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Hindi Section (20 Jun 2019 NewAgeIslam.Com)



इस्लामी शरीअत और व्यक्तिगत मुसलमान Islamic Shariat and the Individual Muslim



नसीर अहमद, न्यू एज इस्लाम

१ मई २०१९

इस्लामी शरीअत के अहया ए नव (नई जिंदगी) के नाम पर बहोत साड़ी जामतें सक्रीय हैंl लेकिन प्रश्न यह है कि कौन सी शरीअत? एक प्राचीन मुनजमिद शरीअत है जिसका आधार पिछली समाविया पुस्तकों के नमूनों और मौजुअ हदीसों पर है जो कि कुरआन करीम की रूह से परस्पर विरोधी हैl यहूदी शरीअत थी जिसने हमें कई शताब्दियों तक प्रिंटिंग प्रेस के प्रयोग से रोके रखा जिसकी वजह से हम योरोप से पीछे हो गएl यह वही शरीअत है जिसने वैज्ञानिक ज्ञान की प्राप्ति पर प्रतिबंध लगा दिया आयर अज्ञानता को बढ़ावा दियाl यहूदी शरीअत है जिसने हमारे उपर अल्लाह के कहर और गुस्से को दावत दी जिसने जिसने उससे राहत देने के लिए हमारे उपर इस्तेमारी हुकूमत को थोपा ताकि हम फिर से एक नई शरीअत तैयार कर सकेंl क्या हमने कुरआन मजीद की सहीह समझ को बुनियाद बना कर ऐसी कोई शरीअत तैयार की है जिससे पिछली कुतुब ए समाविया के नमूनों और मौजुअ हदीसों को अलग रखा गया हो?नहीं! हमने ऐसा नहीं कियाl इसलिए, अगर हम फिर उसी शरीअत की ख्वाहिश रखते हैं तो यह अल्लाह के गज़ब को एक बार फिर दावत देना और अपने उपर एक विदेशी हुकुमत को मुसल्लत करना हैl’

इस शरीअत की तरफ लोगों को हाकिमियत ए इलाह के नाम पर बुलाया जाता हैl क्या हाकिमियत ए इलाह का दावा करना और उसे कायम करना हम इंसानों का काम है? अल्लाह पाक जिस दिन चाहे अपनी मर्जी हमारे उपर मुसल्लत कर सकता है और हमारी आज़ादी और खुद मुख्तारी हमारे हाथों से छीन सकता है जैसा कि हमें औपनिवेशिक हुकूमतों के अधीन बना कर किया थाl मुसलमान इस तरह के गुमराह कुन राजनीतिक नारों का शिकार हरगिज़ ना होंl इसमें कोई शक नहीं कि हम अल्लाह की शरीअत या अल्लाह के दीन की पैरवी करने पर विश्वास रखते हैं लेकिन क्लासिकी इस्लामी फिकह हमें जो शिक्षा देती है वह कुरआनी शरीअत के साथ एक भद्दा मज़ाक हैl

व्यक्तिगत रूप से शरीअत या अल्लाह के दीन का अर्थ हमारे लिए क्या है? यह मिन व अन अल्लाह के अहकामात पर अमल करना हैl चीन और रूस के सिवा हम जिस देश में भी रहते हों अपने धर्म पर अमल कर सकते हैंl जैसे व्यक्तिगत रूप से हमें अल्लाह के अहकाम पर अमल करना चाहिए और ज़िनाकारी से बचना चाहिएl ज़िनाकारी पर कुरआन की सज़ा का निफाज़ राज्य की जिम्मेदारी है किसी व्यक्ति की नहींl यहाँ तक कि अगर इस प्रकार के नियमों का निफाज़ हो जाए तब भी हमारा धर्म हमें अपराधियों को सज़ा देने की हौसला अफजाई नहीं करता हैl वास्तविकता यह है कि हमारा धर्म हमें गवाह बनने से सख्ती के साथ मना करता है और अगर चार गवाहों के साथ जुर्म साबित नहीं हो सका तो ऐसे गवाहों के लिए ८० कोड़े मारने का आदेश है, हालांकि यह नहीं कहा जा सकता कि गवाही देने वाले झूट बोल रहे हैंl दीन हमें जुर्म करने वालों की इस्लाह करने की हौसला अफजाई करता है लेकिन उन्हें सज़ा देने से रोकता हैl और इसकी वजह से हमारे इस्लाम में कोई कमी पैदा नहीं होती क्योंकि रियासत कुरआनी कानून लागू नहीं करती है, क्योंकि अगर राज्य कुरआनी कानून लागू करती तब भी हम गुनाह करने वालों की इस्लाह करने की ही कोशिश करेंगे बजाए इसके कि हम हुक्काम को इसकी खबर दें और अपराधी को सज़ा दिलवाने के लिए गवाही देंl तथापि, जो शरीअत का निफाज़ चाहते हैं वह इस बात नहीं समझ सकतेl वह यह साबित करने के लिए कि उन्होंने “हाकिमियत ए इलाह” कायम कर दी है सबसे पहला काम यह करते हैं कि सार्वजनिक स्तर पर बड़े पैमाने पर अपराधियों पर सख्त सजाएं लागू करते हैंl यह सितमगर क्या ही बदसूरत इस्लाम कायम करना चाहते हैं!

जब मुसलामानों की एक बड़ी जनसंख्या अपनी जाती ज़िन्दगी में कुरआनी शरीअत नाफ़िज़ कर ले तभी रियासत के कानून में परिवर्तन हो सकेगीl लोकतंत्र एक बेहतरीन और वाहिद रास्ता है और निश्चित रूप से यही एक ऐसे धर्म में परिवर्तन पैदा करने का इस्लामी रास्ता है जिसका एलान यह है कि “दीन में जबर व इकराह की कोई गुंजाइश नहीं है”l उसका निफाज़ राजनीतिक पदों पर काबिज जबर व इकराह से काम लेने वाली जामातें नहीं कर सकतीl इसलिए कि बेशक जब वह इसमें सफल हो जाते हैं तो लोगों पर एक ज़ालिम व जाबिर हुकूमत मुसल्लत कर देते हैंl

तथाकथित क्लासिकी इस्लामी शरीअत कुछ भी हो मगर इस्लाम नहीं है’ और यह हम पर इस्तेमारी सरकार लागू करके समाप्त होने के लिए ही थीl कुरआन पिछली सभी आसमानी सहीफों से अपने इस व्यापक सिद्धांत के कारण प्रतिष्ठित है कि “ दीन में जबर व इकराह की कोई गुंजाइश नहीं हैl” इसलिए ऐसा कोई कानून या काएदा नहीं बनाया जा सकता जिसमें किसी मुसलमान को नमाज़ पढ़ने या रोज़ा रखने या मुस्लिम औरतों को हिजाब पहनने या पर्दा करने पर मजबूर किया गया हो या अपने धर्म को छोड़ने पर किसी मुसलमान को सज़ा दी जाती हैl यह फैसला करने का हक़ व्यक्तिगत रूप से केवल जनता को है वह क्या करेंगे या क्या नहीं करेंगे शर्त यह है कि उनके किसी अमल या हरकत से दोसरों के अधिकारों या अवामी अनुशासन में कोई खलल पैदा ना होता होl

हर मौजुअ हर कुरआनी शरीअत क्लासिकी शरीअत से भिन्न व परस्पर विरोधी हैl मिसाल के तौर पर,

समलैंगिकता के लिए कोई सज़ा नहीं है शर्त य७अह है कि समाज उसे सख्ती के साथ अस्वीकार ना करता हो, और सज़ा केवल खुल कर फहाशी करने पर हैl

कुरआन में इर्तेदाद के लिए कोई सज़ा नहीं हैl इसमें तौहीन ए रिसालत और इल्हाद के लिए भी कोई सज़ा नहीं हैl अवामी अनुशासन में खलल पैदा करने या नफरत अंगेजी के खिलाफ कानून हो सकता है लेकिन बौद्धिक व वैचारिक स्वतन्त्रता या आलोचना के अधिकार के विरुद्ध कोई कानून नहीं हो सकताl

कुरआनी शरीअत के अनुसार तलाक का अमल क्लासीकी इस्लामी शरीअत से भिन्न हैl

क्लासीकी इस्लामी फिकह विरासत से संबंधित हिसाब व किताब में खता का शिकार हैl

क्लासीकी इस्लामी शरीअत में जंग के नियम गलत तौर पर पेश किये गए हैंl

क्लासीकी इस्लामी शरीअत में जंग के नियम गलत तौर पर पेश किये गए हैंl मुसलमानों पर ऐसा कोई फरीज़ा लागू नहीं है कि वह गैर मुस्लिमों को महकूम बनाएं और उन्हें इस्लामी शरीअत के तहत लाएंl

‘दोसरों’ या गैर मुस्लिमों के साथ संबंध क्लासीकी इस्लामी शरीअत में गलत बयान किये गए हैंl

गैर मुस्लिमों पर ‘जज़िया’ का निफाज़ नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दौर में भी कोई मज़हबी फरीज़ा नहीं थाl

अब मुसलमानों को ध्यान के साथ कुरआन का अध्ययन करने और यह समझने की आवश्यकता है किस तरह मुतअस्सिब इस्लामी उलेमा व फुकहा ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा है, और आवश्यक है कि वह इस पुराने क्लासीकी इस्लामी शरीअत को अस्वीकार करें जो पिछली समाविया किताबों और मौजुअ हदीसों पर आधारित है, और कुरआन पाक की प्रमाणिक शिक्षाओं पर आधारित नए सिरे से एक नै शरीअत संपादित करेंl इसके एक लोकतांत्रिक कार्य शैली की आवश्यकता हैl अब इस बात की कोई अहमियत व इफादियत नहीं बची कि अतीत में किस तरह लोकतांत्रिक कार्य शैली के बिना इस्लाम का कयाम हुआ थाl आज हमारे बीच ऐसा कोई पैगम्बर नहीं हैं जिसे हमारी हिदायत के लिए सीधे खुदा से वही हासिल हो रही हो और आँख बंद करके हम जिसकी पैरवी कर सकेंl आज हमारे बीच दमनकारी और मुतास्सिब इस्लामी विचारों के हामिल भूल चूक करने वाले इंसान हैं जो खुद के लिए एक नबी का इख्तियार और हैसियत हासिल करने और अपनी क्रूर हुकूमत कायम करने की कोशिश कर रहे हैंl उन मक्कारों को खुद से दूर करेंl

हमारे पास आज कुरआन की शकल में एक ऐसी किताब है जिसे विभिन्न लोग भिन्न अंदाज़ में समझते हैं इसलिए किसी भी व्यक्ति, गिरोह या वर्ग को यह अधिकार नहीं है कि वह अपना नज़रिया बाकी सभी लोगों पर लागू करेl हमारे पास लोकतांत्रिक कार्य शैली की पैरवी करने के अलावा कोई रास्ता नहीं हैl व्यक्तिगत तौर पर अल्लाह के लिए हमारा फरीज़ा है कि हम कुरआन पढ़ें, जहां तक संभव हो इसे बेहतर अंदाज़ में समझें और अपनी जिंदगियों में इसे लागू करें और लोगों को इसकी शिक्षा दें और इसे बढ़ावा भी देंl हम एक मिल्लत, एक समाज, एक कौम और एक उम्मत के तौर पर इसमें तभी सफल हो सकते हैं जब हम सब से पहले अपने कामों को व्यक्तिगत तौर पर अंजाम देंl

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URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/naseer-ahmed,-new-age-islam/इस्लामी-शरीअत-और-व्यक्तिगत-मुसलमान--islamic-shariat-and-the-individual-muslim/d/118930

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