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Hindi Section (30 Jan 2019 NewAgeIslam.Com)



The Beauty of Islam that attracts intellectuals इस्लाम की सुंदरता जो बुद्धिजीवियों को आकर्षित करती है



मौलाना नादीमुल वाजिदी

३१ मई २००९ के अखबारों में यह खबर प्रकाशित हुई है कि अंग्रेजी और मलयालम की नामवर लेखिका कमला दास का, जिन्होंने १२ दिसंबर १९९९ में पैंसठ वर्ष की आयु में इस्लाम स्वीकार किया था, मौत हो गई, उनका इस्लामी नाम कमला सुरैया था, उनकी गिनती भारत के प्रथम श्रेणी के साहित्यकारों और कवियों में होता है, उन्होंने अपनी बे बाकाना लेखों के माध्यम से पाठकों को यह एहसास दिलाया कि इंसानों के बीच असमानता इंसानियत के खिलाफ है, वह रिवायत शिकन के तौर पर प्रसिद्ध थीं, लम्बी लेखनीय जीवन व्यतीत करने के बाद उन्होंने इस्लाम के दामन में पनाह लेने का निर्णय किया, यह निर्णय उन्होंने लम्बे विचार के बाद किया था, केरल के शहर कोचीन के एक जीवंत समारोह में इस्लाम कुबूल करने के एलान के बाद उन्होंने एक टीवी इंटरव्यू में कहा था कि मैंने किसी दबाव के तहत इस्लाम कुबूल नहीं किया है, यह मेरा स्वतंत्र निर्णय है, मैं इस्लाम कुबूल करने पर किसी की आलोचना की कोई परवाह नहीं करती, इस्लाम मेरे लिए दुनिया की सबसे अमूल्य संपती है और यह मुझे जान से अधिक प्रिय है, १५ दिसंबर १९९९ को टाइम्ज़ ऑफ इण्डिया में उनका इंटरव्यू छपा उसमें उन्होंने कहा कि इस्लामी शिक्षाओं में बुर्के ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया है, कमला सुरैया अपने खानदान के बीच में रहती थीं जो मुसलमान नहीं हुआ था, वह अंतिम समय तक ईमान पर कायम रहीं, उनकी वसीयत थी कि उनको पलायम की जामा मस्जिद के कब्रिस्तान में मुसलमानों के बीच दफ़न किया जाए, उनकी वसीयत का सम्मान किया गया और पुरे सरकारी सम्मान के साथ उनको उसी कब्रिस्तान में दफ़न किया गयाl भारत में इस्लाम कुबूल करने की यह घटना इत्तेफाक से अखबारों में आ गई, क्योंकि इसका संबंध एक प्रसिद्ध लेखिका से था, ऐसा नहीं कि भारत में इस्लाम कुबूल करने की घटनाएं पेश नहीं आ रही हैं, बल्कि मुल्की हालात के संदर्भ में उनको छुपाने की कोशिश की जा रही है, इसके बावजूद जब कोई घटना पढ़ने को मिलता है तो दिल संतुष्टि के एहसास से भर जाता है, ख़ास तौर पर उस समय जब उस घटना का संबंध किसी उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति हो और उसे इस्लाम की किसी ख़ास शिक्षा से इस्लाम स्वीकार करने की तहरीक मिली होl ख़ुशी की बात यह है कि सारी दुनिया में इस्लाम एक ऐसे धर्म के तौर पर उभर रहा है जिसे जाहिलों के मुकाबले में पढ़े लिखे लोग अधिक कुबूल कर रहे हैं और यह इस बात का प्रतीक है कि इस्लाम दीने फितरत है और इसमें दिल व दिमाग पर एक ही समय में प्रभावी होने की सलाहियत मौजूद है, यूरोप और अमेरिका में ख़ास तौर पर इस्लाम की ओर लोगों के रुझान में वृद्धि अनुभव किया जा रहा है, लोग इस्लाम को समझना चाहते हैं, इसकी अच्छाइयों को महसूस करना चाहते हैं और इसकी खूबियों को समेटना चाहते हैं, हाल ही में अर्ब न्यूज़ ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसमें कहा गया है कि इस्लाम ईसाईयत के बाद अकीदे के हामिल दोसरे बड़े समूह के तौर पर उभर रहा है, एक ओर जहां ब्रिटिश मीडिया इस्लाम को गलत तौर पर पेश करने में व्यस्त हैं वहीँ दोसरी ओर इस्लाम ब्रिटिश में तेज़ी से फ़ैल रहा है और देश में मुसलमानों की आबादी बीस लाख तक पहुँच चुकी हैl २००१ की जनगणना में ब्रिटेन में मुसलमानों की संख्या सोलह लाख दर्ज की गई थी, इस संख्या में वृद्धी ब्रिटेन में इस्लाम के तेज़ी से फैलने का मज़हर है, आने वाले बीस सालों में यह संख्या इतनी बढ़ जाएगी कि जो समूह इस समय अल्पसंख्या में है वह बहुसंख्या में आ जाएगा, यही हाल योरोप के बाकी देशों में है २००३ में योरोपीय यूनियन में मुसलमानों की संख्या डेढ़ करोड़ थी, यह ख्याल भी प्रकट किया जा रहा है कि अगर इस्लाम की ओर लोगों के रुझान का यही हाल रहा तो यह संख्या २०१५ तक तीन करोड़ और २०२० तक लगभग पांच करोड़ हो जाएगी, स्पेन के बारे में बतलाया गया है कि वहाँ हर साल पांच हज़ार लोग इस्लाम कुबूल कर रहे हैं, पश्चिमी यूरोप के कुछ देशों के संबंध में यह ख्याल है कि आने वाले कुछ वर्षों में इन देशों के कुछ शहरों के मेयर मुसलमान हो सकते हैंl

इस्लाम कुबूल करने के सिलसिले में यह बात ख़ास तौर पर उल्लेखनीय है कि उच्च शिक्षा प्राप्त लोग, उच्च खानदानों से जुड़े हुए लोग और प्रसिद्ध व्यक्तित्व मामूली पेशावरों के मुकाबले में इस्लाम के अन्दर अधिक दिलचस्पी ले रहे हैं, बड़े बड़े व्यापारी और उद्द्योगपति भी इस्लाम कुबूल करने में पीछे नहीं हैं, इस ब्रिटेन में मुसलमान करोड़पतियों की संख्या दस हज़ार से आगे बढ़ चुकी है, ब्रिटिश उद्द्योग में मुसलमानों का योगदान ३१ अर्ब पाउंड से अधिक है, साधारणतः लोग सोच समझ कर और लम्बे विचार विमर्श के बाद इस्लाम कुबूल करते हैं, इस्लाम के प्रति मीडिया और सरकारों का नाकारात्मक व्यवहार उन्हें इस्लाम की ओर आकर्षित करता है और वह इस्लाम को समझने का कार्य प्रारम्भ कर देते हैं, मुस्लिम समाज में उनकी आवाजाही बढ़ जाती है, इस्लामी पुस्तकों का अध्ययन या मुसलमानों की गतिविधियों का निरीक्षण उन्हें इस्लाम कुबूल करने की तहरीक देता है, जो लोग इस्लाम कुबूल कर रहे हैं वह इस्लाम की किसी ना किसी खूबी से प्रभावित हो कर ऐसा कर रहे हैं, इस प्रकार दुनिया के सामने इस्लाम एक ऐसे धर्म के तौर पर सामने आ रहा है जिसकी शिक्षाओं में आकर्षण भी है और सुन्दरता भी, जिनमें ह्रदय पर प्रभाव डालने की सलाहियत भी है और दिमाग को संतुष्ट करने की शक्ति भी, यह पुरुष, स्त्री, वृद्ध, युवा, आम, ख़ास, शिक्षित, अशिक्षित, समाज के हर वर्ग के लिए समान रूप से आकर्षित करने वाला और दृष्टि केंद्र है, अखबारों और पत्रिकाओं में इस्लाम कुबूल करने वालों की प्रतिक्रिया छपती हैं, जिनसे पता चलता है कि कभी कभी कई छोटी छोटी बातें भी हिदायत का कारण बन जाती हैं, हैरत तो उस समय होती है जब धार्मिक लोग इस्लाम कुबूल करते हैं, उन्हें एहसास होता है कि वर्षों से वह जिस धर्म को गले लगाए बैठे हैं उसमें यह क्षमता ही नहीं है कि समाज की इस्लाह व तामीर में कोई किरदार अदा कर सकेl हद यह है कि कुछ उच्च धार्मिक व्यक्तित्व अपने धार्मिक मान्यताओं की व्याख्या में भी असफल नज़र आते हैं, कुछ वर्ष पहले एक ईसाई मुबल्लिग जॉन्सन ने न्यूयॉर्क के इस्लामी सेंटर में इस्लाम कुबूल करके अपना नाम मोहम्मद अहमद रखा था, उसने लिखा है कि ईसाई मुबल्लिग का कोर्स पूर्ण करने में मुझे दस वर्ष लग गए, इसके बावजूद मैं ईसाई शरियत को नहीं समझ सका, ईसाई मुबल्लिग भी बन गया लेकिन मेरा अक़ीदा व खुदा की ज़ात के सिलसिले में दुविधा का शिकार रहा, इसी अकीदे के अनुसार तीन खुदा हैं या खुदा के तीन भाग हैं, खुदा के अलावा उसका बेटा ईसा (अलैहिस्सलाम) भी उसके शरीक कार हैं, और पाक मरियम (अलैहस्सलाम) को भी निज़ाम ए कायनात चलाने में दखल है, इन तीनों के बाद खुदा की जो कल्पना उभरती है ज़नाना भी है और मर्दाना भी, मेरे लिए खुदा की यह कल्पना हास्यास्पद लगता था, मैंने इरादा किया कि मैं इस सिलसिले में फादर माइकल से सम्पर्क करूँगा और उनके सामने अपने शक व संदेह रखूँगा, फादर माइकल की बड़ी शोहरत थी, समय समय पर हमारे गाँव में लेक्चर देने के लिए आते रहते थे, एक बार फादर माइकल गाँव के एक स्कूल में लेक्चर देने के लिए आए तो मैंने फैसला किया कि मैं इस सिलसिले में उनसे प्रश्न करूंगा, लेक्चर के समापन पर जब हजारों लोग मौजूद थे मैंने एक पर्चा भेज कर उसने सवाल करने की अनुमति मांगी, उन्होंने शफकत से अनुमति देदी, मैंने तसलीस के अकीदे के हवाले से यह पूछा कि खुदा की ज़ात को एक मानने के बावजूद हज़रत ईसा और हज़रत मरियम (अलैहस्सलाम) को खुदा की ज़ात के हिस्सा क्यों माना जाता है, खुदा पुलिंग है या स्त्रीलिंग? इस पहलु के बारे में ईसाईयों का अकीदा यह है कि वह पुलिंग है, ईसा (अलैहिस्सलाम) उसके बेटे हैं, और खुदा का बेटा जब खुदा से किसी की सिफारिश करता है तो खुदा अपने बेटे की सिफारिश अस्वीकार नहीं करता, दोसरी ओर पाक मरियम की ज़ात है, वह कायनात में हर प्रकार का तसर्रुफ़ रखती हैं, और खुदा उनकी सिफारिश को भी अस्वीकार नहीं करताl फादर माइकल से मैंने सवाल किया कि आखीर यह क्या पहेली है? क्या खुदा की ज़ात में निस्वानियत (औरत पने) का कोई पहलु पोशीदा है या खुदा की ज़ात मर्दाना सिफ़ात की हामिल है, फादर माइकल ने मेरे सवाल को बचकाना कह कर अनदेखा कर दिया, और मुस्कुरा कर कहने लगे कि मेरे पास कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न हैं जिनका उत्तर देना अधिक आवश्यक हैl

लेकिन मैंने जोर दिया की मेरे प्रश्न का उत्तर दिया जाए, मेरी बार बार की हस्तक्षेप से परेशान हो कर और लोगों के समर्थन से मजबूर हो कर फादर ने कहा कि खुदा की ज़ात बहुत सारी विशेषताओं का पैकर है, उसकी कुछ विशेषताओं में निस्वानियत मौजूद है, और कुछ विशेषताएं ऐसी हैं जो मर्दाना अंदाज़ की हैं, फादर की इस बात से मेरे मन में और प्रश्न उभरते गए और कई घंटे तक बहस चलती रही लेकिन बेकार, फादर माइकल मेरे प्रश्नों का उत्तर देने में असफल रहेl उनकी अंतर्दृष्टि और ज्ञान का जो गलबा मेरे दिमाग पर था वह समाप्त हो गया और मुझे ऐसा महसूस हुआ कि ईसाई धर्म की बुनियाद बिलकुल खोखली है, जो धर्म खुदा के कल्पना को भी व्यापक तरीके से पेश ना कर सके वह धर्म इंसानी दुनिया को क्या दे सकता है, इसकी शिक्षाएं किस प्रकार लागू करने के योग्य हो सकती हैं, इस सोच ने मुझे इस्लाम की ओर आकर्षित किया, इस्लाम ई दौलत मुझे मुफ्त में हासिल नहीं हुई, बल्कि इसे पाने के लिए मैंने ना जाने कितनी किताबों का अध्ययन किया है और कितना पसीना बहाया है, हक़ की तलाश में मैंने अपना खून ए जिगर लगाया है तब जा कर मुझे इस्लाम की दौलत मिली हैl एक जापानी महिला मिस लकाता ने अपने इस्लाम कुबूल करने की कहानी Root To Islam के शीर्षक से लिखी है, यह खातून फ्रांसीसी लिटरेचर की उच्च शिक्षा के लिए पेरिस में रह रही थीं, अक्सर जापानियों की तरह उनका भी कोई धर्म नहीं था, सारतिर नत्शे, कम्युस जैसे इल्हाद और दहरियत के मुबल्लिग उसके प्रिय दार्शनिक थे, लेकिन यह अजीब बात है कि मज़हब से बेगानगी के बावजूद उस महिला को मज़हबी अध्ययन का शौक था, किसी बातिनी रूहानी मतलब के लिए नहीं बल्कि सदाकत की तलाश में विभिन्न धर्मों के बारे में उनका अध्ययन जारी रहता था और यही शौक उन्हें इस्लाम की ओर ले आया, खुद लिखती हैं कि इस्लाम के संबंध में पहली किताब जिसका मैंने अध्ययन किया उसमें हिजाब को नार्मल अंदाज़ में स्पष्ट करते हुए कहा गया था कि अल्लाह पाक इसकी पुरजोर नसीहत करता है, अगर किसी ने हुक्म देने के अंदाज़ में कहा होता तो मैं इस हुक्म के खिलाफ अवश्य बगावत करती, इस्लाम का अर्थ है कि अल्लाह की मर्जी कुबूल कर लेना और उसके अहकाम की इताअत के लिए सर झुका देना, मुझ जैसी हस्ती के लिए जिसने बरसों किसी मज़हब के बिना जीवन व्यतीत की थी किसी हुक्म की तामील करना बड़ा कठिन काम था, यह केवल अल्लाह का क्रम है कि जीवन के इस मोड़ पर मेरी ख्वाहिशें सहज रूप से अल्लाह के मर्जी के अनुसार हो गईं और मैं इस्लामी फ़राइज़ को बिना किसी जबरदस्ती के एहसास के अदा करने के लायक हो गई, मैं अपने नए खोल में संतुष्ट थी, हिजाब केवल अल्लाह की इताअत ही की अलामत ना था बल्कि मेरे अकीदे का बरमला इज़हार था, एक मुसलमान औरत जो हिजाब पहनती है जनसमूह में भी पहचान के काबिल होती है, इसके उल्ट किसी गैर मुस्लिम औरत का अकीदा अक्सर शब्दों के माध्यम से बयान करने ही से स्पष्ट हो सकता है, मेरा हिजाब भी मेरी मुस्लिम शिनाख्त को बल देता हैl एक कम्युनिस्ट नवयुवती चीलिंग कम ने लिखा है कि मैंने होश संभालने के बाद गाँव में हर ओर लाल झंडे लहराते देखे जिन पर हथौड़ा और हंसिया बने हुए थे, मुझे मेरे माता पिता ने बतलाया कि हथौड़ा और हंसिया कम्युनिस्ट पार्टी की चिन्ह हैं, रूस में कम्युनिस्ट का शासन है, जो किसी धर्म को नहीं मानते, बल्कि नज़दीक हथौड़ा और हंसिया पवित्र हैं, यह दोनों चीजें मेहनत करने वालों को संदेश देती हैं कि उन्हें दिन रात मेहनत करके रोज़ी रोटी कमानी चाहिए क्योंकि जीवित रहने के लिए रोज़ी रोटी की सबसे अधिक आवश्यकता है, अगर रोज़ी रोटी मुयस्सर नहीं होगी तो जीवन बेकार है, लेकिन जब मैं बड़ी हो गई और पढ़ लिख गई तो मेरा वास्ता विभिन्न धर्म के लोगों से पड़ा, उनमें से एक मुसलमान थे मोहम्मद हादी हसन, जिन्होंने मुझे बताया कि कम्युनिज्म में रोटी, कपड़ा और मकान को सबसे अधिक महत्व दिया गया है, इसके आगे भी कुछ हो सकता है मुल्हिदों को इसकी खबर नहीं है, वह समझते हैं कि रोटी कपड़ा और मकान जीवन का गंतव्य हैं, लेकिन जीवन की यह कल्पना बहुत तुच्छ है, इस्लाम इसको स्वीकार नहीं करता, इस्लाम जीवन की उच्च मूल्यों पर विश्वास रखता है, रोज़ी रोटी और मकान के लिए दोसरे जीव भी चिंतित रहते हैं, आदमी के लिए आवश्यक है कि वह उच्च गुणों के साथ जीवन व्यतीत करे और जानवरों की तरह रोज़ी रोटी और मकान के लिए परेशान ना हो, यह सारी चीजें तो अल्लाह की तरफ से अता की जाती हैं, आदमी को अपनी सभी आवश्यकताओं के लिए असल बनाने वाले के आगे सर झुकाना चाहिएl

मोहम्मद हादी हसन की बातों ने मेरे दिल व दिमाग पर गहरा असर डाला, अल्लाह ने मेरे भाग्य में लिख दिया था कि मैं इल्हाद छोड़ कर इस्लाम में दाखिल हो जाऊं, अल्लाह ने मेरी मुश्किल आसान कर दी, आज मैं आमना हादी हसन के नाम से ब्रिटेन में इस्लामी शआयर के साथ जीवन व्यतीत कर रही हूँl एक अमेरिकी मैरी होल्ड ब्रोक्स जो जमाने में बदनाम ग्वांतना मोबे जेल में कैदियों की निगरानी पर नियुक्त थे मराकिश के एक कैदी अहमद अल रशीदी के असीर हो गए, एक अवधि तक बात चीत करने के बाद एक रात उन्होंने तुरंत इस्लाम कुबूल करने का फैसला किया और जेल की सलाखों के बीच से एक कलम और कागज़ अल रशीदी के हवाले करते हुए दरख्वास्त की कि वह उस पर शहादत का कलिमा अंग्रेजी और अरबी में लिख दें, कागज़ मिलते ही उन्होंने बुलंद आवाज़ के साथ शहादत का कलिमा पढ़ा और ग्वांताना मोबे कैद खाने के कैम्प डेलटिया में इस्लाम लाएl होल्ड ब्रोक्स ने जिनका इस्लामी नाम मुस्तफा है कई धार्मिक विषयों पर कैदियों से बात चीत की, वह कहते हैं कि मैंने उनसे विभिन्न विषयों जैसे फादर, क्रिसमस, हज़रत इसहाक और हज़रत इब्राहीम (अलैहस्सलाम) और कुर्बानी के मसले पर बात चीत की, यहाँ तक कि ईसा अलैहिस्सलाम के संबंध में भी बात चीत की, वहाँ मैं रूढ़िवादी कैदियों की ज़िन्दगी की हालत देख कर काफी प्रभावित हुआ, अधिकतर अमेरिकियों ने खुदा को बिलकुल फरामोश कर दिया था, जबकि उस स्थान पर (ग्वांतना मोबे के कैद खाने में भी) महरुसीन ने इबादत को जान का हर्ज़ बना रखा है, मुस्तफा अब २५ वर्ष के हैं, उन्होंने शराब पीने से तौबा कर ली है, वह यूनिवर्सिटी के पास एक इस्लामिक सेंटर में पांच वक्त की नमाज़ अदा करते हैं, मस्जिद के इमाम साहब ने जब नमाजियों से उनका यह परिचय कराया कि उन्होंने ग्वांताना मोबे में इस्लाम कुबूल किया है तो लोग जोश और जज़्बात में उनकी ओर मुसाफ़हे के लिए बढ़े, मस्जिद के इमाम अम्र अल्सनी कहते हैं कि मैं तो समझता था कि ग्वांताना मोबे में वहशी और दरिन्दे फौजी तैनात हैं, मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि वहाँ होल ब्रोक्स जैसे लोग भी हैंl अब्दुल वहाब जिनका पुराना नाम जोज़फ़ था न्यूयॉर्क की एक यहूदी कम्पनी में कर्मचारी हैं आपबीती में लिखते हैं कि मैं पुख्ता अकीदे का कैथोलिक ईसाई था, ईसाई समाज से मुझे बड़ी अकीदत थी, इसलिए मैं ईसाईयों की सभी गतिविधियों में बढ़ चढ़ कर भाग लिया करता था, मैं जिस कम्पनी में नौकर था वहाँ कुछ मुसलमान भी थे, मैं देखता था कि कम्पनी के मुसलमान कर्मचारी नौकरी का समाप्त होने के बाद आपस में मिल बैठ कर बात चीत करते हैं, जब नमाज़ का समय आता है तो उठ कर चले जाते हैं, रमजान के रोज़े रखते हैं, उनका आपसी संबंध और अकीदे में पुख्तगी देख कर मैं उनके धर्म में आकर्षण महसूस करने लगा, मैंने मुसलमानों से करीबी संबंध पैदा किये और इस्लाम को समझने की कोशिश की, कुछ दिनों के बाद इस्लाम ने मेरे दिल में घर कर लिया और मैंने इस्लाम कुबूल कर लियाl इस प्रकार की घटनाएं बहुत हैं और सूर्य की नई किरणों के साथ इनमें लगातार वृद्धि हो रहा है, कुछ नव मुस्लिमों की आपबीती छप भी रही हैं, अधिकतर ऐसे हैं जो इस्लाम में दाखिल हो चुके हैं लेकिन उन्होंने अपने तजुर्बे को अपनी ही ज़ात तक सीमित रखा है, हर व्यक्ति की दास्तान अलग अलग है, किसी को इस्लाम का अकीदा ए तौहीद पसंद है, किसी को अकीदा ए रिसालत अच्छा लगता है कोई जन्नत दोज़ख और मौत के बाद की ज़िन्दगी के कल्पना से प्रभावित है, किसी को इस्लाम के इबादत के निजाम से दिलचस्पी है, कोई इस्लाम की नैतिक शिक्षाओं पर फ़िदा है, किसी को इस्लाम का समानता का सिद्धांत अपील करता है, कोई इस्लाम के अता किये हुए इंसानी अधिकारों के हवाले से इस्लाम के करीब हुआ है, इस्लाम में हज़ारों खूबियाँ हैं और हर खूबी किसी ना किसी को पसंद है, है कोई ऐसा धर्म जो एक ही समय में इतने खूबियों का मजमुआ हो और जिसे उसके मानने वाले इंसानियत के हवाले करने में गर्व महसूस करते हों?

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