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Hindi Section (25 Apr 2014 NewAgeIslam.Com)



It is Good to Ignore the Cows अच्छा यही है फेर ले आंखों से गाय को

 

 

 

 

अभिजीत, न्यु एज इस्लाम

25 अप्रैल, 2014

हिन्दुस्तान की तारीख में पिछले कई सौ बर्षो से गोहत्या एक बड़ी वजह रही है जिसने इस देश के दो बड़े संप्रदायों को हमेशा आपस में संधर्षरत रखा है और कभी भी उनके बीच स्थायी भाईचारा और एकता पनपने ही नहीं दी है । जाहिर है जब किसी देश के दो बड़े संप्रदाय आपस में संधर्षरत होंगे तो फिर वो देश कभी तरक्की नहीं कर सकेगा । देश के दो बड़े संप्रदायों के बीच का संशय और अविश्वास राष्ट्रीय एकात्मता को खंडित करता है और अंततः यही विभाजन की वजह भी बनती है। 1947 में सनातन काल से अखंड रही भारत भूमि विभाजित हो गई। इस विभाजन के पीछे कई वजहें थी जिसमें एक बहुत बड़ी वजह गोहत्या भी थी। पाकिस्तान के मांग के समर्थन में मोहम्मद अली जिन्ना ने जो तर्क दिये थे उसमें उन्होनें ये भी कहा था कि हिंदू और मुसलमान कभी भी एक साथ नहीं रह सकते क्योंकि चीजों को लेकर दोनों की मानसिकता में भारी अंतर है !"

जिन्ना का ऐसा कहना यथार्थ ही था क्यूंकि मसलन एक तरह हिंदू जहां गाय को माता मानता है वहीं एक मुसलमान की नज़रों में गाय का दर्ज़ा सिर्फ एक पशु का है, जिसका मांस खाने से भी उसे कोई गुरेज नहीं है ! इसलिए ऐसा कहा जा सकता है की भारत-विभाजन की बड़ी वजहों में एक गोहत्या भी रही होगी ! अगर हिन्दुस्तान में गोहत्या का मसला न होता तो शायद देश विभाजन की एक बड़ी वजह टल जाती।    

इन सबके बाबजूद हमलोगों के लिये सबसे सुखद बात यह है कि इस देश में कई ऐसे ऋषितुल्य मुसलमान रहें हैं जिन्होनें अपनी-2 क्षमताओं के अनुरुप गोहत्या जैसे पापकर्म और धृणित कृत्य को रोकने के लिये निरंतर प्रयास किया है। ऐसे सद्प्रयास करने वालों में जहां मुसलमान फकीर रहें हैं, वहीं बादशाह भी, समाजसेवक, लेखक, पत्रकार, बुद्धिजीवी ,शायर और कवि तक इस मुहिम में शामिल रहें हैं।

सर्वविदित है भारतबर्ष पर बरसों-बरस तक मुसलमानों की हुकूमत रही। कभी तुर्क, कभी मुगल, कभी अफगान इन सबों ने यहां शासन किया। कई लोगों के लिये यह तथ्य चैंकाने वाला और हतप्रभ करने वाला हो सकता है पर यह सुखद सत्य है कि प्रथम मुगल बादशाह बाबर ने अपने बेटे हुमायूँ को मरते वक्त यही वसीयत की थी कि 'ऐ मेरे प्यारे बेटे। इस मुल्क के लोगों को यदि अपना बनाना हो और तुम्हें उनका दिल जीतना हो तो गोहत्या पर रोक लगाना।' अबुल फजल ने आईने-अकबरी में लिखा है कि अकबर ने हिन्दू भावनाओं का सम्मान करते हुए गोहत्या पर प्रतिबन्ध लगाई थी ! बर्नियर ने अपने यात्रा विवरण में इस बात का जिक्र किया है कि जहाँगीर के शासन काल में भी गोहत्या पर रोक थी ! अपवादस्वरूप कुछ मुगल बादशाहों को अगर छोड़ दे तो अधिकांश मुगल बादशाहों के समय में गोहत्या पूर्णरुपेण प्रतिबंधित थी। आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर ने तो 28 जुलाई 1857 को बकरीद के मौके पर गाय की कुरबानी न करने का फरमान जारी किया था और बाकायदा यह ऐलान कर दिया था कि गोहत्यारे के लिये मौत की सजा होगी। दक्षिण में हैदर अली और टीपू सुल्तान तथा अवध में नबाब वाजिद अली शाह के समय भी गोहत्या प्रतिबंधित थी।

1857 की क्रांति में हिंदू और मुसलमानों के बीच अंग्रेजों के खिलाफ जो एकता दिखी थी तो उस एकता के पीछे की एक बड़ी वजह भी यही थी कि उस समय के प्रमुख मुसलमान नेताओं और मौलवियों ने गोहत्या बंदी का बिगुल फूंका था। बाद में जब अंग्रेजों को हिंदू-मुस्लिम एकता के पीछे की इस वजह का पता चला तो उन्होंनें इस एकता को तोड़ने के लिये कई चालें चलनी शुरु कर दी और अपने इस चाल में वो कामयाब भी हो गये। परंतु बाद में अंग्रेजों के इस चाल को कई प्रबुद्ध मुस्लिम नेताओं ने भांप लिया। यही कारण था कि सर सैयद अहमद और मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे कई मुस्लिम नेताओं ने मुसलमानों का आह्वान किया कि वो अंग्रेजों के इस चाल में न फंसे और गोहत्या से दूर रहें। प्रख्यात शायर अकबर इलाहाबादी ने भी मुसलमानों को यही सलाह दिया-                               

                                अच्छा यही है फेर ले आंखों से गाय को ,

                                क्या रखा है रोज की इस हाय-हाय  से।

इतना ही नहीं खिलाफत के समय भी जब सारा माहौल सांप्रदायिक हो चुका था, उस दौरान भी मौलाना अब्दुल बारी नामक मुस्लिम विद्वान ने कहा था कि मैं मौलवी होने के अधिकार से ये बात कह रहा हूँ कि इस्लाम में गोवध अनिवार्य नहीं है। आजादी के पश्चात् भी अनेक ऐसे मुसलमान हैं जो इस पुनीत कार्य और इस पुनीत परंपरा को आगे बढ़ा रहें हैं। हाल ही में जमीयत-उलेमा-ए-हिंद के मौलाना असद मदनी तथा ऑल इंडिया जमीयतुल कुरैश के अध्यक्ष ने भी गोहत्या बंदी संबंधी एक प्रस्ताव केंद्र को भेजा है। इसी तरह राष्ट्रवादी मुस्लिम तंजीम के कार्यकर्ताओं  ने गोहत्या बंदी संबंधी प्रस्ताव पर 10.50 लाख मुसलमानों का हस्ताक्षर करवाकर राष्ट्रपति व केद्र सरकार को ज्ञापन सौंपा है। इन सद्प्रयासों की श्रृंखला में ऐसा ही एक नाम है लखनऊ से निकलने वाले साप्ताहिक अखबार 'दास्ताने-अवध' के संपादक अब्दुल वहीद का। इस अखबार के प्रकाशन का मुख्य उद्देश्य है हिंदू-मुस्लिम एकता को सुढ़ृढ़ करना। इस अखबार के प्रायः हर अंक में गोहत्या बंदी और गाय के महत्त्व पर एक लेख रहता ही है। संपादक अब्दुल वहीद कहतें हैं कि 'गोहत्या इस्लाम विरोधी है और मेरा एकमात्र उद्देश्य है गोहत्या बंदी के समर्थन में मुस्लिम समाज को एकजुट करना।' वहीद आगे कहतें हैं कि जब भी मैं कहीं ये पढ़ता या सुनता हूँ कि फ्लां जगह किसी मुसलमान ने गोहत्या की है अथवा फ्लां जगह कोई मुसलमान गाय के साथ पकड़ा गया है तो ये सुनकर मेरा दिल दुखता है, इसलिये मैं चाहता हूँ कि गोहत्या बंदी के मेरे इस अभियान में ज्यादा से ज्यादा लोग जुड़ें। वहीद अब इस अखबार का प्रकाशन हिंदी में भी कर रहें हैं ताकि इसकी आवाज उन मुसलमानों तक भी पहुँचे जो उर्दू नहीं जानतें हैं अथवा कम जानतें हैं।

इस राह में सबसे सुखद अनुभूति तब हुई जब दुनिया के मुसलमानों की दूसरे नंबर की यूनिवर्सिटी दारुल-उलूम देबबंद से भी इस बारे में एक फतवा आ गया। आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के वंशज नवाब शाह मो. शुऐब खान के इस सवाल पर कि-

'क्या कहते हैं उलामाएदीन मुफत्यान निम्न मसले में (1) मालूम है कि गाय की कुरबानी जाईज हुक्मे शरीअत में से है। किन्तु हिन्दुस्तान में इस जानवर की श्रद्धा की नजर से देखा जाता है और हिन्दू भाईयों के ह्रदय को ऐसा करने से दुःख होता है और वह इस पर शिकायत करते हैं तो, क्या इस हालात में शरीअत कोई अन्य हुक्म (विकल्प) सुझाती है?'

दारूल उलूम देवबंद की तीन सदस्यीय समिति के सदस्यों मुफ्ती हबीबुर्रहमान, मुफ्ती जफरऊल्लाह और एक अन्य मुफ्ती ने इस पर फतवा देते हुए कहा –

"निःसंदेह गाय की कुरबानी मुबाह (करने अथवा न करने योग्य) है। किन्तु एक बहुसंख्यक समुदाय की दिले-आजारी (हृदय दुखाना) व उनके धर्म एहतराम करना मकरूह (बुरा) है। हुजूर पाक (हजरत मुहम्मद सल्ल0) ने फरमाया (कहा) है कि अगर किसी मुसलमान ने किसी धर्म के इनसान को नाहक तकलीफ पहुंचाई तो मैं उस गैरमुस्लिम (दूसरे धर्म वाले) की तरफ से कयामत (प्रलय) के दिन उस खुदा के सामने उस मुसलमान के विरुद्ध खड़ा होऊंगा और उसे इंसाफ (न्याय) दिलाऊंगा। किसी का दिल दुःखाना यूं भी शरीअत (इस्लामी कानून) में गुनाह है और गाय की कुरबानी करना वाजिब (उचित) नहीं है अर्थात जरूरी नहीं है।"

देबबंद के इस फतवे का मुसलमानों ने जोरदार स्वागत किया ! जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख सचिव और राज्य सभा सदस्य मौलाना महमूद मदनी ने इस फतवे पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा देश में गोहत्या पर 1955 में प्रतिबंध लगाया गया था। संवैधानिक मानकों का आदर किया जाना चाहिए। मुझे नहीं लगता कि हिंदू-मुस्लिम मैत्री बढ़ाने वाले इस फतवे से किसी को एतराज होगा। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष मौलाना कल्बे सादिक भी इस फतवे से सहमत थे कि गोहत्या हर हाल में प्रतिबंधित होनी चाहिए ! उन्होंने कहा कि दारूल उलूम का फतवा तो आज आया है पर शिया कौम तो हजरत इब्राहीम और हजरत ईस्माइल की याद में मनाई जाने वाली बकरीद के अवसर पर पहले से ही यह प्रतिबंध मानती आई है। गाय के विकल्प के तौर पर कुर्बानी के लिए बकरा तो है ही इसलिए हम मुसलमानों को हिन्दू भाइयों के जज्बात का ध्यान रखना ही चाहिए। शिया नेशनल फ्रंट के महासचिव याकूब अब्बास ने भी यही कहा कि अगर गोहत्या से किसी की भावना को ठेस लगती है और फसाद होता है तो ऐसी कुर्बानी बेकार है ! देबबंद के इस फतवे का मुसलमानों के हर फिरके से मिला समर्थन स्पष्ट करता है कि भारतीय मुसलमान ये चाहतें हैं कि इस देश में फसाद की एक बड़ी वजह खत्म हो और हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एकता बढ़े। गोहत्याबंदी के मुद्दे पर इन सबका समर्थन करना सबसे राहत की बात है।

गोहत्या न करने की ऐसी ही अपील बरेलवी मस्लक के विद्वान हाशमी मियां की तरफ से भी आया। गोहत्या बंदी की अपील करते हुये उन्होंनें कहा, खुदा ने सबके सब फल, सब्जियां खाने के लिये जायज ठहराये लेकिन हर जानवर नहीं। यानि स्वास्थ्य के लिये जो ठीक है वो सब जायज है। जब हमारे हिंदू भाईयों को हमारे गोहत्या करने से दुःख होता है तो हम अपने पड़ोसी के लिये अपना खाना क्यों नहीं बदल लेते? इसलिये वह खाना खाओ जो तुम्हारा स्वास्थ्य बढ़ाये और साथ ही पड़ोसी धर्म को भी मजबूती दे।

मुगल बादशाहों का, टीपू सुल्तान या हैदर अली का, सर सैयद, मौलाना अबुल कलाम आजाद, अकबर इलाहाबादी, देवबंद, बरेली और शिया पंथ के उलेमाओं का फतवा या फिर अब्दुल वहीद जैसे लोगों के ये प्रयास अकारण या अनायास ही नहीं है वास्तव में यह तो इस्लाम की स्वाभाविक प्रवृति है जो अपने साथ रहने वाले गैरमुसलमानों के भावना का ख्याल रखने की सीख देती है। पूरे कुरान या हदीस में एक भी आयत ऐसी नहीं है जिसमें ये कहा गया हो कि गोहत्या इस्लाम में फर्ज है अथवा आवश्यक मजहबी कर्तव्य है। गोहत्या नहीं करने वाले मुसलमान ये जानतें हैं कि गोहत्या इस्लाम में फर्ज तो नहीं ही है साथ ही ऐसा करना इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतो के खिलाफ भी है। वो ये भी जानतें हैं कि इस्लाम में पड़ोसियों का ख्याल रखने पर कितना जोर दिया गया है। इसके मुतल्लिक कई हदीसे हैं-

- उक्बा बिन आमिर से रिवायत एक हदीस है जिसमें आता है कि 'कयामत के दिन बंदों के हक से संबंधित जो मुकदमे खुदा के यहां पेश होंगें उसमें सबसे पहला मुकदमा उन दो पड़ोसियों का होगा जो अड़ोस-पड़ोस में रहते हुये भी एक-दूसरे को सताने से न चुका हो और यह मुकदमा खुद हुजूर (मो0 साहब) की मौजूदगी में होगा।'

- अबू हुरैरा से रिवायत है। इसमें आता है कि एक आदमी रसूल (सल्ल0) के पास आकर कहता है कि हुजूर फ्लां औरत नफ्ल नमाज पढ़ने, नफली रोजा रखने और सदका करने के लिये बहुत मशहूर है परंतु वो अपने पड़ोसियों को बहुत सताती है, उसके बारे में क्या हुक्म है? रसूल (सल्ल0) ने फरमाया- उसे बता दो कि वो जहन्नमी है। उस आदमी ने कहा, हुजूर एक और औरत है जो नमाज बहुत कम पढ़ती है, रोजे भी कम ही रखती है और सदका-खैरात भी ज्यादा नहीं करती परंतु वो अपने जुबान से भी अपने पड़ोसियों को नहीं सताती, उसके बारे में क्या हुक्म है? रसूल (सल्ल0) ने फरमाया- उसे जन्नती होने की खुशखबरी दे दो।

पड़ोसियों का हक व उनका ख्याल रखने संबंधी ऐसी एक नहीं वरन् अनेकों हदीस है।

- हजरत आएशा से रिवायत एक हदीस है जिसमें वो कहतीं है कि मैनें अल्लाह के रसूल (सल्ल0) से पूछा, या रसूल (सल्ल0) मेरे दो पड़ोसी हैं उनमें से किसके यहां मैं कोई चीज तोहफे में भेजूं? रसूल (सल्ल0) ने कहा, उस पड़ोसी के यहां जिसका दरवाजा तेरे धर के सबसे करीब है।

- एक बार नबी (सल्ल0) ने फरमाया, खुदा की कसम वह मोमिन ही नहीं है, खुदा की कसम वह मोमिन ही नहीं है, खुदा की कसम वह मोमिन ही नहीं है। सहाबियों ने पूछा, या रसूल (सल्ल0) ! कौन मोमिन नहीं है? रसूल (सल्ल0) ने फरमाया- वो जिसका पड़ोसी उसके शरारत से महफूज न हो।

                    ये सब जानने के बाबजूद अगर कोई मुसलमान गोहत्या जैसा कोई काम करके अपने रसूल (सल्ल0) की नाफरमानी करता है तथा इसके जरिए अपने प्यारे रसूल (सल्ल0) का दिल दुखाता है तो उसके लिए इससे बढ़कर शर्म और लानत की बात और क्या होगी ? उसके लिये इससे भी बढ़कर कोई नुकसान हो सकता है क्या कि जिस रसूल (सल्ल0) के लिये वो दरुद-शरीफ पढ़ता है, जिनके पवित्र नाम को बिना ‘सल्लाहोअलैहिवसल्लम‘ लिये लेना पसंद नहीं करता वही रसूल (सल्ल0) कयामत के दिन उसके इस गैर जरुरी और गैर-बाजिब कृत्य के बदले उसके खिलाफ किसी गैर मुस्लिम के पक्ष में खड़े होंगें। कई मुसलमान तो इसलिये गोहत्या नहीं करते क्योंकि वो जानते है कि उनके रसूल (सल्ल0) ने उन्हें ऐसा करने से मना फरमाया था। मोहम्मद साहब ने कहा था कि गाय के दूध में शिफा है और इसका मांस नुकसानदायक है। रसूल (सल्ल0) द्वारा गाय के संबंध में कही गई प्रामाणिक हदीसें मौजूद हैं जिसे मुसलमान भी जानतें हैं और उसे सहीह करार देतें हैं पर गोहत्या बंदी के मुद्दे पर इन हदीसों को दरकिनार कर मौन धारण कर लेतें हैं।

हजरत मोहम्मद (सल्ल0) और गाय

1. सहीह मुस्लिम शरीफ में बीबी आएशा से रिवायत एक हदीस है जिसमें वो कहती हैं कि रसूल (सल्ल0) ने फरमाया कि गाय का दूध और धी शिफाबख्श है और इसका मांस बीमारी को बढ़ाने वाला है। हयातुल हैवान में भी यह रिवायत आता है और इमाम तबरानी ने भी इस हदीस को सहीह करार दिया है।

2. हयातुल हैवान में इब्ने मसूद (रजि0) से रिवायत है कि नबी (सल्ल0) ने फरमाया कि तुम गाय का दूध और धी खाया करो तथा इसके गोश्त से बचा करो। वो इसलिये क्योंकि इसका दूध और धी इलाज है और गोश्त में बीमारी है।

3. हजरत अब्दुल्ला इब्ने अब्बास से रिवायत एक हदीस में आता है कि पीने की चीजों में नबी (सल्ल0)-ए-करीम को सबसे अजीज दूध था।

4. बीबी आएशा से रिवायत एक हदीस है जिसमें वो फरमाती है कि रसूल (सल्ल0) को हुजूर को खजूर में मक्खन और दही मिला कर खाना बड़ा पसंद था।

5. पैगंबर (सल्ल0) के अलावा  इस्लाम के चौथे खलीफा हजरत अली ने भी यही फरमाया है कि गाय से धी से ज्यादा शिफा किसी भी चीज में नहीं है।                 

6. अबू दाऊद में हजरत अब्दुल्ला बिन उमर से रिवायत एक हदीस है जिसमें वो फरमातें हैं कि जंगे-तबूक के दौरान नबी (सल्ल0) की खिदमत में पनीर पेश किया गया तो आपने बिस्मिल्ला पढ़कर उसे काटा। (यानि रसूल (सल्ल0) पनीर को पसंद फरमाते थे)

7. नबी (सल्ल0) के जमाने में हसीस नाम का हलवा खजूर से तैयार किया जाता था। जिसमें खजूर को धी में तलने के बाद पनीर मिलाकर पकाया जाता था। नबी (सल्ल0) को यह हलवा इस कदर पसंद था कि उन्हानें बीबी सफिया (रजि0) के साथ अपने निकाह के बाद वलीमे में लोगों को हसीस खिलाई और फरमाया, खजूर के साथ पनीर को शामिल करने से इसकी गिजाई इस्तेअदाद में इजाफा होता है और यह जिस्मानी कमजोरी को भी दूर करता है।

8. नसाई शरीफ में हजरत अब्दुल्ला बिन मसूद से रिवायत एक हदीस है। वो कहतें हैं कि नबी (सल्ल0) ने फरमाया, अल्लाह तआला ने हर बीमारी के लिये दवा नाजिल फरमाई है, पस तुम गाय का दूध पिया करो क्योंकि यह हर किस्म के दरख्तों पर चरती है।

9. तिरमिजी शरीफ में हजरत अब्दुल्ला बिन मसूद एक हदीस रिवायत करते हुये कहतें हैं कि नबी (सल्ल0) ने फरमाया, गाय के दूध से इलाज किया करो क्योंकि अल्लाह ने इसमें शिफा रखी है और यह हर किस्म के दरख्तो पर चरती है।

10. तिरमिजी शरीफ में हजरत मल्लिका बिंते अमरु रिवायत करतीं हैं कि नबी (सल्ल0) ने फरमाया, गाय के दूध में शिफा है, इसका मक्खन मुफीद है, अलबत्ता इसके गोश्त में बीमारी है। इसी रिवायत को हजरत सुहैब ने इब्नुस्समनी में नकल की है।

हजरत मोहम्मद (सल्ल0) साहब की जानवरों के प्रति भावना

हजरत मोहम्मद (सल्ल0) साहब के बारे में पवित्र कुरान ने फरमाया है 'ऐ मोहम्मद ! हमने आपको सारे आलम के लिये रहमत बना कर भेजा है।' रसूल (सल्ल0) की रहमत सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं थी वरन् उनके रहमत के समंदर में बेजुबान जानवर और परिंदें भी बसते थे। ये दया इतनी ज्यादा थी कि एक बिल्ली को तकलीफ देने वाली एक महिला के बारे में रसूल (सल्ल0) ने फरमाया था कि यह औरत इस बिल्ली के कारण नरक में दाखिल होगी, जिसने इसे बांध दिया और न ही उसे छोड़ा ताकि वह जमीन के कीड़े-मकोड़े खा सके। (ये हदीस सही है और अब्दुल्ला बिन उमर से रिवायत है) इसी तरह अबू हुरैरा से रिवायत एक और हदीस है जो बुखारी और मुस्लिम शरीफ दोनों में आयी है। इस में रसूल (सल्ल0) ने एक व्यक्ति को जन्नत की खुशखबरी दे दी क्योंकि उसने प्यास से हांफ रहे एक कुत्ते को पानी पिलाया था। एक बार नबी (सल्ल0) किसी अंसारी के बाग में दाखिल हुये, अंदर एक ऊँट था जो नबी (सल्ल0) को देखकर आवाज करने लगा और उसकी आँखों से आंसू गिरने लगे तो रसूल (सल्ल0) उसके पास आये और उसकी गर्दन पर हाथ फेरा तो वह चुप हो गया। रसूल (सल्ल0) ने पूछा, इसका मालिक कौन है? एक अंसारी लड़के ने उत्तर दिया कि ये मेरा ऊँट है। तो रसूल (सल्ल0) ने फरमाया, क्या इस जानवर के बारे में तुमको अल्लाह का डर नहीं है। इस ने मुझसे शिकायत की है कि तुम इसे तेज-2 हांकते हो और निरंतर उसके ऊपर भारी बोझ डाले रखते हो। (अबू दाऊद)

सीरते-रसूल (सल्ल0) में ऐसी एक नहीं हजारों मिसालें है जो तमाम मख्लूकों के प्रति नबी (सल्ल0) की रहमत का बयान करती है। एक बार एक सहाबी नबी (सल्ल0) की खिदमत में हाजिर हुये, उनके हाथ में किसे परिंदे के बच्चे थे जो बेचैनी से चीख रहे थे। नबी (सल्ल0) ने पूछा, ये बच्चे कैसे हैं? सहाबी ने फरमाया, मैं एक झाड़ी के पास से गुजरा तो इन बच्चों की आवाज आ रही थी, तो मैं इनको निकाल लाया। इतनी देर में इन परिंदों की मां भी आकर सहाबी के सर के ऊपर बेचैनी से मंडराने लगी। नबी (सल्ल0) उस सहाबी पर बेहद नाराज हो गये और हुक्म दिया कि जाओ और जाकर अभी इन बच्चों को उस जगह पर छोड़ आओ जहां से लाये हो। यह हदीस अबू दाऊद शरीफ में आई है। इसी तरह अबू दाऊद शरीफ में ही एक और हदीस आई है जो हजरत अब्दुर्रहमान बिन अब्दुल्ला से रिवायत है। वो फरमातें हैं कि हम लोग एक बार नबी (सल्ल0) के साथ सफर में थे। इस बीच नबी (सल्ल0) हाजत के लिये गये तब तक हम एक चिड़ियाँ देखी जो अपने दो बच्चों के साथ थी। हमने उसके चूजों को पकड़ लिया तो उसकी मां जमीन पर आकर तड़पने लगी, इसी बीच रसूल (सल्ल0) आ गये और फरमाया, किसने इस  चिड़ियाँ के बच्चों को तकलीफ दी है? इसके बच्चे को अभी वापस लौटाओ।

एक बार कुछ सहाबियों ने चींटियों के एक बिल को जला दिया, यह खबर सुनकर नबी (सल्ल0) बहुत नाराज हुये और गुस्से में फरमाया, किसने इन चीटिंयों को ऐसी तकलीफ दी है? सहाबियों ने कहा, ये हरकत हमसे हुई है। नबी (सल्ल0) ने गुस्से में फरमाया, आग के साथ सिवाए रब्बुल आलमीन के किसी को ये अख्तियार नहीं को वो किसी को आग में जलाये या उन्हें अजाब दे। (अबू दाऊद)

जिस अरब में लोग इंसान के जिंदा रहने के हक को गवारा नहीं करते थे , उस अरब में मोहम्मद साहब (सल्ल0) ने जानवरों और पशु-पक्षियों के जिंदगी का हक निर्धारित किया। उन्होनें फरमाया, जो कोई व्यक्ति बगैर किसी अपराध के किसी गौरैया या उससे बड़े जानवर को मारता है, तो अल्लाह तआला उससे कियामत के दिन इस बारे में उससे सवाल करेगा। (नसाई शरीफ)

क्या यह बात समझने की नहीं है जो रसूल (सल्ल0) बिल्ली और गौरैया जैसे अदने जीव के (जिससे इंसानों के लिये कोई बिशेष फायदा भी नहीं है) जिंदा रहने के अधिकार को लेकर इतने फिक्रमंद थे वो गाय जैसी बहुपयोगी जीव (जिसे वो तमाम चैपायों की सरदार बताते थे) के कत्ल पर दुःखी नहीं होता होगें? दूध की कीमत का मोल रसूल (सल्ल0) से अधिक और कौन समझ सकता है, यह बात तो उनकी सीरत से साबित है। गौरतलब है कि उनका लालन-पालन बीबी हलीमा ने किया था और उन्हें अपना दूध पिलाया और इस दूध का हक भी रसूल (सल्ल0) ने अदा किया था। वो बीबी हलीमा के औलादों को अपना दूध शरीक भाई और बहन मानते थे।

इस्लामी के इतिहास में ऐसी कई मिसालें हैं जिसमें जीवों पर रहम करने की बात कही गई है। राबिया का तारीखे-इस्लाम में एक बुजुर्ग आबिदा के रुप में बहुत ऊँचा मुकाम है। इन्हीं राबिया के कालखंड में एक और महान संत हुये जिनका नाम संत हसन बसरी था। उन दिनों राबिया ने जंगल को अपना इबादतगाह बनाया हुआ था और एक दिन संत हसन उनसे मिलने आये। दूर से देखा कि जंगल के जानवर और परिंदों राबिया के पास इत्मीनान से बैठें हैं। हसन जब करीब आये तो सारे जानवर और परिंदें वहां से भाग गये। हसन को बड़ा ताज्जुब हुआ और वो राबिया से पूछ बैठे कि मुझे देख कर ये सब भाग क्यों गये? राबिया ने प्रतिप्रश्न किया, आज आपने खाया क्या था? हसन ने कहा, गोश्त। राबिया ने कहा वो मासूम जानवर उस इंसान से नफरत न करें तो और क्या करें जो उन्हें मार के खाना पसंद करता है। इस धटना के बाद हसन ने मांसाहार छोड़ दिया।

इमाम रिजा जो इस्लाम में बहुत बड़े आबिद, हकीम और विद्वान गुजरें हैं वो जब तूस में कियाम कर रहे थे तो उन्होंनें लोगों की एक मजलिस को खिताब करते हुये फरमाया कि गाय के दूध से बच्चे का दिमाग तेज होता है वहीं गाय का गोश्त दिमाग और याददाश्त को कमजोर बनाता है।

पवित्र कुरान में गाय

कुरान का दूसरा अध्याय सूरह बकरह है जिसका अर्थ होता है गाय। कई मुसलमान ये कहतें हैं कुरान के इस अध्याय में गोबलि का प्रावधान मिलता है। परंतु इस संदर्भ में कुरान की आयतें उनके  इस दावे को झुठला देती है। सूरह बकरह में गाय का जिक्र हजरत मूसा के अपने कौम वालों से खिताब के संदर्भ में आया है। मूसा तूर पर्वत पर तौरात की तख्तियां लाने गये थे और इसी बीच सामरी नामक बनी इजरायल के एक शख्स ने किसी बछड़े को अपनी कौम का माबूद धोषित कर दिया। मूसा अपने कौम वालों के झूठे माबूदों को पूजने की आदत से बेजार हो गये थे इसलिये उन्हें ईश्वर की तरफ से हुक्म हुआ कि जिनको इन लोगों ने माबूद बना लिया है उस जीव को इन्हीं के हाथों जिबह करवाओ ताकि झूठे माबूदों की इबादत से ये कौम बच सके। सूरह बकरह की आयत सं0 67 ये 71 में इस पूरी धटना की तफ्सीर मौजूद है। इन आयतों में आता है कि जब हजरत मूसा ने अपने कौम वालों को एक गाय जिबह करने का हुक्म दिया तो उनके कौम वालों ने उनके इस हुक्म पर कहा कि 'क्या तुम हमसे मजाक करते हो?' कौम वालों का ये कहना यह बता रहा है कि उनके लिये यह बिलकुल अनूठी बात थी कि कोई उनसे गाय जिबह करने की बात करे। संभवतः बनी इजरायल में इससे पहले गोहत्या की कोई धटना हुई ही नहीं थी। इसके बाद भी वह मूसा के साथ टाल-मटोल के लहजे में बात करते रहें ताकि उन्हें गोहत्या करने का पाप न करना पड़े। कुरान की आयतों से स्पष्ट है कि गाय को जिबह करने का मूसा का आदेश बछड़े को माबूद बना लेने के तात्कालिक संदर्भ में था। इस धटना का वर्णन कुरान के साथ-2 तौरात में भी आता है पर दोनों ही में कहीं भी ये नहीं वर्णित है कि हजरत मूसा का यह निर्देश कोई स्थायी आदेश था। यहूदी इतिहास में भी कहीं ये उल्लेख नहीं आता है गाय जिबह के मूसा के इस आदेश को परंपरा मान लिया गया हो।

यहां यह बात भी गौरतलब है कि ईसाईयों और यहूदियो के लिये पूजनीय माने जाने वाले ग्रंथ तौरात और इंजील में 80 बार दूध का जिक्र आया है जहां इसकी फजीलत बयांन की गई है।

गोहत्या का समर्थन: मानसिक विकृतों और राष्ट्रद्रोहियों का प्रपंच

इस देश में कई लोग ऐसे हैं जो नहीं चाहते कि गोहत्या बंद हो क्योंकि उनके लिये यह मसला अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने और कई दूसरे स्वार्थो को पूरा करने का है। गोहत्या का मसला यूं ही चलता रहे  इसके लिये हमेशा उनकी ये कोशिश रहती है कि किसी भी तरह इस मुद्दे को उलझा कर रखा जाये और ऐसा करने के लिये वो कई तरह की दलीलें भी देतें हैं मसलन, हिंदुधर्मग्रंथों और बिशेषकर वेदों में यह वर्णन आता है कि हिंदू भी गोमांस का सेवन करते थे और हिंदुओं में गोहत्या सामान्य धटना थी या फिर गोहत्या के लिये केवल मुसलमान ही दोषी नहीं है क्योंकि कोई हिंदू गाय को बेचता है तभी तो उसे कोई मुसलमान काटता है।

हिंदुओं में धर्मग्रंथों की विशाल श्रृंखला है। सृष्टि के इस आदि धर्म में कई ग्रंथ प्रचलित हैं और बिना अपवाद इन सारे ही धर्मग्रंथों में गाय की महिमा का बृहद् बखान है जिसके केवल उदाहरण दिये जाये तो भी एक ग्रंथ बन जायेगा। वेद से लेकर पुराणों तक में और रामायण से लेकर महाभारत जैसे इतिहास ग्रंथों में गायों को अहन्या माना गया है और उसे 'माँ‘ का स्थान दिया गया है। हिंदू ग्रन्थ गाय की महिमा के बखान से ओत-प्रोत हैं। इसके कुछ उदाहरण निम्नवत् हैं-

- अर्थववेद में कहा गया है-'मित्र ईक्षमाण आवृत आनंदः। युज्यमानों वैश्वदेवो युक्तः प्रजापति विर्मुक्तः सर्पम्।। एतद्वैविश्वरुपं सर्वरुपं गोरुपम्।। उपैनं विश्वरुपाः सर्वरुपाः पशवस्तिष्ठन्ति य एवम् वेद।। (अर्थववेद, 9/7/9-26)

अर्थात् देखते समय गौ मित्र देवता है, पीठ फेरते समय आनंद है। हल तथा गाड़ी में जोते जाते समय (बैल) विश्वदेव, जाते जाने पर प्रजापति तथा जब खुला हो तो सबकुछ बन जाता है। यही विश्वरुप अथवा सर्वरुप है, यही गौरुप है। जिसे इस विश्वरुप का यर्थाथ ज्ञान होता है, उसके पास विविध प्रकार के पशु रहतें हैं।

- अर्थववेद में ही कहा गया है, ब्राह्मण तथा क्षत्रिय विश्वरुप गौ के नितंब है। गंधर्व पिंडलियां तथा अप्सरायें छोटी हड्डियां हैं। देवता इसके गुदा हैं,मनुष्य आंते तथा अन्य प्राणी अमाशय है। राक्षस रक्त तथा इतर मानव पैर हैं।

- गाय के संबंध में एक जगह कहा गया है- प्रत्यंग तिष्ठन् धातोदङ तिष्ठनन्रसविता।। तृणाणि प्राप्तः सोमो राजा।। अर्थात् पश्चिमाभिमुख खड़े होते समय गाय विधाता, उत्तराभिमुख खड़े होते समय सविता तथा धास चरते समय चंद्रमा है।

- लोग दुष्प्रचार करतें हैं कि महाभारत में गोहत्या की इजाजत दी गई है, जबकि महाभारत के आश्वमेधिकपर्व, बैष्णवधर्म पर्व के 12वें अध्याय में गोमहिमा के बारे में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा-राजन्।  जिस समय अग्निहोत्री ब्राह्मण को कपिल गौ दान में दी जाती है उस समय उसके सींगों के अग्रभाग में बिष्णु तथा इंद्र वास करतें हैं। सींगों के जड़ में चंद्रमा तथा व्रजधारी इंद्र रहतें हैं। सींगों के बीच में ब्रह्मा तथा ललाट में शिव का निवास होता है!”  इसी तरह आगे गाय के प्रत्येक अंगों में विभिन्न देवी-देवताओं के वास के बारे में बताया गया है।

- विभिन्न ग्रंथों में कहा गया है कि गाय के अंगों में ईश्वर का वास है। उदाहरणार्थ- बृहत्पराशर स्मृति (5/36-41), पद्मपुराण (सृष्टिखंड,57/156-165), स्कंदपुराण (आवंत्यखंड,रेखाखंड,अध्याय-13) , ब्रह्मांडपुराण (गो सावित्री स्त्रोत), भबिष्यपुराण (उत्तरपर्व, 67/25-37), बह्मवैवर्त के श्रीकृष्णजन्म कांड आदि में गाय की महिमा का वर्णन है।

- गोवध का निषेध करते हुये वेद में कहा गया है-माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यनाममृत्स्य नाभिः। प्र नु वोचं चिकितुषे जनायमा गामनागादितिं वधिष्ट।। अर्थात् गौ रुद्रों की माता ,वसुओं की पुत्री, अदितिपुत्रों की बहन तथा धृतरुप अमृत का खजाना है, प्रत्येक विचारशील मनुष्य को मैनें यही कहा है कि निरपराध व अवध्य गौ का कोई वध न करे।

- अथर्ववेद में गायों को सम्पत्तियों का भंडार कहा गया है- धेनुः सदनम् रयीणाम्। (अर्थववेद, 11/2/34) अर्थात् 'गाय सम्पत्तियों का भंडार है। वेदों में अन्यत्र भी कहा गया हैः-‘गावो विश्वस्य मातरः।‘ अर्थात् ‘गाय संसार की माता है।‘ वेदों में तो गाय को टेढ़ी आंख से देखना तथा लात मारने को भी बड़ा अपराध माना गया है- यच्च गां पदा स्फुरति प्रत्यड़् सूर्यं च मेहति। तस्य वृश्चामि ते मूलं च्छायां करवोपरम्।। (अर्थववेद, 13-1-56) अर्थात् ‘जो गाय को पैर से ठुकराता है और जो सूर्य की ओर मुँह करके मूत्रोत्सर्ग करता है मैं उस पुरुष का मूल ही काट देता हूँ, संसार में फिर उसे छाया मिलनी कठिन है !’

गाय तो शुरु से हमारे यहाँ अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी गई है फिर उसके वध की इजाजत कैसे दी जा सकती है? गर्गसंहिता गोलोकखंड के चैथे अध्याय में कहा गया है-‘‘नन्दः प्रोक्तः स गोपालैर्नवलक्ष गवां पतिः। उपनंदश्च कथितः पञ्चलक्षगवां पतिः !” अर्थात् ‘जिस गोपाल के पास 5 लाख गायें हों वह अपनंद, जिसके पास 9 लाख गाये हो वह नंद, दस लाख गायों वाला बृशवानु, 50 लाख गायों वाला बृशमानुवर और एक करोड़ गायों के मालिक नंदराज की उपाधि से विभूषित किया जाता था। महाभारत के महाविराट (22-28) में भी आया है कि पितामह भीष्म कहतें हैं कि जहाँ युधिष्ठिर होंगें वहाँ गायें पहले से ज्यादा होंगी। खूब पुष्ट होंगीं तथा उनके दूध, धी भी पहले से ज्यादा सरस व हितकारक होगें।

- महर्षि च्यवन ने तो अपने शरीर का मूल्य राजा नहुष के चक्रवर्ती राज्य को नहीं वरन् एक गाय को निर्धारित किया था। नंदिनी गाय की रक्षा में राजा दिलीप अपने प्राण देने तक को तैयार हो गये थे। महर्षि जमदाग्नि तथा ऋषि बशिष्ठ ने गौ रक्षा के लिये प्राणों की बाजी लगा दी थी। श्रीकृष्ण को तो गाय पालने के कारण ही गोपाल कहा गया है।

- यजुर्वेद में कहा गया है-‘दोग्ध्री धेनुर्वोढ़ानडृवान्’ अर्थात् दूध से वसुधा को सिंचित करने वाली गायें व भीरवाही बैल हमारी निधि हैं।

       उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि जिन हिंदू धर्मग्रंथों में गाय की इतनी महिमा बखान की गई है उनमें गोहत्या जैसे धृणित कर्म करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। जिन लोगों ने भी हिंदू ग्रंथों में गोहत्या का आना बताया है वो इन ग्रंथों के श्लोंकों की गलत व्याख्या करतें हैं। गोरक्षा की राह में सबसे बड़ी बाधा ऐसे मानसिकता के लोग हैं। वेदों में गोहत्या की बात उसके किसी भी प्रामाणिक भाष्य में नहीं आती और न ही वेदों के किसी प्रामाणिक अध्येता ने ही इसकी पुष्टि की है। वेदों में गोमेध शब्द जरुर आया है जिसका अर्थ लोगों ने गाय की हत्या से लगा लिया है। सारी गलतफहमी इस शब्द के अर्थ को न समझने के कारण हुई है। वेदों के प्रख्यात विद्वान व अति प्रसिद्ध व्याख्याकार महर्षि दयानंद सरस्वती ने ‘गोमेध‘ शब्द की व्याख्या करते हुये अपने गंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में लिखा है , "जो कोई भी ब्राह्मण ग्रंथों में प्रयुक्त अश्वमेध, गोमेध, नरमेध आदि शब्दों का अर्थ घोड़े, गाय आदि को मारकर होम करना बतातें हैं, उन्हें इसकी जानकारी है। वेदों में कहीं भी गोहत्या की इजाजत नहीं हैं, केवल वाममार्गी ग्रंथों में ऐसा लिखा है। अग्नि में धी आदि का होम करना अश्वमेध, इंद्रियां, किरण, पृथ्वी आदि को पवित्र करना गोमेध तथा जब मनुष्य मर जाये तो विधिपूर्वक उसके शरीर का दाह करना नरमेध है।"       

ये भी ज्ञात है कि वैदिक काल में मनुष्य पशुओं पर बहुत अधिक निर्भर रहा करते थे। यही कारण है कि वेदों में बहुत सारे पशुओं का उल्लेख हुआ है। वैदिक यज्ञों के संपन्न करने में भी कई प्रकार के पशुओं की आवश्यकता होती थी। यथा धोड़े का उपयोग अश्वमेध यज्ञ में तथा रथों को खींचने में किया जाता था। सुवर का उपयोग सफाई कार्य में, बैल हल तथा गाड़ी को खींचने में काम आते थे, कुत्ता रखवाली का काम करता था। इसी तरह विभिन्न पशुओं को याज्ञिक कार्यों में कई तरह से लगाया जाता था और इन सारे पशुओं में गाय का स्थान सर्वोपरि माना गया था क्योंकि गाय का धी, गोदुग्ध, दही, गोबर इत्यादि का व्यापक प्रयोग यज्ञादि कार्यों में और हिंदू धार्मिक संस्कारों में होता रहा है। यज्ञ के दौरान यज्ञकुंड के आसपास गायें बांध दी जाती थी ताकि आवश्कता पड़ने पर तुरंत ही ताजा दूध निकाला जा सके या गोबर प्राप्त किया जा सके। बांधने का दूसरा प्रयोजन ये था कि यजमान यज्ञ के पश्चात् याज्ञिकों को दक्षिणा में गाय दिया करते थे। क्योंकि उस समय लोग पशु को भी धन ही मानते थे। अतः दक्षिणा प्रसंगों में गोदान, अश्वदान, अजादान आदि शब्द सामान्य रुप से प्रचलन में थे। इसी को अश्वालंभ, गवालंभ आदि भी कहा जाता था। इसी प्रसंग में ‘गोमेधयज्ञ’ आता है। पारसी ग्रंथ ‘जेंदावेस्ता’ हमारे अथर्ववेद से काफी मिलता है। इसके कई श्लोकों और अथर्ववेद के मंत्रों में काफी समानता है। इस ग्रंथ के अध्ययन के आधार पर डा0 मार्टिन हॉग कहतें हैं कि गोमेध का अर्थ गोवध नहीं वरन् इसका अर्थ मिट्टी को उर्वरा बनाकर वनस्पति उगने योग्य कर देना है। जंद भाषा मे गोमेध का अपभ्रंश ‘गोमेज‘ है। जिसका यही अर्थ है। हॉग लिखतें हैं कि ‘‘पारसी मत में खेती करना धर्म समझा जाता है। अतः कृषिधर्म से संबंध रखने वाले प्रत्येक क्रियाकलाप धर्मकार्य ही समझा जाता है। अतः कृषिधर्म से संबंध रखने वाले समस्त क्रियाकलाप का नाम ‘गोमेज’ है। महर्षि दयानंद के अनुसार शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है- ‘अन्नं हि गौ’  अर्थात अन्न का नाम गौ है वहीं मेध शब्द मेधा व मेधावी अर्थ में आता है। इसका अंगेजी अनुवाद कल्चर है। ‘कल्चर‘ शब्द कृषि के लिये ही आता है। अतः भूमि को अन्न उगाने योग्य करने को ही गोमेघ कहा गया।

एक तो हिंदू धर्मग्रंथों में कहीं इसका वर्णन नहीं है कि हिंदुओं में गोमांस का चलन था और एक क्षण के लिये यह मान भी लिया जाये कि ऐसा था भी तो भी क्या यह हिंदुओं के बौद्धिक विकास का घोतक नहीं है कि आज वह इस कृत्य को पाप मानता है और हर तरह से बहुउपयोगी गाय के प्रति श्रद्धा भाव रखता है? अगर हमारे पूर्वजों के समय कुछ सामाजिक कुरीतियां थी भी तो उसका निवारण करना क्या हमारी बुद्धि के उत्कृष्टता का परिणाम नहीं माना जाना चाहिये? क्या महज इस लिये गाय को काट के खायें कि यह किसी धर्मग्रंथ में लिखा है तो यह दलील भी स्वीकार्य नहीं है। हम अपनी माँ के साथ-2 गाय का दूध पीकर भी पलते है। अपनी सगी माँ का दूध तो दो-ढ़ाई साल की उम्र में छूट जाता है पर गऊ माता का दूध सारी उम्र नहीं छूटता। गाय जैसी बहुपयोगी जानवर तो कोई भी नहीं है। ये धरती पर की अकेली जीव है जिससे प्राप्त होने वाली कोई भी चीज बेकार नहीं है। यहां तक कि इसके गोबर और मूत्र भी मानवजाति के लिये परम कल्याणकारी हैं। हम गोहत्या नहीं करेंगें यह हमारा प्रण है और ये प्रण सिर्फ इसलिये नहीं है कि हमारे धर्मग्रंथ इसकी इजाजत नहीं देते ये प्रण इसलिये है क्योंकि गाय का सम्मान हमारी अंतरात्मा की आवाज है।  

गोहत्या बंदी के विरोध में अनर्गल तर्क इस मसले को सिर्फ उलझा कर रखेगा ! हिंदू बेचता है, मुसलमान काटता है जैसे झगड़ों और बहसों के अंतहीन मुद्दों में उलझे रहने की बजाये ये आवश्यक है कि हम अगर सिर्फ ये सोचे कि जिस गाय के दूध से पल कर हमसब बड़े हुये है, जिस गऊ माता का दूध हमें हर तरह की मिठाईयाँ उपलब्ध कराता है वो गाय हम सबके लिये श्रद्धा का केंद्र है और उसके प्रति सम्मान भाव रखते हुये गोवंश संरक्षण का प्रयास हम सबका कर्तव्य है। इसलिये अपने रसूल (सल्ल0) के सुन्नत को मानने वाले और पवित्र कुरान की आज्ञानुसार जिंदगी गुजारने वाले हर मुसलमान का और अपने ऐतिहासिक परंपराओं और ग्रंथों पर गर्व करने वाले और घर की पहली रोटी गाय को खिलाने वाले हर हिंदू का यह कर्तव्य है कि राष्ट्रीय एकात्मता को बाधित करने वाले इस कार्य के खिलाफ मुसलमानों को एकजुट करे और उन्हें गोहत्या की बजाए गोरक्षण का पाठ पढ़ाये क्योंकि पवित्र कुरान भी उनसे यही अपेक्षा करता है - ‘‘तुम सबसे बेहतरीन लोग हो जो लोगों में हिदायत के वास्ते पैदा किये गये हो। तुम उन्हें भले कामों का हुक्म देते हो और बुराई से रोकते हो और अल्लाह पर ईमान रखते हो !” (पवित्र कुरान, सूरह आले-इमरान, आयत- 110)

अभिजीत मुज़फ्फरपुर (बिहार) में जन्मे और परवरिश पाये और स्थानीय लंगट सिंह महाविद्यालय से गणित विषय में स्नातक हैं। ज्योतिष-शास्त्र, ग़ज़ल, समाज-सेवा और विभिन्न धर्मों के धर्मग्रंथों का अध्ययन, उनकी तुलना तथा उनके विशलेषण में रूचि रखते हैं! कई राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में ज्योतिष विषयों पर इनके आलेख प्रकाशित और कई ज्योतिष संस्थाओं के द्वारा सम्मानित हो चुके हैं। हिन्दू-मुस्लिम एकता की कोशिशों के लिए कटिबद्ध हैं तथा ऐसे विषयों पर आलेख 'कांति' आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। इस्लामी समाज के अंदर के तथा भारत में हिन्दू- मुस्लिम रिश्तों के ज्वलंत सवालों का समाधान क़ुरान और हदीस की रौशनी में तलाशने में रूचि रखते हैं।

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/abhijeet,-new-age-islam/it-is-good-to-ignore-the-cows-अच्छा-यही-है-फेर-ले-आंखों-से-गाय-को/d/76730

 




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  • गाय महज  एक  पशु नही  बल्कि हिंदुस्तानी समाज में इसका  एक अलग  और  उंचा  मक़ाम   है ,और मै लेखक महोदय  कि बातो से 100 %  सहमत हु जिस  तरह  लेखक
    महोदय ने ऐतिहासिक  तथ्यों से  इस  बात   का  खुलासा किय कि  भारत के   मुस्लिम  शाशक  भली भांति जनते थे  कि अगर इस देश में शांति और भाईचारा  को स्थापित बनाये रखना है तो  इस देश के बहुसंखयक कि भावनाओ को  समझना होगा  तभी तो भारत  वर्ष में सैंकड़ो सालोँ तक शांति वयवस्था  कयम थीं ,आज  भी हम ब्रिटिशर के  द्वारा  बिछाये  जल में फ़ांस कर उसी मानसीकता क ग़ुलाम बने बैठे  है जैसा कि वो चाहते थे कि इस देश में कभी आपस में देश कि एक कम्युनिटी  के  लोगो क विश्वास दूसरे  बने। मै  लेखक महोदय क प्रयास को तहें दिल से स्वीकारता हु और उन के प्र्यास कि  सराहन  करता हु  ………  मोहम्मद आबिद

    By mohammad Abid - 5/2/2014 4:32:53 AM



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