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Hindi Section (11 May 2016 NewAgeIslam.Com)



Wahhabi Influence on the Indian Understanding of Islam इस्लाम की भारतीय समझ पर वहाबी असर

 

इंजीनियर शुजाअत अली क़ादरी

भारत सूफ़ी संतों का देश है जहाँ हिन्दू और मुसलमान मिलकर रहते हैं। देखा जाए तो हिन्दू समुदाय के दिल में सूफ़ी फ़क़ीरों के लिए जो अक़ीदत है, वह मुसलमानों के कमतर नहीं। आप अजमेर में ख़्वाजा के दरबार में चले जाइए,आपको लगेगा जैसे हिन्दू मुस्लिम एकता का मेला लगा है। सिख, ईसाई,दलित और बौद्ध भी उसी श्रद्धा से आते हैं और ग़रीब नवाज़ से अपनी फ़रियाद लगाते हैं। यह बात मुझे पिछले दिनों दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम और जयपुर में एक शानदार सूफ़ी सम्मेलन के बाद आयोजनकर्ता तंज़ीम उलामा ए इस्लाम के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना मुफ़्ती अशफ़ाक़ हुसैन क़ादरी ने कहीं।

आपको ऐसी सैकड़ों कहानियाँ मिल जाएंगीं जो अन्तरविश्वास से जुड़ी हों और हिन्दू-मुस्लिम एकता की आज भी सबसे बड़ी वजह है। लेकिन सवाल यह उठता है कि इस्लामी आतंकवाद के लिए ज़िम्मेदार घोर वहाबीकरण कीनियोजित मुहिम के आगे यह एकता कितने दिन टिक पाएगी? इसमें बड़ा ख़तरा वहाबीकरण का है क्योंकि यह जितना रियाद में पाया जाता है कि उतना ही इस्लामाबाद में है, जितना दोहा में है उतना ही क्वालालम्पुर,जकार्ता, वॉशिंगटन और बेशक दिल्ली में है।

भारत में इस्लाम पर सबसे अधिक किताबें लिखी गई हैं। पिछले सौ सालों तक भारतीय सुन्नी सूफ़ी समुदाय ने लाखों किताबों की रचना की जो इस्लाम के उदारपंथ सुन्नत वल जमात या सूफ़ीवाद पर आधारित हैं। भारत में वहाबी नियोजित विचारधारा का पोषण पहले स्वतंत्रता संग्राम के निष्फल होने के बाद शुरू हुआ। वर्तमान तुर्की से सात सौ साल राज कर चुकी उस्मानिया ख़िलाफ़त को अंग्रेज़ जब किसी हाल में नहीं हरा सके तो उन्नीसवीं शताब्दी में वर्तमान सऊदी अरब में उन्होंने अलसऊद परिवार को चयन किया जो उस ज़माने में हाजियों से लूटपाट करने वाले एक डाकू गिरोह की तरह काम करता था। अलसऊद के तत्कालीन डाकू अब्दुल अज़ीज़ से ब्रिटेन ने सम्पर्क कर मदद की पेशकश की लेकिन अब्दुल अज़ीज़ इलाक़े जीत जाने पर भी जनता के विद्रोह की आशंका से परेशान था। इसके लिए ब्रिटेन ने उसे पूर्ववर्ती ब्रिटेनपरस्त लेखक इब्न अब्दुल वहाब की विचारधारा के मदरसे साथ में स्थापित करने का सुझाव दिया। इब्न अब्दुल वहाब के नाम से ही इसकी विचारधारा को ‘वहाबियत’ या ‘Wahabism’ कहा जाता है।अब्दुल अज़ीज़ को इस वैचारिक हथियार की ज़रूरत थी जिससे वह अपने अधीन जनता को यह डराने में कामयाब हो गया कि यदि मुसलमान उदार है तो वह काफ़िर है। उस्मानिया ख़िलाफ़त लगातार ब्रिटिश और फ़्रेंच हमले और दक्षिणी अरब में अलसऊद के नियोजित हमलों से ढह गई। भारत में उदार सुन्नी समुदाय ने इसके विरोध में मौलाना मुहम्मद अली जौहर की अगुवाई में ‘ख़िलाफ़त आन्दोलन’ चलाया जिसे महान् स्वतंत्रता सेनानी महात्मा गांधी ने भी समर्थन दिया था। गांधी समझते थे कि जितने ख़तरनाक अंग्रेज़ हैं उतने ही ख़तरनाक वहाबी भी हैं। आमतौर पर यह ग़लतफ़हमी पाई जाती है कि ख़िलाफ़त का अर्थ विरोध होता है लेकिन इसका सही शाब्दिक अर्थ ‘ख़लीफ़ा का राज’ होता है। पूरे विश्व में वहाबी विचारधारा के विरुद्ध पहला फ़तवा भारत से आया था। भारतीय मुसलमानों ने इस ख़तरे को तभी पहचान लिया था लेकिन अरब के लोग इस ख़ौफ़ में आ गए कि अगर उन्होंने वहाबी विचारकों की बात को नहीं सुना तो वह मुसलमान नहीं रहेंगे। वहाबी की 'फ़तवा राजनीति' का सूत्रपात यहीं से शुरू हुआ जिसने आज इस्लाम को बेशुमार बदनामी दिलवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

सन् 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम को दबाने के दौरान अंग्रेज़ों को इस बात का अनुभव हो गया कि भारत पर लम्बे वक़्त तक क़ाबिज़ रहने के लिए उन्हें दो चीज़ों की फ़ौरन आवश्यकता है। पहला हिन्दू-मुस्लिम एकता को तोड़ना और दूसरे मुसलमानों के बीच एक ऐसी विचारधारा को पोषित करना जो ख़ुद अपने समाज के ख़िलाफ़ काम करे। उस्मानिया ख़िलाफ़त के इलाक़ों के बँटवारे के दौरान अंग्रेज़ों ने अरब के पवित्र मक्का और मदीना के इलाक़े ‘हिजाज़’ के साथ नज्द और रबीउल ख़ाली का इलाक़ा मिलाकर इसे अलसऊद परिवार को दे दिया और इसका नामकरण एक डाकू परिवार के नाम पर किया यानी ‘सऊदी अरब’। दरअसल पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब को हिजाज़ नाम ही पसंद था और अलसऊद के सत्ता में आने से पहले तक हिजाज़ पर उस्मानिया ख़िलाफ़त या उससे पहले किसी भी इस्लामी हुकूमत में दुनिया भर के मुसलमानों की सहमति से क़ानून चलता था क्योंकि मक्का को अल्लाह का और मदीना को पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब का शहर माना जाता था। चूँकि हर मुसलमान पर पाँच फ़र्जों में आख़िरी हज भी है जो इस बात की तस्दीक़ करता है कि इस्लाम के इन पवित्र स्थलों के जोड़े यानी‘हिजाज़’ पर समहति का क़ानून चलेगा। लेकिन अपने लुटेरी प्रवृत्ति के अनुरूप अलसऊद ने हिजाज़ को निजी सम्पत्ति बनाकर क़ानूनन हाजियों को लूटना शुरू किया। यह लूट ही तो है कि हर साल हज लगभग 20 फ़ीसदी महंगा हो जाता है जिसे भारत की हज कमेटी भी सही ठहराती है क्योंकि उस पर भी वहाबी क़ब्ज़ा है। इतना ही नहीं आज इन दोनों शहरों में मिलाकर इस परिवार ने लगभग 900 पवित्र स्थलों को ध्वस्त कर दिया है और यह पूरी दुनिया के इस्लामी विरासत के भी गुनहगार हैं।

दरगाह ख्वाजा गरीब नवाज़ अजमेर के गद्दीनशीन और अंजुमन कमेटी के महासचिव मौलाना सय्यद वाहिद हुसैन चिश्ती बताते हैं कि अलसऊद ने पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद के मदीना के मकान, पत्नी ख़दीजा की पत्नी का मकान, उनके साथी हज़रत अबू बक्र का मकान ही नहीं तोड़ा बल्कि बेशुमार क़ब्रों के निशान भी मिटा दिए। हज़रत अली की पत्नी और पैग़म्बर की बेटी हज़रत फ़ातिमा, उनके पुत्र हज़रत हसन और ख़लीफ़ा हज़रत उस्मान की क़ब्रों को सपाट कर दिया है। भारत समेत दुनिया के लगभग हर मुस्लिम बहुल देशों में इस सांस्कृतिक नरसंहार के विरुद्ध बड़े बड़े प्रदर्शन हुए लेकिन अलसऊद ने किसी की परवाह नहीं की।

हाल ही में इराक़ में आईएसआईएस के लिए काम करते हुए कल्याण,महाराष्ट्र के एक लड़के आरिफ़ और अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के लिए एक युवा भटकल के मारे जाने के बाद यह सवाल उठना लाज़िमी है कि जिस भारत ने वहाबियत के विरुद्ध सबसे पहली और बड़ी मुहिम चलाई क्या उसकी ज़मीन में इतना ज़हर फैल चुका है कि वहीं से नौजवान वहाबी जिहादी चक्की में पिसने ख़ुद जा रहे हैं। ख़ुफ़िया एजेंसियों ने ऐसे और 17लड़कों की पहचान की है जो वर्तमान में इराक़ में आईएसआईएस के लिए लड़ रहे हैं। जिस समाज ने अंग्रेज़ों के सत्ता मे रहने के दौरान इतना विशाल वहाबी विरुद्ध मुहिम चलाई वहाँ से वहाबी लड़ाकों का निकलना किसी अचरज से कम नहीं।

मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ इंडिया यानी एमएसओ के राष्ट्रीय अध्यक्ष सय्यद मुहम्मद क़ादरी ने बताया कि लगभग 20 करोड़ से अधिक भारतीय मुसलमान आबादी का 90 प्रतिशत सुन्नी है और इस 90 प्रतिशत का बमुश्किल 10 फ़ीसदी वहाबी है। यह आंकड़ा तब है जब अंग्रेज़ 1857से प्रायोजित वहाबी कार्यक्रम भारत में शुरू करके गए जिसका नतीजा पहले बंटवारे, दंगों के रूप में देखा गया और आज आईएसआईएस या अलक़ायदा के लिए काम कर रहे लड़कों के रूप में सामने है। दरअसल भारतीय राजनीतिज्ञों और नौकरशाही को इस बात की ख़बर ही नहीं है कि वहाबी तंत्र कैसे काम करता है?

भारत सरकार द्वारा हाल ही में गठित की गई सेंट्रल वक़्फ़ कौंसिल यानी सीडब्लूसी के सदस्य और वक़्फ़ बचाने की अखिल भारतीय मुहिम 'ईमान'संस्था के संस्थापक अध्यक्ष इंजीनियर मुहम्मद हामिद का मानना है कि कुछ समझ की कमी और कुछ विदेशी रिश्वत ने भारत के इस्लामी जगत को बहुत नुक़सान पहुँचाया है। इसका उदाहरण देते हुए हामिद कहते हैं कि भारत के वक़्फ़ बोर्डों पर लगभग सऊदी अरब परस्त वहाबी नौकरशाही और राजनीतिक नियुक्तियों का क़ब्ज़ा है। सऊदी अरब और उसके भारतीय एजेंट जानते हैं कि एक वक़्फ़ बोर्ड हाथ आने पर उन्हें दो चीज़ें हाथ लगती है।

पहला वक़्फ़ बोर्ड की मस्जिदों की इमामत जहाँ से ज़हर आसानी से फैलाया जा सकता है और दूसरे पुरानी वक़्फ़ मस्जिदों में बैठने से इन इमामों और इनके वहाबी आक़ाओं को वैधानिकता मिल जाती है जिसका फ़ायदा यह राजनीतिक और नौकरशाही रसूख बनाने में उठाते हैं। इंजीनियर हामिद का कहना है कि धर्म प्रचार के नाम पर सऊदी अरब के पैसों पर घूमने वाले एजेंटों को इन्हीं मस्जिदों में पनाह मिलती है जिससे वह अपना धंधा चलाते हैं। वह कहते हैं हज कमेटियों और मुस्लिम कल्याण की योजनाओं पर क़ब्ज़ा करने से वो दोहरा लाभ उठाते हैं। एक सऊदी अरब की कृपा से वहाबी मुहिम चल रही है और दूसरी राजनीतिक पनाह से धंधा को वैधानिकता भी मिल जाती है। रह गई 90 प्रतिशत बहुसंख्यक उदार सुन्नी सूफ़ी और शिया आबादी जिसकी उनको फ़िक्र नहीं।

पूरी दुनिया में आज वहाबी फ़िक्र के लिए समझ का विस्तार हो रहा है। चेचेन्या के राष्ट्रपति रमज़ान कादिरोव इसके पंडित माने जाते हैं मिस्र,कोसोवो, तुर्की, सीरिया, बांग्लादेश, इंडोनेशिया और पाकिस्तान में उदारपंथ वहाबी तंत्र के ख़िलाफ़ खड़ा हो रहा है।

ऑल इंडिया तंज़ीम उलामा ए इस्लाम ने इन्हीं मुद्दों पर पिछले साल मानसून में दिल्ली के रामलीला मैदान में महारैली का आयोजन किया था जिसमें लाखों लोग शरीक़ हुए लेकिन सरकार को इन बातों से कोई सरोकार नहीं। जब सरकारी संस्थाओं में वहाबी वक़्फ़, हज और यूनिवर्सिटी के सिलेबस और सिस्टम में बैठे हैं तो वहाबी विचारधारा के संस्थानीकरण के विरुद्ध सार्थक लड़ाई कैसे लड़ी जा सकेगी। तंज़ीम उलामा ए इस्लाम के संस्थापक मुफ़्ती अशफ़ाक़ क़ादरी पूछते हैं‘हमारी उदार सुन्नी सूफ़ियों की अनपढ़ समझी जाने वाली करोड़ों की भारतीय आबादी को इस बात का शऊर है कि वहाबियत कितनी ख़तरनाक है, क्या ये सियासयदाँ और अफ़सर नहीं समझते?’

क़ादरी, मुस्लिम स्टूडेंट्स आर्गेनाईजेशन ऑफ़ इंडिया, के राष्ट्रीय महासचिव हैं.

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/engineer-shujaat-ali-qadri/wahhabi-influence-on-the-indian-understanding-of-islam--इस्लाम-की-भारतीय-समझ-पर-वहाबी-असर/d/107260

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  • i really feel good to read this article 
    By Shakeel Ahmed - 6/23/2016 6:22:42 PM



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