New Age Islam
Tue Jun 09 2026, 05:51 AM

Hindi Section ( 11 Sept 2012, NewAgeIslam.Com)

Comment | Comment

Between Salafism and Sufism, a Search for Modern Islam सल्फ़ी इस्लाम और सूफीवाद के बीच आधुनिक इस्लाम की तलाश

 


सैफ शाहीन, न्य एज इस्लाम

30 जुलाई, 2012

इस्लामवाद और इसके अपने आलोचकों के बीच दलील तेजी से आस्था के दो भिन्न दृष्टिकोणोः सल्फ़ी तरीका और सूफी तरीका के बीच संघर्ष में बदल रहा है । दाँव पर न सिर्फ एक धार्मिक विचारधारा के रूप में इस्लाम का अर्थ है बल्कि ये भी है कि रोज़मर्रा में मुसलमान कैसे खुद को महसूस करते हैं और इस सिकुड़ रही दुनिया में किस तरह अपने स्थान को देखते हैं।

सल्फ़ी आस्था के लोग इस्लाम को उस दौर में वापस ले जाना चाहते हैं जैसा कि इनके अनुसार इसके प्रारंभिक काल में इस पर अमल होता था, खासकर मुसलमानों की पहली तीन नस्ले जो सल्फ़ के ज़माने में थी या इस्लामी कैलेंडर के शुरुआती 300 साल में थी। वो कुरान और हदीस की शाब्दिक व्याख्या का प्रचार प्रसार करते हैं, उनका मानना ​​है कि सल्फ़ सालेहीन के आखीर तक इज्तेहाद के दरवाजे बंद हो गए थे। वो चाहते हैं कि आम मुसलमान कलमा, नमाज, रोज़ा, हज और ज़कात के पांच इस्लामी स्तम्भों तक खुद को सीमित रखे।

सूफी धर्म के प्रति अधिक आध्यात्मिक दृष्टिकोण होने का दावा करते हैं। उनके अनुसार, दिन में पाँच बार नमाज़, रमज़ान के महीने में रोज़ा रखने की औपचारिक इबादत काफी नहीं है,  और कभी कभी इसका बिल्कुल भी कोई नतीजा हासिल नहीं होता है। इन लोगों का विश्वास है कि इस्लाम, अल्लाह के साथ संवाद का मामला है, जिस तरह खुद पैगंबर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इसे वही नाज़िल होने के दौरान हासिल किया था। वो अक्सर गाने,  नृत्य,  अल्लाह के नाम को जपने और कभी कभी दवाओं और उत्तेजक औषधियों की मदद से भी इस तरह के संवाद को स्थापित करने की कोशिश करते हैं। विभिन्न सूफी सिलसिले अपनी शिक्षा और सिद्धांतों का संबंध पहले और चौथे खलीफा हज़रत अबु बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हू और हज़रत अली करमल्लाहू वजहू के ज़रिए नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से जोड़ते हैं। पूरी दुनिया में बड़ी संख्या में सूफी संत और कवि पैदा हुए जिनका सम्मान आज तक आम मुसलमान करते हैं।

अर्थ बदले

अगर इतिहास हमें एक सबक सिखाता है,  तो वो ये है कि कोई भी चीज वैसी नहीं रहती जैसे शुरुआत में होती है। प्राचीन सूफियों के तरीके का उद्देश्य,  ईश्वर से संवाद की कल्पना, और  अल्लाह के सिवा हर चीज़ से मुंह मोड़ लेना था। इसका मतलब कलमए तैय्येबा को सिर्फ जपना नहीं था बल्कि दिल और आत्मा में इसको महसूस करना था। लेकिन अमल उद्देश्य पर ग़ालिब आ गया,  और बहुत से लोगों के लिए सूफीवाद का उद्देश्य खुदा से लौ लगाने का माध्यम ही नहीं था बल्कि सिर्फ गायकी,  नृत्य, खुदा का नाम जपना और मादक पदार्थ था, जो इसके साथ शामिल था। दुनिया के कई हिस्सों में, विशेष रूप से दक्षिण एशिया और उत्तरी अफ्रीका में आम मुसलमान इंतेक़ाल कर चुके लोगों और दफन सूफी संतों का आदर करते हैं बल्कि उनसे मन्नतें मांगते हैं इन लोगों का विश्वास है कि संतों के पास रहस्मय शक्तियाँ हैं और उनके मज़ारात पर फूल और पैसे चढ़ाते हैं। अक्सर गैर मुस्लिम भी उनके साथ इसमें शामिल होते हैं।

इस बदलाव ने पुरोहित वर्ग को जन्म दिया जो इस दुनिया से जा चुके संतों की औलादों में से थे जिन्होंने उनकी विरासत को अपना लिया और अब खुद को आम मुसलमानों और अल्लाह के बीच मध्यस्थ के तौर पर पेश करते हैं। वास्तव में सूफीवाद में बिगाड़ कुछ समाजों में ऐसे स्तर पर पहुंच गया है कि नकली सूफी हज़रात शोहरत और सौभाग्य, बीमारी और मृत्यु के ऊपर खुद के शक्ति हासिल होने का दावा करते हैं,  भोले भाले और अशिक्षित लोगों को धोखा देते हैं और उनके विश्वास को मज़ाक बनाते हैं। सूफीवाद का मकसद  मोमिन के दिल को अल्लाह के सिवा हर चीज़ से हटाना था,  ये पुरोहिती भ्रष्टाचार और नैतिक बिगाड़ में तब्दील हो गयी।

जब सल्फ़ी दृष्टिकोण ने मध्यकाल के विभिन्न समाजों में अपनी जड़ें मजबूत करना शुरू कर दिया,  ये यूरोपीय संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के जवाब और आंशिक रूप से सूफी तरीके में आए बिगाड़ के खिलाफ विद्रोह के रूप में था। सल्फ़ियों ने मुसलमानों को प्रेरणा दी कि वो शिर्क (किसी को अल्लाह के साथ शामिल करने का गुनाह) से बचें किसी को अल्लाह के साथ शरीक या ये मानना ​​कि इन लोगों के पास खुदाई ताकत है। वो अपने काम को खुद नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के काम की प्रतिछाया के रूप में मानते थे, जिन्होंने अरब को उस समय आम मूर्ति पूजा से निजात दिलाई थी,  इस्लाम से पहले इस ज़माने को ज़मानए जाहिलियत कहा जाता है। लेकिन इतने पर ही ये नहीं रुके। इस्लाम को सल्फ़ सालेहीन की अवधि में वापस ले जाने की इच्छा में सल्फ़ी लोग प्रभावी रूप से धर्म की लगभग पूरे 14 सदियों पुराने इतिहास को पाक साफ करना चाहते हैं, जो न सिर्फ अनुचित है, बल्कि ऐसा करना असंभव है।

इस प्रक्रिया में सल्फ़ी विचारधारा सांस्कृतिक रूप से पीछे लो जाने वाली और अरबी साम्राज्यवाद, या अधिक स्पष्ट रूप से 'सऊदी साम्राज्यवाद'  को अच्छे ढंग से पेश करने वाले में तब्दील हो गया। सल्फ़ी दृष्टिकोण का सऊदी संस्करण वहाबियत इस पर गालिब आ गया। लेकिन शुरू से ही वहाबियत एक धार्मिक दृष्टिकोण कम और राजनीतिक शक्ति हासिल करने के लिए एक उपकरण अधिक था। सऊद ने प्रारंभिक में अरब प्रायद्वीप पर नियंत्रण हासिल करने की कोशिश की और हाल के दशकों में मुस्लिम दुनिया और अब यूरोप और अमेरिका में मुसलमानों की आबादी तक पहुँचने की कोशिश कर रहे हैं।

वहाबी- सऊद गठबंधन राजनीतिक विरोध को कुचलने के लिए धर्म की नैतिक सत्ता का उपयोग करता है और सल्फ़ की तरफ वापसी का नारा मुस्लिम समाज में सांस्कृतिक समरूपता को थोपना है,  जो इसके नतीजे में उनके राजनीतिक लक्ष्य को भी पूरा करता है। इस गठबंधन की हमेशा पश्चिमी साम्राज्यवाद से दोस्ती रही है पहले ब्रिटिश साम्राज्यवाद से और अब अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ है, जो खुद स्पष्ट है।

लेकिन यही सब कुछ नहीं है। आमतौर से सल्फ़ी दृष्टिकोण, और खासकर वहाबियत ने मुसलमानों के साथ बदतरीन ज़्यादतियाँ की हैं जिनके साथ लोगों को रहना पड़ता है। राजनीतिक शक्ति का ये हथियार कभी भी केवल वैचारिक नहीं रहा है, हिंसा हमेशा इसमें शामिल थी। गठबंधन के शुरुआती दिनों में, मोहम्मद बिन सऊद के नेतृत्व में वहाबी सेनाओं ने मध्य अरब के सभी शहरों और कस्बों को 'मुशरिकाना अमल के लिए सज़ा के रूप में नष्ट करती थीं। 1773 में रियाद और 1801 में कर्बला पर कब्जे के दौरान हजारों निर्दोष मुसलमानों की हत्या की गई।

1960 और 1970 के दशक के मुस्लिम ब्रदरहुड और आज के अल-कायदा और बोको हराम सल्फ़ी तरीके के असल वारिस हैं जो हत्या और विनाश की अपनी परंपराओं का लिहाज़ रखते हुए उसे जारी रखे हुए हैं। इसके साथ साथ ये लोग इस्लाम को उस अंदाज़ में ढाल रहे हैं जो खुद को तानाशाही और अत्यधिक सख्त विश्वास वाला बताए और जो इस दुनिया में मुसलमानों को शक और संदेह,  भय और घृणा की वस्तु बनाने पर तुले हुए हैं और विडम्बना ये है कि ऐसा केवल गैर मुसलमानों के लिए ही नहीं बल्कि खुद मुसलमानों के लिए भी वो ऐसा चाहते हैं।

एक और तरीका

विद्वानों और सामाजिक वैज्ञानिकों के साथ लेखकों और पत्रकारों की एक बड़ी संख्या ने अब सैद्धांतिक और वैचारिक आधार पर सल्फ़ी विचारधारा को चुनौती देना शुरू कर दिया है, उसकी राजनीति और साम्राज्यवादी जड़ों और उसके विकास में पेट्रो डालर की भूमिका को भी बेनक़ाब कर रहे हैं। बहुत से लोग अक्सर बहस करते हैं कि सल्फ़ी तरीका कभी भी मुस्लिम समाज में आम मुसलमानों की चयनित पद्धति नहीं थी। वो इन समाजों के सूफी विरासत की ओर ध्यान दिलाते हैं, इसके स्थानीय गैर इस्लामी सामाजिक परंपराओं के साथ मेलजोल को सबूत के तौर पर पेश करते हैं कि इस्लाम ऐतिहासिक रूप से एक उदारवादी, व्यापक और शांतिपूर्ण विश्वास रहा है।

लेकिन ऐसा करने में वो एक महत्वपूर्ण कारण को नज़रअंदाज़ करते हैं कि आख़िर इंजीनियरों, डॉक्टरों और अन्य युवा पेशेवरों और छात्रों सहित आधुनिक मुस्लिम समाज में सल्फ़ी दृष्टिकोण से चिपके हुए इतने अधिक लोग क्यों हैं। इसकी वजह सूफी तरीके का भ्रष्टाचार, उसकी मिथ्यावादी ख़ुराफ़ात और नकली रहस्यवादियों के निरर्थक बातचीत करने वाले पंथ में इसका तब्दील हो जाना है। शिक्षित या आधुनिक जमाने की आम समझ रखने वाले कब्रों पर दुआ और जाप करने और पैसों और फूलों को अजीब ढंग के कपड़े पहने बकवास करने लोगों को पेश करने को बजा तौर पर हास्यास्पद मानते हैं। वो इसे गंभीर रूप से धर्म नहीं मान सकते हैं, खासकर जो एक खुदा के मानने वाले और मूर्ति पूजा का विरोध करने वाले होने का दावा करते हैं।

असामान्य सामाजिक और सांस्कृतिक गतिशीलता और नैतिक गिरावट के इस दौर में, सल्फ़ी तरीका इस तरह के मुसलमानों के लिए एक स्वाभाविक अपील रखता है। धार्मिक मामलों में इसका कट्टरपन आस्था और पहचान की उनकी जरूरतों के लिए शरणस्थली के रूप में काम करता है, इसका कट्टरपन नैतिक रूप से काले और सफेद को अलग करने में मदद करता है। सल्फ़ियों के सुनहरे दौर में जब मुसलमान वैसे थे जैसा कि अल्लाह, पैगम्बर (स.अ.व.) और कुरान उनसे अपेक्षा करता था,  उसकी ओर वापस लौटने का वादा पलायनवादी कल्पना है। बल्कि काफी समय पहले दुनिया को छोड़ चुके लोगों की कब्रों पर दुआ करने पर दुनियावी इच्छाओं के पूरा होने के बारे में सल्फ़ी दृष्टिकोण का भय अधिक तर्कसंगत और यहाँ तक कि वैज्ञानिक लगता है।

जबकि राजनीति और पेट्रो डालर ने सल्फ़ी तरीके के लिए रास्ता हमवार किया है,  बहुत से मुसलमान इसलिए गुमराह हो गए कि कालभ्रम का उतार चढ़ाव जो सूफी तरीके पर दाग लगाता है और बुद्धि और चेतना वाले लोगों को इस राह पर चलने को मुश्किल बनाता है। बसों में बम विस्फोट करने  वालों का  मुकाबला सिर्फ कब्रों पर अगरबत्ती जला  कर नहीं हो सकता है। अगर आधुनिक शिक्षित मुसलमानों को सल्फ़ी तरीके को छोड़ने के लिए कहा जाएगा तो उन्हें ऐसा रास्ता दिखाना होगा जो धर्म को पवित्र दिखावा और दिव्य शोषण वाला न बनाता हो,  बल्कि एक ऐसा रास्ता जो उनकी चेतना को अपील करने वाला हो और उनकी सामान्य समझ का सम्मान करता हो।

सैफ शाहीन, आस्टिन में स्थित टेक्सास विश्वविद्यालय में रिसर्च स्कालर हैं। वो न्यु एज इस्लाम के लिए नियमित रूप से कॉलम लिखते हैं।

URL for English article: https://newageislam.com/islamic-ideology/between-salafism-sufism,-search-modern/d/8090

URL for Urdu article: https://newageislam.com/urdu-section/modern-islam-salafi-sufism/d/8634

URL for this article: https://newageislam.com/hindi-section/salafism-sufism-modern-islam/d/8635


Loading..

Loading..