

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/s-arshad,-new-age-islam/promoting-sectarian-and-religious-hatred-in-the-guise-of-julus-e-muhammadi--जुलूस-ए-मोहम्मदी-की-आड़-में-साम्प्रदायिक-और-धार्मिक-घृणा-को-बढ़ावा-देने-की-कोशिश/d/116942

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