certifired_img

Books and Documents

Hindi Section (14 Jan 2016 NewAgeIslam.Com)



The Importance of Rendering Justice in Islam इस्लाम में न्याय करने का महत्व

 

 

 

नसीर अहमद, न्यु एज इस्लाम

2 अक्टूबर 2015

अब हम तर्क और साक्ष्य के आधार पर इस बात की समीक्षा करते हैं कि क्या अल्लाह की नजर में सभी मामलों में सही (सेक्युलर) न्याय करने से भी अधिक महत्वपूर्ण कोई अन्य जिम्मेदारी है?

अल्लाह ने गवाही दी कि उसके सिवा कोई पूज्य नहीं; और फ़रिश्तों ने और उन लोगों ने भी जो न्याय और संतुलन स्थापित करनेवाली एक सत्ता को जानते है। उस प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी के सिवा कोई पूज्य नहीं (३:१८)

उपरोक्त आयत को इस तरह भी पढ़ा जा सकता है: जिसे अल्लाह की, उसके वाहदानियत की, और उसके हिकमत वाला होने कि पहचान दी गई है, वह न्याय पर मजबूती के साथ क़ायम रह कर इस तरह का इल्म और उसकी गवाही या सबूत प्रदान करते हैं।

इस आयत पर भी विचार करें:

ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह के लिए गवाही देते हुए इनसाफ़ पर मज़बूती के साथ जमे रहो, चाहे वह स्वयं तुम्हारे अपने या माँ-बाप और नातेदारों के विरुद्ध ही क्यों न हो। कोई धनवान हो या निर्धन (जिसके विरुद्ध तुम्हें गवाही देनी पड़े) अल्लाह को उनसे (तुमसे कहीं बढ़कर) निकटता का सम्बन्ध है, तो तुम अपनी इच्छा के अनुपालन में न्याय से न हटो, क्योंकि यदि तुम हेर-फेर करोगे या कतराओगे, तो जो कुछ तुम करते हो अल्लाह को उसकी ख़बर रहेगी (४:१३५)

उपरोक्त आयत में पूर्ण धर्मनिरपेक्ष न्याय पर जोर दिया गया है, और अल्लाह का गवाह होने के एलावा अन्य सभी पहलुओं को नजरअंदाज किया गया है - अल्लाह से कुछ भी छिपा नहीं है और यहाँ तक कि उनके आंतरिक विचारों, इच्छाओं, पूर्वाग्रहों , बैर, प्यार या नफरत का भी फैसला किया जाएगा।

आयत 8: 5 में थोड़ा सा अलग शब्दों का प्रयोग हुआ है जहां आसानी से शब्द “शूहादाउल्लाह” इस्तेमाल (सूचीबद्ध) हो सकता था, लेकिन शूहादा बिल्क़िस्त शब्द का इस्तेमाल किया गया है. लेकिन संदर्भ फिर अल्लाह के लिए पूरे दृढ़ निश्चय के साथ आदर्श न्याय करने की तरफ इशारा कर रहा है।

ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह के लिए खूब उठनेवाले, इनसाफ़ की निगरानी करनेवाले बनो और ऐसा न हो कि किसी गिरोह की शत्रुता तुम्हें इस बात पर उभार दे कि तुम इनसाफ़ करना छोड़ दो। इनसाफ़ करो, यही धर्मपरायणता से अधिक निकट है। अल्लाह का डर रखो, निश्चय ही जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह को उसकी ख़बर हैं (५:८)

यह बात अब अच्छी तरह से स्पष्ट हो चुकी है कि न्याय किसी भी बाहरी स्थिति या कारण पर आधारित नहीं हो सकता है और उसे इस तरह से अंजाम दिया जाना चाहिए कि जो अल्लाह की दृष्टि में उचित हो, जिससे तुम्हारी मंशा और सोच छिपी नहीं है, और बाद में अल्लाह की बारगाह में तुम्हारी रेज़ा, और अल्लाह की वाहदानियत और उसके दिव्य गुण पर तुम्हारा विश्वास कितना है, यह सुबूत के तौर पर काम करेगा.

तौहीद की सिफ़त अल्लाह की दृष्टि में सभी को समान बनाता है, जिसका प्रदर्शन न्याय करने में किया जाना चाहिए। अल्लाह पर पूरा यक़ीन हर प्रकार की बुराई का विरोध करने में मदद करता है। बाहरी प्रभाव से प्रभावित होकर किया गया न्याय, अन्याय है। न्याय के विपरीत अत्याचार है। और यह सब बुराइयाँ शैतान की शहादत देती है। पूर्ण रूप से न्याय किया जाना अल्लाह और उसकी विशेषताओं का सबूत प्रदान करता है, और साथ ही साथ खुदा की बारगाह में यह फ़ैसले अल्लाह की रेज़ा और खुशी का कारण बनते हैं।

“हिकमत” की विशेषता दया की भावना के साथ न्याय करने की मांग करती है, इसलिए कि अल्लाह ने अपने लिए दया और क्षमा का कानून विशेष कर रखा है। दया के सिद्धांत से न्याय का उद्देश्य व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करते हुए समाज की भलाई को अधिक बढ़ावा देते हैं।

एक (दूसरी) आयत के एलावा लफ्ज़ शूहदा (गवाह) का उपयोग पूरे कुरान में गवाह के सामान्य अर्थों में किया गया है:

यदि तुम्हें आघात पहुँचे तो उन लोगों को भी ऐसा ही आघात पहुँच चुका है। ये युद्ध के दिन हैं, जिन्हें हम लोगों के बीच डालते ही रहते है और ऐसा इसलिए हुआ कि अल्लाह ईमानवालों को जान ले और तुममें से कुछ लोगों को गवाह बनाए - और अत्याचारी अल्लाह को प्रिय नहीं है. (३:१४०)

इस आयत से हमें यह बात भी समझ में आई कि आदर्श धर्मनिरपेक्ष इंसाफ़ करने से, अपने जीवन के विभिन्न परिस्थितियों में व्यक्ति अपने समर्पण और प्रतिबद्धता में स्थिरता से एक सच्चा मोमिन होने का सबूत पेश करता है। इस से उसके ईमान की हद का परीक्षण होता है। कई अनुवादों में इस आयत में इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द "शुहदा" का अनुवाद "शहीद" किया  गया है, लेकिन स्पष्ट रूप से इसका अर्थ यह नहीं है। एक घायल व्यक्ति के ईमान की परीक्षा एक मृतक की तुलना में अधिक कठिन होती है। इस आयत में सिर्फ इस बात को उजागर किया गया है कि एक सच्चा मोमिन जब किसी मुसीबत में गिरफ्तार होता है तो कैसे उन लोगों से अलग हो जाता है जिनके कदम मुसीबत के समय में डगमगाने लगते हैं।

इस आयत में लफ्ज़ "शहीद" का क्या मसला है?

कुरान इस आयत में शब्द "शहीद" शहीदों के लिए प्रयोग नहीं करता है। कुरान में ऐसी भी अन्य आयात हैं जो स्पष्ट रूप से उन लोगों का उल्लेख करती है जिनकी मौत अल्लाह के रास्ते में हुई है, लेकिन उनमें शब्द शहीदों या शहीद का उपयोग नहीं किया गया है, और ना ही  उनका प्रयोग किया जा सकता है इसलिए कि इस तरह के प्रयोग से कुरान का अर्थ विकृत हो जाता हैं।

जो लोग अल्लाह के रास्ते में लड़ते हैं और मारे जाते हैं उन्हें पुरस्कृत किया जाएगा, लेकिन उन्हें शहीद या शुहदा नहीं कहा गया है। हो सकता है कि ऐसा इसलिए हो क्योंकि लड़ाई, एक मामूली हालत में नहीं, बल्कि केवल असाधारण परिस्थितियों में एक जिम्मेदारी है। इसके अलावा ऐसे अन्य कारण भी हो सकते है जिनकी वजह से लोग लड़ते हैं जैसे: माल व दौलत, महिलायों से प्यार, मंसब, घृणा।  इसलिए निष्पक्ष लड़ाई में मारा जाना इस व्यक्ति की नीयत और मंशा का सबूत नहीं होता। बहरहाल, प्रचलित उपयोग और अवधारणाओं के विपरीत, कुरान मक़्तूलों के लिए शब्द "शहीद" का उपयोग नहीं करता है.

इसलिए, अल्लाह की विशेषताओं का  गवाह कहलाने योग्य एक सच्चा मोमिन सही और धर्मनिरपेक्ष न्याय करता है और अपने सभी परीक्षाओं और दुख व आलाम के दौर में भी प्रतिबद्धता और स्थिरता प्रस्तुत करता है। इसलिए यह एक मुसलमान की प्रमुख विशेषताएं हैं।

अगर कोई सबसे अच्छा काम है जो कि एक मुसलमान के ईमान का सबूत देता है तो वह है न्याय के लिए प्रतिबद्धता और स्थिरता प्रस्तुत करना , तो इसके विपरीत वह कौन सी प्रक्रिया है जो किसी के कुफ्र का सबूत है?  न्याय के लिए प्रतिबद्धता और स्थिरता प्रस्तुत करने के विपरीत किसी भी रूप में लोगों पर ज़ुल्म करना है।

अत्याचार के खिलाफ तब तक लड़ना एक कर्तव्य है जब तक न्याय और अल्लाह पर यक़ीन ग़ालिब न आ जाए, इसलिए कि दमन, हत्या से भी बदतर है। लेकिन अगर वह अपने ज़ुल्म व सितम से बाज आ जाएं तो उनके खिलाफ अपनी लड़ाई भी खत्म कर दो। (२: १९१-१९३)

अल्लाह और उसके दिव्य गुण में सबसे पुण्य या अच्छाई की प्रक्रिया सही न्याय करना है और अल्लाह के खिलाफ काफ़िर की सबसे स्पष्ट संकेत एक ज़ालिम का ज़ुल्म है।

एक बार फिर मैं इस बात को दोहराना चाहूंगा कि प्रचलित धारणाओं के विपरीत अल्लाह के रास्ते में लड़ने का उद्देश्य केवल अत्याचार और अत्याचारी का अंत करना है, यहाँ ज़ालिम और ज़ुल्म के ईमान से कोई सरोकार नहीं है। मैं ने निम्नलिखित लेख में इसी बात का अधिक विस्तार से विवरण किया है:

The Much Discussed and Debated Medinian Verses Relating To Fighting

http://www.newageislam.com/ijtihad,-rethinking-islam/naseer-ahmed,-new-age-islam/the-much-discussed-and-debated-medinian-verses-relating-to-fighting/d/102351

इसलिए, क्या न्याय को इस्लाम का मुख्य स्तंभ और बाकी पांच स्तंभों को इसके नीचे का स्तंभ नहीं ठहराया जाना चाहिए? यदि केंद्रीय स्तंभ को हटा दिया जाए तो तम्बू भी बाकी पांच सतूनों समेत धराशायी हो जाएगा। इस्लाम के शेष पांच स्तंभ भी कोई कम महत्वपूर्ण नहीं हैं इसलिए कि केंद्रीय स्तंभ भी खुद से खड़ा नहीं रह सकता। हालांकि पांच स्तंभ केवल ज़रूरी कारक (अवामिल) प्रदान करते हैं। एक सच्चे मुसलमान का निर्धारण करने वाला इस्लाम का मुख्य स्तंभ अल्लाह और उसके दिव्य गुणों का लोगों के सामने गवाही देना है, जिसके लिये वे सिर बसजूद होता है, वह न्याय मानदंड जिस के सहारे वह कार्य करता है। एक ज़ालिम अल्लाह और उसके गुणों से इनकार करता है और वह शैतान का एक प्रतिनिधि है।

URL for English article:  http://www.newageislam.com/islamic-ideology/naseer-ahmed,-new-age-islam/the-importance-of-rendering-justice-in-islam/d/104770

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/the-importance-of-rendering-justice-in-islam---اسلام-میں-انصاف-کرنے-کی-اہمیت/d/104812

URL for this article: http://www.newageislam.com/hindi-section/naseer-ahmed,-new-age-islam/the-importance-of-rendering-justice-in-islam--इस्लाम-में-न्याय-करने-का-महत्व/d/105979

New Age Islam, Islam Online, Islamic Website, African Muslim News, Arab World News, South Asia News, Indian Muslim News, World Muslim News, Womens in Islam, Islamic Feminism, Arab Women, Womens In Arab, Islamphobia in America, Muslim Women in West, Islam Women and Feminism,

 




TOTAL COMMENTS:-    


Compose Your Comments here:
Name
Email (Not to be published)
Comments
Fill the text
 
Disclaimer: The opinions expressed in the articles and comments are the opinions of the authors and do not necessarily reflect that of NewAgeIslam.com.

Content