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Hindi Section ( 14 Aug 2012, NewAgeIslam.Com)

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A Brief Reflection on the Religious Justification Behind Wearing of Face veils चेहरे के पर्दे (बुर्का और नक़ाब) के बारे में धार्मिक औचित्य और इसकी मान्यताओं पर संक्षिप्त विचार

 

डाक्टर अदिस दुदरीजा, न्यु एज इस्लाम

2 अप्रैल, 2012

(अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

हाल के दिनों में मुस्लिम महिलाओं द्वारा बुर्का और नक़ाब पहनने के मसले पर पश्चिमी देशों के उदारवादी लोकतंत्रों में बड़ी संख्या में गर्मा गर्म बहस उभर कर सामने आई है। इस छोटे से लेख में बुर्का और नक़ाब पहनने की परंपरा के पीछे दिए जाने वाले धार्मिक औचित्यों पर मैं संक्षिप्त विचार पेश करूँगा और जो लोग इसे धार्मिक रूप से आवश्यक बताते हैं उनकी दलील में शामिल व्याख्याओं और अन्य मान्याताओं को भी प्रस्तुत करूँगा।

 इसमें कोई शक नहीं है कि वो लोग जो चेहरे के पर्दे को आवश्यक बताते हैं वो अपनी बात के समर्थन में कई प्रमाणिक (सही) हदीस (परंपरा में जिसे सब लोगों की राय में नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से संबंधित किया जाता है) और कुरान की आयत (33:53- अन्य आयतों जैसे 33:59 को भी इस्तेमाल किया जाता है लेकिन मुख्य रूप से बालों सहित शरीर को ढांकने न कि चेहरे को ढांकने की दलील के रूप में इसका इस्तेमाल किया जाता है) जो कि नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के घर पर आने वाले मेहमानों को संबोधित करती है कि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की पत्नियों के सामने कैसे पेश आएं, लेकिन इसकी व्याख्या 'सभी मोमिनों की माँओ के रूप में नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की पत्नियों के आदर्श चरित्र के आधार पर इसे सभी मुस्लिम महिलाओं पर लागू होने वाली आयत के रूप में किया जाता है।

इसके अलावा वो लोग जो चेहरे के पर्दे को धार्मिक रूप से अनिवार्य भूमिका के रूप में तर्क देते हैं वो मर्द और औरतों की लैंगिकता की विशेष समझ के आधार पर इसका औचित्य पेश करते हैं और जो कुरान में तो नहीं है लेकिन कुछ 'सही' या प्रामाणिक हदीसों में है। इन लोगों ने कानूनी कहावत blocking the means’  के आधार पर बुर्का और नक़ाब के धार्मिक मानक चरित्र को भी अपनाया है जिसे इस्लामी कानून के सिद्धांत और उसके प्रमुख साहित्य में भी तलाश किया जा सकता है, और जो दलील देते हैं कि कुछ भी नैतिक रूप से नापसंद परिणाम की ओर ले जा सकता है यानी हराम अपने आप में ही हराम है।

चेहरे के पर्दे के मामले में एक सवाल जो अक्सर बड़ी संख्या में होने वाले विश्लेषणों में नहीं पूछा जाता है वो ये है कि कितनी महिलाएं चेहरे का पर्दा करने का चयन करेंगीं (या कितने पुरुष इसके लिए कहेंगे/ ऐसा करने के लिए औरतों को मजबूर करेंगे) अगर वो नहीं सोचते हैं कि ये धार्मिक दृष्टि से आवश्यक / अनिवार्य या यहाँ तक कि पसंदीदा होगा? ये विशेष रूप ऐसा है अगर एक विकल्प और प्रामाणिक '(और मेरे विचार में राज़ी करने वाली व्याख्या) प्राचीन व्याख्या और ज्ञान मीमांसा से संबंधित फ्रेमवर्क के तहत हो, तो उसे निम्नलिखित पंक्तियों के अनुसार दिया गया था।

1. सही, हदीस जिनका उल्लेख किया गया है वो अकेली हदीस (अहद) हैं और प्राचीन इस्लामी कानूनी सिद्धांत के अनुसार विद्वता को कानून के स्रोत के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

2. आयत शब्द हिजाब, न कि नक़ाब/बुर्का का इस्तेमाल करती है और उसे एक ऐसे नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के संदर्भ में देखा जाना चाहिए जिनके व्यक्तित्व के बारे में सभी जानते थे और जिनकी अपनी पत्नियों सहित व्यवहारिक रूप से बहुत कम या कोई निजी जीवन नहीं था। बहुत से लोग अपनी इच्छा से आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम घर पर आते और जाते थे। आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के घर में आज की तरह दरवाजे नहीं थे। इसके अलावा, आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का घर और उनकी पत्नियों के कमरे बड़ी मस्जिद के परिसर का ही हिस्सा थे। इस तरह यह एक बहुत ही व्यस्ततम जगह थी। शायद यह समानता यहाँ उचित होगी। उदाहरण के लिए, ऐसे माता पिता जिनके बच्चे हों और जो प्रौढ़ता को प्राप्त कर चुके हों, तो वो अपने बच्चों से ये ज़रूर कहेंगे कि माता पिता के कमरे के दरवाजे न खोलें जब वो अंदर हों, जब तक कि उन्हें ऐसा करने के लिए माता पिता से इजाज़त न मिल जाये।

इसलिए आयत की मन्शा पर इस परिप्रेक्ष्य में विचार करना चाहिए। वास्तव में हदीस ने इसकी पुष्टि की है कि प्राचीन इस्लामी परंपरा औपचारिक रूप से इस आयत से जुड़ी हुई है जिन पर कि सवाल खड़े किए गए हैं। उदाहरण के लिए, वही के नाज़िल होने के संदर्भ में नए शादी शुदा जोड़े का कमरा (यानी पैग़म्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और उनकी पत्नी हज़रत ज़ैनब रज़ियल्लाहू अन्हा) है और उद्देश्य उनकी अंतरंगता की रक्षा करना और तीसरे व्यक्ति (हज़रत अनस रज़ियल्लाहू अन्हा नाम के सहाबी) को खारिज करना था। इस मामले पर मौजूद हदीस की तहरीरों से (बड़ी संख्या में विभिन्न संस्करण) पता चलता है कि संक्षेप में वही के नाज़िल होने के पीछे मौक़ा था कि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम अपनी शादी की रात को खुद को कुछ उद्दण्ड मेहमानों से अलग नहीं कर सके क्योंकि वो शादी के बाद खाने के दौरान और उसके बाद बातचीत में खोए हुए थे, जबकि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम हज़रत ज़ैनब रज़ियल्लाहू अन्हा के साथ अपनी शादी की पहली रात अकेले रहना चाहते थे। परोक्ष रूप से उन लोगों को बताने की कई कोशिशों के बाद कि वो ये समझ जाएं कि उनके जाने का समय हो गया है और वह उनके घर से निकल कर उनके आंगन में चले जाएं। इस घटना के गवाह हज़रत अनस इब्ने मलिक रज़ियल्लाहू अन्हू के अनुसार तब इस अवसर पर नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने वो आयत तिलावत फ़रमाई जिस पर हम सवाल कर रहे हैं। 33:53 "ऐ ईमान वालो! नबी (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) के घरों में दाखिल न हुआ करो सिवाय इसके कि तुम्हें खाने के लिए इजाज़त दी जाये (फिर वक्त से पहले पहुंच कर) खाना पकने का इंतजार करने वाले न बना करो, हाँ जब तुम बुलाए जाओ तो (उस वक्त) अन्दर आया करो फिर जब खाना खा चुको तो (वहाँ से उठकर) तुरंत चले जाया करो और वहां बातों में दिल लगाकर बैठे रहने वाले न बनो। यक़ीनन तुम्हारा ऐसे (देर तक बैठे) रहना नबी (अकरम) को तकलीफ़ देता है और वो तुमसे (उठ जाने को कहते हुए) शर्माते हैं और अल्लाह हक़ (बात कहने) नहीं शर्माता, और जब तुम इन (अज़्वाजे मोतह्हरात) से कोई सामान मांगो तो उनसे पर्दे के पीछे से पूछा करो, ये (अदब) तुम्हारे दिलों के लिए बड़ी तहारत का सबब है और तुम्हारे लिए (कभी जायज़) नहीं तुम रसूलल्लाह (स.अ.व.) को तकलीफ़ पहुँचाओ और न ये (जायज़) है कि तुम उनके बाद अबद तक उनकी पत्नियों (मोतह्हेरात) से निकाह करो, बेशक ये अल्लाह के नज़दीक बहुत बड़ा (गुनाह) है," इस आयत की तिलावत के बाद नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपने (और अपनी पत्नी हज़रत ज़ैनब रज़ियल्लाहू अन्हा) और हज़रत अनस रज़ियल्लाहू अन्हू के बीच पर्दा कर लिया (हदीस कुरान के शब्द हिजाब जिसका अर्थ पर्दा हैं, इसके विकल्प के रूप में उपयोग करता है)।

3. मर्द और औरत की लैंगिकता जो कुरान में नहीं है, इसके बारे में प्राचीन समझ इस तरह थी कि जिसके अनुसार महिलाओं के शरीर को नैतिक रूप से बिगाड़ पैदा करना वाला (लैंगिकता के विपरीत) माना जाता था और ये कि पुरुष महिलाओं की अप्रतिरोधी लैंगिकता के खिलाफ विरोध कर पाने में असमर्थ थे और जिसके कारण सामाजिक और नैतिक अराजकता (फ़ितना) पैदा होती थी। कुछ हदीसों में इस मानसिकता के कुछ सुबूत हैं। लेकिन पुरुष/महिला लैंगिकता के बारे में ये कथन अनुभव के आधार पर झूठ है और किसी भी हदीस का सबूत जो अनुभव के आधार पर झूठ हो, यहां तक ​​कि प्राचीन हदीस विज्ञान के अनुसार भी, वो ठीक नहीं हो सकती है, अगर यह 'सही' मानी जाती हो तब भी। मुझे लगता है कि हम में से अधिकतर लोग इस बात से सहमत होंगे कि औरतों के शरीर को नैतिक रूप से बिगाड़ पैदा करने वाला प्रस्तावित करना भी नैतिक बुराई है।

4. इस्लामी कानूनी प्रक्रिया के साहित्य में पाई जाने वाली कानूनी कहावत, ‘blocking the means’ भी अस्पष्ट है क्योंकि ये केवल महिलाएं नहीं हैं जिन्हें इस का भार बर्दाशत करना होगा बल्कि अगर इस प्रक्रिया को तार्किक तरीके से आगे बढ़ाया गया तो ये अत्यंत कठोर होगा और कोई भी इस के आधार पर किसी भी चीज़ की वजह बता देगा (उदाहरण के लिए जैसे सऊदी अरब में महिलाओं की ड्राइविंग का मामला, फोन पर विपरीत लिंग के असम्बंधित व्यक्ति से बात करने या पत्रव्यवहार करने के मामले में)। अंत में, पुरुष/महिला लैंगिकता के बारे में प्राचीन दृष्टिकोण मनुष्य को नैतिक विकास करने का सक्षम नहीं रखता है, किसी नैतिक, अनुशासनात्मक प्रशिक्षण के मामले में यह प्रस्ताव देना कि कोई फ़ितना नैतिक रूप से बुरे कार्यों की ओर अवश्य ले जाएगा। इसके बजाय, पुरुषों को नैतिक यौन बुराई के शिकार के रूप में पेश किया जाता है और ये बुराई महिलाओं से संबंधित कर पेश की जाती है। इस विचारधारा को मानने पर भी बिना ध्यान दिये महिलाओं को लैंगिक रूप से उसी भौतिक वस्तु के रूप में पेश करता है जैसा कि इस विचारधारा के प्रवर्तक उतनी तेजी से पश्चिमी सभ्यता पर आरोप लगाते हैं। क्या ये नैतिक रूप से बुरा नहीं है?

एक तरह से ये मुझे याद दिलाता है, जो हाल ही में मैंने बीबीसी रेडियो पर मलेशिया के स्कूलों में यौन शिक्षा की शुरुआत के बारे में सुना था। उदाहरण के लिए जो इसका विरोध (पुरातनपंथी पारंपरिक मुसलमान) करते हैं वो इस तर्क का उपयोग करते हैं कि स्कूलों में यौन शिक्षा की शुरुआत से संबंधित लोगों की यौन गतिविधि में अवश्यक रूप से वृद्धि हो जाएगी। ये एक अजीब तर्क है और अक्सर ये खुद ही पूरी हो जाने वाली भविष्यवाणी के रूप में काम करती है।

डॉक्टर अदिस दुदरीजा मेलबर्न विश्वविद्यालय के इस्लामिक स्टडीज़ विभाग में रिसर्च एसोसिएट हैं और वो न्यु एज इस्लाम के लिए नियमित रूप से कॉलम लिखते हैं।

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