संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के जिनेवा का 22 वाँ सत्र
सांस्कृतिक विरासत के अधिकार पर सार्वजनिक बातचीत
शुक्रवार 15 मार्च, 2013
12:00 - 14: 00
रूम: XXIV – पैलेस डेस नेशन्स
आयोजन: RADDHO, अल हाकिम फाउण्डेशन और अन्य
श्री अलदोलू अब्दुल्लाह (माली) के साथ श्री सुल्तान शाहीन
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वक्तागण:
माली का संकट और सांस्कृतिक वंशगत समस्याएं (Malian crisis and problems of cultural patrimonial)
श्री अलदोलू अब्दुल्लाह, युनेस्को में काउंसलर
संस्कृति को चरमपंथियों से खतरा- पर विश्लेषण
श्री सुल्तान शाहीन, एडिटर, न्यु एज इस्लाम
प्रो के वारिकू , महासचिव, हिमालयन रिसर्च एंड कल्चरल फाउंडेशन
इराक में सांस्कृतिक वंशगत की वर्तमान स्थिति- पर विश्लेषण
डॉ. अब्दुल अमीर हाशिम, संयुक्त राष्ट्र, जिनेवा में अल हाकिम फाउंडेशन के मुख्य प्रतिनिधि
विश्लेषण और परिप्रेक्ष्य: बामियान स्मारकों की बहाली
प्रो. रियाज़ पंजाबी, पूर्व कुलपति, कश्मीर युनिवर्सिटी
मॉडरेटर: श्री बीरो डियावारा, RADDHO कार्यक्रम प्रबंधक, जिनेवा
अनुवाद / अंग्रेजी- फ्रेंच
सुल्तान शाहीन, एडिटर, न्यु एज इस्लाम के भाषण का पूरा पाठ
15 मार्च, 2013 जिनेवा
आधुनिक समय में सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और रखरखाव का अधिकार सार्वभौमिक और अनिवार्य माना जाता है। लेकिन दुर्भाग्य से अंधकार की ओर ले जाने वाली कुछ ताक़तें जो मेरे धर्म इस्लाम में विश्वास रखने का दावा करती हैं वास्तव में सांस्कृतिक विरासत की दुश्मन हैं। सऊदी, वहाबी, सल्फी इस्लामी विचारधारा में प्रशिक्षित अफगानिस्तान के तालिबान और अफ्रीका के बोको हराम ने अफ्रीका के कुछ हिस्सों में बहुमूल्य इस्लामी विरासत और अफ़गानिस्तान में बौद्ध विरासत को तबाह कर दिया है। पश्चिमी अफ्रीका के वर्तमान गणराज्य माली का दास्तानों का शहर टिम्बकटू जो रेगिस्तान का ज़ेवर कहलाता है। 333 सूफियों के कारण मशहूर था। मैं यहां मौजूद जानकार दर्शकों के सामने उस शहर की तबाही की दास्तान दोहराने की ज़रूरत नहीं समझता जो अंधेरे की तरफ ले जाने वाली उन्हीं ताक़तों के हाथों हुई है जिन्होंने बामियान बुद्ध को ध्वस्त किया, हालांकि ये लोग दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में अलग अलग नामों से जाने जाते हैं।
इन ताक़तों को प्रोत्साहन सऊदी अरब से मिलती है जो फिलहाल मदीना में मस्जिदे नब्वी के विस्तार के नाम पर आलीशान सात सितारा होटलों के निर्माण के लिए प्राचीन मुस्लिम विरासत को तबाह करने में व्यस्त है। पैगम्बर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का रौज़ा मुबारक जो जाहिल नज्दी बद्दूओं के सदियों में विकसित हेजाज़ के वैश्विक समाज पर कब्ज़े के वक्त से ही निशाने पर था, एक बार फिर सऊदी सरकार के निशाने पर है। नज्दियों ने 1806 से ही प्राचीन इमारतों को ढहाना शुरू कर दिया जब मदीना पर सबसे पहली सऊदी सरकार की वहाबी सेना ने क़ब्ज़ा किया। उनका पहला निशाना जन्नतुल बक़ी क़ब्रिस्तान था। ये पैगम्बरे इस्लाम की मस्जिद से सटा व्यापक क़ब्रिस्तान था। यहां अहले बैत और सहाबा के अवशेष सुरक्षित हैं जिन्होंने प्रारंभिक सख्त दौर में इस्लाम के अस्तित्व के लिए निर्णायक भूमिका अदा की थी। तुर्की की ख़िलाफ़ते उस्मानिया ने इन रौज़ों पर खूबसूरत मज़ारों का निर्माण किया था। मौजूदा दौर की तरह उस ज़माने में भी तुर्कों का झुकाव सूफीवाद की ओर था। ये उनके अनुसार कुफ्र था, क्योंकि ये लोग इब्ने तैमिया और मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब के अत्यधिक संकीर्ण विचारों से प्रभावित थे। न सिर्फ ये कि जन्नतुल वक़ी की क़ब्रों को बराबर कर दिया गया बल्कि सभी शहर में मौजूद विरासती मस्जिदों को निशाना बनाया गया। जब इन वहाबी गुर्गों ने पैगम्बर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के रौज़े मुबारक को ढहा देने की कोशिश की तो वैश्विक मुस्लिम समुदाय की तरफ से ज़बरदस्त विरोध के कारण उनकी योजना नाकाम हो गयी।
तुर्क ने 1811 और 1818 के बीच लड़ी गई जंगों में सऊदी वहाबियों को हराया और इसके बाद 1848 और 1860 के बीच बेहतरीन कारीगरों की मदद से इन पवित्र स्थानों को फिर से बनवाया। मगर लगभग आधी सदी के बाद ही एक बार फिर नज्दी वहाबियों ने इस क्षेत्र में अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया और इस्लाम से जुड़ी सभी सांस्कृतिक विरासतों को ध्वस्त करना शुरू कर दिया। 21 अप्रैल,1925 को मदीना में जन्नतुल बक़ी की कब्रों और गुम्बदों को फिर ध्वस्त कर दिया गया। तब से अब तक 300 से ज़्यादा इस्लामी इमारतों को तबाह कर दिया गया है और उनकी जगह शौचालय, सड़कें और आलीशान होटल निर्मित कर दिए गए हैं।
जैसा कि 6 अगस्त 2005 को दी इंडिपेंडेन्ट में पत्रकार डेनियल हाउडन ने लिखा था, ''इस्लाम का केंद्र, ऐतिहासिक शहर मक्का मज़हबी जुनूनियों के अप्रत्याशित हमलों के नीचे दफन हो रहा है। इस पवित्र शहर का बहुस्तरीय इतिहास लगभग समाप्त हो चुका है। वाशिंगटन स्थित गल्फ इंस्टिट्यूट का अंदाज़ा है कि हज़ार बरस पुरानी इमारतें पिछले दो दशकों में तबाह की जा चुकी हैं। अब पैगम्बरे इस्लाम की वास्तविक जन्म स्थली सऊदी अधिकारियों की मिलीभगत से बुलडोज़रों के निशाने पर है, क्योंकि इनकी इस्लाम की कट्टर व्याख्या उन्हें अपनी ही विरासत को तबाह करने पर मजबूर कर रही है।''
वो आगे लिखते हैं,''इसी तेल की दौलत से मालामाल कट्टरपंथी वर्ग ने तालिबान को दौलत मुहैया करके ताक़त दी जिन्होंने 2000 में बामियान बुद्ध को धमाकों से उड़ा दिया। और इसी नज़रिए ने जो हर प्रकार की मूर्ति पूजा का विरोधी है इसी हफ्ते ये फैसला जारी किया कि साऊदियोंके बादशाह को भी रेगिस्तान के गुमनाम कब्र में दफनाया जाए।
एक सऊदी निर्माण विशेषज्ञ समी अंगावी जो इस क्षेत्र के इस्लामी इमारतों के विशेषज्ञ हैं, इंडिपेंडेन्ट को बताया कि मक्का की आखरी विदाई क़रीब है। हम मक्का और मदीना के अंतिम दिनों को गिन रहे हैं''
''डॉ. अंगावी के अनुसार जिन्होंने इस्लाम के दो पवित्र शहरों की सुरक्षा के लिए अपने जीवन को समर्पित कर दिया है, ज़्यादा से ज़्यादा ऐसे 20 स्थान बच गए हैं जो 1400 साल पहले पैगम्बर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के जीवन से सम्बंधित हैं और अब वो किसी भी समय ढहाये जा सकते हैं। ये मक्का और मदीना के इतिहास और उनके भविष्य का अंत है। डॉ. अंगावी ने कहा, इन सबकी तह में वहाबियत है। मूर्ति पूजा के सम्बंध में और पैगम्बरे इस्लाम से जुड़ी हर चीज़ से सम्बंधित इनमें एक काम्प्लेक्स है।
पहले की तरह इस बार भी पैगंबर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के रौज़े को पेश ख़तरे ने उम्मते मुसलमा की अंतरात्मा को झकझोर दिया है। हाल ही में भारत के सूफी विद्वानों और मशाईख ने सऊदी अरबिया में इस्लाम के पवित्र स्थानों के विध्वंस के विरोध प्रदर्शन किया है। उन्होंने हज़ारों भारतीय मुसलमानों का चिंता का प्रतिनिधित्व करते हुए भारत सरकार के साथ ही भारत में सऊदी राजनयिक और आर्गनाइज़ेशन ऑफ इस्लामिक कोआपरेशन को पत्र लिखा है।
अफ्रीका के कुछ हिस्सों में इसी प्रकार की जागरूकता देखी जा सकती है। साहिल उलमा की लीग जो अल्जीरिया और दूसरे अफ़्रीकी देशों के शेखों, मोरितानिया के धार्मिक मामलों के मंत्रालय के उलेमा और माली के सूफी आंदोलन के प्रतिनिधियों पर आधारित है, ने तथाकथित जिहाद का दावा करने वाले गुटों के द्वारा बढ़ावा दिये गये उग्रवाद और अतिशयोक्ति से मुक़ाबले के लिए कदम उठाने का ऐलान किया है।
ट्यूनीशिया की सरकार ने भी हाल ही में कहा है कि ''हमारे संज्ञान में जब ये बात आई कि कुछ धार्मिक संगठनों द्वारा इन ऐतिहासिक प्रतीकों को पूरी तरह से तबाह करने की योजना है तो इन पवित्र स्थानों की सुरक्षा एक आपातकालीन समस्या बन गयी।''
इस विध्वंस के सिलसिले के दार्शनिक आधार की व्याख्या करते हुए आधुनिक विचारक ज़ियाउद्दीन सरदार लिखते हैं, '' .. आधुनिक वहाबियत में सिर्फ ठहरा हुआ वर्तमान है। न असली अतीत है और न ही किसी विकल्प का और न अलग भविष्य की वास्तविक अवधारणा है। इनका अनन्त वर्तमान अपने अतीत के एक विशेष दौर में बल्कि इस्लामी इतिहास के एक विशेष दौर यानी पैगंबर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के समय में मौजूद रहता है। मुस्लिम सभ्यता की संस्कृति या इतिहास अपनी सारी महिमा, जटिलताओं और विविधता के साथ उनके लिए महत्वहीन और अप्रसांगिक है। बल्कि बिदअत (नवाचार) और गुमराही करार देकर रद्द कर दी जाती है। इसलिए ये बात हैरान करने वाली नहीं है कि सऊदी इस सांस्कृतिक पूंजी और मक्का के पवित्र स्थानों के लिए कोई जज़्बा या भावना नहीं रखते।''
वो आगे लिखते हैं: ''वहाबियत ने वैश्विक स्तर पर लंबे समय पर आधारित इस्लामी इतिहास की विविधता और जटिलता का शिद्दत से इन्कार कर के और इस्लाम की विविधता और बहुलता की व्याख्या को अस्वीकार करके इस मज़हब को सभी नैतिक और सांस्कृतिक सम्पत्ति से महरूम (वंचित) और इसे सिर्फ आज्ञाओं और प्रतिबंधों की एक अप्रिय सूची तक सीमित कर दिया है। इस बात पर जोर देना कि स्रोत के पाठ में जिस बात का ज़िक्र न हो या प्रारंभिक मुस्लिमों की रवायतों में जो बात मौजूद न हो वो कुफ्र है और इस्लाम से बाहर होना चाहिए और इस व्यापक धारणा को हाथों की ताक़त या सामाजिक दबाव की मदद से लागू करना और जनता को इसकी पैरवी के लिए मजबूर करना तानाशाहियत को राह देता है।''
अब ये स्पष्ट है कि मुसलमानों ने उठ खड़े होने और इस्लामी फ़ाशिस्टों के चंगुल से इस्लाम के आध्यात्मिक मूल्यों को पुनः प्राप्ति की ज़रूरत को महसूस किया है। लेकिन पेट्रो-डालर की भरमार से ताक़त प्राप्त इस फासीवादी दृष्टिकोण ने पूरी दुनिया में इतने समर्थक पैदा कर लिए हैं कि आम मुसलमान उनका मुकाबला करने में मुश्किल महसूस कर रहे हैं। कुछ आवाज़ों को छोड़ कर आतंकवाद और बहुमूल्य इस्लामी विरासत की तबाही पर मुसलमानों की ख़ामोशी अर्थपूर्ण है।
यूरोप या उत्तरी अमेरिका में किसी मस्जिद के विध्वंस की कल्पना कीजिए। हम मुसलमान पूरी दुनिया में अपनी चीख और पुकार से आसमान सिर पर उठा लेंगे। यही फासीवादी ताक़तें जो इस्लाम के ऐतिहासिक हैसियत को मिटाने पर तुली है, शोर मचाने लगेंगी और इसमें शक नहीं कि दुनिया के कुछ हिस्सों में हिंसा भी फूट पड़ेगी। मुसलमान धर्म के मामले में बहुत संवेदनशील माने जाते हैं। मगर हैरानी की बात है कि जब मुस्लिम विरासत के स्थानों, दरगाह और खूबसूरत मकबरे और मस्जिदें कट्टरपंथी मुसलमानों के द्वारा तबाह कर दिए जाते हैं तो ये संवेदनशीलता कहां चली जाती है। अब समय आ गया है कि मुसलमान अपने विवेक को टटोलें और जिस चीज में ईमान रखते हैं उसकी हिफ़ाज़त के लिए उठ खड़े हों। अंधकार की ओर ले जाने वाली इन ताक़तों के चंगुल से इस्लाम को आज़ाद कराना होगा जो इस्लाम के सौंदर्य के लिए खतरा बने हुए हैं। अब समय आ गया है कि विश्व समुदाय भी सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाए। क्या आर्गनाइज़ेशन ऑफ इस्लामिक कोआपरेशन अपनी अंतरात्मा को टटोलेगा और सूफी विद्वानों और मशाईख बोर्ड की मांग पर कार्रवाई को सम्भव बनायेगा?
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