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Hindi Section (31 Jul 2018 NewAgeIslam.Com)


Why Should an Academic Course on Islamist Terror Rile Muslims? इस्लामी आतंकवाद पर शैक्षणिक कोर्स पेश किए जाने से मुसलमानों में गुस्सा क्यों?

 

 

 

अरशद आलम, न्यू एज इस्लाम

18 जुलाई 2018

कुछ दिनों पहले जे एन यू  में इस्लामी आतंकवाद पर एक कोर्स पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने का प्रस्ताव पेश किया गया थाl समाज के विभिन्न वर्गों ने इस कदम का विरोध किया और यह कहा कि इस प्रकार के कोर्स की आवश्यकता ही क्यों हैl अकादमिक हलकों में यह बात की गई कि यह कोर्स और अधिक व्यापक होना चाहिए जिसमें ना केवल इस्लाम के अन्दर बल्कि विभिन्न धर्मों में आतंकवाद के प्रयोग पर शिक्षा दी जाएl अब इस एतेहासिक तथ्य में कोई कलाम (बहस) नहीं हो सकता है कि विभिन्न धर्मों ने किसी ना किसी तरह आतंकवाद का प्रयोग किया हैl लेकिन इसके लिए केवल इस्लाम को विशेष किए जाने से इस विचार को मजबूती मिली है कि यह कोर्स सैद्धांतिक रूप से तास्सुब (पूर्वाग्रह) का शिकार हैl

दूसरी ओर जबकि इस्लाम के नाम पर मौजूदा दौर में आतंकवाद के अनेकों घटनाएं अंजाम दिए जा रहे हैं, इस रुझान पर विशेष ध्यान देने का एहसास पैदा होता हैl और शैक्षणिक संस्थाओं से बेहतर इसका तरीका और क्या हो सकता हैl और यह भी दिमाग में रखा जाना चाहिए कि इस कोर्स में सभी धर्मों को सम्मीलित करने से यह कोर्स गड़बड़ी का शिकार हो जाएगाl अगर किसी की रुचि उस चीज में है जो इस्लाम और आतंकवाद के बीच एक संबंध है तो फिर पूरा ध्यान उसी संबंध पर होना चाहिएl

इसके अलावा, इस मामले में एक सबसे अच्छा लिबरल स्टैंड यह होगा कि इस प्रकार के शैक्षणिक मामलों को संबंधित विश्वविद्यालय या अध्यापक के हाथों में छोड़ दिया जाएl समस्या यह है कि भारत में लिबरल वर्ग यह मानता है कि अध्यापक और शैक्षणिक संस्थाओं की स्वतन्त्रता और संप्रभुता को महत्व दिया जाना चाहिए जब वह सत्ता में हों, जबकि दूसरों को इस आज़ादी से वंचित रखा जाना चाहिएl

एक और समस्या स्वयं इस्लामी ही हैl आलोचकों ने त्वरित यह तर्क पेश कीया कि कोई भी धर्म हिंसा की अनुमति नहीं देता इसलिए, आतंकवाद पर एक कोर्स के लिए शब्द ‘इस्लामी’ का प्रयोग बहुत बड़ा दुरुपयोग हैl जब हम ईसाई आतंकवाद या हिन्दू आतंकवाद जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं करते हैं तो इस्लामी आतंकवाद की इस्तेलाह (शब्द) क्यों प्रयोग किया जाएl

यह बात एतेहासिक रूप से गलत हैl ईसाईयों, मुसलामानों और हिंदुओं ने अपने इतिहास के किसी ना किसी युग में अपने धार्मिक भावनाओं के आधार पर हिंसा का प्रदर्शन किया हैl अगर ऐसा नहीं है तो हम सलीबी जंगों और बुद्ध मत के अनुयायियों पर किए गए अत्याचारों और उनके हत्याओं को क्या समझते हैं? समस्या केवल यह नहीं है कि धर्मों ने आतंकवाद का प्रयोग किया है; बल्कि सबसे बड़ी समस्या यह है कि इस बारे में कोई सहमती नहीं है कि आतंकवाद की परिभाषा किस प्रकार की जाएl

उदाहरण के रूप में तीसरी दुनिया के देशों की स्वतन्त्रता का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा हुआ है कि जिसमें हमारे बड़े बड़े स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी मंजिल प्राप्त करने के लिए उचित और बहुमूल्य स्रोतों के रूप में आतंकवाद और हिंसा का प्रयोग किया हैl लेकिन इस प्रकार के आतंकवाद से हमें कोई समस्या नहीं हैl इसके अलावा विभिन्न विकासशील और विकसित देशों में सरकारों ने अपने ही नागरिकों पर आतंकवाद का प्रयोग किया है लेकिन चूँकि हिंसा पर सरकार का एकाधिकार है इसीलिए हम इसे आतंकवाद नहीं समझतेl इसलिए आतंकवाद एक ऐसा शब्द है जिसकी परिभाषा देना या जिसका पैमाना निर्धारित करना एक बहुत कठिन कार्य है क्योंकि किसी एक का आतंकवादी किसी दुसरे का शहीद भी हो सकता हैl

तथापि, इसके कारण हमें धार्मिक आतंकवाद के मूल प्रश्न से भटकना नहीं चाहिएl अगर आतंकवाद की ऐसी घटनाएं अंजाम दी जाती हैं जिनमें धर्म एक प्राथमिक उत्तेजक है तो फिर हम आतंकवादियों के धर्म का नाम लेने में शर्मिंदा क्यों होंl और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर कोई इस्लाम के नाम पर इस प्रकार के हमलों को अंजाम दे रहा है तो फिर हम यह कहने वाले कौन होते हैं कि वह वास्तविक मुसलमान नहीं हैं?

विविध मुस्लिम समूहों ने इस प्रस्तावित कोर्स का विरोध केवल इसलिए किया क्योंकि इससे इस्लाम का नाम खराब होगाl उन्होंने साफ़ तौर पर यह कहा कि इस्लाम का अर्थ अमन है और इस धर्म में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं हैl यह बिलकुल निराधार बात है और इसका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं हैl

सबसे पहली बात यह है कि आज कल यह झुटा दावा करना एक फैशन बन चुका है कि इस्लाम एक अमन का धर्म हैl कोई धर्म पूर्ण रूप से शांतिपूर्ण या हिंसक नहीं होताl ख़ास तौर पर इस्लाम धर्म का इतिहास इसके पहले दिन से ही हिंसा से भरा हुआ हैl इससे बुरा और क्या हो सकता है कि मुसलामानों ने अपने नबी की वफात के बाद ही राजनीतिक मूल्यों के लिए एक दुसरे से लड़ना शुरू कर दिया थाl ऐसा नहीं है कि मुसलमान स्वयं अपने इतिहास से अनभिज्ञ हैंl बल्कि मामला इसके उलट है: वह अपने हिंसक अतीत के इतिहास से अच्छी तरह परिचित हैंl और यही कारण है कि वह अब यह दावा कर रहे हैं कि इस्लाम एक शांति का धर्म हैl

सच्ची बात यह है कि इस्लाम का अर्थ तस्लीम व रज़ा होना चाहिए और मुस्लिम जो तस्लीम व रज़ा बजा लाएl मुसलामानों को अपने अतीत से इनकार करने की कोई आवश्यकता नहीं है: सारे धर्मों के इतिहास में कहीं ना कहीं हिंसा अवश्य पाया जाता हैl मुसलामानों को अपनी इस कष्टप्रद इतिहास को स्वीकार कर लेना चहिए और यह ध्यान रखना चाहिए कि यह फिर से ना दोहराई जाएl केवल यह कह देने से इस्लाम अमन का धर्म नहीं बन जाएगा कि इस्लाम एक शांतिपूर्ण धर्म है; अगर मुसलमान इस्लाम को एक शांतिपूर्ण धर्म के तौर पर पेश करना चाहते हैं तो मुसलामानों को एक वैकल्पिक व्याख्यात्म परंपरा का निर्माण करना होगाl

इस पृष्ठभूमि में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र संघ और दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन ने इस विशिष्ट कोर्स को परिवर्तित करने के लिए जे एन यू को ख़त लिखाl अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को इस संबंध में कुछ कठिन प्रश्नों के उत्तर देने की आवश्यकता हैl अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के दूसरी यूनिवर्सिटी के मामलों में रूचि क्यों ले रही है? क्या अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र संघ को अपनी ही यूनिवर्सिटी के छात्रों की आवश्यकताओं और हितों का ख़याल नहीं रखना चाहिए? हम यह मानते हैं कि उनके पास राजनीतिक आलोचना का अधिकार है लेकिन हमें यह भी बताया जाए कि वह अपने कैम्पस के मौजूदा हालत पर आलोचना करना आरम्भ करेंगे? अगर वह जे एन यू से यह मांग करते हैं कि ‘उनके’ भावनाओं का सम्मान किया जाए, तो क्या अब समय नहीं आया है कि स्वयं अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी अपने ही अलग और विविध छत्रों की संवेदनशीलता का इसी प्रकार ख़याल रखेl

क्या अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी हिन्दू मत पर कोई कोर्स प्रारम्भ करेगी? इसी प्रकार, एक शैक्षणिक कोर्स के सामग्री पर एक यूनिवर्सिटी से स्पष्टीकरण मांगना अल्पसंख्यक आयोग का काम नहीं होना चाहिएl मुसलमानों को इस देश में बहुत सारे गंभीर समस्याओं का सामना है और यह अच्छा होगा अगर आयोग हर दिन मुसलामानों को पेश आने वाले अपमान पर ध्यान देl शैक्षणिक मामलों को संबंधित यूनिवर्सिटी पर ही छोड़ देना ठीक हैl

एक जबरदस्त हंगामा और शोर-गुल के बाद जे एन यू ने इस कोर्स को छोड़ने का निर्णय लिया और यहाँ तक कि यूनिवर्सिटी ने इस बात से इनकार भी कर दिया कि ऐसा कोई कोर्स परिचित कराने की उनकी कोई योजना भी थीl तथापि, अब यह बात सामने आ रही है कि वह अब ‘इस्लामी’ आतंकवाद के शीर्षक को ‘इस्लाम पसंद’ आतंकवाद से परिवर्तित करके एक ऐसे तहक़ीक़ी विषय के तौर पर परिचित कराने की योजना बना रहे हैंl लेकिन यह तहक़ीक़ी विषय भी विवादों में घिर चुका हैl मुस्लिम आलोचकों ने इस तहक़ीक़ी विषय के पीछे यूनीवर्सिटी के ‘नापाक’ उद्देश्यों को उजागर करने में कोई देरी नहीं कीl अगर हम यह स्वीकार कर भी लें कि इस देश में राजनीतिक बहस के मद्देनजर ‘इस्लामी’ आतंकवाद का प्रयोग मुसलामानों के लिए कष्टप्रद हो सकता है, लेकिन यह बात समझ से बाहर है कि ‘इस्लाम पसंद आतंकवाद’ का शब्द भी मुसलामानों के लिए क्यों कर कष्टप्रद हो सकता हैl

हमें इस्लामी और इस्लाम पसंद के बीच अंतर करने की आवश्यकता है: इसलिए कि उत्तरार्द्ध उल्लेखित सत्ता शासन पर कब्ज़ा करने के लिए केवल इस्लाम का राजनीतिक प्रयोग करते हैं जिसमें हिंसा बहुत से रास्तों में से एक रास्ता हैl क्या यह पूरी दुनिया के इस्लाम पसंदों का एक अंतिम उद्देश्य नहीं है और क्या उन्होंने अपने उद्देश्यों में सफलता प्राप्त करने के लिए एक विधि के तौर पर आतंकवाद का प्रयोग नहीं किया है? क्या आइएसआइएस और तालिबान को इस्लाम पसंद आतंकवाद के अलावा और किसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है? दुनिया भर में यहाँ तक कि मुस्लिम विद्वानों के बीच भी अब यह बात साबित हो चुकी है कि इस्लाम पसंदी का अध्याय बंद करने की आवश्यकता हैl

तो किसी ऐसे कोर्स या तहक़ीक़ी विषय में क्या परेशानी है जिसका उद्देश्य इस रुझान के विभिन्न पहलुओं को जानना और उन पर तहकीक़ (शोध) करना है और भारतीय मुसलामानों को इसका विरोध क्यों करना चाहिए? इसकी केवल एक ही वजह समझ में आती है और वह इस्लाम और इस्लाम पसंदी के बीच अंतर का स्पष्ट ना कर पाना हैl इसके अलावा, ऐसा लगता है कि गैर ख़ुशामदाना अंदाज़ में शब्द इस्लाम या इससे संबंधित किसी भी शब्द के प्रयोग में भारतीय मुसलामानों को परेशानी हैl

यह एक बहुत बड़ी समस्या है और जितनी जल्द मुसलमान इसका कोई हल निकाल लें यह उनके लिए उतना ही अच्छा होगाl उन्हें इस्लाम की किसी भी मौजूदा आलोचना पर खुल कर बहस करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए इस आत्मनिरीक्षण के बिना यह समझना बहुत कठिन है कि हम हिंदुस्तानी मुसलमान की हैसियत से किस तरह हमारे आस पास की दुनिया के साथ सद्भाव स्थापित करने में सफल होंगेl अगर हम यह स्वीकार नहीं करते कि किसी दुसरे धर्म की तरह इस्लाम भी आतंकवाद का कारण बन सकता है तो हमारे अन्दर एक ऐसा काल्पनिक दृष्टिकोण परवान चढ़ेगा कि जिसमें मुसलमान मज़लूम दिखेंगे और 11/9 जैसी आतंकवादी घटनाएं ईसाईयों की साज़िश लगेगीl

URL for English article: http://www.newageislam.com/radical-islamism-and-jihad/arshad-alam,-new-age-islam/why-should-an-academic-course-on-islamist-terror-rile-muslims?/d/115867

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/arshad-alam,-new-age-islam/why-should-an-academic-course-on-islamist-terror-rile-muslims?--اسلامی-دہشت-گردی-پر-تعلی--نصاب-پیش-کئے-جانے-سے-مسلمانوں-میں-غصہ-کیوں؟/d/115959

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/arshad-alam,-new-age-islam/why-should-an-academic-course-on-islamist-terror-rile-muslims?--इस्लामी-आतंकवाद-पर-शैक्षणिक-कोर्स-पेश-किए-जाने-से-मुसलमानों-में-गुस्सा-क्यों?/d/115984

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