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Hindi Section (07 Oct 2013 NewAgeIslam.Com)



The Phenomenon of ‘Fighting Terrorism’ ‘आतंकवाद से लड़ाई’ की प्रवृत्ति

 

हसन तहसीन

5 सितम्बर 2013

"आतंकवाद से लड़ाई" शब्द की खोज 9/11 के हमलों के बाद राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के प्रशासन द्वारा की गई थी। अमेरिकियों को महसूस हुआ कि उनका देश आतंकवादी हमलों की चपेट में था और परिणामस्वरूप वाशिंगटन ने आतंकवाद के खिलाफ एक तरफा तौर पर कार्रवाई करने का अधिकार खुद को दे दिया। समय बीतने के साथ साथ इस शब्द का उपयोग बड़ी संख्या में नेताओं के द्वारा अपने राजनीतिक विरोधियों से लड़ने के बहाने के रूप में किया जाने लगा।

अमेरिका ने एक असंतुलित सैन्य टकराव में अफगानिस्तान पर हमला किया, दुनिया की एक मात्र सुपर पावर ने एक ऐसे देश की क़ब्र खोद दी जो ज़्यादातर मामलों में पहले भी और आज भी बहुत बदतर हालत में है। हमले के द्वारा अमेरिका के सभी उद्देश्य पूरे नहीं हुए लेकिन अमेरिका को मध्य एशिया में पैर जमाने के अपने गुप्त एजेंडे को हासिल करने में कामयाब हो गया।

अमेरिका ने सूडान, सोमालिया और यमन पर भी हमला किया। इसने कई देशों, खास तौर से अरब देशों की आशंकाओं को बढ़ा दिया कि वो आतंकवाद के खिलाफ युद्ध की आड़ में अमेरिकी हमलों का निशाना बन सकते हैं।

सैन्य ताक़त

अमेरिका ने सूडान, सोमालिया और यमन के खिलाफ हमलों में अपनी सैन्य शक्ति का इस्तेमाल किया, और इसने ईरान, इराक और उत्तर कोरिया को भी सीधे तौर पर धमकी दी, जिन्हें राष्ट्रपति बुश ने "बुराई की धुरी" कहा है।

ऐसा लगता है कि अमेरिकी प्रशासन मिस्र की तरफ़ रुख़ करने से पहले सीरिया पर हमला करने के लिए अड़ा हुआ है।

उत्तर कोरिया को अमेरिका ने विरोधी देशों की सूची में सिर्फ इसलिए शामिल नहीं किया कि प्योंग-यांग ने उसे सीधे तौर पर धमकी दी थी बल्कि इसलिए कि वो इन आरोपों से इंकार कर सके कि अमेरिका का निशाना सिर्फ अरब और इस्लामी देश हैं।

11 फरवरी 2002 को लंदन टाइम्स ने एक अज्ञात अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से कहा कि वाशिंगटन के पास सोमालिया और यमन के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने का औचित्य साबित करने के लिए पर्याप्त सुबूत थे। लेकिन अधिकारियों ने इस बात का खुलासा नहीं किया कि वो सुबूत क्या थे।

उस समय के सीआईए के निदेशक जॉर्ज टेनेट ने खुले तौर पर कहा था कि आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका की योजना भविष्य में मध्य पूर्व के देशों के संगठनों जैसे हमास, अल-जिहाद मूवमेंट, हेज़्बुल्लाह और पॉपुलर फ्रंट फॉर लिबरेशन ऑफ फिलीस्तीन आदि को शामिल करने तक विस्तार किया जा सकता है। इस तरह के बयानों ने चिंता और संदेह को जन्म दिया, क्योंकि विश्व भर के नेता इस बात का अनुमान लगाने में असमर्थ थे कि अफगानिस्तान के बाद अमेरिका का अगला क़दम क्या होगा।

एक तरफा संघर्ष

आतंकवाद के खिलाफ एक तरफा लड़ाई के फैसले को अगर अमेरिका ऐसा करना ज़रूरी समझता है, तो ये आतंकवाद के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय गठबंधन के गंभीर विभाजन का कारण बन सकता है, जिसे स्थापित करने में अमेरिका को कई बरस लग गये।

नाटो जिसने इराक के खिलाफ युद्ध का पूरी तरह से विरोध किया था वो भी अमेरिका की सैन्य कार्रवाईयों को बिना सोचे समझे अपनी मदद देने पर अब दोबारा सोचना शुरु कर दिया है। बिना किसी अपवाद के अरब देशों ने भी आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के बहाने किसी भी अरब या इस्लामी देश पर हमले का समर्थन करने से इंकार किया है। रूस ने भी ऐसे किसी भी हमले के खिलाफ चेतावनी दी है जिसकी अनुमति सुरक्षा परिषद द्वारा न दी गई हो। चीन ने हमेशा की तरह अमेरिका कार्रवाईयों की विश्वसनीयता पर शक किया है। चीन का कहना है कि अमेरिका अक्सर अपने निर्णय जल्दबाज़ी में लेता है और इन पर ध्यानपूर्क सोच विचार नहीं किया गया होता है।  

दुनिया ने अफगानिस्तान के खिलाफ अमेरिकी युद्ध का समर्थन इसलिए किया ताकि तालिबान और अलक़ायदा को तबाह किया जा सके जिन्होंने मिल कर कई आतंकवादी संगठनों को गले लगाया है।

आज मिस्र, सिनाई रेगिस्तान में आतंकवादी तत्वों के खिलाफ असली लड़ाई लड़ रहा है। वाशिंगटन न केवल इन तत्वों को खत्म करने मिस्र के अधिकार से उसे वंचित कर रहा है बल्कि हमास और अन्य आतंकवादी संगठनों को देश को अस्थिर करने के लिए प्रेरित भी कर रहा है।

मिस्र की उपेक्षा?

यहां सवाल ये पैदा होता है कि क्यों ओबामा प्रशासन सिनाई में मौजुद आतंकवादी समूहों की अनदेखी कर रहा है? ऐसा क्यों है कि वो आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में मिस्र का समर्थन नहीं कर रहा है? क्यों अतीत में अमेरिका ने बादेर मायनहोफ और जापानी रेड आर्मी जैसे कई आतंकवादी संगठनों के खिलाफ स्पष्ट रुख अख्तियार नहीं किया? क्या अमेरिका का ये विचार है कि सभी आतंकवाद अरब और इस्लामी देशों से ही पैदा होता है?

ऐसा लगता है कि वर्तमान अमेरिकी प्रशासन मिस्र की तरफ अपना रुख करने से पहले सीरिया को तबाह करने पर अड़ा हुआ है। मिस्र के लोग ग्रेटर मध्य पूर्व के बारे में अमेरिकी योजना को नाकाम करने में सक्षम थे, जिसे हासिल करने के लिए अमेरिका 60 से अधिक बरसों से संघर्ष कर रहा है।

दूसरे देशों को अपने अधीन करने और उनका दोहन करने के लिए अमेरिका की महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं। ये पूरी तरह से उपनिवेशवादी योजनाएं हैं। अमेरिका के अक्खड़ रवैय्ये ने दुनिया भर में उसके दुश्मन पैदा कर दिये हैं जिसके नतीजे में अमेरिकी लोगों को किसी भी समय आतंकवादी हमलों की आशंका रहती है। हमें उम्मीद है कि अमेरिकी जनता अपनी सरकार की साज़िशों से अवगत होगी ताकि वो दुनिया के दूसरे लोगों के प्यार और सम्मान खो न दें।

हसन तहसीन, मिस्र के एक अनुभवी लेखक और सऊदी गजट सहित अरब सहित पूरे अरब के अखबारों के नियमित लेखक हैं। उनका लेखन मध्य पूर्व विवाद पर केन्द्रित होते हैं। तहसीन के राजनीतिक विश्लेषणों का केंद्र विशेष रूप से क्षेत्रीय स्तर पर अरब इज़रायल सम्बंध हैं और पश्चिमी दुनिया के साथ सम्बंधों सहित मिस्र की देशी और विदेशी नीतियां हैं।

स्रोत: http://english.alarabiya.net/en/views/news/world/2013/09/05/The-phenomenon-of-fighting-terrorism-.html

URL for English article:

http://www.newageislam.com/islam,terrorism-and-jihad/hassan-tahsin/the-phenomenon-of-‘fighting-terrorism’/d/13381

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http://www.newageislam.com/urdu-section/hassan-tahsin,-tr-new-age-islam/the-phenomenon-of-‘fighting-terrorism’--دہشت-گردی-سے-جنگ--کا-رجحان/d/13436

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TOTAL COMMENTS:-   1


  • America terrorism ko badhawa bhi deta hai aur terrorism ke khatme ka dikhawa bhi karta hai,yeh america ki dohari policy hai,darasal ab america ki bhi politics islam aur musalmano par depend ho gayi hai. america apne hi galat faishalo se dunia ko jahannum bana raha hai,ye un nato ke sahyogi countries ko samajhana chahiye jo america ki chaplusi karte hai.
    By Anis faiz - 10/8/2013 1:42:29 AM



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