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Hindi Section (09 Jan 2016 NewAgeIslam.Com)



The Ambivalent Notion of Consensus of the Scholars (Ijma) in Islam इस्लाम में इजमा ए उलेमा (आम सहमती) की अस्पष्ट अवधारणा

 

 

 

मोहम्मद यूनुस, न्यु एज इस्लाम

(संयुक्त लेखक अशफाक़ुल्लाह सैयद), इस्लाम का असल पैग़ाम, आमना पबलकेशनज़, अमेरिका, 2009)

22 अक्टूबर 2015

भूमिका:

जैसे ही पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वासल्लम के मृत्यु के बाद इस्लाम पड़ोसी देशों में फैलने लगा स्थानीय रस्म व रिवाज और नियमों को कुरान की विस्तृत निर्देशों के अनुसार तैयार करने की जरूरत महसूस हुई। पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्ल्म के मृत्यु के महज बीस वर्षों के अंदर ही पश्चिम यानी उत्तरी अफ्रीकी क्षेत्रों से लेकर मिस्र, सीरिया, फिलिस्तीन, इराक, ईरान और अफगानिस्तान तक फैले हुए इन क्षेत्रों में इस्लामी कानून के अनुसार सरकार के लिए एक कोड भी रखना जरूरी हो गया था। चूंकि इन क्षेत्रों के अपने नियम और रस्म व रिवाज थे जो बेहद संगठित और विनियमित थे, इसलिए प्रारंभिक उलेमा इस्लाम और धर्मशास्त्रियों (फ़ुक़ाहा किराम) को इस्लामी फिक़्ह में उम्मत की सहमति के लिए एक कुरानी निर्देश की जरूरत पेश आई। इसीलिए उन्होंने इजमा ए उम्मत का औचित्य साबित करने के लिए आयात 2: 143 और 3: 110 का सहारा लिया।

आयत 2: 143, के  इस प्रारंभिक हिस्सा "और (मुसलमान) इस प्रकार हमने  तुम्हें (एतेदाल वाली) बेहतर उम्मत बनाया" का संदर्भ हर ज़माने में मुसलमानों पर अल्लाह की विशेष नेमत का उल्लेख करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जिससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि मुसलमानों का फैसला खुद नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के निर्णय की तरह प्रामाणिक और विश्वासपात्र माना जाएगा।

आयत 3: 110 के प्रारंभिक हिस्सा, '' आप बेहतरीन उम्मत हैं जो सब लोगों (मार्गदर्शन) के लिए भेजे गये हो,  भलाई का हुक्म देते हैं और बुराई से मना करते हो '' का संदर्भ यह साबित करने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा कि मुसलमान कभी भी किसी गलती पर सहमत नहीं हो सकते क्योंकि अगर ऐसा होता तो कुरान निम्नलिखित शैली में मुसलमानों की प्रशंसा कभी नहीं करता।

उपरोक्त दावों की पुष्टि में निम्नलिखित मशहूर हदीसों को पेश किया जाता है:

"मेरी उम्मत कभी भी किसी गलती पर सहमत नहीं होगी। अगर आप उन दोनों के बीच कोई मतभेद देखो तो तुम्हें भारी बहुमत का पालन करना चाहिए।"

"उम्मते मुसल्लामा और उनके रहनुमाओं का पालन करो।"

"मुसलमानों की दृष्टि में जो कुछ अच्छा है वह अल्लाह की दृष्टि में भी अच्छा है और जो कुछ मुसलमानों की दृष्टि में बुरा है वह अल्लाह के नज़र में भी बुरा है।

हालांकि, कई समकालीन उलेमा इस सिद्धांत से सहमत नहीं हैं। उन्होंने इन कुरानी आयतों की व्याख्या एक अलग तरह से की है, और अपने विचारों को साबित करने के लिए विभिन्न परंपराओं का हवाला दिया है। उन्होंने तो इस सिद्धांत को इस आधार पर पूरी तरह खारिज कर दिया है कि अगर कोई  आदमी व्यक्तिगत रूप से त्रुटि का शिकार हो सकता हैं, यह कैसे संभव है कि उन्ही लोगों से मिलकर बना एक समुदाय त्रुटि का शिकार न हो। हालांकि, कट्टरपंथी उलेमा ने इज़मा का समर्थन किया और सर्वसम्मत इज़मा से इनकार करने वाले को काफिर क़रार दिया। इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए, अहमद हसन इमाम अशअरी के हवाले से बयान करते हैं: १

धार्मिक विद्वानों ने अक्सर अपने विरोधियों को उम्मत से बाहर कर दिया है, जिसका यह परिणाम सामने आया कि उलूम दीनिया का अध्ययन विवाद का एक प्रारंभिक बिंदु बन गया। उनके उलूम के अध्ययन के पक्ष में और साथ ही साथ इसके विरोध में भी बहुत सारी किताबें लिखी गई हैं। "

१:१ विद्वानों की इजमा का औचित्य

लगभग डेढ़ इस्लामी सदियों तक इजमा ए उम्मत को कानून एक उपकरण माना जाता रहा, जबकि मुसलमानों की भूमिका धीरे धीरे उलेमा तक ही सिमट गई। और तर्क यह दिया गया कि चूँकि मुसलमानों के विचारों उलेमा निर्धारित करते थे, इसीलिए उम्मत का इज़मा विद्वानों के इज़मा से अलग नहीं है। और इस तर्क के समर्थन में आयत 4:59, 7: 181 का हवाला पेश किया गया।

कुरान के इस बयान का हवाला कि: "ऐ ईमान वालो! मानो अल्लाह और रसूल सललाल्लाहू अलैहे वसल्लम की एताअत करो और अपने में से (योग्य) साहिबाने अमर की ........." (4:59) एक प्रामाणिक धर्मगुरू के निर्णय का औचित्य साबित करने के लिए दिया गया और यह दलील पेश की गई कि जो पालन करने का आदेश दिया गया है, इसको हर प्रकार के दोष से मुक्त होना चाहिए।

कुरान के इस बयान को कि '' और जिन्हें हम ने पैदा फ़रमाया है उनमें से एक जमात (ऐसे लोगों की भी) है जो सही बात निर्देशित करती हैं और इसी के साथ न्याय पर आधारित निर्णय करती हैं '' (7: 181 ),  को बल प्रदान करने के लिए पेश किया जाता है कि अल्लाह ने सभी मामलों में सही निर्णय लेने की हिदायत की है।

यह बात उल्लेखनीय है कि विरोधियों ने इज़मा (सहमति) के औचित्य के सिद्धांत का विरोध किया और इसे खारिज कर दिया। यहां तक कि उसके समर्थक भी इस सिद्धांत पर विभाजित हैं और इस मामले पर अपनी एक अलग राय रखते है। उनके कुछ विचार और विचारधाराओं को नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि इस सिद्धांत से उत्पन्न होने वाले विवादों का अनुमान लगाया जा सके [1]:

केवल नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथियों की आम सहमति सही है, और उनके बाद की पीढ़ियों की सहमति विचारणीय नहीं है।

हर पीढ़ी में मुसलमानों का आम सहमति सही है।

बाद की पीढ़ियों के उलेमा इस्लाम की प्रारंभिक सदियों के विद्वानों की सहमति का उल्लंघन नहीं कर सकते।

इमाम मालिक और उनके अनुयायियों के लिए, मदीना के विद्वानों से सहमत ही आम सहमति है।

फ़ुक़्हा के एक समूह के लिए, कूफ़ा और बसरा के विद्वानों की सहमाती ही सहमति होती है।

अगर मुसलमानों के एक समूह में किसी समस्या पर मतभेद हो जाए, और उसके बाद की पीढ़ी के मुसलमान अलग अलग राय में से किसी एक पर सहमत हो जाएँ तो वह आम सहमति मान्य होगा।

आम सहमति पर अगर एक धर्मगुरू भी सहमति का विरोध करता है, तो आम सहमति सही नहीं है।

 विद्वानों की सहमति के औचित्य के सिद्धांत में त्रुटियां।

मानव उलूम में कई उतार चढ़ाव है। आज जो कुछ सच है, हो सकता है कि कल गलत साबित हो, सिवाय कुछ मजबूत वैज्ञानिक तथ्यों के, जिन से अल्लाह की सच्चाई साबित होती है, जैसे; (पृथ्वी गोल है, रेगिस्तान में कम वर्षा, पानी ढाल से नीचे बहती है)। हालांकि, मानव संबंध, न्यायशास्त्र, रस्म व रिवाज, आदतों के मामलों में, उनके आधार बाहरी वातावरण के आधार पर होती है, और बाहरी वातावरण में परिवर्तन के साथ उनमें भी बदलाव पैदा होती है। और यही मामला धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी मुद्दों पर धर्मशास्त्रियों और उलेमा इस्लाम के विचार के  साथ भी है। इसलिए, वर्तमान या अतीत के विद्वानों के विचारों और नियमों को समाप्त करने का कोई भी सुझाव किसी विशेष परिस्थिति या संदर्भ के तहत जारी किए गए विद्वानों के आदेश को एक अनन्त औचित्य प्रदान करने के समान होगा। इसलिए, उदाहरण के लिए युद्ध की स्थिति में जारी किए गए कई आदेशों पर रोक लगा दिए जाते हैं, जब  शांति बहाल हो जाता है इसी तरह व्यक्तिगत राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानव संबंध में कोई भी नयापन एक अलग स्थिति में जारी किए गए आदेशों या सहमति को रद्द कर सकती है। इसलिए, जैसा कि हाल ही में प्रकाशित की गई एक अत्यंत प्रामाणिक पुस्तक में उल्लेख है कि, ''आम सहमति (इज़मा) के क्लासिकल सिद्धांत को '' अपने प्रारंभिक दौर में भी पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया गया था। इसके सैद्धांतिक प्रकृति के कारण और शायद कुछ निश्चित रूप से व्यवहार्य मशीनरी के अभाव की वजह से इसका इस्तेमाल मुस्लिम समाज के सुधार के लिए नहीं किया जा सकता 7 "। हक़ीक़त तो यह है की यह न तो कभी कानून का कोई स्थिर सिद्धांत था और न है [2]।

इसलिए, इतिहास के किसी भी दौर से लेकर अब तक मुसलमान समकालीन या अतीत के विद्वानों की सहमति का पालन करने के लिए बाध्य नहीं हैं।

मुस्लिम लेखकों के बीच उन ऐतिहासिक संदर्भ की समीक्षा के बिना जिसमें  इज़मा का गठन हुआ था, "अतीत के उलेमा केराम की आम सहमति" को नक़्ल करने का रुझान भी अधिक होता जा रहा है। मिसाल के तौर पर एक ऐसे ज़माने में जब बग़दाद मंगोल फौज के क़ब्ज़े में तबाही के कगार पर था खिलाफत को अल्लह का हुक्म मान लिया गया लेकिन आज के हालात में जब के यह लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित कल्याणकारी राज्य का वक़्त है, आईएसआईएस के खूनी दरिंदों के खिलाफत की स्थापना के  दावा को हुक्म ए एलाही का दर्जा नहीं दिया जा सकता है।

संक्षेप में उलेमा की सहमति को भी इसी ऐतिहासिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए जिसमें इसका गठन हुआ है, और उस समाती को बिलकुल सही नहीं माना जा सकता, क्योंकि किसी भी इज़मा पर उम्मत के सभी व्यक्तियों का समर्थन संभव नहीं है, और यदि "आम सहमति के लिए अधिकृत कोई एक विद्वान भी सहमति का विरोध करता है तो वह आम सहमति सही नहीं है" [1]

1। अहमद हसन, इस्लाम में आम सहमति के सिद्धांत, नई दिल्ली 1992, और पृष्ठ संख्या 16।

2। मोहम्मद यूनुस और अशफ़क़ुल्लाह सैयद, इस्लाम का असल पैग़ाम, मैरीलैंड अमेरिका 2009, इस्लाम में धर्मशास्त्र का उदय और विकास, 1.5।

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