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Hindi Section (10 Oct 2016 NewAgeIslam.Com)



Sultan Shahin Raises Triple Talaq Issue सुल्तान शाहीन ने UNHRC में ट्रिपल तलाक के मुद्दे को उठाया , उन्होने मुसलमानों से कहा कि वे इस्लामी थियोलाजी पर गंभीरता से पुनर्विचार करें

 

 

 

 

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद, जिनेवा,

एजेंडा आइटम 9, आम बहस, 26 सितंबर, 2016,

एशियन- यूरेशियन ह्यूमन राइट्स फोरम: की ओर से

सुल्तान शाहीन, संस्थापक संपादक, न्यु एज इस्लाम द्वारा मौखिक वक्तव्य

अध्यक्ष महोदय,

जब दुनिया का ध्यान मुसलमानों के एक वर्ग द्वारा अपनाए गए हिंसक चरमपंथ पर केंद्रित है,   धर्म के नाम  पर बहुत से मुस्लिम समाजों  में  मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन हो  रहा है।

दक्षिण पूर्व एशिया के एक देश में,  ईश्वर के अरबी नाम पर मुसलमानों का एकाधिकार है। गैर-मुसलमान यदि ईश्वर के लिए पारंपरिक नाम अल्लाह का प्रयोग करते हैं, तो उन्हें दंड दिया जाता है।

दक्षिण एशिया के एक मुस्लिम देश में हजारों हिंदू और ईसाई लड़कियों को , जिनमें से बहुत सी18 वर्ष की आयु से कम की हैं उनकाअपहरण कर लिया गया है, उन्हें जबरन मुसलमान बनाया गया हैऔर फिर उनकी "शादी"अपहणकर्ताओं से कर दी गई है।

एक मध्य पूर्वी देश में, अदालतें, 9 साल की उम्र  वाली छोटी लड़कियों के विवाह की अनुमति देती हैं और उन्हें अपने विवाह को शारीरिक संबंध स्थापित करके पूर्ण करने और अपने पति के साथ रहने को मजबूर करती हैं।

मेरे अपने देश, भारत में , मुस्लिम पति  एक बार में, एक के बाद एक, तीन बार  तलाक शब्द बोलकर ,कानूनी तौर पर एक मिनट से भी कम समय में, अपनी पत्नियों को अपने घरों से बाहर फेंक देते हैं।

यह  मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन तो हैं ही, साथ हीये सब तरीके इस्लाम धर्म को भी अवमानित करते हैं।

आतंकवाद सहित बहुत से आपराधिक कार्य इस तरह  किए जा रहे हैं , जैसेकि इस्लामी शास्त्रों द्वारा उनकी आज्ञा दी गई  हो ।

आतंकवाद सहित बहुत से आपराधिक कार्य इस तरह  किए जा रहे हैं , जैसेकि इस्लामी शास्त्रों द्वारा उनकी आज्ञा दी गई  हो ।

इन्ही कारणों से, मुस्लिम समुदाय के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे गहराई से इसपर विचार करें। हम मुसलमानों को ,इस तरीके सेअपने धर्म  का अपहरण करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए।

अध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से ,परिषद में मुस्लिम देशों के प्रतिनिधियों से एक अनुरोध करना चाहता हूं।

प्रिय महोदया, महोदया, कृपया अपने देशों में धर्मशास्त्रियों के साथ एक गंभीर बातचीत शुरू करें और उनसे रचनात्मक विचार के लिए,रास्ता निकालने के लिए कहें। इस्लाम के मूल शास्त्र, पवित्र कुरान में,  न केवल इसकी अनुमति दी गई है, बल्कि अल्लाह की ओर से यह आज्ञा दी गई है क्योंकि पैगंबर मुहम्मद (सल्ल) के बाद किसी अन्य पैगंबर को नहीं आना है ।

हम मुसलमानों को 21 वीं सदी की जरूरतों को ध्यान  में रखते  हुए अपने धर्मशास्त्र पर पुनर्विचार करना चाहिए। हम 7 वीं शताब्दी में नहीं रह रहें हैं और न ही उन शुरुआती लड़ाइयों को लड़ रहे हैं और न ही हम अपने समाज को मध्ययुगीन तरीके से रख सकते हैं।

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TOTAL COMMENTS:-   2


  • ऐसी "हलाला" जिस में तलाक़ की शर्त लगाईं जाए ताके वह पहले "शौहर" के लिए हलाल हो जाए, ऐसी हलाला जायज़ नहीं है.. संक्षेप में इस तरह समझे की हलाला शर्त के साथ किया नहीं जाता बल्कि खुद ही एक परिस्थिति बनती है जिससे वह औरत पहले वाले शौहर के लिए हलाल हो जाती है। .यानी उस औरत ने तलाक़ के बाद दूसरे किसी मर्द के साथ शादी की और फिर उन दोनों में कोई ऐसा मामला हुआ जिससे बात तलाक़ तक पहुँच गयी..दूसरी तलाक़ के बाद अगर उसे पहले शौहर की मुहब्बत महसूस हो जाए या यूँ कहें की पहला शौहर उसे दुबारा निकाह की ज़रिये हासिल करना चाहता हो तो ऐसी हालत में ये कहा जाएगा की वो अगर चाहे तो अब पहले शौहर से दुबारा निकाह कर सकती है। ... इस तरह की अनजाने से बन जाने वाली परिस्थिति को हलाला का नाम दिया जाता है लेकिन अफ़सोस की बात ये है की कुछ लोगों ने इसे एक धंधा बना लिया है और हलाला में तलाक़ देने की शर्त लगाते है जोकि पूरी तरह से हराम और गैर इस्लामी है.. हलाला में तलाक़ देने की शर्त लगाना हराम है/
    सवाल यह है की मशरूत हलाल हराम है लेकिन किया अगर किसी ने इस तरह का गैर इस्लामी हलाला कर लिया तो किया वह अपने पहले शौहर के लिए जायज़ हुई या नहीं ? इस सवाल पर गौर करने की ज़रूरत है। .. उम्मीद करता हूँ कोइ साहब इस सवाल पर अपनी रौशनी ज़रूर डालेंगे। ..अगर नहीं तो इंशा अल्लाह मैं अपनी मालूमात में मुताबिक़ यहाँ अपनी बात ज़रूर रखूँगा।। 

    By Ghulam Ghaus Siddiqi غلام غوث الصديقي - 1/18/2017 2:34:39 AM



  • डियर सुल्तान शाहीन साहब जी मैंने कुछ रोज़ पहले एक वेबसाइट पर एक फतवा पढ़ा जोकी नीचे पेश कर रहा हूं आप कृपया करके इस फतवे के बारे मे अपनी राय ज़रुर दें... आपका आभारी रहूंगा... 

    मेरे एक मित्र ने अपनी पत्नी को तीसरी तलाक़ दे दी, तो क्या मेरे लिए जायज़ है कि मैं उससे विवाह करके फिर उसे तलाक़ दे दूँ ताकि वह अपने पहले पति के पास वापस चली जाए?

    Published Date: 2016-11-06

    हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

    अगर आदमी अपनी पत्नी को तीसरी तलाक़ दे दे तो वह उसके लिए उस समय तक हलाल नहीं होगी जब तक कि वह किसी दूसरे पति से निकाह न कर ले, क्योंकि अल्लाह तआला का फरमान है :

    (فَإِنْ طَلَّقَهَا فَلا تَحِلُّ لَهُ مِنْ بَعْدُ حَتَّى تَنْكِحَ زَوْجاً غَيْرَهُ) [البقرة : 230]

    ''फिर यदि वह उसको (दो तलाक़ों के पश्चात तीसरी बार) तलाक़ दे दे, तो अब वह उसके लिए हलाल (वैध) नहीं जब तक कि वह स्त्री उसके अतिरिक्त किसी दूसरे पति से निकाह न कर ले।'' (सूरतुल बक़रा : 230)

    तथा इस निकाह में, जो उसे उसके पहले पति के लिए हलाल (जायज़) कर सकता है, यह शर्त है कि वह एक सही निकाह हो। अतः कुछ सीमित समय के लिए निकाह करना (जिसे निकाहे मुत्आ कहा जाता है), या महिला को उसके पहले पति के लिए हलाल करने के उद्देश्य से निकाह करना (जिसे निकाहे हलाला कहा जाता है), ये दोनों निकाह आम विद्वानों के कथन के अनुसार हराम (निषिद्ध) और बातिल (व्यर्थ) हैं, और इसके द्वारा औरत अपने पहले पति के लिए हलाल नही होगी।

    देखिए : ''अल-मुग़्नी'' (10/49-55).

    तथा रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से निकाहे हलाला को हराम (वर्जित) ठहराने वाली कई हदीसें वर्णित हैं।

    अबू दाऊद (हदीस संख्या : 2076) ने रिवायत किया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : ''हलाला करने वाले (मुहल्लिल) और हलाला करवाने वाले (मुहल्लल् लहू) व्यक्ति पर अल्लाह की लानत (धिक्कार) हो।''

    शैख अल्बानी रहिमहुल्लाह ने 'सहीह सुनन अबू दाऊद' में इस हदीस को सहीह कहा है।

    मुहल्लिल : वह व्यक्ति है जो औरत से इस लिए निकाह करे ताकि उसे उसके पहले पति के लिए हलाल कर दे।

    मुहल्लल लहू : औरत का पहला पति है (यानी जिसके लिए हलाला किया गया है)।

    तथा इब्ने माजा (हदीस संख्या : 1936) ने उक़बा बिन आमिर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : ''क्या मैं तुम्हें किराए पर लिए गए सांड के बारे में न बतलाऊँ? (कि वह कौन होता है) लोगों ने कहा : क्यों नहीं, ऐ अल्लाह के रसूल! आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया : वह हलाला करने वाला व्यक्ति है, अल्लाह तआला हलाला करने वाले और हलाला करवाने वाले पर लानत (अभिशाप) करे।'' शैख अल्बानी रहिमहुल्लाह ने ''सहीह सुनन इब्ने माजा'' में इस हदीस को हसन कहा है।

    और अब्दुर्रज़्ज़ाक़ (6/265) ने उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्हों ने लोगों को भाषण देते हुए फरमाया : ''अल्लाह की क़सम मेरे पास हलाला करने वाला और हलाला करवाने वाला व्यक्ति लाया जाए तो मैं उन्हें रज्म (पत्थरों से मार-मार कर हलाक) कर दूँगा।''

    तथा निकाह के समय, चाहे उसने अपने उद्देश्य को स्पष्ट किया हो और उन्हों ने उस पर यह शर्त रखी हो कि जब वह उसे उसके पहले पति के लिए हलाल कर देगा, तो उसे तलाक़ दे देगा, या उन्हों ने यह शर्त न रखी हो, बल्कि केवल उसने अपने हृदय में इसका इरादा किया हो, इस मामले में ये दोनों चीज़ें बराबर हैं।

    इमाम हाकिम ने नाफे से रिवायत किया है कि एक आदमी ने इब्ने उमर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से कहा : मैं ने एक औरत से शादी की है ताकि मैं उसे उसके पहले पति के लिए हलाल कर दूँ, जबकि उस आदमी ने न तो मुझे इसका आदेश दिया है और ना ही उसको इसका ज्ञान है। आप ने फरमाया : नहीं, सिवाय इच्छा पूर्ण निकाह के, यदि वह तुम्हें पसंद है तो तुम उसे रोक रखो, और अगर वह नापसंद है तो उसे छोड़ दो। आप ने फरमाया : निःसंदेह हम लोग इसे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के युग में ज़िना (व्याभिचार) शुमार करते थे। और फरमाया : वे दोनों निरन्तर ज़ानी (व्याभिचारी) हैं, यद्यपि वे दोनों बीस वर्षों तक एक साथ रहें।''

    इमाम अहमद रहिमहुल्लाह से पूछा गया कि : एक आदमी किसी औरत से शादी करता है और उसके दिल में यह बात है कि वह उस औरत को उसके पहले पति के लिए हलाल करेगा, जब्कि औरत को इस बात का ज्ञान नहीं है। इस पर इमाम अहमद रहिमहुल्लाह ने उत्तर देते हुए बताया कि : वह मुहल्लिल अर्थात हलाला करने वाला है, जब वह हलाला करने का इरादा करे तो वह मलऊन (अभिशापित) है।

    इस आधार पर, आपका उस औरत से शादी करना जायज़ नही है जबकि आप इसके द्वारा उसे उसके पहले पति के लिए हलाल करने का इरादा रखते हैं। ऐसा करना महा पाप है, तथा यह निकाह भी सही नहीं होगा, बल्कि यह ज़िना है। 


    By Hisham Qidwai - 1/18/2017 1:53:49 AM



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