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Hindi Section (30 Jun 2018 NewAgeIslam.Com)


The Jinnah Redux in AMU; This Time as a Farce अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जिन्ना पर एक बार फिर हास्यास्पद हंगामा

 

 

 

अरशद आलम, न्यू एज इस्लाम

12 जून, 2018

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय फिर से ख़बरों में हैl और इस बार उसकी वजह बियर का उपयोग करने पर वहाँ तीन छात्रों को सज़ा दिए जाने का मामला है! इस मामले की हकीकत यह लगती है कि: एक साझा मित्र के साथ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के तीन छात्रों ने बियर पी कर मौज मस्ती करने का फैसला कियाl रमजान के महीने में जबकि मुसलमान खाने पीने से रुके रहते हैं, इन छात्रों ने ना केवल यह कि इस निशेधता का उल्लंघन किया, बल्कि उन्होंने सोशल नेटवर्क साईट फेसबुक के माध्यम से इसका प्रचार करने का भी साहस कियाl

इन चित्रों की ख़ास तौर पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अन्दर जबरदस्त निंदा की गईl कुछ ऐसे छात्रों नें जिन्हें यह महसूस हुआ कि इससे उनका राजनीतिक कैरियर बन सकता है, उन तीनों छात्रों के खिलाफ एफ आई आर दर्ज करवा दियाl अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय प्रशासन अब तक उन छात्रों के बारे में चुप है जिन्हें विश्वविद्यालय के विभिन्न सांस्कृतिक कलबों से निलंबित कर दिया गयाl एफ आई आर एक खबर की तरह फ़ैल गई और सोशल मीडिया पर मुस्लिम बिरादरी की ओर से उन छात्रों के खिलाफ एक ज़बरदस्त प्रतिक्रिया देखने को मिलीl कुछ लोगों ने तो यहाँ तक कह दिया कि उन्हें कुफ्र व इर्तेदाद का मुर्तकिब करार देकर क़त्ल कर दिया जाना चाहिएl बहर हाल वह तीनों छात्र अपने फोन बंद करके अभी छिपे हुए हैं और उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स बंद कर दिया हैl इतने सख्त दबाव के माहौल में उन्हें लिबरल वर्ग की भी कोई हिमायत हासिल नहीं हैl उनके दोस्त अचानक दुश्मन बन चुके हैं, और इससे बुरा क्या हो सकता है कि वह अपनी ही बिरादरी में अपमानित हो कर रह गए हैंl

कुछ हफ्ते पहले अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने अपने छात्र यूनियन की दिवार पर जिनाह के चित्र का जैम कर बचाव कियाl तथापि, जिनाह के दोष के मसले को भारत बटवारे के दायरे में रखने के बजाए उन्होंने उनके बचाव में तरह तरह के बहाने बनाए और हिन्दू अतिवादी संगठनों के विरोध प्रदर्शन के बाद पुलिस हिंसा पर अपनी ऊर्जा खर्च कीl इस बात का उद्देश्य यह है कि उन्हें स्पष्ट तौर पर यह बयान देना चाहिए था कि: भारत के बटवारे के लिए केवल जिनाह को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकताl उस समय सत्ता में यह तीन खिलाड़ी थे: कांग्रेस, मुस्लिम लीग और ब्रिटेनl इसलिए, भारत के बटवारे के लिए इन तीनों को जिम्मेदार ठहराया जाना आवश्यक है इसलिए कि वह उसे रोकना चाहते तो रोक सकते थेl

इसके बजाए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय मिश्रित बहस का शिकार हुई और उसने यह साबित करने के लिए इतिहास के पन्ने पलटने शुरू कर दिए कि हिन्दू अतिवादियों का भी यही सिद्धांत था, इसलिए बटवारे के लिए उन्हें भी आरोपी ठहराया जाना चाहिएl जबकि बात यह है कि उस समय प्रमुख शक्तियों के मुकाबले में हिन्दू अतिवादी संगठनों की शक्ति सामान्य थी, इसलिए बटवारे के लिए उन्हें ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकताl

हर संकट अपने साथ एक मौक़ा भी लेकर आता हैl अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बे आधुनिक इतिहास में जिनाह की हैसियत पर निष्पक्ष बहस का एक शानदार मौक़ा खो दियाl लेकिन जैसा कि हम सब जानते हैं कि जिनाह की ज़िद पौराणिक थीl अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने उनके लिए जो रवय्या अपनाया उससे असंतुष्ट हो कर जिनाह का भुत अब मौजूदा संकट की शकल में दोबारा हमारे सामने हैl जिनाह को अपनी शराब से प्यार था और उन्हें यह देखना होगा कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय अपने मौजूदा बियर संकट को नई व्यस्तताओं के लिए एक मकालमाती मौके में किस तरह परिवर्तित करती हैl

अब तक अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अधिकारियों की प्रतिक्रिया बिलकुल हास्यास्पद रही हैl उन्हें विभिन्न सांस्कृतिक क्लबों से हटाने के रूप में उन छात्रों को सज़ा देकर यूनिवर्सिटी ने संस्कृति के दृष्टिकोण को उलट पलट कर दिया हैl महत्वपूर्ण बात यह है कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी अपनी पिछली गलतियों से कोई सबक सीखने के लिए तैयार नहीं हैl

कई सालों पहले की बात है कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में सीरस नामक एक प्रोफेसर थे जिनके उपर यूनिवर्सिटी ने केवल इसलिए अनुशासनात्मक कार्यवाही की थी कि वह समलैंगिक (gay) थे जिसके बाद रहस्यमय हालत में उन्हें मुर्दा पाया गया थाl प्रोफ़ेसर सेरस को जान बूझ कर और आपराधिक तौर पर जिन छात्रों ने धमकी दी थी उन्हें यूनिवर्सिटी से निकालने के बजाए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अधिकारियों ने एक ऐसे अध्यापक को नैतिकता का पाठ पढ़ाना शुरू कर दिया जो कई तरीकों से महरूमियत का शिकार थेl

ऐसा ही कुछ अब फिर होता दिखाई दे रहा हैl छात्रों के एक वर्ग के इस हिंसक रवय्ये की निंदा करने में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अधिकारियों की असफलता को उनके इस रवय्ये की तस्दीक कल्पना किया जाएगाl खामोश रह कर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अधिकारी आज अपने ही तीन छात्रों को धमकी देने और उन्हें चुप करने में खुद शामिल हैंl अगर ज़बरदस्त दबाव के तहत वह आत्महत्या कर लेते हैं या कैम्पस वापस आने के बाद उनके साथ किसी तरह की मार पपीत की जाती है तो इसके लिए केवल और केवल अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अधिकारी जिम्मेवार होंगेl

यह बात कोई ढकी छुपी नहीं है कि मुसलमान अपने पेय से आनंदित होते हैंl अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अंदर ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो ऐसा करते हैंl वहा ऐसे लोग हैं जो रमज़ान के दौरान पीना छोड़ देते हैंl और वहाँ ऐसे लोग भी हैं जो ऐसा नहीं करतेl वहाँ ऐसे लोग भी हैं जो रमज़ान के दौरान दिन में रोज़े रखते हैं लेकिन शाम में पीते हैंl मुझे विश्वास है कि जो लोग इन युवा बालिगों के इस गैर मज़हबी और “असभ्य” रवैय्ये के खिलाफ विरोध कर रहे हैं वह अच्छी तरह यह बात जानते हैंl इसलिए, इन तीन छात्रों को ही निशाना क्यों बनाया गया? ऐसा लगता है कि समस्या पीने का नहीं हैं लेकिन समस्या इसका खुले तौर पर इज़हार करने का हैl दुसरे शब्दों में अगर बयान किया जाए तो मामला यह है कि इन छत्रों को पीने के लिए सज़ा नहीं दी जा रही है बल्कि इसके बारे में उन्हें एहतियात से काम ना लेने की सज़ा दी जा रही हैl अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को यह फैसला करने की जरूरत है कि क्या वह एक ऐसी संस्कृति को बढ़ावा देना चाहते हैं जहां मुनाफिकाना रवय्ये पर इनाम मिले और इमानदारी के लिए सज़ा मिलेl

असल में सबसे बड़ा मसला मतभेद और अंतर की गुंजाइश का है जो कि सभी बिरादरियों को अपने अन्दर पैदा करना चाहिए, और ख़ास तौर पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी जैसी जगहों में इसके लिए माहौल जरुर अनुकूल होना चाहिएl मुस्लिम समाज के अन्दर एक महत्वपूर्ण संस्था की हैसियत से अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष में सबसे आगे होना चाहिएl इसलिए कि जब बोलने की आज़ादी सल्ब की जाती है तो इससे अल्पसंख्यक बिरादरियां पिछड़ी जातियां ही प्रभावित होती हैंl इतिहास से हमें यह सबक मिलता है कि यह खुद अल्पसंख्यकों के हक़ में है कि वह आज़ादी के वाहक बनेंl लेकिन आज हम जो कुछ देख रहे हैं वह इसके बिलकुल विपरीत हैl

मुस्लिम समाज को तेज़ी के साथ इस बात का विश्वास हो चला है कि मुसलमान के रवैये को संगठित करने की आवश्यकता हैl निश्चित रूप से अपने समुदाय के अन्दर इन मूल्यों को बढ़ावा दिए बिना कोई भी अपने समाज में बड़े पैमाने पर आज़ादी और लोकतंत्र की उम्मीद नहीं कर सकताl अधिक चिंताजनक बात यह है कि मुसलमान खुद को केवल एक धार्मिक समुदाय के तौर पर पेश करने के लिए चिंतित हैंl अगर फिकही रवैयों की सीमाओं का निर्धारण करना शुरू कर दे तो अधिकारों की भाषा पहला संकट बन जाती है और समाज का मज़ाक बनता रहता हैl

ऐसी बहुत सारी समस्या हैं जिन के बारे में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को चिंतित होना चाहिएl और रमज़ान के दौरान कुछ छात्रों के शराब पीने और उसके प्रचार करने पर उसे कम ध्यान देना चाहिएl

URL for English article: http://www.newageislam.com/islam-and-politics/arshad-alam,-new-age-islam/the-jinnah-redux-in-amu;-this-time-as-a-farce/d/115521

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URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/arshad-alam,-new-age-islam/the-jinnah-redux-in-amu;-this-time-as-a-farce--अलीगढ़-मुस्लिम-विश्वविद्यालय-में-जिन्ना-पर-एक-बार-फिर-हास्यास्पद-हंगामा/d/115684

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