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Hindi Section (17 Apr 2017 NewAgeIslam.Com)


Ayodhya Dispute अयोध्या विवाद



सैयद मंसूर आग़ा

30 मार्च, 2017

इस हिकमते इलाही को क्या कहा जाए कि शाहजहाँ ने दिल्ली में जामा मस्जिद बनवाई तो उसे ऐसी स्वीकृति प्राप्त हुई कि क्या ईमान वाले और क्या ईमान की दौलत से ख़ाली, दुनिया भर से लोग बड़ी तादाद में इसकी तरफ खिंचे चले आते हैंl किसी समय की नमाज़ ऐसी नहीं होती कि हजारों सिर अपने रब के हुज़ूर सजदे में नज़र न आते होंl रमज़ान में दर्जनों हुफ्फाज़ (कुरआन को ज़ुबानी याद करनें वाले) अलग-अलग जमाअतों में कुरआन सुनाते हैं। 1857 के पश्चात अंग्रेजों ने इस पर क़ब्ज़ा कर लिया। इसमें घोड़े बांधे। मगर संकट टली और इसकी मीनारों से अज़ान की आवाज़ गूंजी। आज इसे मुख्य मस्जिद का दर्जा प्राप्त है। ख़ुदा की शान यह कि जो इससे जुड़ गया है वह भी सम्मान पाता है। जबकि बाबर के सेनापति मीर बाकी ने अयोध्या में एक मस्जिद निर्माण कराई, यह मस्जिद भी अपने वास्तुकला के कारण अनोखी थी। प्रतिष्ठा उसने भी पाई, लेकिन गलत कारणों से। हमारा यह स्थान नहीं कि शाहजहाँ को अल्लाह वाला होनें का प्रमाणपत्र प्रदान करें या मीर बाकी की ईमानदारी पर शक करें, लेकिन यह प्रश्न अवश्य है कि दोनों के भाग्य में यह विरोधाभास क्यों?

हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम हिजरत करके मदीना पहुंचे मस्जिद बनाने का इरादा फरमायाl जिस जगह को मस्जिद के लिये पसंद फरमाया, पहले यह पता किया कि वह किसकी मिलकियत है? जब उसके नाबालिग मालिकों और उनके वारिसों नें पृथ्वी भेंट करने की पेशकश की तो आपनें बहुत एहतियात से काम लिया, भेंट स्वीकार नहीं फरमाया बल्कि प्रचलित दर से अधिक राशि का भुगतान करके उसे खरीदा और फिर मस्जिद बनवाईl इसलिए हमारे लिए इस गुमान की गुंजाइश है कि अयोध्या में 'राम कोट' के टीले पर मस्जिद के स्थान के चयन में मीर बाकी से चूक हुई और एहतियात को नज़र में नहीं रखा जिसकी उदाहरण नबी करीम ने स्थापित कर दी थी।

गुमान किया जा सकता है कि अवध के गवरनर पर सामयिक राजनीतिक रौब और दबदे की युक्ति हावी आ गई अन्यथा उस पर त्वरित विवाद खड़ा ना हो गया होताl बाबर की सरकार भारत में 1526 में स्थापित हुई। मस्जिद1928-29 में बनी]| बाबर का पोता अकबर (1556) राजा हुआ और उस मस्जिद का मुद्दा उसकी अदालत में भी पहुंचा। राजा ने बीच का रास्ता निकाला और मस्जिद परिसर में सदरदरवाज़े कनेक्ट एक 17 फुट चौड़ा 21 फुट लंबा चपूतरह निर्माण करा दिया, जिस पर रामलला, सीता जी और लक्ष्मण की मूर्तियां रख दी गईं जिनकी आधिकारिक तौर पर पूजा होती रहीl शायद इसीलिए इसे '' मस्जिद जन्म स्थान '' भी कहा जाता था (बाबरी मस्जिद: सैयद सबाहुद्दीन अब्दुर्रहमान स्वर्गीय)। यही वह मूर्तियां थीं जिन्हें दिसंबर 1949 में मस्जिद की मेहराब में रख दिया गया।

दिसंबर 1949 तक यह विवाद स्थानीय प्रकृति का रहा। लेकिन विभाजन के बाद उसकी प्रकृति बदल गई और इसे हिंदू आस्था और विश्वास का मुद्दा बना दिया गयाl हिन्दू आस्था  के अनुसार श्रीराम विष्णु के औतार हैं और 'त्रेता युग' में आए जो 12 लाख 96 हज़ार सौर्य वर्ष पर आधारित था। इसके बाद 'द्वापर युग' आया जो आठ लाख 64 हज़ार साल का था। अब कलयुग चल रहा है जो चार लाख 32 हज़ार साल पर खत्म होगाl इसलिए राम जी का जन्म कोई 21 लाख साल पहले हुआ था। हालांकि वेदों के उतरनें का समय एक करोड़ 97 लाख साल पहले माना जाता है लेकिन उनकी टिकाएँ तो हर दौर में लिखी जाती रहीं और उनमें ऐसे एकीकृत हो गईं कि अब अलग पहचान भी संभव नहीं। यही हाल उपनिषदों का है, लेकिन किसी भी पुराने हिन्दू ग्रन्थ से इस अकीदे का समर्थन नहीं होता कि राम जी का जन्म इसी स्थान पर हुवा था जहां मस्जिद थी। लेकिन यह चर्चा व्यर्थ है। हमें तो इतना पता है कि खुद हमारे दौर की किसी प्रमुख व्यक्तित्व के बारे में निर्धारित विधी से यह नहीं बताया जा सकता कि जन्म चार फिट वर्ग के किस स्थान पर हुआ, जैसा कि दावा किया जा रहा है कि राम जी सटीक उसी जगह जन्मे थे, जहां मस्जिद की मेहराब थी, जबकि उनकी विलादत इतिहास से पहले के दौर की है और गांधी जी ने तो यहां तक कह दिया कि वह कोई ऐतिहासिक हस्ती नहीं थे। लेकिन विश्वास तो बस विश्वास होता है उस को परवान चढ़ा कर राजनीतिक हथीयार बना दिया गया है।

इस विश्वास को परवान चढ़ाने की राजनीतिक प्रक्रिया स्वतंत्रता के तुरंत बाद ही उस समय शुरू हो गयी थी जब 22 और 23 दिसंबर 1948 की रात में चबूतरे से उठाकर मूर्तियां मस्जिद की मेहराब में रख दी गईं और 6 दिसंबर 1992 को उस समय चरम पर पहुंची जब आडवाणी जी, अशोक सिंघल और दुसरे संघी नेताओं की पुकार पर लाखों कानून विरोधी अयोध्या में इकट्ठे हुए और उन नेताओं की मौजूदगी में एक प्राचीन आराधनालय को ध्वस्त कर दिया गया और फिर सरकार की निगरानी में उसके मलबे पर अस्थायी ही सही, मंदिर बना दिया गया। इस दौरान किस किस का क्या रोल रहा? यह बताने की जरूरत नहीं। जब मूर्तियां रखी गईं तब भी कांग्रेस की सरकार थी। जब ताला खुला तब भी जब शीलान्यास हुआ तब और जब मस्जिद गिराई गई तब भी सरकार कांग्रेस की ही थी। यह बात भी उज्ज्वल दिन की तरह स्पष्ट है कि इसे राष्ट्रीय समस्या बनाने और राजनीतिक लाभ लेने की शातिराना चाल का संघ परिवार की रणनीति दरअसल राजनीति के खेल में कांग्रेस के नहले पर दहले का आदेश रखता है।

लिब्राहन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में अनियमित हिन्दू कौम परस्ती को बढ़ावा देने में अंतरिम प्रधानमंत्री गुलज़ारी लाल नंदा का तो ज़िक्र किया, लेकिन बाकी को छोड़ दियाl उनमें से कई नाम ज़ेहन में आज भी ताजा हैं। जैसे आधुनिक दिमाग वाले प्रधानमंत्री राजीव गांधी (जिन्हें सुब्रह्मण्यम स्वामी ने मूल हिन्दू प्रधान मंत्री करार दिया है) उनके गृहमंत्री सरदार बूटा सिंह और राज्यमंत्री आंतरिक सुरक्षा अरुण नेहरु जिनके बरगलाने पर मस्जिद का ताला खुलवाकर आधिकारिक मंदिर में परिवर्तित करा दिया और फिर धूम धाम से चुनाव से कुछ दिन पहले शिलान्यास करा दिया और राजीव ने अपने चुनाव अभियान की शुरूआत भी अयोध्या से 'राम राज्य' की स्थापना के वादे के साथ किया।

राजीव गांधी हांलांकि राजनीतिक घराने में पैदा हुए थे, लेकिन उन्हें राजनीति से रुचि नहीं थी। 1980 में छोटे भाई संजय गांधी की हवाई दुर्घटना में मौत के बाद उनको राजनीति में लाया गया और केवल चार साल बाद 1984 में श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री बना दिया गया। यह संयोग राजनीतिक अनुभव का बदला नहीं होते। वह सलाहकारों पर मुनहसिर रहे| ताला खुलवाने से पहले सरकारी दूरदर्शन पर एक साल तक 'रामायण सीरियल' प्रदर्शित हुई जिसकी बदौलत मन में श्रीराम की महानता के छाप खूब निखर गए इसके बाद ताला खुलवाया, शिलान्यास कराना और 'राम राज्य' का भूला बिसरा सबक याद दिलाना आदि आत्मज्ञान और विकासशीलता के खिलाफ राजनीतिक रणनीति थी जिसके लिए उनके कोताह नज़र और सेकुलरिज्म से अनजान सलाहकार कम जिम्मेदार नहीं थे। यह सब महज संयोग नहीं था बल्कि हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को उभार कर उनसे चुनावी लाभ उठाने की संगठित कोशिश थी। इसी के बाद हिन्दू अक्सरियत परस्ती के आंदोलन को पर लग गए और आंधी में कांग्रेस खुद भी बह गईl जो माहौल कांग्रेस ने बनाया था अडवाणी और वी एच पी नें उसे चुरा लिया।

बाबरी मस्जिद की जमीन के स्वामित्व पर विवाद भी नया नहीं। जनवरी 1885 में एक हिन्दू महंत रघुबर दास ने फैजाबाद के शीर्ष न्यायाधीश की अदालत में एक आवेदन दी कि मस्जिद जिस स्थान पर बनी है वह राम जन्मभूमि है। वहां राम मंदिर बनाने की अनुमति दी जाए मगर जज पंडित हरि कृष्ण ने इसे खारिज कर दिया। दिसंबर 1949 में मस्जिद में मूर्तियाँ रख दिए जाने के बाद द्विपक्षीय मामला दायर हुवे। सुप्रीम कोर्ट में यह उन्हीं मुकदमों की अपील है जो 69 साल से जारी हैं, जिनको बहुत अधिक संवेदनशील और आस्था से जुड़ा करार देते हुए चीफ जस्टिस जे एस खेहर ने 21 मार्च को सलाह दी है कि दोनों पक्ष आपसी बातचीत से विवाद को हल कर लें और यह कि वह खुद मध्यस्थता के लिए तैयार हैंl इस प्रस्ताव पर बहस छिड़ गई है।

बेशक सैद्धांतिक बात यह है कि अदालत को जमीन के स्वामित्व पर निर्णय देना चाहिए और सरकार को इस फैसले को लागू भी करना चाहिए। लेकिन ऐसे उदहारण हैं कि संवेदनशील मामलों में न्यायिक फैसलों का क्रियान्वयन नहीं हो पाता। इस विवाद के अध्याय में यह बात उज्ज्वल दिन की तरह साफ नज़र आती है की अगर निर्णय मुस्लिम पक्ष के खिलाफ हुआ तो वह तो घर बैठ जाएंगे लेकिन अगर हिन्दुओं के खिलाफ गया तो पूरे देश में हत्या और क़त्ल का जो तूफान उठ सकता है, वह मस्जिद के विध्वंस के बाद 1992 से और गुजरात  2002 से अधिक भयानक होगा। हमारा जवाब बेशक इस आशंका को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। नियम पर अड़ने से ज्यादा दूर अन्देशाना राजनीतिक रणनीति समय की मांग है। हमारे स्टैंड में यह लिहाज़ रखा जाना चाहिए कि निष्पक्ष भारतीयों की सहानुभूति हमें मिल सके और उच्च न्यायालय में भी बेहतर हालात पैदा होl मुख्य न्यायाधीश की पेशकश को संवाददाता सम्मेलन में रद कर देना निहायत अनुचित है।

इस तरह की एक आधिकारिक प्रस्ताव जून 2003 में कांची के शंकराचार्य द्वारा आई थी जिसमें यह पेशकश थी कि अगर अयोधया की जमीन मंदिर के लिये दान कर दी जाए तो पुरातत्व विभाग के तहत बंद पड़ी एक हजार से अधिक मस्जिदों को नमाज़ के लिए खोल दिया जाएगा। मुस्लिम नौजवानों को सरकारी नौकरियों में 9 / प्रतिशत आरक्षण दे दिया जाएगा। काशी और मथुरा की पूजा स्थलों पर मांग हटा लिया जाएगा| उस समय यह सुनिश्चित करने के लिए कारण मौजूद थी कि पेशकश को बाजपई सरकार का समर्थन हासिल थाl दो पन्नों पर आधारित यह सुझाव 21 /जून को मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड को मिली थीं, लेकिन इन को ना तो मुस्लिम पक्ष ने स्वीकार किया और न विहिप ने। (हिन्दुस्तान टाइम्स 22 / जून 2003)

इस समय माहौल यह है कि जिस तरह विपक्ष की अय्याराना समर्थिन से 'एनमी प्रोपर्टी एक्ट' पारित हो गया, राज्यसभा में इसका विरोध करने के बजाय विपक्ष ने “वॉक आउट” किया उसी तरह' राम मंदिर 'के लिए भी कानून पास किया जा सकता है। ये निश्चित है कोई विपक्षी दल इसका विरोध नहीं करेगी। गौर कीजिये कि उस समय क्या स्थिति होगी? हमारे लिए जीना कितना मुश्किल होगा?

यह भी गौर कीजिये, अगर मंदिर बना तो रात दिन जो धन बरसे गा, वह किन हाथों में जाएगा, और इसका इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए होगा? उसका विश्लेषण करके मैंने रोजनामा कौमी आवाज में एक लंबे लेख (27-28 जून 2003 ) में यह निवेदन किया था अगर मुस्लिम पक्ष शंकराचार्य का प्रस्ताव इस शर्त के साथ स्वीकार कर ले कि मंदिर निर्माण और प्रबंधन सरकार अपने हाथ में ले और विहिप को इससे बेदखल किया जाए तो विहिप को बे नकाब करने और फिरका परस्ती के नाग को कुचलने में बड़ी मदद मिल सकती है। विहिप अगर इसके बावजूद खुद मंदिर बनाने की ज़िद पर अड़े रहते हैं तो जनता को यह बात समझने में देर नहीं लगेगी कि इसका उद्देश्य राम मंदिर नहीं, कुछ और है। हालांकि विचार यह है कि किसी समझौते के लिए सभी पक्षों को सहमत होना आवश्यक है, लेकिन हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि मूल पक्ष कोई संगठन नहीं बल्कि पूरा राष्ट्र है। हमारे स्टैंड को चाहे विहिप अस्वीकार करे मगर वह उन उदारवादी धार्मिक हिंदुओं के दिल में उतर जाना चाहिए जिनको वरगला कर साम्प्रदायिक तत्व शक्ति प्राप्त करते हैं। जनता को श्रीराम से श्रद्धा है और उनको राम के नाम पर एक मंदिर में रुचि हो गई है लेकिन इस बात से हरगिज़ नहीं कि यह मंदिर विहिप ही निर्माण करेl जिस तरह हजारों मस्जिदों पर कब्जा प्रतिकूल है, उसी तरह इस एक और मस्जिद के मलबे पर भी कर लिया जाए तो देश के सांप्रदायिक माहौल को बदलने में बड़ी मदद मिलेगी। '' लेकिन अफसोस यह आवाज़ सुनी नहीं गई। और क्यों सुनी जाती! अपने अपने नेतृत्व की समस्या जो है। अब वह नेता नहीं रहे जो लोगों को साथ लेकर चलें। अब वे हैं जो राष्ट्र की भावनाओं को भड़काते हैंl और फिर जज़बात में बहती कौम के आगे आगे चलते हैंl अगर पुरातत्व विभाग के तहत बन्द हमारी कोई एक हज़ार मस्जिदें खुल जातीं, तो अल्लाह के यहाँ किसी की पकड़ नहीं होती। रहा अयोध्या में बदले में मस्जिद तो कह दीजिए अगर असल जगह नहीं तो न कोसी के उस पार और न इस पार हमें मस्जिद नहीं चाहिए।

30 मार्च, 2017 स्रोत: रोज़नामा हिन्दुस्तान एक्सप्रेस, नई दिल्ली

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/syed-mansoor-agha/ayodhya-dispute--اجودھیا-تنازعہ/d/110646

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/syed-mansoor-agha,-trnew-age-islam/ayodhya-dispute--अयोध्या-विवाद/d/110785

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