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Hindi Section (01 Aug 2018 NewAgeIslam.Com)


Why are Islamic countries not coming forward to take Rohingyas? इस्लामी देश रोहंगिया मुसलामानों की सहायता के लिए आगे क्यों नहीं आ रहे हैं? क्या मानवाधिकार केवल मुसलामानों के लिए है?

 

 

 

गुलाम रसूल देहलवी, न्यू एज इस्लाम

10 सितंबर 2017

टाइम्स नाउ Times Now (रोहंगीय बहस, 9/9/17) में एक हाल के बहस में न्यू एज इस्लाम के फाउन्डिंग एडीटर जनाब सुलतान शाहीन ने पैनल के सम्मीलित लोगों के सामने एक बहुत महत्वपूर्ण और आवश्यक प्रश्न यह पेश किया कि जब पाकिस्तान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, मलेशिया, सऊदी अरब और मिस्र जैसे तथाकथित इस्लामी देशों और मुस्लिम विश्व के दुसरे भागों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को पुर्णतः रौंदा जाता है तो भारतीय मुस्लिम रहनुमा मूक दर्शक क्यों बने रहते हैं? जैसा कि, उन्होंने इस बात का संकेत किया कि हर साल हज़ारों हिन्दू लड़कियों का अपहरण किया जाता है, उन्हें जबरदस्ती इस्लाम कुबूल करवाया जाता है और उनके अपहरणकर्ता उनके साथ निकाह के नाम पर बलात्कार करते हैंl इन सब बातों पर इन भारतीय मुसलामानों के बीच गुस्सा क्यों नहीं फूटता जब वह निश्चित रूप से भारत और दुसरे स्थानों पर मुसलामानों के नरसंहार और उन पर हिंसा के दुसरे घटनाओं के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन करते हैंl उन्होंने पैनल में शामिल मुस्लिम रहनुमाओं को यह बताया कि बन्दों के हक़ (खुदा के बनाए हुए जीव, और केवल मानव ही नहीं बल्कि जानवर और पौदों के अधिकार) का भी इस्लाम में एक महत्वपूर्ण स्थान हैl उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि क्या हम यह भूल चुके हैंl

जनाब सुलतान शाहीन ने यह भी कहा कि “मानवाधिकार अविभाज्य हैं इसी लिए मानवाधिकार को मुसलामानों के लिए विशेष नहीं किया जा सकताl इसलिए, अगर भारत रोहंगिया मुसलामानों को म्यांमार भेज देता है तो यह एक विडंबना होगी, जिस प्रकार क्यूबा और अमेरीका ने हिटलर के अत्याचारों से भागने वाले 900 से अधिक यहूदियों पर आधारित समुद्री जहाज को 13 मई 1939 में अनदेखा करके उन्हें मौत के मुंह में डाल दिया था (जिनमें से कम से कम 250 लोगों को नाजी जर्मनी फ़ौज ने मौत के घाट उतार दिया था), इसी प्रकार मुसलामानों को भी यह महसूस करना होगा कि हमारी मानवीय और धार्मिक जिम्मेदारी है कि हम मुस्लिम देशों और ख़ास तौर पर पाकिस्तान और सऊदी अरब जैसे देशों में जो कि इस्लामी होने का दावा करते हैं गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर ढाए जाने वाले अत्याचारों के विरुद्ध भी विरोध की आवाज़ बुलंद करेंl”

न्यू एज इस्लाम के एडीटर जनाब सुलतान शाहीन ने प्राइम टाइम टीवी के बहस में एक और महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठाया कि क्यों इस्लामी देश रोहंगिया मुसलामानों को पनाह देने के लिए आगे नहीं आ रहे हैं? उन्होंने कहा कि “सीरिया के शरणार्थियों को जर्मनी और दुसरे योरोपियन देशों ने पनाह दी है लेकिन मुस्लिम देश उन्हें शरणार्थी का स्थान देकर भी उनकी सहायता नहीं कर रहे हैंl यह वास्तव में वैश्विक मुस्लिम बिरादरी के लिए एक सामूहिक रूप से अपमान की बात है कि इस्लामी देश रोहंगिया शरणार्थियों से अपना मुंह मोड़ रहे हैं”l और उनकी इस बात का समर्थन पैनल में सम्मिलित एक और सक्रिय कार्यकर्ता शबनम लोन ने इस बहस के दौरान कीl

जनाब सुलतान शाहीन ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि “भारत के पास अतीत की घटनाओं के मद्देनजर जायज सुरक्षा भय हैं और हमें संसाधनों की कमी का भी सामना है लेकिन हम यह भी नहीं भूल सकते कि भारत में सभ्यता व संस्कृति और अब लोकतंत्र की एक पुरानी परम्परा रही है और हमने सभी जगहों से आने वाली मज़लूम अल्पसंख्यकों की हमेशा सहायता की है और उनका स्वागत किया हैl और यही बात हमारे देश को सुन्दर बनाती हैl जरूरतमंद लोगों की सहायता करना हमारा संस्कार हैl

जारी रोहंगिया संकट में मानवाधिकार का गंभीर उल्लंघन करने के लिए म्यांमार को अत्यधिक आलोचना का निशाना बनाया जा रहा हैl ऐसा माना जा रहा है कि म्यांमार में मानवता समाप्त होने के कगार पर हैl महिलाओं और बच्चों का नरसंहार किया जा रहा है, और बेगुनाह युवकों और वृद्धों को एक संगठित तरीके से निशाना बनाया जा रहा हैl इस  नाजुक मोड़, रोहंगिया शरणार्थियों को देश से निकालने के भारत सरकार के स्टैंड ने अनेकों सम्याएं खड़ी कर दी हैं और सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ह्युमन कमीशन की तरफ से तहक़ीक़ाती प्रश्न का सामना हैl उनके देश निकाला के इस योजना ने भारतीय मुस्लिम रहनुमाओं, बुद्धिजीवियों और ख़ास तौर पर उन उलेमा के बीच एक तनाव का माहौल पैदा कर दिया है जो रोहंगिया मुसलामानों के लिए सहानुभूति का जज़्बा रखते हैंl उनके लिए यह समझना कठिन है कि जिस देश ने अपने आरम्भ से ही शरणार्थियों का स्वागत किया है वह इन 40 हज़ार रोहंगिया शरणार्थियों को किस प्रकार बाहर निकाल सकता है जो इस समय विश्व की सबसे अधिक पीड़ित अल्पसंख्यक हैं!

ऑल इंडिया उलेमा व मशाइख बोर्ड के संस्थापक व अध्यक्ष मुहम्मद अशरफ काछौछवी ने कहा कि भारत सरकार को इन बेगुनाह शरणार्थियों को आश्रय उपलब्ध कराना चाहिए जो अपने जीवन व गरिमा की सुरक्षा के लिए की ओर आशा की दृष्टि से देखते हैंl उन्होंने न्यू एज इस्लाम को बताया कि भारत ने सदैव पूरी दुनिया से बेघर शरणार्थियों को बचाने का प्रयास किया हैl और जिस प्रकार हमारे पड़ोसी देश बांग्लादेश ने मानवीय आधार पर प्रभावितों के लिए नए द्वार खोले हैं उसी प्रकार भारत को भी रोहंगिया शरणार्थियों की सहायता के लिए आगे आना चाहिएl

एक प्रसिद्ध सूफी कार्यकर्ता सैयद सलमान चिस्ती, गद्दी नशीन दरगाह अजमेर शरीफ ने न्यू एज इस्लाम से कहा कि: “अतिथि देवो भवः (मेहमान खुदा की तरह है) राजनीति का केवल नारा मात्र नहीं हैl बल्कि यह भारत की एक मजबूत सभ्यता हैl“ उन्होंने आगे कहा है कि “वसुधैव कुटुम्बकम” (पूरी दुनिया एक ही खानदान है)” सभी भारतीय नागरिकों का एक पक्का विश्वास है जो इस बात का संकेत है कि हम पुरी दुनिया को एक ही खानदान मानते हैंl

इसलिए, रोहंगिया शरणार्थियों को देश से बाहर करने के सरकार के निर्णय को इस देश की विरासत “वसुधैव कुटुम्बकम” (पुरी दुनिया एक ही खानदान है)” के विरुद्ध समझा जा रहा है, अधिकतर भारतीय मुसलमान यह महसूस करते हैं कि सभी रोहंगिया शरणार्थियों को देश से निकालने का सरकार का कदम “नैतिक तौर पर बहुत अवांछित” हैl      

लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न जिसे इस संदर्भ में अनदेखा किया गया है कि: मुस्लिम देश व्यथित रोहंगिया मुसलामानों के लिए सहानुभूति क्यों महसूस नहीं करते? उन्होंने शाम, ईराक, लीबिया, सोमालिया और दुसरे युद्धग्रस्त देशों के भी बहुत पीड़ित अरब मुस्लिम शरणार्थियों को पनाह प्रदान नहीं किया हैl “Left Out In The Cold” के शीर्षक से मानवीय अधिकारों का संगठन एमेंसी इंटर नेशनल कुआप्रेशन काउंसिल की 2014 की एक रिपोर्ट के अनुसार, जिसमें सऊदी अरब, बहरीन, कुवैत, क़तर, अमान और संयुक्त अरब अमारात जैसे देश भी सम्मिलित हैं, जब से वहाँ 2011 में संकट शुरू हुआ है तब से उन्होंने सरकारी तौर पर एक भी सीरियाई शरणार्थियों को शरण नहीं दिया हैl

वह मुस्लिम देश जिनकी गिनती संपन्नतम इस्लामी देशों में होता है वह मुस्लिम आप्रवासियों और शरणार्थियों को बड़े स्टार पर आर्थिक सहायता प्रदान करते हैंl हाल ही में तुर्की ने भी म्यांमार में हिंसा से भागे हुए रोहंगिया मुसलामानों की सहायता के लिए 10 हज़ार टन प्रदान करने का एलान किया हैl लेकिन वह शरणार्थियों को अपने देश में बनाह नहीं देते हैंl उनमें से कोई भी आधिकारिक तौर पर हिजरत के कानूनी अवधारणा को स्वीकार नहीं करते हैंl

ऑल इंडिया उलेमा मशाइख बोर्ड, जमीयत उलेमा ए हिन्द जैसी भारतीय मुस्लिम संगठनों ने भारत सरकार, संयुक्त राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकारों के संगठनों से बजा तौर पर म्यांमार के राखीन के क्षेत्र में अत्याचार का शिकार रोहंगिया मुसलामानों की सहायता करने की अपील की हैl लेकिन क्या उन्होंने इस सिलसिले में प्रभावी कार्यवाही करने के लिए वैश्विक ‘मुस्लिम बिरादरी’ से भी कोई अपील की है? रोहंगिया शरणार्थी मुस्लिम देशों और विशेषतः खाड़ी देशों में क्यों पनाह तलाश नहीं करते?

जमाअत इस्लामी हिन्द के प्रवक्ता India Tomorrow की रिपोर्ट के अनुसार जमाअत इस्लाम इ हिन्द के सदर मौलाना सैयद जलालुद्दीन उमरी ने रोहंगिया मुसलामानों की हलाकतों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए संयुक्त राष्ट्र संगठन, ओ आई सी और विभिन्न मानवाधिकारों के संगठनों से इस बात का मुतालबा किया है कि वह “उनके अपने हमवतनों को क़त्ल से रोकने उनकी नागरिकता बहाल करने, उनके सफ़र पर सभी प्रकार की पाबंदियों को हटाने और उनकी सामाजिक और आर्थिक विकास पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए बर्मी सरकार पर दबाव बनाएं”l (1)

इसी प्रकार, जमीअत उलेमा ए हिन्द ने म्यांमार में रोहंगिया मुसलामानों के लिए अपना रुख परिवर्तित करने के लिए एक आखरी मियाद निर्धारित करने के लिए सुरक्षा परिषद का इजलास बुलाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संगठन से अपील की हैl जमीअत उलेमा ए हिन्द ने भारत में शरण की तलाश करने वाले रोहंगिया मुसलामानों के लिए भारत सरकार को पारम्परिक मानवीय आधारों पर अपने रुख से मुनहरिफ़ ना (ना भटकने) होने [पर भी ज़ोर दिया हैl बड़े पैमाने पर भारतीय मीडिया में प्रकाशित होने वाली ख़बरों के अनुसार जमीअत उलेमा ए हिन्द ने भारत सरकार से कहा है कि “इस सिलसिले में भारत को यूरोपीय संघ सहित विकसित देशों की पैरवी करनी चाहिए”l

रोहंगिया शरणार्थियों का संकट स्पष्ट रूप से मानवीय अधिकारों की एक समस्या हैl लेकिन, जैसा कि जनाब सुलतान शाहीन ने टाइम्स नाउ पर बहस के बीच कहा, यह एक बहुत चिंताजनक बात है कि “जब तथाकथित इस्लामी देशों के अन्दर उन सरकारों या इस्लामी दहशतगर्द संगठनों के इशारे पर इसी प्रकार की या इससे अधिक दर्दनाक इंसानी अधिकारों के उल्लंघन का मामला सामने आता है तो भारत में यह इस्लामी संगठनें उसके विरोध में आवाज़ बुलंद नहीं करती हैंl” इसलिए, यह प्रश्न अपनी जगह बिलकुल सहीह है कि: “क्या मानवाधिकार केवल गैर इस्लामी देशों में रहने वाले मुस्लिम अल्पसंख्यकों के साथ विशेष हैं?” क्या उलेमा और इस्लामी रहनुमा उस समय कभी निंदा में आवाज़ उंचा करते हैं जब हज़ारों गैर मुस्लिम लड़कियों का अपहरण किया जाता है, “इस्लामी राज्य” पर उनकी नाकारात्मक मानसिकता बनाई जाती है और निकाहे के जिहाद के नाम पर उनका शोषण किया जाता है?

बेशक 40 हज़ार रोहंगिया मुसलामानों को देश निकाला करने की भारत सरकार की योजना एतेहासिक तौर पर देश के बहुलतावादी मूल्यों के विपरीत होगाl श्रीलंका, अफगानिस्तान और तिब्बत सहित पड़ोसी देशों से फरार होने वाले मजरूह और कमज़ोर लोगों की मदद करने की भारत की एक लम्बी तारीख रही हैl लेकिन भरोसा केवल उन्हीं लोगों का किया जाना चाहिए और केवल उन ही का समर्थन किया जाना चाहिए जिनके अन्दर उनकी ओर से आवाज़ उठाने का भरोसा हो और जिन्हें इसका अधिकार प्राप्त हो, उन लोगों का नहीं जो इससे राजनीतिक लाभ प्राप्त करना चाहते हैंl सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रोहंगिया शरणार्थियों की सहायता धर्म के आधार पर नहीं बल्कि मानवीय आधारों पर की जानी चाहिएl जो लोग मानवता के बजाए धर्म के आधार पर शरणार्थियों की किस्मत का फैसला करने का प्रयास कर रहे हैं वह अपने खुफिया हितों को बढ़ावा देने की कोशिश में हैंl

और साथ ही साथ भारत को अपने शरणार्थी कानून में धार्मिक स्तर को छोड़ देना चाहिएl भारत सरकार ने नागरिकता के अमल को आसान बनाने के लिए 1955 की नागरिकता के कानून में संशोधन का प्रस्ताव पेश किया थाl लेकिन दुखद बात यह है कि इस नए बिल से केवल ईसाइयत, हिन्दुइज्म, जैनिज़्म, ज़रतश्तिज्म और सिखिज्म को ही लाभ प्राप्त होगा जिन्हें अपने पैत्रिक देशों में अल्पसंख्यक धर्म समझा जाता हैl इस बिल से मुस्लिम बेघर व्यक्तियों को बाहर कर दिया गया हैl इसलिए, बहुत सारे लोगों का मानना है कि रोहंगिया मुसलमानों को देश से निकालने का सरकार का ताज़ा प्रस्ताव उसी बिल का भाग हैl

हालांकि भारत ने ऐसे किसी भी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किया है जिसकी वजह से शरणार्थियों को शरण की पेशकश करना उसका फर्ज़ हो, लेकिन इस देश ने हमेशा विवादों और आफतों से भागने वाले शरणार्थियों को शरण दिया है, चाहे वह सीरिया के ईसाई हों, मालाबार के यहूदी हों या इरान के पारसी होंl इसलिए, रोहंगिया मुसलामानों को इस देश से निकालना उसकी इस इंसानी परंपरा के विपरीत होगा जिस पर भारत कई दशकों से कायम रहा हैl

ख़ास तौर पर सुप्रीम कोर्ट ने रोहंगिया शरणार्थियों को देश निकाला करने के योजना को चैलेंज करने वाले एक आवेदन पर सरकार का स्टैंड जानने की कोशिश की हैl इसके अलावा, यह बात भी संतोषजनक है कि भारत सरकार ने यह विश्वास दिलाया है कि वह “उन्हें ना तो गोली मारेगी और ना ही उन्हें समुन्द्र में फेंकेगी”l

1. indiatomorrow.net/eng/jamaat-urges-govt-of-india-united-nations-to-help-rohingya-muslims

URL for English article: http://newageislam.com/the-war-within-islam/ghulam-rasool-dehlvi,-new-age-islam/why-are-islamic-countries-not-coming-forward-to-take-rohingyas?-are-human-rights-for-muslims-only?/d/112485

URL for Urdu article: http://newageislam.com/urdu-section/ghulam-rasool-dehlvi,-new-age-islam/why-are-islamic-countries-not-coming-forward-to-take-rohingyas?---اسلامی-ممالک-روہنگیا-مسلمانوں-کی-مدد-کے-لئے-کیوں-آگے-نہیں-آ-رہے-ہیں؟-کیا-انسانی-حقوق-صرف-مسلمانوں-کے-لئے-ہیں؟/d/112494

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/ghulam-rasool-dehlvi,-new-age-islam/why-are-islamic-countries-not-coming-forward-to-take-rohingyas?--इस्लामी-देश-रोहंगिया-मुसलामानों-की-सहायता-के-लिए-आगे-क्यों-नहीं-आ-रहे-हैं?-क्या-मानवाधिकार-केवल-मुसलामानों-के-लिए-है?/d/115995

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