निम्नलिखित लेख जो न्यु एज इस्लाम के अरमान नियाज़ी द्वारा अनुवादित है, में, लेखक शकील रशीद बड़े पैमाने पर मुसलमानों के ईसाई धर्म स्वीकार करने पर अफसोस का इज़हार कर रहे हैं। 20 हजार मुसलमानों ने पहले ही अपना धर्म बदल लिया है, हालांकि इनमें से बहुत से मुसलमानों ने अपने नामों को बरकरार रखा है। लेखक इसके लिए ईसाई प्रचारकों को वैसे ही ज़िम्मेदार मानते हैं, जैसे कि दुनिया भर के मुसलमान उन पर अनैतिक तकनीकों का प्रयोग करने, परेशान हाल मुसलमानों के हालात का फायदा उठाकर उन्हें ईसाई बनाने का आरोप लगाते हैं। ऐसा लगता है कि वो इस सच्चाई से अपरिचित हैं कि बड़ी संख्या में इस्लाम धर्म को छोड़ने वाले जरूरी नहीं कि ईसाई धर्म को ही स्वीकार कर रहे हों, वो पूर्व मुसलमान बन रहे हैं और ये एक अंतरराष्ट्रीय रुझान (प्रवृत्ति) है।
अफ्रीका में इस रुझान के बारे में बात करते हुए लीबिया के एक प्रमुख इस्लामी विद्वान शेख अहमद अलक़त्तानी ने अल-जज़ीरा को हाल ही में बताया कि "जैसा कि आपने पहले जिक्र किया, इस्लाम अफ्रीका के प्रमुख धर्म की तरह प्रतिनिधित्व करता था, और अफ़्रीका में 30 ऐसी भाषाएँ थीं जो अरबी लिपि में लिखी जाती हैं। अफ्रीका में मुसलमानों की संख्या 316 मिलियन से कम है, जिनमें से आधे उत्तर अफ्रीकी अरब हैं। तो अफ्रीका के जिस गैर अरब क्षेत्र के बारे में हम बात कर रहे हैं, वहां मुसलमानों की संख्या 150 मिलियन से अधिक नहीं है।"
लीबिया के शेख ये भी बताते हैं: "जब हमें ये मालूम होता है कि अफ्रीका की पूरी आबादी एक अरब है, तो हम देखते हैं कि मुसलमानों की संख्या पिछली सदी की शुरुआत के समय जितनी थी, उसकी तुलना में मुसलमानों की संख्या आज बहुत कम है। दूसरी तरफ कैथोलिक ईसाइयों की संख्या 1902 ई. में दस लाख से आज 329,882,000 हो गई है। अगर इसे पूर्णांक बना दें तो वर्ष 2000 में ये संख्या 330 मिलियन पहुंच जाती है .... अब 1.5 मिलियन चर्च हैं जिनके होने वाले समागम में 46 लाख लोग जमा होते हैं। हर घंटे में 667 मुसलमान, ईसाई धर्म स्वीकार करते हैं। हर दिन 16 हज़ार मुसलमान ईसाई धर्म स्वीकार कर रहे हैं। हर साल 6 मिलियन मुसलमान ईसाई धर्म स्वीकार कर रहे हैं।"
कश्मीर के बांदीपुरा क्षेत्र के एक बड़े मदरसे के प्रबंधक "मौलाना मोहम्मद रहमतुल्ला मीर कास्मी ने कश्मीर घाटी में ईसाईयत के फैलाव की जो कहानियां श्री राशिद को सुनाई उसने लेखक को हैरान कर दिया। उनकी रिपोर्ट के अनुसार "मौलाना" कश्मीर के ईसाई प्रचारकों के खिलाफ अकेले संघर्ष कर रहे हैं।
लेकिन कश्मीर या कहीं और के मुसलमानों के बीच अंतराअवलोकन का मामूली संकेत नहीं है कि आख़िर क्यों मुसलमान बड़ी संख्या में इस्लाम छोड़ रहे हैं। अधिकांश मुसलमान पश्चिम के इस्लाम का भय फैलाने वाले मीडिया द्वारा फैलाए जाने वाले झूठ पर खुश हैं कि, "इस्लाम दुनिया में सबसे तेजी से फैलने वाला धर्म है।" कुछ देशों में मुसलमानों की संख्या बढ़ रही है और ये इमीग्रेशन (आव्रजन) और हमारी गरीबी और अशिक्षा को स्थायी करने के लिए मुसलमानों के बीच बड़े पैमाने पर प्रजनन के कारण हो सकता है। लेकिन पश्चिमी देशों के इस्लाम का भय फैलाने वालों (Islamophobes) का अपना एजेंडा, इस्लाम के डर को फैलाना है। लेकिन मुसलमानों और विशेष रूप से हमारा मीडिया इस झूठ को गले लगाए हुए है और हजारों बार दोहरा रही है इस तरह इस्लाम के भय फैलाने वाले झूठ को हम खुद ही फैला रहे हैं।
ये समय है कि हम इस पर गंभीरता से विचार करें कि वास्तव में दुनिया में क्या हो रहा है। क्यों मुसलमानों हर जगह, सिर्फ कश्मीर या अफ्रीका में ही नहीं, बड़ी संख्या में इस्लाम छोड़ रहे हैं अगर इस्लाम को दुनिया में बरकरार रहना है तो ये महत्वपूर्ण सवाल है जिस पर हमें विचार करना चाहिए। एक और सवाल जिस पर ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है: क्या दुनिया पर या अल्लाह पर इससे कोई फर्क पड़ता है कि दुनिया में मुसलमानों की संख्या कम हो रही है। एक मानव के रूप में क्या हमें इसको लेकर परेशान होने का कोई कारण है? सभी जानकारी के स्रोतों के अनुसार मुसलमान अन्य धार्मिक वर्गों के जैसे ही बुरे या अच्छे हैं। अगर इंसानी व्यवहार के कई सामाजिक पहलुओं या तक़वा के ज़रिए जिसे खुदा ने हमारे लिए बनाया है, को ध्यान में रख कर इंसाफ करें तो हम इससे भी बदतर साबित हो सकते हैं। ख़ुदा ने वादा किया है कि मुसलमान अपने मीसाक़ को बरक़रार रखने में नाकाम होते हैं तो मुसलमानों को तबाह कर जमीन पर एक बेहतर तब्का (वर्ग) पैदा करेंगे, इसलिए बतौर इंसान हमें क्यों चिंता करनी चाहिए? --- सुल्तान शाहीन, एडिटर, न्यु एज इस्लाम
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कश्मीरी मुसलमान बन रहे हैं ईसाई
शकील रशीद
11 जुलाई, 2012
सरवर खान जम्मू कश्मीर के पुंछ इलाके का रहने वाला है। उसके ईसाई बनने की वजह सिर्फ इतनी है कि उसे ये एहसास होने लगा था कि मुसलमान दूसरे मुसलमान की मदद नहीं करते। वो जब देखता कि कश्मीर के गरीब मुसलमानों पर न कोई मुस्लिम नेता ध्यान देने वाला है और न ही कोई अमीर मुस्लिम पड़ोसी तो उसका गुस्सा और बढ़ जाता। एक दिन उसकी मुलाकात एक ईसाई प्रचारक से हो गई जिसने उससे सहानुभूति के कुछ शब्द कहे, उसकी कुछ मदद की और फिर दोनों में रोज़ाना ही मुलाकातें होने लगीं और एक दिन सरवर खान ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया।
ज़ैबुन्निसा (परिवर्तित नाम) एक गरीब विधवा हैं। आतंकवादियों के हाथों पति की हत्या के बाद उसका सहारा एक बेटा था लेकिन एक दिन वो भी मारा गया। कश्मीर की ये विधवा अपने एकमात्र सहारे से भी वंचित हो गई। उसकी किसी ओर से कोई मदद नहीं की गई। न उसके मुसलमान पड़ोसियों ने उसकी खैर खैरियत ली और न ही कश्मीर के उन मुस्लिम नेताओं ने जिनकी नज़रों में ‘इस्लाम’ से बढ़कर कुछ नहीं है। वो गरीब विधवा एक ईसाई प्रचारक के हाथ चढ़ गई, जिसने उसकी आर्थिक मदद भी की और चिकित्सा सहायता भी पहुँचाई और फिर उसने भी ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। सरवर खान और ज़ैबुन्निसा ये सिर्फ दो इंसान ही नहीं हैं जिन्होंने इस्लाम धर्म छोड़ कर ईसाई धर्म अपनाया। एक मामूली अनुमान के अनुसार 1990 में कश्मीर घाटी में उग्रवाद की शुरुआत के बाद से अब तक कोई 20 हजार कश्मीरियों ने ईसाई धर्म अपनाया है। ईसाइयों के धर्म प्रचार की पत्रिका 'क्रिश्चियानिटी टुडे’ ने 2006 में ये दावा किया था कि अब तक कश्मीर में 15 हज़ार लोग ईसाई धर्म स्वीकार चुके हैं, बाद के छह बरसों में इस संख्या में वृद्धि हुई है।
आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के मुंबई अधिवेशन के दौरान संयोग से मेरी मुलाकात मौलाना मोहम्मद रहमतुल्ला मीर कास्मी से हुई। मौलाना कश्मीर के बांदीपुरा इलाके में स्थित एक बड़े मदरसे दारुल उलूम रहीमिया के प्रबंधक हैं। मौलाना मोहम्मद रहमतुल्ला मीर कास्मी कश्मीर घाटी में सक्रिय ईसाई प्रचारकों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने कश्मीर में ईसाई धर्म के प्रसार की जो कहानियां सुनाई वो बेहद चिंताजनक हैं और दुखद भी.... पिछले साल श्रीनगर में एक ऐसी सीडी जारी की गई थी जिसे देख कर घाटी के मुसलमान ग़म व गुस्से से भर गए थे। सीडी श्रीनगर के एक संवेदनशील और बहुत ही सुरक्षित क्षेत्र में स्थित एक चर्च के अंदर की थी। सीडी की वीडियोग्राफी रमज़ान के दिनों में की गई थी, ईसाई बनाने की रस्म, बपतिस्मा का दृश्य था, एक एक करके मुस्लिम युवा आते हैं और पानी के एक छोटे से हौज़ में डुबकी लगाते हैं और ईसाई पादरी के सामने संकल्प लेते हैं कि वो हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के रास्ते (जो अल्लाह के आखरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जीवन के बाद रद्द हो चुका है) पर चलेंगे। सीडी में मर्द भी दिखाए गए हैं और औरतें भी उनके हाथों में झंडे हैं जिनमें हरा झंडा भी है, बपतिस्मा की रस्म पूरा करने के बाद ईसाई प्रचारक दुआ करता है कि 'कश्मीर घाटी में हर दिन मजबूती के साथ प्रभु के संरक्षण में तेरी (प्रभु की) बादशाहत यानी ईसाई धर्म बढ़ता चला जाए।''
उक्त सीडी ..... जिसे मैं भी देख चुका हूँ। में पादरी बपतिस्मा देते समय इन नौजवानों को जो ईसाई धर्म स्वीकार कर रहे हैं उनके इस्लामी नामों मोहम्मद यूसुफ, अय्यूब, रियाज़ अहमद, इदरीस और बशीर आदि से पुकारता है और आस्था के अनुसार '' खुदा बाप'' खुदा बेटा, भगवान पवित्र आत्मा'' के नाम पर बपतिस्मा देने के शब्द अदा करके उन्हें पानी में डुबकी लगवाता है.... उक्त सीडी को लेकर मौलाना मोहम्मद रहमतुल्ला मीर कास्मी कहते हैं कि '' जब जाँच की गयी तो पता चला कि जिन लड़कों ने बपतिस्मा लिया है इन लड़कों की एक संस्था है जिसका नाम 'खिदमते खल्कल्लाह सोसाइटी' है, ज़ाहिर सी बात है कौन शक कर सकता है कि इस अरबी इस्लामी नाम से ईसाइयों की कोई मिशनरी भी सक्रिय हो सकती है''! लेकिन कश्मीर में ऐसी अनगिनत मिशनरियां और चर्च सक्रिय हैं जिनके नाम लगते अरबी इस्लामी हैं मगर इसकी आड़ में ये मुसलमानों को ईसाई बनाने का काम करते हैं। जैसे नूरे हयात चर्च'' अलबशर फेलोशिप ' अलमजलिस जमात फेलोशिप आदि।
कश्मीर में धर्म परिवर्तन का ये अभियान सुनियोजित ढंग से चलाया जा रहा है। अमेरिका, जर्मनी, नीदरलैंड, स्विटज़रलैण्ड और कोरिया के मिशनरी पूरी घाटी में दनदनाते फिर रहे हैं। उनके काम का अंदाज बेहद योजनाबद्ध है। ये विभिन्न समूहों में विभाजित विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय हैं। जैसे कैंपस क्रुसेड टू क्राइस्ट, नाम की मिशनरी यानी ईसाई प्रचारकों का एक समूह दक्षिण कश्मीर में सक्रिय है और ये सिर्फ छात्रों के बीच काम करती है। फ्रण्टियर नामक एक समूह है जो कश्मीरी गुज्जर बिरादरी में ईसाई धर्म का प्रचार करता है। जर्मन टाउन बापटिस्ट ट्रस्ट, नामक समूह गरीब ग्रामीणों के मन को परिवर्तित करने में लगा है। ऑपरेशन गैप' नामक एक समूह है जो आतंकवादियों में काम करता है जिन्होंने या तो आत्मसमर्पण कर दिया है या जेलों से आज़ाद हो गए हैं। ग्रामीणों में सक्रिय एक समूह है जिसका नाम है असेम्बलीज़ ऑफ गॉड है। इसी तरह अलबशर मिशन' और ' गास्पेल ऑफ एशिया नामक दो समूह सीमावर्ती इलाकों में काम करते हैं। ये कुछ समूह हैं लेकिन ऐसे ही दूसरे सैकड़ों मिशनरी ग्रुप इन दिनों कश्मीर घाटी को अपना लक्ष्य बनाए हुए हैं। इनका आगमन 1990 में चरमपंथ के शुरुआत से हुआ है। ये श्रीनगर, पुलवामा, बड़गाम' बारामुला, कुपवाड़ा, गंदरबल, कंगन और दूर दराज़ के इलाकों में फैले हुए हैं।
ऐसा नहीं है कि कश्मीरी मुसलमान ईसाई मिशनरियों के धर्म परिवर्तन' की कोशिशों से अनजान हैं। और इस पर ग़म और गुस्से का इज़हार थोड़े थोड़ अंतराल पर होता भी रहता है। 15 सितंबर, 2006 को पुलवामा में उग्र लोगों ने एक ईसाई स्कूल पर हमला भी किया था। यही नहीं 2005 में कश्मीर में आए भूकंप के बाद राहत और बचाव का काम करने वाले संस्थान भूकंप पीड़ितों की मदद के लिए कश्मीर पहुंचे थे तब इस शिकायत के बाद कि रुपये पैसे का लालच देकर लोगों का धर्म परिवर्तन किया जा रहा है। प्रशासन ने ईसाई मिशनरियों पर पाबंदी लगा दी थी, इसके बावजूद ईसाई मिशनरियाँ सक्रिय हैं। इसकी एक बड़ी वजह ये है कि राज्य सरकार और खुद मुस्लिम नेताओं की ओर से, आज तक ये आवाज नहीं उठी है कि ईसाई मिशनरियों को कश्मीर से बाहर किया जाय। हालांकि धर्म परिवर्तन की इन कोशिशों के खिलाफ आवाज उठती रहती हैं।
मौलाना मोहम्मद रहमतुल्ला मीर कास्मी बताते हैं कि '' जिंदगी का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है इल्ला माशाअल्लाह जहां ईसाइयों और उनकी मिशनरियों ने अपने ज़हरीले प्रभाव को, सुकून, मरहम, सहायता, सहारा, शिक्षा, सेवा, विकास, पुनर्वास, सहायता, भाई चारा, इलाज, उद्योग के हसीन नाम से न पहुंचाए हों।
वो आगे बताते हैं कि '' कुछ पादरियों ने तो यतीमखानों, स्कूलों या होस्टलों के अंदर यतीम और गरीब बच्चों को कम उम्र में जब वो सातवीं या दसवीं कक्षा के छात्र रहे, उनके अनजाने में ही बपतिस्मा दे दिया, हालांकि वो बच्चे ये भी नहीं जानते थे कि बपतिस्मा होता क्या है और इससे विश्वास पर क्या प्रभाव पड़ेगा, ये बच्चे वयस्क होने पर समझ रहे हैं कि उनके साथ कैसा अत्याचार हुआ है।
घाटी में ईसाई धर्म को अपनाने के क्या कारण हैं? इस संबंध में मौलाना मोहम्मद रहमतुल्ला मीर कास्मी ने अपनी एक पुस्तिका '' कश्मीर में इर्तेदाद का हादसा, में जो जानकारी दी है वो आंखें खोलने वाली हैं। एक जगह लिखा है कि '' इसमें कोई शक नहीं कि ये सारी स्थिति हम मुसलमानों की अपनी कोताही का नतीजा है लोगों की प्रतिक्रिया ये है कि लोग सिर्फ पैसों की वजह से धर्म बदलते हैं जबकि मामला सिर्फ यही नहीं है, सबसे बड़ी वजह ये है कि मुसलमानों का इस्लाम से सम्बंध दिन ब दिन कम होता जा रहा है, अल्लाह पाक की मोहब्बत, अल्लाह के रसूल हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से संबंध 'आखिरत का तसव्वुर (परलोक की कल्पना) और इस्लामी चेतना की महानता में कमी होती जा रही है जिसका अनुचित लाभ गैर इस्लामी गतिविधियों में व्यस्त ईसाई प्रचारक, पादरी, उनके सहायक, उनके द्वारा स्थापित किये गये एनजीओ और दूसरे संगठन उठा रहे हैं, मुसलमान धर्म की दावत देने वाले थे लेकिन अफसोस कि खुद दावत को स्वीकार करने वाले हो गये हैं।''
कश्मीर में ईसाई के धर्म के प्रचार में सबसे बड़ा रोल मिशनरी स्कूल अदा कर रहे हैं। ये स्कूल दो तरह के हैं, एक तो ईसाई मिशनरियों द्वारा स्थापित किए गए स्कूल जिनमें बारामुला के सेंट जोज़फ़ सेकण्ड्री स्कूल के अलावा श्रीनगर का बर्न पाल सेकंड्री स्कूल, कांवेन्ट स्कूल, बस्को स्कूल, मेलिन्सन स्कूल शामिल हैं तथा वो स्कूल जो सीधे मिशनरियों की निगरानी में चल रहे हैं जैसे गुड शेफ्ड सोनावार, गुड शेफ्ड स्कूल पुलवामा, कश्मीर वैली स्कूल एयर पोर्ट और सेंट पॉल स्कूल सोनावार आदि। दूसरे स्कूल वो हैं जो औपचारिक रूप से मिशनरी स्कूल नहीं हैं, लेकिन वहाँ गतिविधियोँ मिशनरी स्कूलों वाली ही जारी हैं। जैसे ईसाई दुआ जो बाइबल की इबारत होती है, क्रास या सलीब का चिह्न। जाहिर है जब बच्चे बाइबल की दुआ पढ़ेंगे और दिन भर इसके निशान को देखेंगे तो उनके मन प्रभावित होंगे। इन स्कूलों में चर्च भी हैं जिनमें मरियम की मूर्ति लगी हुई है और सलीब जड़ी हुई है। बच्चों को नियमित रूप से स्कूलों के चर्चों में जाने की प्रेरणा दी जाती है। ईसाई प्रचारक कहते हैं कि परीक्षा के दिनों में वहां जाकर सफलता की दुआ मांगें! बच्चों के अविकसित मन पर ये चीजें बुरी तरह से प्रभावित करती हैं और उनका अपने धर्म से संबंध कटता चला जाता है।
दूसरे शब्दों में ये कहा जा सकता है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और मदद के नाम पर धोखेबाज़ी से काम लिया जाता है। ईसाई धर्म के इस प्रचार को '' धोखेबाज़ी का प्रचार प्रसार' भी कहा जा सकता है। ये धोखेबाज़ी का प्रचार मेडिकल कैम्पों, शिक्षण संस्थानों और सिलाई सेंटरों में ज़ोरों पर जारी है।
कश्मीर के जो हालात हैं वो बेहद चिंताजनक हैं, एक पूरी पीढ़ी इर्तेदाद (धर्म विमुख) का शिकार होने के निशाने पर है। सवाल ये है कि इन हालात में क्या करना चाहिए? मौलाना मोहम्मद रहमतुल्ला मीर कास्मी का कहना है कि उसके बस ये तरीके है कि उल्मा और मशाइख, इस्लामी मदरसे तथा धार्मिक दल इस्लामी माहौल बनाएँ, इस्लामी संस्थाओं को जगह जगह स्थापित करें और अपनी कल्याणकारी संस्थाओं को सक्रिय करें, माँ-बाप ऐसे स्कूलों को चुनें जहां शैक्षिक विकास के साथ बच्चों का विश्वास भी सलामत रहे, स्कूली बच्चों को धार्मिक शिक्षा और कुरान पाक की शिक्षा ज़रुर दी जाए, धनी मुसलमान अपने आधुनिक शिक्षा संस्थान स्थापित करें, मुसलमान अपने पड़ोसियों, अजनबियों और रिश्तेदारों का ख़याल रखें, लोगों की सहायता करें और अधिकारों का हनन न करें। यदि ज़रा सी मेहनत कर ली जाए तो अल्लाह की नुसरत और मदद साथ होगी वरना कश्मीर आने वाले समय में 'मुर्तदों की सरज़मीन (धर्म विमुख लोगों की धरती), कहलाएगी।
11 जुलाई, 2012 सधन्यवाद: हमारा समाज, नई दिल्ली
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