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Hindi Section ( 12 Jan 2013, NewAgeIslam.Com)

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Delhi Trial Court's Recent Judgment on Polygamy दिल्ली ट्रायल कोर्ट का बहुविवाह से सम्बंधित हाल ही में दिया गया फैसला

 

अब्दुल हमीद नोमानी

8 जनवरी, 2013

(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

एक बेहतर और आदर्श समाज के गठन में न्याय की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है। बहुत से ऐसे सामाजिक मामलें होते हैं, जिन्हें अंजाम देने के लिए न्याय पहली शर्त है। वो समाज के निर्माण के लिए आधार है, मतलब ये है कि न्याय एक आदर्श और बेहतर समाज में एक उच्च मूल्य का दर्जा रखता है। शादी जैसे मामले में जिसका मानव समाज के अस्तित्व और सुरक्षा और उसे आगे ले जाने की प्रक्रिया से अत्यधिक संबंधित है, न्याय बुनियाद और उच्च मूल्य की हैसियत रखता है। जहां प्राकृतिक यौन इच्छा के प्रभाव के कारण आदमी के लिए शादी अनिवार्य और व्यभिचार का शिकार होने की आशंका तो शादी फर्ज़ हो जाती है। वहीं दूसरी तरफ अगर अपने विशेष स्वभाव की वजह से ये आशंका और खयाल हो कि होने वाली बीवी ज़्यादती की चपेट में आ जाएगी, तो उसके लिए निकाह करना मकरूह (घिनौना काम) और अगर यक़ीन हो कि बीवी के साथ इंसाफ नहीं कर सकेगा और ज़ुल्म व ज़्यादती की शिकार हो जाएगी, तो शादी करना हराम है। एक से अधिक शादी के मामले में भी ये देखना ज़रूरी है कि दूसरी बीवी, बीवियों के साथ इंसाफ हो। इसके लिए क़ुरान और सुन्नत और फ़िक़्हे इस्लामी में स्पष्ट निर्देश पाए जाते हैं। अगर अपने हालात और आवश्यकता के मद्देनजर एक से अधिक (4 तक) शादी की ज़रूरत महसूस करता है, तो वो ऐसा कर सकता है। इसकी इस्लामी शरीयत ने इजाज़त दी है। आज की तारीख में यहां ये सवाल ध्यान देने लायक हो गया है कि क्या दूसरी शादी के लिए आदमी को पहली बीवी की इजाज़त और रज़ामंदी (सहमति) हासिल करना ज़रूरी होगा और ये शर्त पूरी किए बिना दूसरी शादी नहीं कर सकता है। ये सवाल दिल्ली की एक ट्रायल कोर्ट के फैसले से सामने आया है। कोर्ट के एडिशनल सेशन जज श्रीमती कामिनी लॉ ने दूसरी शादी करने वाले की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज करते हुए जो फैसला दिया है, उसके कई मामले और पहलू पर ध्यान और बहस की आवश्यकता है। मसले का एक हिस्सा वो है जो जज श्रीमती कामिनी ला के फैसले से सम्बंध रखता है। और दूसरा हिस्सा वो है जो दूसरी शादी और उसकी इसल प्रकृति से सम्बंध रखता है। असल फैसले में किन तर्कों और तथ्यों के हवाले से मसले को पेश किया गया है। इसकी असल की कापी के अध्ययन और जायज़े के बाद ही अंतिम रूप से प्रतिक्रिया व्यक्त की जा सकती है। प्रसिद्ध क़ानून विशेषज्ञ डॉ. ताहिर महमूद साहब ने एक बयान में कहा है कि ट्रायल कोर्ट की जज ने जो कुछ कहा है, वो सौ फीसद ठीक कहा है। उन्होंने ये सब अपनी तरफ से नहीं, बल्कि किताबों का हवाला देकर कहा है, लेकिन मीडिया में जज द्वारा कही गई सभी बातें नहीं आई हैं, अगर वो भी की प्रकाशित जातीं, तो उनका पक्ष और ज्यादा स्पष्ट हो जाता।

लेकिन मीडिया (टाइम्स ऑफ इंडिया, दैनिक जागरण 2 जनवरी 2013 आदि) में जितना कुछ आया है, उसको डॉक्टर ताहिर महमूद ने गलत करार नहीं दिया है। मीडिया में फैसले का जो हिस्सा प्रकाशित हुआ है, उसमें कहा गया है कि कुरान ने किसी मुसलमान को एक वक्त में एक से अधिक शादी करने की इजाज़त ज़रूर दी है, लेकिन इसको प्रोत्साहित नहीं किया है। इस्लामी शरीयत में विशेष परिस्थितियों में एक से अधिक शादी की इजाज़त दी गई है। जिन देशों में इस्लामी कानून लागू है, वहाँ भी दूसरी शादी की इजाज़त विशेष परिस्थितियों में दी गयी है, जैसे पहली बीवी की बीमारी या उसका बांझ होना। ऐसे हालात में पहली बीवी की इजाज़त लेकर दूसरी शादी की जा सकती है। बहुत से मुस्लिम देशों में एक से अधिक शादी को नियम के तहत बनाया गया है, या सिरे से खत्म कर दिया गया है। इन परिवर्तनों की रौशनी में भारत जैसे उदार लोकतंत्र में इसको प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता है।''

जहां तक ​बालिग़ लड़की की ज़बरदस्ती शादी करने का मसला है तो वो शरीयत के मुताबिक सिरे से स्वीकार योग्य नहीं है। अगर उसके सरपरस्त (संरक्षक) बाप दादा भी ज़बरदस्ती शादी करा दें तो वो इस्लामी शरीयत के मुताबिक रद्द करने लायक़ है, जबकि मौजूदा मामले में कहा जाता है कि लड़की की मर्ज़ी के खिलाफ जबरदस्ती, उसके सरपरस्तों (संरक्षकों) को बताए बगैर उसका निकाह, एक शादीशुदा तीन बच्चों के बाप से करा दिया गया था। ऐसी शादी को अवश्य ही रद्द कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि शरीयत की यही मांग और मंशा है, लेकिन इसमें निकाह करने वाले का क्या कुसूर है, जबकि उसको बेखबर रखकर ऐसा कुछ किया गया हो, गवाहों के बगैर तो निकाह नहीं पढ़ा सकता है। हाँ अगर निकाह करने वाले की मिली भगत से ज़बरदस्ती शादी की गई हो दूसरी बात है। लेकिन ऐसे मामले में निकाह करने वालों का ज़मानत न देना, समझ से बाहर है। इस सूरत में वो भी निश्चित तौर पर दोषी करार पाएगा। मौजूदा हालात में मामले के सारे पहलू सामने नहीं आए हैं, इसलिए स्थिति का निष्कर्ष बताने वाला विश्लेषण भी नहीं किया जा सकता है, लेकिन फैसले में दूसरी शादी की ज़रूरत का इज़हार जिस शक्ल में सामने आया है, उसे न तो समस्या की पूरी और बेहतर व्याख्या ठहराया जा सकता है और न डॉक्टर सैय्यद ताहिर महमूद साहब की इस राय से सहमत हुआ जा सकता है कि जज ने जो कुछ कहा है वो सौ फ़ीसद ठीक कहा है। उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ के बारे में मुस्लिम देशों में किए गए उपायों और अपनायी गयी नीतियों पर महत्वपूर्ण काम किया है, इसके बारे में उनकी रचनाएं किताब की शक्ल में प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें से कुछ में दूसरी शादी को पहली बीवी की इजाज़त के अधीन कर दिया गया है, लेकिन ये डॉक्टर ताहिर महमूद साहब भी जानते हैं कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के बारे में कुछ मुस्लिम देशों के उल्लंघन करने का चलन, शरीयते इस्लामी का बेहतर प्रतिनिधित्व नहीं है। इसके बारे में फ़िक़्ह व शरीयत के विशेषज्ञों ने विस्तृत टिप्पणियाँ की हैं। इस्लामी शरीयत ने जिस उद्देश्य और ज़रूरत के तहत एक से अधिक शादी की इजाज़त दी है (प्रेरणा और आदेश नहीं) तुर्की जैसे देशों, जहां बिना दीन और मज़हब से अरुचि का एक समय में बोलबाला रहा है, की नीति के ख़िलाफ़ है। इसके बारे में मुस्लिम पर्सनल लॉ के संदर्भ में उनका हवाला न तो सीधे तौर पर व्यवहार हो सकता है और न ही ये कोई दलील है। शरई मामले मैं शरई दलील ही विश्वसनीय और स्वीकार्य है और मुस्लिम पर्सनल लॉ का सम्बंध इस्लामी शरीयत ही से है। शरीयत एक्ट के मुताबिक़ भारतीय अदालतें, इसकी प्रतिबद्ध हैं कि वो मुस्लिम पर्सनल लॉ: निकाह, तलाक़, वक़्फ़ आदि में इस्लामी शरीयत के अनुसार फैसला करें। दिल्ली की ट्रायल अदालत की जज कामिनी लॉ ने अपने फैसले में दूसरी शादी के कारणों और परिस्थितियों के संदर्भ में जो बातें कही हैं, वो ज़्यादातर शरई लिहाज़ से लगभग सही और शरीयत की मंशा पर आधारित हैं, लेकिन ज़रूरत के तहत दूसरी शादी को पहली बीवी की इजाज़त के अधीन करना इस्लामी शरीयत के उद्देश्य और मंशा के खिलाफ है। इसके लिए कुरान और सुन्नत और इस्लामी फ़िक़्ह में सिरे से ही कोई हवाला मौजूद नहीं है। विशेष परिस्थितियों में पहली बीवी की ओर दूसरी शादी को सशर्त करार देना शौहर की ज़रूरत और कवामियत को नज़रअंदाज़ कर देने के बराबर है। इससे जहाँ समस्या पैदा  होगी, वहीं ज़रूरत के तहत शरई इजाज़त से फ़ायदे का रास्ता भी बंद होकर समाज में दुराचार पैदा होगा। इस्लामी शरीयत में इसकी गुंजाइश निश्चित तौर पर नहीं है कि कोई आदमी इजाज़त से ज़रूरत की हद तक फायदे के बजाय सिर्फ अय्याशी और मस्ती के लिए, एक से ज़्यादा शादी करने और पहली बीवी के साथ किसी भी दर्जे में नाइंसाफी, ज़ुल्म और ज़्यादती करे। एक से ज़्यादा निकाह बीवियों के बीच मुमकिन हद तक अधिकारों के मामले में इंसाफ और ज़रूरी व वाजिब हक़ की अदायगी की शर्त के तहत है, जैसा कि कुरान की सूरे अलनेसा की आयत 3 में कहा गया है, 'और अगर तुमको इस बात का ऐहतेमाल (आशंका) (भी) हो (और यक़ीन हो तो बदर्जे औवला) कि तुम अनाथ लड़कियों के बारे में (बाबत उनके महेर के) इंसाफ (रियायत) नहीं कर सकोगे, तो (उनसे निकाह मत करो, बल्कि) और औरतों से जो तुमको (अपनी किसी मसलहेत के एतबार से) पसंद हों, निकाह कर लो (क्योंकि वो मजबूर नहीं, आज़ादी से अपनी रज़ा (मर्ज़ी) ज़ाहिर कर सकती हैं और निकाह इस कैद के साथ हो कि जो एक औरत से ज़्यादा करना चाहे, तो इन सूरतों में से कोई सूरत हो, (एक सूरत ये है कि एक मर्द ) दो दो औरतों से (निकाह करे) और (दूसरी सूरत ये है कि एक मर्द) तीन तीन औरतों से (निकाह करे) और (तीसरी सूरत ये है कि एक मर्द) चार चार औरतों से (निकाह करे)। बस, अगर तुमको (ग़ालिब) ऐहतेमाल हो इसका कि (कई बीवियाँ करके) अद्ल न रखोगे (बल्कि किसी बीवी के हुक़ूक़ (अधिकार) वाजिबा ज़ाया (बर्बाद) होंगे) तो एक ही बीबी (बीवी) पर बस करो।

(तर्जुमा मय तस्वीर बयानुल क़ुरान अज़ मौलाना अशरफ अली थानवी रहिमतुल्लाह अलैहि)

एक से ज़्यादा शादी में असल काबिले लिहाज़ बात बीवियों के बीच इंसाफ और वाजिब हक की अदायगी है, न कि पहली बीवी की इजाज़त। ये शर्त गैरज़रूरी इज़ाफा है, इस बारे में गुलाम अहमद परवेज़ (मफ़हूमुल कुरान) प्रोफेसर रफीउल्लाह शहाब (एहकामुल फ़ुरक़ान) जैसे लोगों ने क़ुरानी आयात और हदीसों की जिस मनमाने ढंग से तफ्सीर (व्याख्या) और तौज़ीह की है, वो तहरीफ (बिगाड़) के तहत आती है। शहाबुद्दीन साहब ने हज़रत फ़ातिमा रज़ियल्लाहू अन्हा और हज़रत अली रज़ियल्ललाहू अन्हू की एक घटना से गलत इस्तदलाल करते हुए एक से ज़्यादा शादी करने के लिए पहली बीवी से इजाज़त को लाज़्मी बताया और आरोप लगाया है कि फ़ुक़्हा ने इरशादे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की अनदेखी कर दी है, हालांकि असल बात ये है कि ऐसे मफ़रूज़ात (अनुमान) से कुरान व हदीस और सभी फ़िक़्ही मसलको की किताबें खाली हैं। इसी संदर्भ में ये कहना सही नहीं होगा कि दिल्ली ट्रायल कोर्ट के फैसले में जो कुछ कहा गया है वो सौ फ़ीसद ठीक है। एक से अधिक शादी करने वाले मर्द को बालिग़ लड़की की इजाज़त और सरपरस्तों (अभिभावकों) की मर्जी से शादी करने और बीवियों के बीच इंसाफ और अद्ल और ज़रूरी हुक़ूक (अधिकार) की अदायगी का कानूनन और शरअन पाबंद किया जा सकता है, न कि दूसरी शादी के लिए पहली बीवी की इजाज़त का। वर्तमान स्थिति ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के लिए एक बार फिर ये ज़रूरत उजागर कर दी है कि वो बेहतर, इच्छित रूप में समस्या को सामने लाने का काम करे।

8 जनवरी, 2013, स्रोत: रोज़नामा हमारा समाज, नई दिल्ली

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